Saturday, October 24, 2009

ठंडी हवाएं लहराके आये....साहिर, बर्मन दा और लता का संगम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 241

हिंदी फ़िल्म संगीत जगत में गीतकार-संगीतकार की जोडियाँ कोई नई बात नहीं है। चाहे आरज़ू लखनवी व आर. सी. बोराल की जोड़ी हो, या क़मर जलालाबादी व हुस्नलाल भगतराम की जोड़ी, शैलेन्द्र/हसरत - शंकर जयकिशन हो, या फिर शक़ील-नौशाद की जोड़ी, फ़िल्म संगीत के हर युग में, हर दौर में इस तरह की जोडियों की भरमार रही है। इन में से कुछ कलाकार ऐसे भी थे जिन्होने एक से ज़्यादा जोडियाँ बनाई। ऐसे ही एक गीतकार थे साहिर लुधियानवी और ऐसे ही एक संगीतकार थे सचिन देव बर्मन। साहिर साहब ने सचिन दा के साथ तो काम किया ही, संगीतकार रवि के साथ भी उनकी ट्युनिंग् बहुत अच्छी जमी। ठीक उसी तरह सचिन दा के साथ साहिर के अलावा गीतकार शैलेन्द्र, मजरूह, नीरज और कुछ हद तक आनंद बक्शी ने अच्छी पारी खेली। दोस्तों, कितनी अजीब बात है कि २५ अक्तुबर को साहिर साहब की पुण्य तिथि है और उसके ठीक ६ दिन बाद, ३१ अक्तुबर को है बर्मन दादा की पुण्य तिथि। इसलिए इन दो महान कलाकारों की जोड़ी को एक साथ स्मरण करने का यही उचित समय है, और उन्होनें एक साथ मिलकर जो सदाबहार नग़में हमें दिए हैं उन्हे एक बार फिर सुनने का यही एक लाजवाब मौका है। तो चलिए, आज से अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनिए साहिर लुधियानवी के लिखे हुए गीत जिन्हे सुरों में पिरोया है सचिन देव बर्मन ने, यह है हमारी ख़ास पेशकश 'जिन पर नाज़ है हिंद को'। इस शृंखला के लिए पहला गीत जो हमने चुना है वह साहिर साहब की पहली प्रदर्शित फ़िल्म भी है। और पहली ही फ़िल्म में उन्हे मिली अपार सफलता। यह है १९५१ की फ़िल्म 'नौजवान' का सदाबहार गीत "ठंडी हवाएँ लहराके आयें, रुत है जवाँ तुमको यहाँ कैसे बुलायें"। लता जी की नई ताज़ी कमसीन आवाज़ में यह गीत बेहद सुरीला बन पड़ा है। जहाँ एक तरफ़ गीत मे इस धरती का सुरीलापन है, वहीं कुछ कुछ पाश्चात्य रंग भी है, आलाप भी है, हमिंग् भी है, व्हिस्लिंग् भी है। कुल मिलाकर उस ज़माने के लिहाज़ से एक नया प्रयोग रहा है यह गीत। और उससे भी ज़्यादा ख़ास बात यह कि इस गीत की धुन पर आगे चलकर दो और गीत बनें जिन्हे भी अपार सफलता हासिल हुई। इनमें से एक है रोशन के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'ममता' का गीत "रहें ना रहें हम", जिसके लिए रोशन साहब ने सचिन दा की अनुमती ली थी, और दूसरा गीत है छोटे नवाब पंचम का फ़िल्म 'सागर' का गीत "सागर किनारे दिल ये पुकारे"।

सचिन देव बर्मन का फ़िल्म जगत में पदार्पण सन् १९४१ में हुआ था बतौर गायक, और फ़िल्म थी 'ताज महल', जिसके सगीतकार थे माधवलाल (मधुलाल) दामोदर मास्टर। हालाँकि उन्होने सन् १९४० में ही बंगला फ़िल्म 'राजकुमार निर्शोने' में संगीत दे चुके थे, हिंदी फ़िल्मों में उन्होने पहली बार संगीत दिया सन् १९४४ में जब फ़िल्मिस्तान के शशधर मुखर्जी ने उन्हे न्योता दिया अपनी दो फ़िल्मों ('आठ दिन' और 'शिकारी') में संगीत देने का। इन दोनों फ़िल्मों में गीत लिखे क़मर जलालाबादी ने। उसके बाद १९४७ में फ़िल्म 'दो भाई' में संगीत देकर उन्हे पहली बड़ी सफलता हासिल हुई, इस फ़िल्म में उनके गीतकार रहे राजा मेहंदी अली ख़ान। १९४९ की फ़िल्म 'शबनम' में एक बार फिर क़मर साहब ने दादा के लिए गीत लिखे। फिर उसके बाद १९५० की फ़िल्म 'मशाल' में बर्मन दादा की धुनों के लिए कवि प्रदीप ने गीत लिखे। और फिर आया १९५१ का साल जिससे शुरुआत हुई सचिन देव बर्मन और साहिर लुधियानवी के जोड़ी की, जिस जोड़ी ने ५० के दशक में एक से एक हिट और बेहद सुरीले गीत दिए। निस्संदेह इन गीतों का उनके फ़िल्मों की कामयाबी में बड़ा हाथ रहा। साहिर साहब १९४९ में बम्बई आए थे और सहायक संवाद लेखक की हैसीयत से नौकरी कर रहे थे। १९५१ में महेश कौल ने अपनी फ़िल्म 'नौजवान' के लिए उन्हे गीतकार चुना और इस तरह से फ़िल्म जगत को मिला एक बेहतरीन गीतकार। नलिनी जयवंत और प्रेम नाथ अभिनीत यह फ़िल्म अगर आज लोग याद करते हैं तो बस आज के प्रस्तुत गीत की वजह से। वैसे तो प्रदर्शित होने वाले तारीख़ के लिहाज़ से 'नौजवान' ही साहिर साहब की पहली फ़िल्म है बतौर गीतकार, लेकिन कहा जाता है कि उन्होने सब से पहले अनिल विश्वास के साथ १९५० की फ़िल्म 'दोराहा' में काम किया था, लेकिन फ़िल्म बाद में रिलीज़ हुई। फ़िल्म 'दोराहा' में तलत महमूद के गाए कुछ हिट गीत रहे "मोहब्बत तर्क की मैने", "दिल में बसाके मीत बनाके भूल ना जाना प्रीत पुरानी" और "तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं कभी, बेदर्द मैने तुझको भुलाया नहीं अभी"। तो दोस्तों, आइए अब सुना जाए आज का गीत। साहिर साहब और बर्मन दादा से संबधित बातें आगे भी जारी रहेंगी इस शृंखला में। अब दीजिए इजाज़त, कल फिर होगी मुलाक़ात, फिलहाल आप ठंडी हवाओं का आनंद लीजिए, और याद कीजिए अपने उस पहले पहले प्यार को जिसके इंतज़ार में आप कुछ इसी तरह की ठंडी आहें भरा करते थे कभी।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. साहिर साहब का लिखा एक यादगार गीत.
२. संगीत बर्मन दा का है.
३. एक अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"दौलत".

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी बिलकुल सही, एक कदम और आप आगे बढ़ गए हैं. बधाई, "नौजवान" साहिर साहब की पहली प्रर्दशित फिल्म थी, हाँ शरद जी ने जिस फिल्म का नाम लिया वो भी पहली फिल्म हो सकती है, बाज़ी उसके बाद प्रर्दशित हुई थी ये तय है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सवा सेर गेहूं - प्रेमचंद

सवा सेर गेहूं - प्रेमचंद
सुनो कहानी: प्रेमचंद की "सवा सेर गेहूं"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद की हृदयस्पर्शी कहानी "ज्योति" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानी "सवा सेर गेहूं", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 59 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

महात्मा जी ने भोजन किया। लम्बी तान कर सोये। प्रातःकाल आर्शीवाद देकर अपनी राह ली।
(प्रेमचंद की "सवा सेर गेहूं" से एक अंश)



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#Fourty Third Story, Sawa Ser Gehun: Premchand/Hindi Audio Book/2009/37. Voice: Anurag Sharma

Friday, October 23, 2009

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ.....बॉम्बे माफ़ कीजियेगा मुंबई मेरी जान का नारा लगते गीता दत्त और रफी साहब

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 240

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आज बारी है गीता दत्त और मोहम्मद रफ़ी साहब के गाये एक युगल गीत की। जो श्रोता व पाठक हमसे हाल में जुड़े हैं, उनकी सहूलीयत के लिए हम यहाँ बता दें कि इससे पहले इस महफ़िल में दो रफ़ी-गीता डुएट्स् बज चुके हैं, पहला गीत था फ़िल्म 'मिस्टर ऐंड मिसेस ५५' का "जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी", और दूसरा गीत था फ़िल्म 'मिलाप' का "बचना ज़रा ये ज़माना है बुरा"। और आज तीसरी बार हम किसी रफ़ी-गीता डुएट लेकर हाज़िर हुए हैं। युं तो रफ़ी साहब और गीता जी ने एक साथ कई रोमांटिक गीत गाए हैं, लेकिन उनमें एक हल्की फुल्की कॉमेडी का अंग भी हमेशा रहा है जिसकी चुलबुलाहट हमें गुदगुदा जाती है, फिर चाहे संगीतकार सचिन देव बर्मन हो या फिर हमारे नय्यर साहब। आज सुनिए ओ. पी. नय्यर के संगीत में मजरूह साहब की एक और सुप्रसिद्ध रचना फ़िल्म 'सी. आइ. डी' से। इस फ़िल्म से शम्शाद बेग़म का गाया "बूझ मेरा क्या नाव रे" आप सुन चुके हैं इस महफ़िल में और इस फ़िल्म के बारे में हम आपको बता भी चुके हैं। आज के इस प्रस्तुत गीत के बारे में यही कहेंगे कि यह गीत अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला के १९५६ के वार्षिक कार्यक्रम में सरताज गीत बना था, यानी कि उस साल का सब से लोकप्रिय गीत। जब अमीन सायानी ने गीतमाला कार्यक्रम के पहले २५ वर्षों के सरताज गीतों का ऒडियो कसैट जारी किया था, तब इस गीत को प्रस्तुत करते हुए उन्होने कहा था - "१९५६ के आते आते बिनाका गीतमाला ने तहल्का मचाना शुरु कर दिया, ऐसा कोई रेडियो प्रोग्राम नहीं था जिससे कि हिन्दुस्तानी फ़िल्म संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सके। उस लोकप्रियता ने कई संगीतकारों को संगीत प्रेमियों के दिलों में बसा दिया था, जैसे कि अनिल विश्वास, सी. रामचन्द्र, नौशाद, एस. डी. बर्मन, हेमन्त कुमार, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, और १९५६ में ज़ोरों में उभरने लगे सलिल चौधरी, वसंत देसाई और ओ. पी. नय्यर।"

दोस्तों, बम्बई अर्थात आज के मुंबई के प्रति आम लोगों की धारणा ऐसी है कि यह एक रंगीन नगरी है जहाँ पर सारे सपने सच होते हैं, एक सपनों की दुनिया है मुंबई। यह बात और है कि हक़ीक़त कुछ और ही है। ख़ैर, ५० के दशक के कई फ़िल्मों के ज़रिये उस समय के बम्बई का नज़ारा देखा जा सकता है। यहाँ तक कि बम्बई पर समय समय पर कुछ गानें भी बनें हैं जो बम्बई के असली चेहरे का खुलासा करते हैं। इस श्रेणी में जो पहला गीत रहा वह मेरे ख़याल से प्रस्तुत गीत ही होना चाहिए। ५० के दशक के मध्य भाग की बम्बई को जानने के लिए यह गीत मददगार साबित हो सकता है। इस गीत में जॉनी वाकर एक के बाद एक लोगों से टकराते रहते हैं और हर बार उनका बटुआ हथिया लेते हैं। जी हाँ, एक पाकिटमार का किरदार निभाया था उन्होने। गीता दत्त की आवाज़ लेकर कुमकुम का गीत के तीसरे अंतरे में आगमन होता है। जहाँ जॉनी वाकर बम्बई की बुराई करते हैं, वहीं कुमकुम बम्बई पर फ़िदा हैं। एक तरफ़ हताशा और नकारात्मक सोच, तो दूसरी तरफ़ आशा की किरण। कुल मिलाकर इस माया नगरी का एक चित्र जनता के सामने पेश करने का बीड़ा उठाया था गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। कुछ बातें हमारे समाज की ऐसी है जिन पर समय का कोई प्रभाव नहीं चल पाया है। पचास साल पहले लिखे गए इस गीत में मजरूह साहब ने लिखा था कि "बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस हँस", यह बात आज की दुनिया में भी १००% सही है। तो आइए दोस्तों, बम्बई की सैर पर चलें मोहम्मद रफ़ी और गीता दत्त के साथ, "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ, ज़रा हट के ज़रा बच के ये है बॊम्बे मेरी जान"। गीत का पंच लाइन है "ये है बॊम्बे मेरी जान", जो इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ कि आज भी लोग मुंबई के बारे में कुछ कहते हुए मज़ाकिया तौर पर इसका इस्तेमाल करते हैं। इस शीर्षक से एक फ़िल्म भी बनी थी। 'मिस्टर आशिक़' शीर्षक से एक फ़िल्म बनी थी सैफ़ अली ख़ान और ट्विंकल खन्ना अभिनीत, जिसे रिलीज़ करते वक़्त निर्माता ने इसका नाम बदल कर रख दिया था 'ये है मुंबई मेरी जान'। और लीजिए, अब सुनिए 'सी. आइ. डी' से "ये है बॊम्बे मेरी जान" और याद कीजिये जॊनी वाकर और कुमकुम की उस कॊमिक जोड़ी को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल से शुरू होगी एक विशेष शृंखला जो समर्पित है दो अमर फनकारों के नाम.
२. इनमें से एक गीतकार है और एक संगीतकार, दोनों की पुण्यतिथि इसी माह के आखिरी सप्ताह में आ रही है.
३. गीतकार की पहली फिल्म का है ये गीत जिसके मुखड़े में शब्द है - "जवाँ".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आपका जवाब हमने बाद में देखा, आपके दो अंक सुरक्षित हैं, गीतकार के विषय में कुछ संशय था, पर आप और पराग जी बिकुल सही हैं, "ओ बेकरार दिल" के गीतकार कैफी साहब ही हैं, इस भूल के लिए माफ़ी चाहेंगें. पर पराग जी आपने तो बस कमाल ही कर दिया, जेकपोट सवाल का सही जवाब देकर कमा लिए पूरे ४ अंक, अब आप मात्र ६ अंक दूर हैं मंजिल से, मजरूह साहब के सबसे अधिक 37 गीत हैं अब तक के सफ़र में, दूसरे स्थान पर है शैलेन्द्र (३०), साहिर साहब के १९ गीत है और शकील के १४. बधाई बहुत आपको. आज का गीत तो किसी तोहफे से कम नहीं होगा आपके लिए :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ...."फ़राज़" के शब्द और "रूना लैला" की आवाज़...

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५६

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की चौथी गज़ल लेकर। आज की गज़ल पिछली तीन गज़लों की हीं तरह खासी लोकप्रिय है। न सिर्फ़ इस गज़ल के चाहने वाले बहुतेरे हैं, बल्कि इस गज़ल के गज़लगो का नाम हर गज़ल-प्रेमी की जुबान पर काबिज़ रहता है। इस गज़ल को गाने वाली फ़नकारा भी किसी मायने में कम नहीं हैं। हमारे लिए अच्छी बात यह है कि हमने महफ़िल-ए-गज़ल में इन दोनों को पहले हीं पेश किया हुआ है...लेकिन अलग-अलग। आज यह पहला मौका है कि दोनों एक-साथ महफ़िल की शोभा बन रहे हैं। तो चलिए हम आज की महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं। उससे पहले एक आवश्यक सूचना: ५६ कड़ियों से महफ़िल सप्ताह में दो दिन सज रही है। शुरू की तीन कड़ियो में हमने दो-दो गज़लें पेश की थीं और उस दौरान महफ़िल का अंदाज़ कुछ अलग हीं था। फिर हमे उस अंदाज़, उस तरीके, उस ढाँचे में कुछ कमी महसूस हुई और हमने उसमें परिवर्त्तन करने का निर्णय लिया और वह निर्णय बेहद सफ़ल साबित हुआ। अब चूँकि उस निर्णय पर हमने ५० से भी ज्यादा कड़ियाँ तैयार कर ली हैं तो हमें लगता है कि बदलाव करने का फिर से समय आ गया है। तो अभी तक हम जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, उसके अनुसार अगले सप्ताह से महफ़िल सप्ताह में एक हीं दिन सजेगी और वह दिन रहेगा..बुधवार। महफ़िल में और भी क्या परिवर्त्तन आएँगे, इस पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। इसलिए आपको वह परिवर्त्तन देखने के लिए अगले बुधवार २८ अक्टूबर तक इंतज़ार करना होगा। अगर आप कुछ सुझाव देना चाहें तो आपका स्वागत है। कृप्या रविवार सुबह तक अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपने विचार हम तक प्रेषित कर दें। धन्यवाद!!

चलिए अब आज के फ़नकार की बात करते हैं। आज की महफ़िल को हमने अहमद फ़राज़ साहब के सुपूर्द करने का फ़ैसला किया है। फ़राज़ साहब के बारे में अपने पुस्तक "आज के प्रसिद्ध शायर- अहमद फ़राज़" में कन्हैया लाल नंदन साहब लिखते हैं: अहमद फ़राज़,जिनका असली नाम सैयद अहमद शाह है, का जन्म पाकिस्तान के सरहदी इलाके कोहत में १४ जनवरी १९३१ को हुआ। उनके वालिद (पिता) एक मामूली शिक्षक थे। वे अहमद फ़राज़ को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि उनकी हर जिद वे पूरी कर पाते। बचपन का वाक़या है कि एक बार अहमद फ़राज़ के पिता कुछ कपड़े लाए। कपड़े अहमद फ़राज़ को पसन्द नहीं आए। उन्होंने ख़ूब शोर मचाया कि ‘हम कम्बल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे’। इस पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे पहला शेर भी कह दिया:

लाए हैं सबके लिए कपड़े सेल से,
लाए हैं हमारे लिए कपड़े जेल से।

बात यहाँ तक बढ़ी कि ‘फ़राज़’ घर छोड़कर फ़रार हो गए। वह फ़रारी तबियत में जज़्ब हो गई। आज तक अहमद फ़राज़ फ़रारी जी रहे हैं। कभी लन्दन, कभी न्यूयार्क, कभी रियाद तो कभी मुम्बई और हैदराबाद।
जानकारी के लिए बता दें कि "फ़राज़" साहब पिछले अगस्त २५ अगस्त को सुपूर्द-ए-खाक हो चुके हैं। इसी पुस्तक में नंदन साहब आगे लिखते हैं: अहमद फ़राज़ की शोहरत ने अब अपने गिर्द एक ऐसा प्रभामण्डल पैदा कर लिया है जिसमें उनकी साम्राज्यवाद और वाज़ीवाद से जूझने वाले एक क्रान्तिकारी रुमानी शायर की छवि चस्पाँ है। फ़राज़ का अपना निजी जीवन भी इस प्रभामण्डल के बनाने में एक कारण रहा है, उन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से बाहर गुज़ारा है और वे एक जिलावतन (देशनिकाला) शायर के रूप में पहचाने और सराहे गए हैं। इसके अक्स उनकी शायरी में जगह-जगह हैं। उसमें देश से दूर रहने, देश के लिए तड़पने का एहसास, हिजरत की पीड़ा और हिजरत करने वालों का दर्द जगह-जगह मिलता है। बखूबी हम इसे फ़राज़ की शायरी के विभिन्न रंगों का एक ख़ास रंग कह सकते हैं। हिजरत यानी देश से दूर रहने की पीड़ा और अपने देश की यादें अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साथ उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।


अपनी पुस्तक "खानाबदोश" की भूमिका में वे लिखते है: मुझे इसका ऐतराफ़ करते हुए एक निशात-अंगेज़ फ़ख़्र महसूस होता है कि जिस शायरी को मैंने सिर्फ़ अपने जज़्बात के इज़हार का वसीला बनाया था इसमें मेरे पढ़ने वालों को अपनी कहानी नज़र आई और अब ये आलम है कि जहाँ-जहाँ भी इन्सानी बस्तियाँ हैं और वहाँ शायरी पढ़ी जाती है मेरी किताबों की माँग है और गा़लिबन इसलिए दुनिया की बहुत सी छोटी-बड़ी जु़बानों में मेरी शायरी के तर्जुमे छप चुके हैं या छप रहे हैं। इस मामले में मैं अपने आपको दुनिया के उन चन्द ख़ुशक़िस्मत लिखने वालों में शुमार पाता हूँ जिन्हें लोगों ने उनकी ज़िन्दगी में ही बे-इन्तिहा मोहब्बत और पज़ीराई बख़्शी है। हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहाँ के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शेअरी तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा। इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं। इसके अलावा मेरी ग़ज़लों को आम लोगों तक पहुँचाने में हिन्दुस्तानी गुलूकारों ने भी ऐतराफ़े-मोहब्बत किया, जिनमें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, जगजीत सिंह, पंकज उधास और कई दूसरे नुमायाँ गुलूकार शामिल हैं। फ़राज़ साहब यूँ हीं हम सब की आँखों के तारे नहीं थे। कुछ तो बात थी या कहिए है कि उनका लिखा एक-एक हर्फ़ हमें बेशकिमती मालूम पड़ता है। उदाहरण के लिए इसी शेर को देख लीजिए:

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो ...


क्या बात है!!! पढकर ऐसा लगता है कि मानो कोई हमारी हीं कहानी सुना रहा हो। आप क्या कहते हैं?

अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये:

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

आज जो दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन ये थी कि ___ हिलनी चाहिए


आपके विकल्प हैं -
a) नींव, b) बुनियाद, c) सरकार, d) आधार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "हिचकी" और शेर कुछ यूं था -

आखिरी हिचकी तेरे ज़ानों पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ....

क़तील शिफ़ाई साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "सीमा" जी ने। "हिचकी" शब्द पर आपने कुछ शेर भी पेश किए:

साथ हर हिचकी के लब पर उनका नाम आया तो क्या?
जो समझ ही में न आये वो पयाम आया तो क्या? (आरज़ू लखनवी)

तेरी हर बात चलकर यूँ भी मेरे जी से आती है,
कि जैसे याद की खुशबू किसी हिचकी से आती है। (डा. कुँअर 'बेचैन')

सीमा जी के बाद महफ़िल की शान बने "शामिख" जी। यह रही आपकी पेशकश:

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो,
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो। (सुभद्राकुमारी चौहान)

इनके बाद महफ़िल में हाज़िर हुए अपने स्वरचित शेरों के साथ शरद जी और मंजु जी। ये रही आप दोनों की रचनाएँ। पहले शरद जी:

मैं इसलिए तुझे अब याद करूंगा न सनम
जो हिचकियाँ तुझे चलने लगीं तो बन्द न होंगीं।

इधर हिचकी चली मुझको ,उधर तू मुझको याद आई
मगर ये तय है कि तुझको भी अब हिचकी चली होगी।

और अब मंजु जी:

हिचकी थमने का नाम ही नहीं ले रही थी ,
सजा ए मौत लगने लगी ,
रोकने के लिए कई टोटके भी किये ,
जैसे ही उसका नाम लबों ने लिया
झट से गायब हो गयी .

दिशा जी, आप महफ़िल में आईं, बहुत अच्छा लगा....लेकिन शेर की कमी खल गई। अगली बार ध्यान दीजिएगा।
चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, October 22, 2009

ओ बेकरार दिल हो चुका है मुझको आंसुओं से प्यार....लता का गाया एक बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 239

ल हमने बात की थी हेमन्त कुमार के निजी बैनर 'गीतांजली पिक्चर्स' के तले बनी फ़िल्म 'ख़ामोशी' की। हेमन्त दा के इस बैनर तले बनी फ़िल्मों और उनके मीठे संगीत का ही शायद यह असर है कि एक गीत से दिल ही नहीं भरता इसलिए आज हम एक बार फिर सुनने जा रहे हैं उनके इसी बैनर तले निर्मित फ़िल्म 'कोहरा' से एक और गीत, इससे पहले इस फ़िल्म का हेमन्त दा का ही गाया "ये नयन डरे डरे" आप इस महफ़िल में सुन चुके हैं। आज इस फ़िल्म से सुनिए लता मंगेशकर की आवाज़ में "ओ बेक़रार दिल हो चुका है मुझको आँसुओं से प्यार"। 'बीस साल बाद' और 'कोहरा' हेमन्त दा के इस बैनर की दो उल्लेखनीय सस्पेन्स फ़िल्में रहीं। आइए आज 'कोहरा' की कहानी आपको बताई जाए। अपने पिता के मौत के बाद राजेश्वरी अनाथ हो जाती है, और बोझ बन जाती है एक विधवा पर जो माँ है एक ऐसे बेटे रमेश की जिसकी मानसिक हालत ठीक नहीं। उस औरत का यह मानना है कि अगर राजेश्वरी रमेश से शादी कर ले तो वो ठीक हो जाएगा। लेकिन राजेश्वरी को कतई मंज़ूर नहीं कि वो उस पागल से शादी करे, इसलिए वो आत्महत्या करने निकल पड़ती है। लेकिन संयोगवश उसकी मुलाक़ात हो जाती है राजा अमित कुमार सिंह से। दोनों मिलते हैं, उन्हे एक दूजे से प्यार हो जाता है, और फिर वे शादी कर लेते हैं। राजेश्वरी का राजमहल में स्वागत होता है। इस ख़ुशी को अभी तक वो हज़म भी नहीं कर पायी थी कि उसे पता चलता है कि अमित की पूनम नाम की किसी लड़की से एक बार शादी हुई थी जो अब इस दुनिया में नहीं है। और तभी शुरु होता है डर! राजेश्वरी को महसूस होता है कि पूनम की आत्मा अब भी महल में मौजूद है। ख़ास कर उनके शयन कक्ष में जहाँ वो देखती है कि कुर्सियाँ ख़ुद ब ख़ुद हिल रहीं हैं, बिस्तर पर बैठते ही लगता है कि जैसे अभी कोई लेटा हुआ था वहाँ, खिड़कियाँ अपने आप ही खुल जाया करती हैं, और उसे किसी की आवाज़ भी सुनाई देती है। और फिर एक दिन पुलिस बरामद करती है पूनम का कंकाल!!! किसने कत्ल किया था पूनम का? क्या अमित ही ख़ूनी है? क्या वाक़ई पूनम की आत्मा भटक रही है हवेली में? अब क्या होगा राजेश्वरी का? यही थी कोहरा की कहानी, जो अपने ज़माने की एक मशहूर सस्पेन्स थ्रिलर रही। कभी मौका मिले तो ज़रूर देखिएगा दोस्तों, इसीलिए मैनें क्लाइमैक्स नहीं बताई। "झूम झूम ढलती रात" इस फ़िल्म का सस्पेन्स सॊंग् है, ठीक वैसे ही जैसे कि 'बीस साल बाद' का गीत था "कहीं दीप जले कहीं दिल"।

'कोहरा' फ़िल्म के क्रीएटिव टीम के बारे में तो हम आपको उसी दिन बता चुके थे जिस दिन "ये नयन डरे डरे" सुनवाया था। तो क्यों ना आज इस फ़िल्म के गीतकार शक़ील बदायूनी के बारे में कुछ कहा जाए। युं तो शक़ील साहब ने ज़्यादातर संगीतकार नौशाद साहब के लिए ही गीत लिखे, लेकिन दूसरे संगीतकारों के लिए लिखे उनके गानें भी उतने ही मक़बूल हुए थे। उन संगीतकारों में से कुछ नाम शक़ील साहब ने ख़ुद बताए थे अमीन सायानी के एक पुराने इंटरव्यू में जो रिकार्ड हुआ था १९६९ में, जब अमीन भाई ने उनसे पूछा था कि उनकी ज़बरदस्त कामयाबी का सब से ख़ास, सब से अहम राज़ क्या है। शक़ील साहब का जवाब था - "सन्'४६ का गीतकार होकर आज सन्'६९ में भी वही दर्जा हासिल किए हुए हूँ, इसका राज़ इसके सिवा कुछ नहीं अमीन साहब कि मैने हमेशा क्वांटिटी के मुक़ाबले क्वालिटी पर ज़्यादा ध्यान दिया। हालाँकि इस बात से मुझे कुछ माली क़ुरबानियाँ भी करनी पड़ी, मगर मेरा ज़मीर मुतमईन है कि मैने फ़िल्म इंडस्ट्री की ज़्यादा से ज़्यादा ख़िदमत की है, और मुझे फ़क्र है मैने बड़े बड़े पुराने संगीतकारों यानी कि खेमचंद प्रकाश, श्यामसुंदर, ग़ुलाम मोहम्मद, ख़ुर्शीद अनवर, सी. रामचन्द्र, सज्जाद, और नौशाद से लेकर रवि, हेमंत कुमार, कल्याणजी, एस. डी. बर्मन, सोनिक ओमी तक के साथ काम किया।" दोस्तों, आइए सुनते हैं आज का गीत "ओ बेक़रार दिल" आपको यह बताते हुए कि इस गीत का एक बंगला संस्करण भी है जिसे हेमन्त दा ने ही गाया था, गीत के बोल हैं "ओ नोदी रे, एकटी कौथा शुधाई शुधु तोमारे, बोलो कोथाय तोमार देश, तोमार नेइ कि कोनो शेष", जिसके अर्थ हैं "ओ नदी, मैं तुमसे एक ही सवाल पूछती हूँ कि बताओ कहाँ है तुम्हारा देश, और क्या तुम्हारा कोई अंत (शेष) नहीं?" यह गीत बंगला में नदी पर बनने वाला सब से मशहूर गीत रहा है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट". चूँकि कल जो गीत हम सुनेंगें उसकी पहेली पहले ही पूछी जा चुकी है तो कल के लिए एक ख़ास सवाल. कल ओल्ड इस गोल्ड के २४० एपिसोड पूरे हो जायेंगें, सवाल ये है कि इन २५० गीतों में हमने किस गीतकार के गीत सबसे ज्यादा सुने हैं इस शृंखला में. सुविधा के लिए हम आपको चार विकल्प दे रहे हैं, सही जवाब आपको देगा एक बाउंड्री यानी ४ अंक...जो आपका पहला जवाब होगा वही अंतिम होगा, आप विकल्प बदल नहीं सकेंगें. विकल्प हैं -

1. मजरूह सुल्तानपुरी
2. साहिर लुधियानवीं
3. शकील बदायुनीं
4. शैलेन्द्र

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी की शानदार सफलता के बाद एक गहरी "खामोशी" छाई रही कल, और पहेली का "कोहरा" बना रहा, मनु जी आवारा तो कोई सस्पेंस थ्रिलर नहीं है :), खैर सही गीत तो अब आप जान ही चुके होंगें. वैसे इतना मशहूर गीत आप लोगों याद क्यों नहीं आया, ताज्जुब है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

शुक्रान अल्लाह वल हम्दुल्लाह....खुदा की नेमतों पर झुके सोनू निगम, श्रेया और सलीम के स्वर

ताजा सुर ताल TST (32)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें 2 अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से 14 दिसम्बर तक, यानी TST के 40 वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में फिर एक बार सीमा जी छाई रही, पर जवाब बस दो ही सही दिए उन्होंने, खैर आपका स्कोर हुआ 20. यदि किसी ने तीसरे जवाब के लिए कोशिश किया होता तो यकीनन दो अंक मिल सकते थे, तीसरे सवाल का सही जवाब है गीतकार प्रवीण भारद्वाज. अगले 9 एपिसोड में 18 सवाल और आयेंगें आपके सामने, उसके बाद विजेता कौन होगा ये तो हम अभी से नहीं कह सकते, पर ये तय है कि सीमा जी को टक्कर देना अब वाकई बहुत मुश्किल होगा. पर चुनौतियाँ आपको मजबूत बनाती है, तो कमर कसिये इन नयी चुनौतियों के लिए

सुजॉय - सजीव, आज TST में तरोताज़ा क्या सुनवाने जा रहे हैं?

सजीव - धर्मा प्रोडक्शन्स् की नवीन प्रस्तुति 'क़ुर्बान' फ़िल्म के गीत से आज हम शुरुआत कर रहे हैं। करण जोहर निर्मित, रेन्सिल डी'सिल्वा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं सैफ़ अली ख़ान और करीना कपूर।

सुजॉय - मैने सुना है इस फ़िल्म की कहानी जिहाद पर आधारित है। आप ने सुना है कुछ इस बारे में?

सजीव - सुना तो मैने भी यही है। सैफ ने एक ताजा बयान में कहा है कि एक मुसलमान हो कर इस फिल्म को करने में उन्हें गर्व है और उनके साथ करीना का होना भी लोगों में दिलचस्पी पैदा करेगा. फ़िल्म के संगीत में सुफ़ियाना अंदाज़ है। पता है कौन हैं इस फ़िल्म के संगीतकार?

सुजॉय - हाँ, सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने संगीत दिया है। इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से आज कौन सा गीत आप लेकर आए हैं?

सजीव - आज जो गीत हम सुनेंगे वो मेरे ख़याल से इस ऐल्बम का सब से अच्छा गीत है, "शुक्रां अल्लाह"। इस गीत को सुनते हुए तुम्हे फ़िल्म 'फ़ना' के गीत "सुभानल्लाह सुभानल्लाह" की शायद याद आए।

सुजॉय - एक मिनट सजीव, 'फ़ना' का बैकग्राउंड म्युज़िक सलीम-सुलेमान ने ही बनाया था न?

सजीव - बिल्कुल, और मैने तो यह भी सुना है कि "सुभानल्लाह" वाली धुन भी इसी जोड़ी ने बनाई थी जिसे जतिन-ललित ने इस्तेमाल की अपनी धुन "चाँद सिफ़ारिश जो करता हमारी" के साथ। यानी कि "सुभानल्लाह" वाली धुन सलीम-सुलेमान की थी और "चाँद सिफ़ारिश" वाली जगह जतीन-ललित की।

सुजॉय - सोनू निगम, श्रेया घोषाल और सलीम मर्चैंट ने गाया है 'कुर्बान' का यह गीत। ऐज़ युज़ुयल सोनू और श्रेया के नर्म और मासूम अंदाज़ इस गीत में भी सुनाई देती है। और सलीम ने इस गीत में जिस तरह से "शुक्रन अल्लाह" वाली जगह गाया है, एक पाक़ समां सा बंध जाता है।

सजीव - और गीतकार निरंजन अय्यंगर ने लिखा भी है बढ़िया इस गीत को। तो चलो सुनते हैं यह गीत

सुजॉय - चलते चलते बता दें कि "शुक्रां अल्लाह वल हम्दुल्लाह" का मतलब है है- खुदा तेरा शुक्रिया खुदा तेरा करम है....और श्रेय घोषाल अवश्य ही इन दिनों ये मंत्र दोहरा रही होंगी, कल राष्ट्रपति भवन में उन्हें तीसरी बार सर्वश्रेष्ठ गायिका का सम्मान दिया गया, और उन्होंने वहां "ये इश्क हाय" गाकर सबको मन्त्र मुग्ध कर दिया, श्रेया को बधाई देते हुए सुनें उनका ये नया गीत.

शुक्रान अल्लाह (कुर्बान)
आवाज़ रेटिंग - ****1/2



TST ट्रिविया # 16- तुलिप जोशी अभिनीत किस "रियलिस्टिक" फिल्म में सलीम सुलेमान ने संगीत दिया था.?

सुजॉय - वाक़ई बहुत अच्छा गाना था। अब किस गीत की बारी?

सजीव - इस हफ़्ते रिलीज़ हुई है फ़िल्म 'ब्लू'। काफ़ी उत्सुकता से लोग इस फ़िल्म का इंतेज़ार कर रहे थे। तो क्यों ना इसी फ़िल्म से एक और गीत हम अपने श्रोताओं को सुनवाएँ!

सुजॉय - बिल्कुल सुनवाते हैं। लेकिन पहले यह बताइए कि आप ने यह फ़िल्म देखी है? मैने तो नहीं अभी नहीं देखी लेकिन मेरे दफ़्तर के दोस्तों ने देखी है और अफ़सोस की बात है कि लोगों को फ़िल्म कुछ ख़ास पसंद नहीं आ रही है।

सजीव - मैंने भी प्रशेन की समीक्षा पढ़ी तो मन ही नहीं हुआ फिल्म देखने का. यह वाक़ई अफ़सोस की बात है! बॉलीवुड की सब से महँगी फ़िल्म अगर पिट जाए तो अफ़सोस के साथ साथ हैरत भी होती है। लेकिन इस तरफ़ के हादसे पहले भी हुए हैं। याद है ९० के दशक में अनिल कपूर और श्रीदेवी की एक फ़िल्म आयी थी 'रूप की रानी चोरों का राजा', जो उस ज़माने की सब से महँगी फ़िल्म थी और कितनी बुरी से पिटी थी?

सुजॉय - बिल्कुल याद है सजीव। लेकिन अभी 'ब्लू' के बारे में किसी निश्कर्ष पर पहुँचना जल्द बाज़ी होगी। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि फ़िल्म दूसरे या तीसरे सप्ताह से तेज़ी पकड़ लेती है और फिर हिट हो जाती है। वैसे खबर है कि इस फिल्म की टीम ने ब्लू का दूसरा भाग बनाने की योजना को भी अंतिम रूप दे दिया है, इसमें ज्यादा खतरनाक शार्क मछलियाँ होंगी, यानी बजट भी और खतरनाक... ख़ैर, अब बताइए कौन सा गीत हम बजा रहे हैं?

सजीव - यह है विजय प्रकाश और श्रेया घोषाल का गाया "फ़िक़राना होके हम जीयें"। ए. आर. रहमान ने काफ़ी इलेक्ट्रॊनिक्स का इस्तेमाल किया है।

सुजॉय - गाना बुरा नहीं है, लेकिन मुझे कहीं ऐसा लगता है कि ज़्यादा इलेक्ट्रॊनिक्स के इस्तेमाल से गीत में शार्पनेस तो आई है लेकिन गोलाई कहीं दूर चली गई है। बहुत ज़्यादा कृत्रिम सुनाई देता है।

सजीव - तुम्हारी बात सही है, लेकिन एक नयापन भी है गीत में। रहमान ने कम से कम अपने आप को उस वृत्त से बाहर निकालना चाहा जिसके अंदर वो कुछ सालों से फँस गए थे और एक ही तरह का संगीत उनकी तरफ़ से आ रहे थे। पर वाद्यों का शोर इस हद तक हावी है कि कई जगह तो शब्द समझ ही नहीं आते. वैसे धुन ऐसी है कि आप गुनगुना सकें.

सुजॉय - तो चलिए सुनते हैं यह गीत।

फिकराना (ब्लू)
आवाज़ रेटिंग - ***



TST ट्रिविया # 17- किस संगीत कंपनी ने "ब्लू" का एल्बम रीलिस किया है ?

सुजॉय - और अब आज के तीसरे और अंतिम गीत की बारी। कौन सा गीत है?

सजीव - फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स' के चार गानें हमने सुने हैं, आज इसी फ़िल्म के पाँचवे गीत की बारी। इस फ़िल्म में वैसे कुल ८ गानें हैं, और हर एक में कुछ ना कुछ बात ज़रूर है, और शायद इसी वजह से हम इस फ़िल्म के गानें सुनते और सुनवाते चले जा रहे हैं।

सुजॉय - फ़िल्म की कहानी भी शायद रॊक बैंड पर आधारित है। सलमान ख़ान और अजय देवगन की दोस्ती नज़र आएगी इस फ़िल्म में। 'हम दिल दे चुके सनम' के बाद शायद इसी फ़िल्म में ये दोनों साथ साथ नज़र आएँगे। अच्छा, आज किस गीत को आप चुन लाए हैं?

सजीव - "बरसो रे", जिसे गाया है विशाल दादलानी और रूप कुमार राठौड़ ने। याद दिला दूँ कि इस फ़िल्म में विशाल-शेखर का नहीं बल्कि शंकर अहसान लॉय का संगीत है।

सुजॉय - यह आप ने अच्छी बात की तरफ़ इशारा किया है। एक संगीतकार का किसी दूसरे संगीतकार से अपनी फ़िल्म में गानें गवाना बहुत बड़ी और स्पोर्टिंग्‍ स्पिरिट वाली बात होती है। विशाल से राजेश रोशन तक ने गानें गवाए हैं फ़िल्म 'क्रेज़ी फ़ोर' में।

सजीव - शायद इसी वजह से कि बहुत दम है विशाल की आवाज़ में। एक जो रॉक की फ़ील होती है न, उसे हर गायक नहीं निभा सकते। विशाल और के.के जैसे गायक आज के दौर में इस तरह के रॊक शैली के गीतों को बख़ूबी निभाते हैं। वैसे मैं व्यक्तिगत तौर पर इनकी आवाज़ का कायल नहीं हूँ, पर लगता है हमारे सभी संगीतकार उनके जबरदस्त फैन बन चुके हैं.

सुजॉय - हाँ, और इस गीत में भी वही रॉक अंदाज़ है। पर्काशन और माडर्न साज़ों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। पूरे जोश और ज़िंदादिली से इस गीत को हर एक कलाकार ने निभाया है। बेशक़ इस गीत को युवा पीढ़ी को आकृष्ट करने के लिए बनाया गया होगा। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ती है, उसमें देसीपन बढ़ती चली जाती है। और तब देती है सुनाई रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ और एक नाज़ुकी सी छा जाती है गीत में।

सजीव - और अंत में एक बार फिर से वही रॉक अंदाज़। रॉक होते हुए भी गीत समाप्त होता है "हनुमान की जय" के साथ। और यही अंतिम हिस्सा इस गीत एक साधारण गीत ख़ास बना देता है तो चलो सुनते हैं यह गीत। ये गानें हम पहली पहली बार सुन रहे हैं, इसलिए शायद एक ही बार में बहुत अच्छा ना लगे सुनने में, लेकिन धीरे धीरे हो सकता है कि हमारे कानों से होते हुए ये दिल में भी जगह बना लें। देखते हैं क्या होता है, फिलहाल सुनते हैं यह गीत

बरसो (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग -****



TST ट्रिविया # 18- लन्दन ड्रीम्स के निर्देशक ने अपनी एक हिट फिल्म में एक मशहूर होली गीत फिल्माया था, कौनसा था ये गीत और कौन थे इस गीत के संगीतकार ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Wednesday, October 21, 2009

दोस्त कहाँ कोई तुमसा...."सिस्टर्स" की सेवाओं को समर्पित एक अनूठा नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 238

हेमन्त कुमार के निजी बैनर 'गीतांजली पिक्चर्स' के बारे में हम आपको पहले ही बता चुके हैं जब हमने आपको फ़िल्म 'बीस साल बाद' और 'कोहरा' के दो गीत सुनवाए थे। इसी बैनर के तले उन्होने १९६९ में फ़िल्म बनाई 'ख़ामोशी'। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत और उल्लेखनीय अध्याय माना जाता है। आशुतोष मुखर्जी की कहानी पर बनी इस फ़िल्म का निर्देशन किया था असित सेन ने, संवाद और गीत लिखे गुलज़ार ने, संगीत था हेमन्त कुमार का और फ़िल्म के मुख्य चरित्रों में थे राजेश खन्ना व वहीदा रहमान। फ़िल्म जितनी सार्थक थी, उतने ही लोकप्रिय हुए इसके गानें। चाहे वह लता जी का गाया "हमने देखी है इन आँखों की महकती ख़ुशबू" हो या किशोर दा का गाया "वह शाम कुछ अजीब थी", या फिर हेमन्त दा का ही गाया "तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है"। इन तीन हिट गीतों के अलावा दो और गीत थे इस फ़िल्म में, एक आरती मुखर्जी का गाया हुआ और दूसरा मन्ना डे साहब का गाया हुआ, जो फ़िल्माया गया था कॊमेडियन देवेन वर्मा पर, जिन्होने फ़िल्म में एक मरीज़ की भूमिका निभाई थी। देवेन साहब के तबीयत का ही यह गीत था "दोस्त कहाँ कोई तुमसा, तुमसा नहीं कोई मिस्टर, कभी तुम डार्लिंग् कभी महबूबा कभी तुम भोली भाली सिस्टर"। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी हास्य गीत की बारी।

'ख़ामोशी' की कहानी बड़ी ही अनोखी है। कर्नल साहब (नासिर हुसैन) एक अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ हैं। उनकी विशेष रुची उन मरीज़ों में है जो 'मैनिआ' (mania) के शिकार हैं। उनके अनुसार यह बिमारी उन लोगों को होती है जो अपनी माँ के प्यार के लिए तरसते हैं, और अपनी माँ से बिछड़ने के बाद वही प्यार वो दूसरी औरतों में ढ़ूंढते हैं, और उनकी यह तलाश तब तक जारी रहती है जब तक कि वो ऐसी किसी महिला को ढूंढ ना ले जो उसे लगता है कि वही उसे वह प्यार दे सकती है। और अगर हक़ीक़त में ऐसा नहीं हुआ तो उसका दिमाग़ ख़राब हो जाता है, नफ़रत भर जाती है उसके दिल-ओ-दिमाग़ में, और वो शिकार हो जाता है 'ऐक्युट मैनिआ' का। तो कर्नल साहब के अस्पताल में एक नर्स है राधा (वहीदा रहमान) जिसने पहले एक इसी तरह के मरीज़ देव (धर्मेन्द्र) को ठीक कर दिया था अपने यत्न और प्रेम से, और अब बारी है अरुण चौधरी (राजेश खन्ना) नाम के एक मरीज़ की। देव के साथ उसकी घनिष्ठता हो जाने की वजह से ना चाहते हुए भी राधा को अरुण की माँ जैसी देखभाल करने वाली नर्स की भूमिका में अपना काम शुरु करना पड़ा ताकी वो उसका विश्वास जीत सके, उसकी तकलीफ़ को दूर कर सके, और उसे एक बार फिर से आम ज़िंदगी जीने के लायक बना सके। लेकिन ऐसा करते हुए राधा दिन-ब-दिन अरुण के साथ ऐसी घुलती मिलती गई कि मन ही मन उससे प्यार करने लगी यह जानते हुए भी कि ठीक हो जाते ही अरुण सब कुछ भूल जाएगा और शायद उसे याद भी ना हो कि राधा नाम की किसी लड़की ने उसकी इतनी देखभाल की थी। अब राधा को यह निर्णय ख़ुद ही लेना है कि क्या उसे नर्स बन कर ही अपना दायित्व निभाते जाना है, या फिर एक औरत की तरह उसे भी हक़ है देव या अरुण से प्यार करने का! इस फ़िल्म का निर्माण बंगला में भी हुआ था 'दीप जेले जाई' (दीया जलाते जाऊँ) शीर्षक से, जिसमें अरुण का चरित्र निभाया बसंत चौधरी ने, राधा का किरदार निभाया सुचित्रा सेन ने और कर्नल साहब की भूमिका में थे पहाड़ी सान्याल। वापस आते हैं 'ख़ामोशी' पर। इस संजीदे कहानी में थोड़ी सी गुदगुदी पैदा करने के लिए कॊमेडियन देवेन वर्मा को उसी अस्पताल में एक मरीज़ का रोल दिया गया था, और उन्ही पर फ़िल्माया गया आज का प्रस्तुत गीत, सुनिए मन्ना डे की आवाज़ में, गुलज़ार के बोल और हेमन्त कुमार का संगीत। मन्ना डे आज राष्ट्रपति के हाथों दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होंगें, या कहें अब तक हो चुके होंगें, तो ओल्ड इस गोल्ड के समस्त श्रोताओं की तरफ से हम उन्हें मुबारकबाद भी दे दें ये गीत सुनते हुए.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. शकील बदायूनीं है गीतकार यहाँ.
२. लता के स्वरों की गहरी वेदना है इस सस्पेंस से भरी फिल्म के गीत में.
३. गीत में इन काफियों का इस्तेमाल हुआ है - बांसुरी, रागिनी...रौशनी....आदि.

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी २२ अंक हुए आपके. पूर्वी जी आपकी सूची मिल गयी है..जल्द ही सुनेंगें उन्हें भी....हम आपको एक बात बता दें कि यदि हमें हमारे चौथे विजेता ३०० अंक पूरे होने तक नहीं मिले, तो ३०० एपिसोड पर आपके सब के जितने भी अंक होंगें सब निरस्त हो जायेंगें, क्योंकि ३०१ वें एपिसोड से प्रतियोगिता सब के लिए फिर से खुल जायेगी और सबके अंक फिर से शून्य से शुरू होंगें...तो ज़रा सब फुर्ती दिखाएँ...हम चाहते हैं कि ३०० एपिसोड से पहले हमें अधिक से अधिक विजेता मिलें, ताकि उन सब की पसंद भी हम यहाँ सुन सकें. निशांत जी आपने जो जानकारी दी उसके बाद हमें यकीं है जो भी इस गीत दुबारा सुनेगा भाव विभोर हो जायेगा....धन्येवाद.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, October 20, 2009

ज़रा सामने तो आओ छलिये...एक ऐसा गीत जो ख़तम होने के बाद भी देर तक गूंजता रहेगा आपके जेहन में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 237

मारी फ़िल्म इंडस्ट्री में शुरु से ही कुछ प्रथाएँ चली आ रही हैं। फ़िल्मों को ए-ग्रेड, बी-ग्रेड और सी-ग्रेड करार दिया जाता है, लेकिन जिन मापदंडों को आधार बनाकर ये ग्रेड दिए गए हैं, उनसे शायद बहुत लोग सहमत न हों। आम तौर पर क्या होता है कि बिग बजट फ़िल्मों, बड़े निर्माताओं और निर्देशकों के फ़िल्मों को ए-ग्रेड कहा जाता है, जिनका वितरण और पब्लिसिटी भी जम कर होती है, और ये फ़िल्में चलती भी हैं और इनका संगीत भी हिट होता है। दूसरी तरफ़ पौराणिक और स्टंट फ़िल्मों का भी एक जौनर शुरु से रहा है। फ़िल्में अच्छी होने के बावजूद भी इनकी तरफ़ लोग कम ही ध्यान देते हैं और इन्हे सी-ग्रेड करर दिया जाता है। यहाँ तक कि बड़े संगीतकार डरते रहे हैं ऐसी फ़िल्मों में संगीत देने से, क्योंकि उनका विचार है कि एक बार माइथोलोजी में चले गए तो वहाँ से बाहर निकलना नामुम्किन है। आनंदजी भाई ने भी यही बात कही थी जब उन्हे शुरु शुरु में पौराणिक फ़िल्मों के ऑफर मिले थे। बात चाहे बुरी लगे सुनने में लेकिन बात है तो सच्ची! पौराणिक फ़िल्मों के ना चलने से इन फ़िल्मों के गीत संगीत भी पीछे ही रह जाते रहे हैं। लेकिन समय समय पर कुछ ऐसी धार्मिक फ़िल्में भी बनी हैं जिन्होने दूसरी सामाजिक फ़िल्मों की तरह ही ख्याति अर्जित की है। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 'जनम जनम के फेरे' और इस फ़िल्म का एक गीत "ज़रा सामने तो आओ छलिए" ने वो सारे रिकार्ड बनाए जो कि किसी 'सो-कॊल्ड' ए-ग्रेड फ़िल्म के गीत बनाया करते हैं। यह गीत सब से बड़ा उदाहरण है कि जब किसी सी-ग्रेड फ़िल्म का गीत लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों की मुख्य धारा में जा कर मिल जाता है और उनसे भी ज़्यादा लोकप्रिय हो जाता है। १९५७ की फ़िल्म का यह गीत उस साल की दूसरी -ए-ग्रेड फ़िल्मों जैसे कि 'प्यासा', 'पेयिंग् गेस्ट', 'देख कबीरा रोया', 'दो आँखें बारह हाथ', 'मदर इंडिया', 'नौ दो ग्यारह', 'चोरी चोरी', 'बसंत बहार' और 'तुमसा नहीं देखा' जैसी म्युज़िकल फ़िल्मों के गीतों को पछाड़ते हुए उस साल के अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीतमाला के सरताज गीत के रूप में चुना गया था। यानी कि १९५७ का सब से लोकप्रिय गीत! यह वाक़ई अचरज की बात थी। और आगे चलकर 'जय संतोषी माँ' एक फ़िल्म और ऐसी रही जिसे ख़ूब ख़ूब कामयाबी नसीब हुई। तो आइए आज सुनते हैं 'जनम जनम के फेरे' फ़िल्म का यह सुपरहिट गीत। हाल ही में गायक शब्बीर कुमार विविध भारती पर तशरीफ़ लाए थे। जब उनसे उनके बचपन के दिनों के बारे में पूछा गया तो उन्होने बताया कि गुजरात के बड़ोदा के किसी गाँव में रहते वक़्त किस तरह से गाँव वालों के अनुरोध पर वे और उनकी बड़ी बहन यही गीत गाया करते थे और इनाम के रूप में उन्हे मिलते थे स्वादिष्ट रसीले आम।

सुभाष देसाई निर्मित फ़िल्म 'जनम जनम के फेरे' का निर्देशन किया था मनमोहन देसाई ने और मुख्य भूमिकाओं में थे निरुपा राय, मन्हर देसाई, बी. एम. व्यास और एस. एन त्रिपाठी। ये सारे कलाकार उस ज़माने के माइथोलोजी जौनर के फ़िल्मों के अग्रणी कलाकार हुआ करते थे। एस. एन. त्रिपाठी जहाँ एक तरफ़ इस जौनर के फ़िल्मों में संगीत दिया करते थे, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसी फ़िल्मों में वे छोटे मोटे किरदार भी निभाया करते थे। इस फ़िल्म में उन्ही का संगीत है और उनके जोड़ीदार गीतकार भरत व्यास ने फ़िल्म के गानें लिखे हैं। निरुपा राय ने इस फ़िल्म में सती अन्नपूर्णा का किरदार निभाया था। शुरु शुरु में फ़िल्म का शीर्षक 'सती अन्नपूर्णा' ही रखा गया था, लेकिन इस डर से कि इस शीर्षक से फ़िल्म नहीं चलेगी, इसलिए फ़िल्म का नाम बदल कर रख दिया गया 'जनम जनम के फेरे', जिससे कि माइथोलोजिकल होते हुए भी एक सामाजिक छुअन सी आ गई फ़िल्म में, और फ़िल्म उस समय के दूसरे पौराणिक फ़िल्मों से बेहतर चली। तो चलिए सुनते हैं लता मंगेशकर और रफ़ी साहब की आवाज़ों में "ज़रा सामने तो आओ छलिए"।



ज़रा सामने तो आओ छलिये
छुप छुप छलने में क्या राज़ है
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है
ज़रा सामने ...

हम तुम्हें चाहे तुम नहीं चाहो
ऐसा कभी नहीं हो सकता
पिता अपने बालक से बिछुड़ से
सुख से कभी नहीं सो सकता
हमें डरने की जग में क्या बात है
जब हाथ में तिहारे मेरी लाज है
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है
ज़रा सामने ...

प्रेम की है ये आग सजन जो
इधर उठे और उधर लगे
प्यार का है ये क़रार जिया अब
इधर सजे और उधर सजे
तेरी प्रीत पे बड़ा हमें नाज़ है
मेरे सर का तू ही सरताज है
यूँ छुप ना सकेगा परमात्मा
मेरी आत्मा की ये आवाज़ है
ज़रा सामने ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. गीतांजली पिक्चर्स के बैनर टेल बनी सबसे उल्लेखनीय फिल्म जिसके सभी गीत एक से बढ़कर एक थे.
२. इस संजीदा फिल्म में हलके फुल्के कुछ पल दे जाता है ये गीत.
३. डॉक्टर्स की भूमिका के इतर अक्सर अनदेखी रह जाती है नर्सों के काम की अहमियत. सेवा के इसी पहलू को समर्पित शायद एकलौता गीत है ये.

पिछली पहेली का परिणाम -

आखिर लम्बे इंतज़ार के बाद हमें हमारा ३ तीसरा विजेता मिल ही गया, या कहें मिल गयी....भाई ढोल नगाडे बजाओ.....पूर्वी जी, बहुत बहुत बधाई.....अब जल्दी से भेजिए अपनी पसदं हमें....ताकि हम सब भी आनंद लें आपके चुने हुए गीतों का :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है....गुलाम अली के मार्फ़त जता रहे हैं "हसरत मोहानी" साहब

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५५

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की तीसरी गज़ल लेकर। गज़लों की इस फ़ेहरिश्त को देखकर लगता है कि सीमा जी सच्ची और अच्छी गज़लों में यकीन रखती है। जैसे कि आज की हीं गज़ल को देख लीजिए, इस गज़ल की खासियत यह है कि गज़ल-विधा को न के बराबर जानने वाला एक शख्स भी इसे बखूबी जानता है और बस जानता हीं नहीं बल्कि इसे गुनगुनाता भी है। ताज्जुब तो तब होता है जब यह मालूम चले कि ऐसी रूमानी गज़ल को लिखने वाला गज़लगो हिन्दुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण सिपाही था। जी हाँ, हम "हसरत मोहानी" साहब की बात कर रहे हैं, जिन्हें "इन्कलाब ज़िंदाबाद" शब्द-युग्म के ईजाद का श्रेय दिया जाता है। इस गज़ल के बारे में इसके फ़नकार "गुलाम अली" साहब कहते है: यह गजल मेरी पहचान बन चुकी है, इसीलिए मेरे लिए बहुत खास है। मेरे स्टेज पर पहुंचते ही लोग इस गजल की फरमाइश शुरू कर देते हैं। दरअसल इस गजल के बोल और इसकी कंपोजिशन इतनी खास है कि हर दौर के लोगों को यह पसंद आती है। मैंने सबसे पहले रेडियो पाकिस्तान पर यह गजल गाई थी और जहां तक मेरा ख्याल है, उसके बाद से मेरी ऐसी कोई परफॉर्मेन्स नहीं रही, जब मैंने यह गजल न गाई हो। हमने आज से पहले एक कड़ी में गुलाम अली साहब की तो एक कड़ी में हसरत मोहानी साहब की बातें की थीं। इस क्रम को ध्यान में रखा जाए तो आज गुलाम अली साहब की बारी है। तो चलिए आज की कड़ी को हम उन्हीं के हवाले कर देते हैं और उन्हीं के शब्दों में उनकी आपबीती का आनंद लेते हैं।(साभार: नवभारत टाईम्स)

हिन्दुस्तान में आकर परफॉर्म करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कलाकार के लिए खास महत्व रखता है। यहां सुननेवालों से हर कलाकार को जैसी मुहब्बत और इज्जत मिलती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यहां के लोगों का प्यार ही है, जो हर बार मुझे यहां खींच लाता है। यहां मेरे हर कार्यक्रम में जिस तरह भीड़ उमड़ती है, उसे देखकर अहसास होता है कि वाकई मैंने यहां के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। यह मेरे लिए बड़े फख्र और खुशी की बात है। यह सही है कि वक्त के साथ काफी कुछ बदला। चीजें काफी कॉमर्शलाइज्ड हो गई हैं। लोगों के पास अब वक्त भी कम है लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं मानता हूं कि हर कलाकार की अपनी अलग शैली होती है। यह सच है कि समय के साथ-साथ गजल में कई तरह के बदलाव आए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ट्रडिशनल तरीके से गजल गाना अब मेरी पहचान बन चुकी है। लोग शायद इसीलिए आज भी मुझे और मेरी गायकी को पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं गजलों में नए प्रयोग करने के खिलाफ हूं, लेकिन प्रयोग के नाम पर गजल की रूह के साथ छेड़छाड़ करना मुझे पसंद नहीं है। मैं कभी अपना क्लासिकल बेस नहीं छोड़ता। हिंदुस्तानियों के दिलों में भी गजल का उतना ही खास मुकाम है, जितना पाकिस्तानियों के दिलों में है। यही वजह है कि यहां आज भी गजल की रवायत मौजूद है। तलत अजीज, हरिहरन, पंकज उधास और पीनाज मसानी जैसे कई फनकारों ने इसे सजाया, संवारा और संभाला है। जगजीत सिंह का तो इसमें सबसे खास योगदान रहा है। पाकिस्तान में भी लोग उन्हें चाहते हैं। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच पल रहे इस वैमनस्य से वे काफ़ी चिंतित दिखते हैं। फिर भी उनका मानना है कि: हमें यह समझना चाहिए कि अगर हम आपस में एक हो जाएं, आपसी समझदारी बढ़ाएं तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मुझे लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझदारी बढ़ रही है, रिश्ते सुधर रहें हैं। मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूं कि इन दोनों मुल्कों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमन-चैन कायम रहे। अभी पिछले दिनों जो कुछ मुंबई में हुआ हमें वह सख्त नापसंद है। ऐसा लगता है मानो हमारे ही साथ हुआ हो। एक फनकार होने के नाते मेरे सुर पर इसका असर पड़ा है और तबाही का वह मंजर मेरी आँखों के सामने घूम रहा है। ऐसे में कोई कैसे गा सकता है। हम चाहते हैं कि सब लोग सुर में आ जाएँ क्योंकि सुर में प्रेम है। हम फनकारों का काम तो प्यार बाँटना ही है। कलाकार तो वैसे भी किसी सरहद के बँधे नहीं होते। लताजी को पाकिस्तान में उतना ही प्यार मिलता है जितना मुझे हिन्दुस्तान में। सोलह आने सच बात कही है आपने!

गुलाम अली साहब के बारे में कहने को ऐसे तो बहुत कुछ है,लेकिन आज बस इतना हीं। वो क्या है कि कभी-कभी डायटिंग भी कर लेनी चाहिए...मतलब कि हर बार हम जो सामग्री पेश करते हैं वो अमूमन हद से ज्यादा होता है यानि ओवरडोज....तो हमने सोचा कि क्यों न आज हल्के-फ़ुल्के में हीं काम निपटा लिया जाए और वैसे भी कभी-कभी जानकारियों के बोझ तले उस दिन की गज़ल/नज़्म दम तोड़ देती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सब कुछ संतुलन में होना चाहिए....क्या कहते हैं आप? तो चलिए हम बढते हैं आज की गज़ल की ओर। उससे पहले हर बार की तरह आज के गज़लगो का लिखा एक शेर पेश-ए-खिदमत है:

देखो तो हुस्न-ए-यार की जादू निगाहियाँ
बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम...


वल्लाह!!!!

और अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। सुनिए और खुद अंदाजा लगाईये कि लिखने वाले के दिल पर क्या बीती है..... रही बात गाने वाले की तो उसे तो खुदा की नेमत नसीब है, उसके बारे में क्या कहना:

चुपके चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़-अ-तन
और दुपट्टे में वो तेरा मुँह छुपाना याद है

बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ए-दिल की दास्तां
वो कलाई में तेरा कंगन घुमाना याद है

वक़्त-ए-रुख्सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये
वो तेरे सूखे लबों का थर-थराना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक़ हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उंगली दबाना याद है

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

आ गया अगर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक़्र-ए-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के भी मुझको रुलाना याद है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

आखिरी ___ तेरे ज़ानों पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ....


आपके विकल्प हैं -
a) ग़ज़ल, b) हिचकी, c) सांस, d) अशार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "लिबास" और शेर कुछ यूं था -

यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम दे...

बशीर बद्र साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना एक साथ दो लोगों ने(हम सेकंड के अंतर को नहीं गिनते)। सीमा जी के साथ हमें एक और साहब मिले जो उद्गार नाम से टिप्पणी करते हैं(असली नाम यही है या नहीं, कहा नहीं जा सकता)। तो इन जनाब ने सही शब्द तो बता दिया लेकिन उस पर शेर कहना भूल गए। इसलिए हम यहाँ बस सीमा जी के शेरों को पेश कर रहे हैं:

कोई किसी से खुश हो और वो भी बारहा हो
यह बात तो गलत है
रिश्ता लिबास बन कर मैला नहीं हुआ हो
यह बात तो गलत है (निदा फ़ाज़ली)

ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-राह सियाही लिखी गई
यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गये (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

इनके बाद महफ़िल में हाज़िरी लगाई दिशा जी और शरद जी ने। जहाँ शरद जी ने स्वरचित शेर कहे, वहीं दिशा जी ने जानेमाने शेर से महफ़िल की रौनक बढाई। ये रहे आप दोनों के शेर (क्रम से):

कौन कहता है कि दुनिया से जा रहा है ’शरद’
वो है मौज़ूद यहाँ , बस लिबास बदला है (एक बार फिर से जबरदस्त, हम धीरे-धीरे आपके फ़ैन बनते जा रहे हैं)

कोइ कैसे पहचान पायेगा असलियत उनकी
लिबास की तरह बदलना है फितरत जिनकी

सुमित जी महफ़िल में आए, फिर लौटकर आने का वादा करके निकल लिए..लेकिन लौटे नहीं...गलत बात!!
मंजु जी अपने चिरपरिचित अंदाज़ में महफ़िल का हिस्सा बनीं। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

लिबास उनका पहन कर आईना हैरान हुआ ,
उनकी जुदाई का लम्हा करीब आ गया..

अंत में शामिख जी अपने शेरों के कारवां के साथ महफ़िल में तशरीफ़ लाए। ये रहे उस कारवां के कुछ मुसाफ़िर:

वरक पे रोशनी जो मैं गिरता हूँ
लिबास अल्फाज़ को सोचों के उढाता हूँ. (स्वरचित)

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं तेरी जबीन-ए-नियाज़ में (इक़बाल)

अब आग के लिबास को ज्यादा न दाबिए,
सुलगी हुई कपास को ज्यादा न दाबिए।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, October 19, 2009

दगा दगा वई वई वई....चित्रगुप्त और लता ने रचा एक ऐसा गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे, कदम थिरक उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 236

श चोपड़ा की सफलतम फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' के बाद चार या उससे अधिक शब्दों वाले शीर्षक से फ़िल्में बनाने की जैसे एक होड़ सी शुरु हो गई थी फ़िल्मकारों के बीच। लेकिन चार शब्दों वाले फ़िल्मी शीर्षक काफ़ी पहले से ही चले आ रहे हैं। हाँ, ये ज़रूर है कि लम्बे नाम वाले फ़िल्मों की संख्या उस ज़माने में कम हुआ करती थी। ९० के दशक में और इस दशक के पहले भाग में सब से ज़्यादा इस तरह के लम्बे नाम वाले फ़िल्मों का निर्माण हुआ। आज फिर से छोटे नाम वाले फ़िल्में ही ज़्यादा बनने लगी हैं। फ़िल्मी इतिहास में ग़ोते लगाने के बाद मेरे हाथ चार शब्दों वाले नाम का जो सब से पुराना फ़िल्म हाथ लगा (अंग्रेज़ी शीर्षक वाले फ़िल्मों को अलग रखते हुए), वह है सन् १९३६ की फ़िल्म 'ममता और मिया बीवी' जिसका निर्माण बॊम्बे टॊकीज़ ने किया था। उसके बाद १९३९ में बनी थी वाडिया मूवीटोन की फ़िल्म 'कहाँ है मंज़िल तेरी'। ४० के दशक में १९४२ में सौभाग्य पिक्चर्स ने बनाई 'हँसो हँसो ऐ दुनियावालों'। १९४४ में दो फ़िल्में आयीं 'चल चल रे नौजवान' और 'पर्बत पे अपना डेरा'। १९४५ में 'स्वर्ग से सुंदर देश हमारा', १९४६ में 'डा. कोटनिस की अमर कहानी', 'माँ बाप की लड़की', और 'फिर भी अपना है', १९४७ में 'घर घर की कहानी', 'समाज को बदल डालो', १९४८ में 'आज़ादी की राह पर', 'बरसत की एक रात', 'हम भी इंसान हैं', १९४९ में 'मैं अबला नहीं हूँ', १९५२ में 'शिन शिनाकी बब्ला बू', १९५३ में 'जलियाँवाला बाग की ज्योति', और 'तीन बत्ती चार रास्ते'। बस्‍, इसी नाम तक हम पहुँचना चाहते थे। 'तीन बत्ती चार रास्ते' ही वह पहली इस तरह की सफल फ़िल्म थी जिसका शीर्षक एक ट्रेंडसेटर बना। इसके बाद जब भी मौका लगा फ़िल्मकारों ने इस तरह के शीर्षक अपनी फ़िल्मों की रखे। आज हम जिस फ़िल्म का गीत आप को सुनवा रहे हैं उसका नाम है 'काली टोपी लाल रुमाल'। सुनिए इस फ़िल्म से लता मंगेशकर की आवाज़ में एक बड़ा ही चुलबुला सा गीत "दग़ा दग़ा व‍इ व‍इ व‍इ, हो गई उनसे उल्फ़त हो गई"।

१९५९ में बनी थी फ़िल्म 'काली टोपी लाल रुमाल' जिसका निर्देशन तारा हरीश ने किया था। फ़िल्म कम बजट की थी, जिसके मुख्य कलाकार थे चन्द्रशेखर, शक़ीला, आग़ा, मुकरी और के. एन. सिंह। फ़िल्म के संगीतकार थे चित्रगुप्त और गीत लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने। प्रस्तुत गीत शक़ीला और आग़ा पर फ़िल्माया गया है। गीत को सुनते ही दिल और पाँव दोनों ही थिरकने लगते हैं, मचलने लगते हैं। युं तो चित्रगुप्त ने ज़्यादातर पौराणिक, और स्टंट फ़िल्मों में संगीत दिया हैं, लेकिन समय समय पर उन्होंने कई सामाजिक फ़िल्मों में भी संगीत दिया जिनके संगीत ने ख़ूब व्यापार किया। 'काली टोपी लाल रुमाल' एक ऐसी ही फ़िल्म थी। प्रस्तुत गीत के अलावा लता-रफ़ी का गाया "लागी छूटे ना अब तो सनम" एक बेहद हिट गीत रहा है। आशा-रफ़ी का गाया युगल गीत "ओ काली टोपी वाले तेरा नाम तो बता" गीत से ही कहीं प्रेरीत हो कर ९० के दशक में 'आँखें' फ़िल्म का वह गीत "ओ लाल दुपट्टे वाली तेरा नाम तो बता" तो नहीं बना था? ख़ैर, अब आपको गीत सुनवाते हैं, लेकिन उससे पहले जान लीजिए कि विविध भारती के विशेष जयमाला कार्यक्रम में संगीतकार चित्रगुप्त ने बरसों पहले लता जी के बारे में क्या कहा था। "फ़िल्म संगीत के बारे में कोई भी चर्चा लता मंगेशकर को छुए बिना ख़तम नहीं हो सकती। फ़िल्म संगीत का ये दौर भविष्य में लता मंगेशकर के दौर के नाम से जाना जाएगा। एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि क्या हमारे देश में दो ही प्लेबैक सिंगर्स हैं, लता जी और आशा जी? मैने कहा कि, हाँ, प्लेबैक जगत में ये ही दो सिंगर्स हैं जिनकी आवाज़ हर संगीतकार चाहते हैं अपने गीतों में।" तो दोस्तों, सुनते हैं चित्रगुप्त और लता जी की सुरीली जोड़ी का यह थिरकता मचलता नग़मा।



दग़ा दग़ा वै वै वै
दग़ा दग़ा वै वै वै
हो गई तुमसे उल्फ़त हो गई) \-२
दग़ा दग़ा वै वै वै

यूँ ही राहों में खड़े हैं तेरा क्या लेते हैं
देख लेते हैं जलन दिल की बुझा लेते हैं |-२
आए हैं दूर से हम
तेरे मिलने को सनम
चेकुनम, चेकुनम, चेकुनम

दग़ा दग़ा वै वै वै ...

जान जलती है नज़र ऐसे चुराया न करो
हम ग़रीबों के दुखे दिल को दुखाया न करो |-२
आए हैं दूर से हम
तेरे मिलने को सनम
चेकुनम, चेकुनम, चेकुनम

दग़ा दग़ा वै वै वै ...

हम क़रीब आते हैं तुम और जुदा होते हो
लो चले जाते हैं काहे को ख़फ़ा होते हो |-२
अब नहीं आएँगे हम
तेरे मिलने को सनम
चेकुनम, चेकुनम, चेकुनम

दग़ा दग़ा वै वै वै ...


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मनमोहन देसाई का निर्देशन था इस फिल्म में.
२. अभिनेत्री निरूपा राय ने इस धार्मिक फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी.
३. इस युगल गीत के मुखड़े की अंतिम पंक्ति में आपके इस प्रिय जाल स्थल का नाम है.

पिछली पहेली का परिणाम -

दिलीप जी ने एकदम सही कहा, वाकई शरद जी का कोई जवाब नहीं, दुबारा शुरुआत करने के बाद भी शरद जी 20 अंकों पर पहुँच गए हैं...बधाई जनाब. पूर्वी जी जाने कहाँ खो गयी है, पता नहीं उन तक हमारा सन्देश पहुंचा भी है या नहीं

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

जो तुझे जगाये, नींदें तेरी उडाये, ख्वाब है सच्चा वही....सच्चे ख़्वाबों को पहचानिये...प्रसून की सलाह मानिये

ताजा सुर ताल TST (31)

दोस्तों, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर के एपिसोडों से लगभग अगले 20 एपिसोडों तक, जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में सीमा जी ने बढ़त बनाये रखी है, ३ में से २ सही जवाब और कुल अंक उनके हुए १६. तनहा जी दूसरे स्थान पर हैं ६ अंकों के साथ. तनहा जी ने भी एक सवाल का सही जवाब दिया. दिशा जी जरा देरी से आई और भी कुछ प्रतिभागी सामने आये तो और मज़ा आये. चलिए अब बढ़ते हैं आज के अंक की तरह...शुभकामनाएँ.

सुजॉय - सजीव, 'ताज़ा सुर ताल' में आज किस फ़िल्म के गीत से हम शुरुआत करने जा रहे हैं?

सजीव - राजकुमार संतोषी की नई कॊमेडी फ़िल्म आ रही है 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी', आज हम इसी फ़िल्म का एक जोशीला ट्रैक सुनेंगे सब से पहले।

सुजॉय - सजीव, आप ने कहा कॊमेडी फ़िल्म, इससे मुझे याद आया राजकुमार संतोषी ने इससे पहले एक फ़िल्म बनाई थी 'अंदाज़ अपना अपना', जो अपनी कॊमेडी की वजह से बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुई थी। आमिर ख़ान और सलमान ख़ान की जोड़ी ने उस फ़िल्म में लोगों को ख़ूब हँसाया था।

सजीव - हाँ, और १९९४ के इस फ़िल्म में परेश रावल, महमूद, देवेन वर्मा, जगदीप, हरीश पटेल, टिकू तल्सानिया जैसे नामचीन हास्य कलाकारों ने भी ख़ूब गुदगुदाया था।

सुजॉय - और अब 'अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी' में नज़र आयेंगे रनबीर कपूर और कटरीना कैफ़। इस फ़िल्म में रणबीर का नाम 'प्रेम' है। आप जानते ही होंगे कि शुरु शुरु में हर फ़िल्म में सलमान ख़ान का नाम 'प्रेम' हुआ करता था, और 'अंदाज़ अपना अपना' में भी उनका नाम 'प्रेम भोपाली' था। तो इस तरह से राजकुमार संतोषी के अलावा 'अजब प्रेम की...' और 'अंदाज़ अपना अपना' में यह एक और कॉमन चीज़ है।

सजीव - जहाँ तक गीत संगीत का सवाल है, 'अंदाज़ अपना अपना' में तुषार भाटिया और विजु शाह का संगीत था, और वो संगीत कुछ कुछ पुराने ज़माने के ओ. पी. नय्यर के संगीत से मिलता जुलता था। जैसे कि "एलो एलो, एलो जी सनम हम आ गये आज फिर दिल लेने" तो बिल्कुल नय्यर साहब का कम्पोजीशन लगता है। आशा और एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम का गाया "ये रात और ये दूरी" भी काफ़ी हिट हुआ था। और अब 'अजब प्रेम की...' का संगीत उससे बिल्कुल अलग है। और क्यों ना हो, इन दो फ़िल्मों के बीच १५ साल का फ़ासला भी तो है।

सुजॉय - जी बिल्कुल! प्रीतम आज के दौर के संगीतकार हैं। और जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि प्रीतम एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिनका संगीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हो जाता है आज की पीढ़ी में, फिर चाहे भले फ़िल्म चले या ना चले। प्रीतम को समालोचकों के वार भी सहने पड़ते हैं लेकिन वह कहते हैं ना कि जो हिट है वही फ़िट है, इसलिए हर वार का मुक़ाबला करते हुए प्रीतम निरंतर हिट पे हिट दिए जा रहे हैं। फ़िल्म के गीतकार हैं इरशाद कामिल और आशिष पंडित ने।

सजीव - ठीक कहा तुमने सुजॉय। बप्पी लाहिरी के साथ भी यही हुआ था जब वो नए नए आए थे डिस्को लेकर। लेकिन आज देखिए, उनके वही पुराने गानें जिनकी उस ज़माने में काफ़ी समालोचना हुई थी, जब वे आज बजते हैं तो लोग उसकी तारीफ़ कर रहे हैं। ख़ैर, आज 'अजब प्रेम की...' का जो गीत हम बजा रहे हैं वह है के.के, सुनिधि चौहान और हार्ड कौर का गाया हुआ एक थिरकता नग़मा।

सुजॉय - यह गीत इस फ़िल्म के ऐल्बम का पहला गाना है, जिसके बोल हैं "मैं तेरा धड़कन तेरी ये दिन तेरा रातें तेरी अब बचा क्या"। बहुत ही उर्जा है इस गीत में। के.के इस तरह के जोशीले गानों को बहुत ही अच्छी तरह से निभाते हैं। सुनिधि की आवाज़ में भी वो दम है कि के.के की आवाज़ से टक्कर ले सके। और हार्ड कौर अपने रैप के साथ बीच बीच में आती रहती हैं। हिप-हॊप के साथ साथ एक टिपिकल बॊलीवुड पॊप नंबर की मिसाल है यह गीत। डी. जे सुकेतू ने इसी गीत का एक ज़बरदस्त रीमिक्स वर्ज़न भी बनाया है।

सजीव - यानी कि कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि यह गीत जवाँ दिलों पर राज करने का पूरा माद्दा रखता है। तो चलिए सुनते हैं यह गीत।

अब बचा क्या (अजब प्रेम की गजब कहानी)
आवाज़ रेटिंग - ***1/2



TST ट्रिविया # 13-इस फिल्म "अजब प्रेम की गजब कहानी" में एक प्रमुख किरदार निभा रहे ऐक्टर ने उदिता गोस्वामी के साथ एक रीमिक्स गीत के विडियो में काम कर शुरुआत की थी, उस एक्टर का नाम और उस रीमिक्स गीत का नाम भी बताएं?

सुजॉय - रवानी भरा, जवानी भरा यह गीत हमने सुना। अब कौन सा गीत हम सुनेंगे सजीव?

सजीव - अब एक बहुत ही अलग तरह का गीत सुनवाएँगे हम फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स‍' से। इस फ़िल्म से "जश्न है जीत का", "खानाबदोश" और "मन को अति भावे स‍इयाँ" हम इस शृंखला में सुनवा चुके हैं। क्योंकि इस फ़िल्म के सभी गानें बहुत ही मेलडियस हैं और नए नए प्रयोग और फ़्युज़न सुनने को मिलते हैं, तो क्यों ना इस फ़िल्म की संगीत यात्रा को जारी रखें 'ताज़ा सुर ताल' में।

सुजॉय- बिल्कुल जारी रखेंगे। तो बताइए आज इस फ़िल्म का कौन सा गीत आप सुनवाएँगे और क्या ख़ास बात है इस गीत में।

सजीव - गीत है "जो तुझे जगाए, नींदे तेरी उड़ाए, ख़्वाब है सच्चा वही, नींदों में जो आए, जिसे तू भूल जाए, ख़्वाब वो सच्चा नहीं"।

सुजॉय - बहुत सही बात कही है गीतकार प्रसून जोशी ने। मुझे याद आ रहा है भूतपूर्व राष्ट्रपति डॊ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का कहा हुआ एक विचार कि "Dream is not something that you see while sleeping; dream is something that does not allow you to sleep". है ना वही भाव इस गीत का?

सजीव - वाह! बहुत ख़ूब! श्रोताओं को यह बता दें कि इस गीत को दो बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न कलाकारों ने गाया है, एक हैं राहत फ़तेह अली ख़ान और दूसरे शंकर महादेवन। ये दोनों ही शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं और यह गीत का आधार शास्त्रीय होते हुए भी इसमें एक आज के संगीत का अंग है, जिसे हम सॉफ्ट रॉक भी कह सकते हैं।

सुजॉय - शंकर अहसान लॊय का हस्ताक्षर साफ़ सुनई देता है इस गीत में। तो सुनते हैं इस बेहद बेहतरीन, बेहद शानदार गीत को।

ख्वाब (लन्दन ड्रीम्स)
आवाज़ रेटिंग - ****1/2



TST ट्रिविया # 14- फिल्म लन्दन ड्रीम्स का वो कौन सा गीत है जो लन्दन के एक मशहूर सगीत हॉल (जहाँ परफोर्म करना हर संगीत प्रेमी का सपना होता है) में फिल्माया गया है?

सुजॉय - वाह! बहुत ही कर्णप्रिय गीत था। और अब आज का तीसरा और आ़ख़िरी नग़मा कौन सा है?

सजीव - सुजॉय, यह जो आज का तीसरा गीत है न, इस गीत के तीन अलग अलग वर्ज़न हैं और तीनों अलग अलग गायकं के गाए हुए हैं। यह है फ़िल्म 'तुम मिले' का शीर्षक गीत "तुम मिले तो जादू छा गया"।

सुजॉय - अच्छा? किन किन गायकों ने गाए हैं इस गीत को?

सजीव - नीरज श्रीधर, जावेद अली, और शफ़क़त अमानत अली ने गाए हैं अलग अलग अंदाज़ों में। नीरज और प्रीतम की जोड़ी ने कई हिट गानें हमें दिए हैं जैसे कि "हरे राम हरे राम", "आहुं आहुं", "चोर बाज़ारी" वगेरह। लेकिन 'तुम मिले' का यह गीत उन सभी गीतों से बिल्कुल अलग हट के है। बहुत ही नर्मोनाज़ुक अंदाज़ का गीत है।

सुजॉय - और बाक़ी के जो दो वर्ज़न हैं उनकी क्या ख़ूबी है?

सजीव - हालाँकि नीरज वाला गीत ही फिल्म का प्रमुख वर्ज़न है, लेकिन जावेद अली और शफ़क़त अमानत अली वाले संस्करण भी कमाल के हैं। जावेद अली के वर्ज़न का टाइटल रखा गया है 'लव रिप्राइज़ वर्ज़न' और अमानत साहब के वर्ज़न का टाइटल है 'रॉक वर्ज़न'। याद है ना इनकी आवाज़ में फ़िल्म 'कभी अलविदा ना कहना' का "मितवा" गीत?

सुजॉय - क्यों नहीं! बिल्कुल याद है। पाक़िस्तान के इस गायक की आवाज़ का असर एक लम्बे समय तक ज़हन में रहता है जिस तरह से 'मितवा' गीत को लोगों ने बहुत बहुत सुना, 'तुम मिले' का यह गीत भी जैसे जैसे हम सुनते जाते हैं, हमारे ज़हन में बसते चले जाते हैं। और इसकी धुन जैसे दिमाग़ पर हावी सी होती जाती है। चलिए सुनते हैं इस गीत को, इसे लिखा है सईद क़ादरी ने, जो भट्ट कैम्प के अब स्थायी गीतकार बन चुके हैं और संगीतकार का नाम तो हम बता ही चुके हैं, प्रीतम। फ़िल्म की तमाम अन्य जानकारियाँ हम फिर किसी दिन देंगे जब हम इस फ़िल्म का कोई दूसरा गाना सुनेंगे। आइए सुनते हैं।

तुम मिले (शीर्षक)
आवाज़ रेटिंग -***



TST ट्रिविया # 15- हाल ही में फिल्म "तुम मिले" का निर्माण कर रही कम्पनी विशेष फिल्म्स के लिए महेश भट्ट ने एक बयान में कहा है कि "फलां" गीतकार को कोई भी उस राशि का १० प्रतिशत नहीं देगा, जिस राशि पर जावेद अख्तर काम करते हैं...यहाँ महेश किस गीतकार के लिए ये कह रहे हैं ?

आवाज़ की टीम ने इन गीतों को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीतों को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Sunday, October 18, 2009

महताब तेरा चेहरा किस ख्वाब में देखा था....लता मुकेश की मखमली आवाज़ में एक सुरीला नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 235

दोस्तों, एक के बाद एक तीन गीत हम आपको सुनवा रहें हैं शंकर जयकिशन के स्वरबद्ध किए हुए, और मौका है शंकर जी के जन्म दिवस का जो था १५ अक्तुबर को। कल की तरह आज का गीत भी शैलेन्द्र का ही लिखा हुआ है। फ़िल्म 'आशिक़' का युगल गीत है मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज़ों में "महताब तेरा चेहरा किस ख़्वाब में देखा था, ऐ हुस्न-ए-जहाँ बतला तू कौन मैं कौन हूँ"। 'आशिक़' १९६२ की फ़िल्म थी जिसके निर्माता थे विजय किशोर दुबे और बनी रूबेन। ऋषीकेश मुकर्जी ने फ़िल्म को निर्देशित किया और इसके मुख्य कलाकार थे राज कपूर, नंदा और पद्मिनी। जहाँ तक म्युज़िक डिपार्ट्मेंट की बात है, तो शंकर जयकिशन के अलावा जिनका फ़िल्म के संगीत में योगदान रहा वे हैं मिनू कात्रक (रिकार्डिस्ट), डी. ओ. भंसाली (सहायक रिकार्डिस्ट), दत्ताराम वाडकर (संगीत सहायक), और सेबास्टियन डी' सूज़ा (संगीत सहायक)। गीतों में आवाज़ें लता जी और मुकेश जी के थे। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म का एक और युगल गीत "ओ शमा मुझे फूँक दे, मैं ना मैं रहूँ तू ना तू रहे" भी लोकप्रिय हुआ था। और मुकेश की एकल आवाज़ में "तुम जो हमारे मीत ना होते, गीत हमारे गीत ना होते" भी शैलेन्द्र की एक चर्चित रचना है। दशकों बाद इसी तरह का एक गीत बना था फ़िल्म 'गीत' के लिए, "आप जो मेरे मीत ना होते, होठों पे मेरे गीत ना होते"। ख़ैर, आज तो हम "महताब तेरा चेहरा" की ही बातें करेंगे। इस गीत में रोमांटिसिज़्म के शायराना अंदाज़ फूट पड़े हैं शैलेन्द्र की क़लम से। दोस्तों, ध्यान देनेवाली बात है कि ऋषिकेश मुखर्जी की निर्देशित यह फ़िल्म थी और एक पर्फ़ेक्ट फ़िल्मकार की तरह वो अपनी फ़िल्मों में ऐसा कोई गीत नहीं डालते थे जो कहानी के प्रवाह के आगे रुकावट बनकर खड़ा हो जाए। राज कपूर के साथ उनकी घनिष्ठता की वजह से उनकी शंकर जयकिशन के साथ भी दोस्ती हुई, और बिमल राय के ज़रिए शैलेन्द्र से।

शंकर जयकिशन ने ऋषि दा के जिन फ़िल्मों में संगीत दिया था उनके नाम हैं 'अनाड़ी', 'असली नक़ली', 'आशिक़', 'गोदान', और 'सांझ और सवेरा'। गीतकारों में आनंद बक्शी और शैलेन्द्र ने ऋषि दा के साथ आठ आठ फ़िल्मों में गानें लिखे। हसरत जयपुरी, कैफ़ी आज़्मी, योगेश, मजरूह और गुलज़ार ने भी ऋषि दा के कई फ़िल्मों में गीत लिखे हैं। दोस्तों, ऋषि दा के साथ शंकर जयकिशन और शैलेन्द्र के साथ का ज़िक्र तो हमने किया, लेकिन यह भी एक आश्चर्य की ही बात है हम कह सकते हैं कि मुकेश इस दुनिया से २७ अगस्त १९७६ को हमेशा के लिए चले गए थे, और इसके ठीक ३० साल बाद, यानी कि २७ अगस्त २००६ को ऋषि दा हमें अल्विदा कहा था। शंकर जयकिशन और सलिल चौधरी को अगर हम अलग रखें तो मुकेश ने ऋषि दा के फ़िल्मों में उन संगीतकारों के लिए गीत गाए हैं जिनके लिए उन्होने बहुत कम गाए हैं। कुछ उदाहरण दें आपको? आर. डी. बर्मन (फिर कब मिलोगी), हेमन्त कुमार (बीवी और मकान), एस. डी. बर्मन (चुपके चुपके)। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने मुकेश से ऋषि दा की फ़िल्म 'सत्यकाम' में मुकेश से गीत गवाया था। तो दोस्तों, आइए अब सुनते हैं "महताब तेरा चेहरा"। आज का यह अंक एक साथ समर्पित है ऋषिकेश मुखर्जी, शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र और मुकेश की स्मृति को!



मुकेश :
मेहताब तेरा चेहरा,
किस ख्वाब में देखा था
ए हुस्ने जहाँ बतला ,
तू कौन मैं कौन हूँ ।
लता :
ख्वाबों में मिले अक्सर
इक राह चले मिल कर
फिर भी है यही बेहतर
मत पूछ मैं कौन हूँ ।
मुकेश :
मेह्ताब तेरा चेहरा
लता :
हुस्नो इश्क है तेरे जहाँ
दिल की धड़कनें तेरी जु़बां
आज ज़िन्दगी तुझसे जवां
मुकेश :
आगाज़ है क्या मेरा
अंजाम है क्या मेरा
है मेरा मुकद्दर क्या
बतला के मैं कौन हूँ । मेहताब ..
लता :
क्यूं घिरी घटा तू ही बता
क्यूं हंसी फ़िजा तू ही बता
फ़ूल क्यूं खिला तू ही बता
मुकेश :
किस राह पे चलना है
किस गाम पे रुकना है
किस काम को करना है
बतला के मैं कौन हूँ । मेह्ताब तेरा चेहरा
लता :
ज़िन्दगी को तू गीत बना
दिल के साज़ पे झूम के गा
इस जहान को तू प्यार सिखा
मुकेश :
मुकेश :
मेहताब तेरा चेहरा,
किस ख्वाब में देखा था
ए हुस्ने जहाँ बतला ,
तू कौन मैं कौन हूँ ।
लता :
ख्वाबों में मिले अक्सर
इक राह चले मिल कर
फिर भी है यही बेहतर
मत पूछ मैं कौन हूँ ।
मुकेश :
मेह्ताब तेरा चेहरा...

और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म के शीर्षक में दो रंगों के नाम हैं.
२. चित्रगुप्त के संगीत से सजा एक बेहद चुलबुला गीत, जिसे सुनते ही मन नाच उठता है.
३. एक अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"जान".

पिछली पहेली का परिणाम -

सबसे पहले तो दीपावली पर्व की आप सब को ढेरों शुभकामनाएँ, शरद जी ने दो अंक और जोड़े अपने खाते में. पूर्वी जी जल्दी कीजिये विजेता बनिए और अपनी पसंद के गीतों की सूची भी तैयार कर भेज दीजिये....दीपो का ये त्यौहार आप सबके जीवन में भी ढेरों रोशनी, और अनगिनत खुशियाँ लेकर आये इसी दुआ के साथ इजाज़त लेते है...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार सुबह की कॉफी और फीचर्ड एल्बम "जूनून" पर बात, दीपाली दिशा के साथ (१८)

कहते हैं कि संगीत एक नशा है, जादू है, जो सर चढ़ के बोलता है. यही नहीं संगीत आत्मा की आवाज है जो इंसान में जोश और जूनून पैदा कर देता है और लोगों तक शान्ति तथा सदभाव पहुँचाने का जरिया भी है. शायद कुछ इसी मकसद से पाकिस्तानी गायकों ने अपने बैंड का नाम ’जूनून’ रखा होगा. खैर उनका मकसद जो भी रहा हो लेकिन उनके संगीत में जूनून नजर आता है जो लोगों में भी एक भाव पैदा कर देता है. ’जूनून’ पाकिस्तान का एक प्रसिद्ध बैंड है. यूं तो पाकिस्तान के कई बैंड यहाँ हिन्दुस्तान में आये हैं लेकिन ’जूनून’ ने काफी ख्याति पायी है. पिछले दस सालों में जूनून बैंड की पाँच एल्बम आयीं हैं जिनमें से सभी ने धूम मचायी है. यह पाकिस्तान के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध बैंड है.

’जूनून’ बैंड के सदस्यों में सलमान अहमद, अली अज़मत और ब्रायन ओ शामिल हैं. ’तलाश’, ’इंकलाब’, आज़ादी, ’परवाज़’ और ’दीवार’ इनकी अब तक की एल्बमें है. जूनून ग्रुप की ’आज़ादी’ एल्बम ने सबसे ज्यादा धूम मचायी थी. इसके प्रसिद्ध होने का मुख्य कारण जूनून बैंड का सूफी के साथ रॉक का संगम होना है. ’आजादी’ का संगीत व गानों को सुनकर लगता है कि जूनून बैंड पूर्वी संगीत से प्रभावित है. इस एल्बम में तबला मुख्य रूप से प्रयुक्त हुआ है. इस एल्बम में जूनून बैंड ने अमेरिका के रिकार्डिंग एवं मिक्सिंग इंजीनियर जोन एली रॊबन्सन की सहायता से स्पेशल इफैक्ट डलवाये. जोन ही इस एल्बम के को-प्रड्यूसर भी हैं.

अल्बम के प्रसिद्ध गीतों में से एक "खुदी को कर" इकबाल की शायरी को रॉक स्टायल में पेश किया गया है. सभी शेरों को अच्छे अन्दाज में पिरोया गया है. शेरों को अपने हिसाब से फेर-बदल करने की वजह से उनकी संवेदना घट गयी है.अन्यथा संगीत अच्छा है. दिल में जोशो-जूनून भरने में बेहद असरदार है ये गीत.



’मेरी आवाज सुनो’ एक कव्वाली है. इसमें तम्बूरे के साथ गिटार का प्रयोग किया गया है यह गाने को कर्णप्रिय बना देता है. संगीत संयोजन गजब का है, और बोल ख़ास ध्यान आकर्षित करते हैं. "तेरे संग ज़माना सारा, खुदा है मेरे संग जालिम....". बेस गिटार का सुन्दर इस्तेमाल अंत में बेहद प्रभावित करता है.



’यार बिना’ भी एक कव्वाली ही है.तबले का जोरदार प्रयोग इस गीत को उत्साही बना देता है. इस गीत को सुनकर मजा आता है. गायकों ने पूरी उर्जा के साथ गीत को निभाया है, कुछ गीत कुछ धुन ऐसी होती है जिनकी प्रतिलिपियाँ आप बरसों से सुनते आ रहे हों, पर फिर भी उनका नशा कभी कम नहीं होता, ये भी कुछ उसी तरह का गीत है.



’सैयो नी’ इस एल्बम का सबसे प्रसिद्ध गीत है जो लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया. इस गीत का सूफीयाना अन्दाज बहुत आकर्षित करता है. एक शेर में एक अलग और उंडा बात कही गयी है, सूफी रॉक में ऐसा परफेक्ट संयोग जहाँ शब्द संगीत और गायिका तीनों का उत्कृष्ट मिलन हुआ हो बहुत कम सुना गया है. बेहतरीन गीत.

"क्या बशर की बिसात,
आज है कल नहीं..."
और

"छोड़ मेरी खता,
तू तो पागल नहीं..."

सुनिए -



’मुक गये’ गीत औसत है. कई जगह संगीत आवाज पर हावी हो जाता है जिससे बोल समझने में मशक्कत करनी पड़ती है. शब्द और गायिकी से विरह की पीडा जो सूफी गीतों का एक अहम् घटक भी है, को उभरने की अच्छी कोशिश की गयी है.



अंत में यही कहेंगे के एल्बम सुनने लायक है. बार-बार तो नहीं लेकिन परिवर्तन के लिये अच्छी है. ज्यादातर गीतों का संगीत व लय एक सा लगता है. संगीत कई-कई जगह हावी हो जाता है जिससे गायकों की आवाज दब जाती है. ’सैयो नी’ गीत के लिये इस एल्बम को जरूर सुनना चाहिए.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

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