Sunday, December 9, 2012

'स्वरगोष्ठी' में ठुमरी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



स्वरगोष्ठी-९९ में आज
फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – १०

विरहिणी नायिका की व्यथा : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा। 


‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा।

हमारी आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों के योगदान से। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म १९०२ में पराधीन भारत के पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली जब ७ वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में उन्हें लोकप्रियता मिली। ली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत-प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, सबकुछ मिलाकर उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, आज सबसे पहले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

 

श्रृंगार रस के विरह भाव को उकेरने में पूर्ण समर्थ इस ठुमरी को सुविख्यात गायिका पद्मा तलवलकर ने भी गाया है। २८ फरवरी, १९४८ को मुम्बई में जन्मीं पद्मा जी की संगीत-शिक्षा जयपुर, अतरौली घराने की प्राप्त हुई है, किन्तु उनके गायन में ग्वालियर और किराना गायकी की विशेषताएँ भी परिलक्षित होती हैं। उनका विवाह जाने-माने तबला-वादक पण्डित सुरेश तलवलकर से हुआ। इस संगीतज्ञ दम्पति की सन्तानें- पुत्र सत्यजीत और पुत्री सावनी, दोनों ही तबला-वादन में कुशल हैं। संगीत-शिक्षा के दौरान पद्मा जी को ‘भूलाभाई मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से पाँच वर्ष तक छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। बाद में उन्हें ‘नेशनल सेण्टर फॉर पर्फ़ोर्मिंग आर्ट्स’ द्वारा दो वर्ष के लिए फ़ेलोशिप भी मिली थी। उन्हें वर्ष २००४ में पण्डित जसराज गौरव पुरस्कार, २००९ में श्रीमती वत्सलाबाई भीमसेन जोशी पुरस्कार तथा २०१० में राजहंस प्रतिष्ठान पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इन्हीं प्रतिभावान गायिका के स्वरों में अब आप भैरवी की इस ठुमरी का आनन्द लीजिए-


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : विदुषी पद्मा तलवलकर




आज हमारी चर्चा में जो ठुमरी है, उसे अनेक गायक-गायिकाओं ने अलग-अलग ढंग से गाया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने भी अनेक अवसरों पर इस ठुमरी को प्रस्तुत किया है। उनके स्वरों में ढल कर इस ठुमरी का एक अलग रंग निखरता है। आज के अंक में हम उनकी आवाज़ में भी यह ठुमरी सुनवा रहे हैं। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। इससे पूर्व अजय जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पिता पं. अजीत चक्रवर्ती से, बाद में कालीदास वैरागी और पं. ज्ञानप्रकाश घोष से प्राप्त हुई। पण्डित अजय चक्रवर्ती पहले ऐसे संगीत-साधक हैं, जिन्हें पाकिस्तान आमंत्रित किया गया और उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया था। एक संगीत-सभा में इस ठुमरी की प्रस्तुति के दौरान पण्डित अजय चक्रवर्ती ने वर्तमान गजल गायकी, राग भैरवी के विभिन्न रूप तथा पटियाला घराने की गायकी के बारे में कुछ चर्चा की है। संगीत के विद्यार्थियों के लिए यह प्रस्तुति लाभकारी होगी। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में भैरवी की यही ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



वर्ष १९७७ वासु चटर्जी की फिल्म ‘स्वामी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग में भैरवी की इस पारम्परिक ठुमरी का उपयोग किया था। परन्तु ठुमरी के इस फिल्मी स्वरूप में भैरवी के अलावा बीच-बीच में कुछ अन्य रागों- जोगिया, पीलू आदि की अनुभूति भी होती है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येसुदास ने इस ठुमरी को बड़े नर्म और भावपूर्ण अंदाज में गाया है। राजेश रोशन के पिता, संगीतकार रोशन ने अपने समय की फिल्मों में पारम्परिक खयाल, ठुमरी आदि का भरपूर उपयोग किया था। फिल्म ‘स्वामी’ में इस ठुमरी को शामिल करने की प्रेरणा राजेश को सम्भवतः अपने पिता से मिली हो। ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के इस फिल्मी रूप का आनन्द आप भी लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

फिल्म – स्वामी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : येसुदास



आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही वर्ष २०१२ की पाँचों श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रथम तीन विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से पुरस्कृत भी किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?
२ – इस पारम्परिक ठुमरी को आठवें दशक की एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। उस फिल्म के संगीतकार कौन थे?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 


 
‘स्वरगोष्ठी’ के ९७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका इकबाल बानो के स्वर में ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग देस। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का



 मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक सौवाँ अंक होगा और यह हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ का समापन अंक भी होगा। इस अंक में हम आपके लिए श्रृंगार रस की अत्यन्त मोहक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। जनवरी, २०१३ से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में बदलाव कर रहे हैं। आप अपने सुझाव १५ दिसम्बर तक अवश्य भेज दें। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

1 comment:

Sajeev said...

yeshudas wala version bhi kuch kam nahi hai....excellent post

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