Monday, March 11, 2013

बंद कमरे की राजनीति में संगीत का तडका

प्लेबैक वाणी -36 - संगीत समीक्षा - साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स


तिग्मांशु धुलिया की सफल साहेब बीवी और गैंगस्टर में शयनकक्ष के भीतर का जिस्मानी खेल कैमरे की जद में था, और संगीत के नाम पर एक जुगनी का ही जोर था. खैर एक बार फिर तिग्मांशु लौटे है और वापसी हुई है गैंगस्टर की, नए संस्करण में गैंगस्टर बने हैं इरफ़ान. आजकल बॉलीवुड में पुरानी फिल्मों के रिमेक और ताज़ा हिट फिल्मों में द्रितीय तृतीय संस्करणों के अलावा शायद कुछ नही हो रहा है...खैर आज बात करते हैं साहेब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न्स के संगीत के बारे में.

जहाँ पहले संस्करण में संगीतकारों की लंबी फ़ौज मौजूद थी नए संस्करण का पूरा जिम्मा बेहद प्रतिभाशाली संदीप चौठा ने उठाया है. शुद्ध हिंदी और कुछ संस्कृत शब्दों को जड़ कर रचा गया हैछल कपट गीत. जिसे गाया है पियूष मिश्रा ने. पियूष का ये  नाटकीय अंदाज़ एक अलग जोनर बनकर आजकल फिल्मों में छाया हुआ है. गुलाल और गैंग्स ऑफ वासेपुर की ही तरह यहाँ भी शब्दों की प्रमुखता अधिक है, धुन और संयोजन के मामले में कोई खास नयापन नहीं है. शब्द निश्चित ही अच्छे हैं और कपट और स्वार्थ की जटिलताओं को बेहद उत्कृष्ट रूप से उजागर करता है.

इधर गिरे एक क्लब नंबर है जो परिणीता के कैसी पहेली गीत की याद दिला देता है सोम्या रूह की आवाज़ में वो जरूरी तत्व हैं जो इस गीत को पर्याप्त सेंशुअल अंदाज़ प्रदान कर देता है, कौसर मुनीर के शब्द सटीक हैं. सेक्सोफोन का प्रयोग इस तरह के गीतों में लाजमी रहता है. पर गीत कुछ ऐसे नहीं है जो इसे अलग सी मकबूलियत प्रदान कर सके.

जुगनी का एक नया संस्करण यहाँ भी उपलब्ध है. जैजी बी की आवाज़ का जोश और तेज रिदम का कमाल कदम अवश्य थिरकाते हैं पर एक बार फिर संगीत प्रेमियों के लिए कुछ चौंकाने वाली बात यहाँ नहीं है.

एल्बम का सबसे बढ़िया गीत इसका आईटम गीत खुले आम कह दूं ही बनकर सामने आता है. परोमा दासगुप्ता की आवाज़ में लचीलापन है और उत्तेजना भी. संदीप नाथ के शब्द नए तेवर के साथ राजनीति और मीडिया के रिश्तों की पोल खोलते हैं, अंतरे खास तौर पे देसी अंदाज़ के चलते प्रभावित करते हैं.

देवीकी पंडित की आवाज़ में मखमली गज़लें सबने सुनीं होंगीं, एल्बम के अंतिम गीत में उनकी आवाज़ में गीत है कोना कोना दिल का. गीत की खासियत है इसका संयोजन जहाँ एक बीट स्किप कर स्वर के साथ जोड़ा गया है, ये प्रयोग ख़ासा लुभावना है, दूसरे अंतरे से पहले वेस्टर्न ओपरा का स्पर्श गीत को और भी खास बना देता है. ये गीत एक धीमे नशे की तरह है जिसे बार बार सुनकर भी आप को लुफ्त आएगा.

बहरहाल एल्बम में कुछ बहुत नया नहीं है संगीत प्रेमियों के लिए, और ऐसा भी कुछ नहीं जो आम श्रोता को आकर्षित कर सके. रेडियो प्लेबैक दे रहा एल्बम को ३.२ की रेटिंग.       

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