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गीत उस्तादों के : चर्चा राग सोहनी की

स्वरगोष्ठी – ७१ में आज

राग सोहनी के स्वरों का जादू : 'प्रेम जोगन बन के...'

पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत-मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक थे। संगीत-प्रेमियों को उन्होने संगीत की हर विधाओं से मुग्ध किया, किन्तु फिल्म संगीत से उन्हें परहेज रहा। एकमात्र फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’ में उनके गाये दो गीत हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम इनमें से एक गीत पर चर्चा करेंगे।

शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत पर केन्द्रित साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, हमारे कई संगीत-प्रेमियों ने फिल्म संगीत में पटियाला कसूर घराने के विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के योगदान पर चर्चा करने का आग्रह किया था। आज का यह अंक हम उन्हीं की फरमाइश पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

भारतीय फिल्मों के इतिहास में १९५९ में बन कर तैयार फिल्म- ‘मुगल-ए-आजम’, एक भव्य कृति थी। इसके निर्माता-निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म की गुणबत्ता से कोई समझौता नहीं किया था। फिल्म के संगीत के लिए उन्होने पहले गोविन्द राम और फिर अनिल विश्वास को दायित्व दिया, परन्तु फिल्म-निर्माण में लगने वाले सम्भावित अधिक समय के कारण बात बनी नहीं। अन्ततः संगीतकार नौशाद तैयार हुए। नौशाद ने फिल्म में मुगल-सल्तनत के वैभव को उभारने के लिए तत्कालीन दरबारी संगीत की झलक दिखाने का हर सम्भव प्रयत्न किया। नौशाद और के. आसिफ ने तय किया कि अकबर के नवरत्न तानसेन की मौजूदगी का अनुभव भी फिल्म में कराया जाए। नौशाद की दृष्टि विख्यात गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पर थी, किन्तु फिल्म में गाने के लिए उन्हें मनाना सरल नहीं था। पहले तो खाँ साहब ने फिल्म में गाने से साफ मना कर दिया, परन्तु जब दबाव बढ़ा तो टालने के इरादे से, एक गीत के लिए २५,००० रुपये की माँग की। यह उस समय की एक बड़ी धनराशि थी, परन्तु के. आसिफ ने तत्काल हामी भर दी। नौशाद ने शकील बदायूनी से प्रसंग के अनुकूल गीत लिखने को कहा। गीत तैयार हो जाने पर नौशाद ने खाँ साहब को गीत सौंप दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने ठुमरी अंग की गायकी में अधिक प्रयोग किए जाने वाले राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध कर गीत- ‘प्रेम जोगन बन के...’ को रिकार्ड कराया। रिकार्डिंग से पहले खाँ साहब ने वह दृश्य देखने की इच्छा भी जताई, जिस पर इस गीत को शामिल करना था। मधुबाला और दिलीप कुमार के उन प्रसंगों को देख कर उन्होने गायन में कुछ परिवर्तन भी किए। इस प्रकार भारतीय फिल्म-संगीत-इतिहास में राग सोहनी के स्वरों में ढला एक अनूठा गीत शामिल हुआ। आइए पहले आपको यह गीत सुनवाते हैं-

फिल्म – मुगल-ए-आजम : ‘प्रेम जोगन बन के...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ



उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ द्वारा राग सोहनी के स्वरों में पिरोया यह गीत के. आसिफ को इतना पसन्द आया कि उन्होने खाँ साहब को दोबारा २५,००० रुपये भेंट करते हुए एक और गीत गाने का अनुरोध किया। खाँ साहब का फिल्म में गाया राग रागेश्री, तीनताल में निबद्ध दूसरा गीत है- ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’। ये दोनों गीत फिल्म संगीत के इतिहास के सबसे खर्चीले गीत सिद्ध हुए। आइए, खाँ साहब के गाये, राग सोहनी में निबद्ध इस गीत के बहाने थोड़ी चर्चा राग सोहनी के बारे में करते हैं। हम ऊपर यह चर्चा कर चुके हैं कि राग सोहनी का प्रयोग ठुमरी अंग में अधिक होता है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग का प्रयोग दो प्रकार से किया जाता है। पहले प्रकार, औडव-षाडव के अन्तर्गत आरोह में ऋषभ, पंचम तथा अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता। राग के दूसरे स्वरूप के आरोह में ऋषभ और अवरोह में पंचम का प्रयोग नहीं होता। यह पूर्वाङ्ग प्रधान राग है। परन्तु इसके गायन-वादन में उत्तराङ्ग प्रधान राग मारवा और पूर्वी की झलक नज़र आती है। इसके अलावा राग हिंडोल की छाया भी दिखती है। राग सोहनी का खयाल अंग में बेहद आकर्षक गायन, पण्डित कुमार गन्धर्व की सुपुत्री और शिष्या कलापिनी कोमकली ने किया है। राग सोहनी, तीनताल में निबद्ध, पण्डित कुमार गन्धर्व की यह रचना अब आप सुनिए-

राग – सोहनी, तीनताल : ‘रंग न डारो श्याम जी...’ : कलापिनी कोमकली



राग सोहनी चंचल प्रवृत्त का राग है। श्रृंगार, विशेष रूप से श्रृंगार के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराने में यह राग समर्थ है। भारतीय संगीत के रागों पर विस्तृत शोधकर्त्ता सत्यनारायण टाटा के अनुसार राग सोहनी, कर्नाटक पद्यति के राग हंसनन्दी के समतुल्य है। यदि राग हंसनन्दी में शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाए तो यह ठुमरी अंग के राग सोहनी की अनुभूति कराता है। सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद शुजात खाँ का मत है कि तंत्रवाद्य पर राग मारवा, पूरिया और सोहनी का वादन कम किया जाता है। शायद इसलिए कि वाद्य के लिए यह थोड़ा मुश्किल है किन्तु नामुमकिन नहीं। जिस कलाकार ने अपने वाद्य पर इन रागों को साध लिया, वह राग के सौन्दर्य को द्विगुणित कर देता है। आइए अब आपको, राग सोहनी में पगी एक आकर्षक रचना, सितार पर सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद शाहिद परवेज़ और इस वादन में तबला संगति की है, उस्ताद अकरम खाँ ने। आप सितार के तंत्रों पर राग सोहनी का आनन्द लीजिए और मुझे आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

सितार पर राग – सोहनी : वादक – उस्ताद शाहिद परवेज़ : रचना – द्रुत तीनताल



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, एक राग-आधारित गीत का अंश, इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। आज से आरम्भ हो रही पहेली की तीसरी श्रृंखला की अन्तिम कड़ी अर्थात ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – गीत के इस अंश में दो गायक कलाकारों के स्वर हैं। इनमें एक स्वर पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर का है। दूसरा स्वर किस विख्यात गायक का है?
२ – गीत का यह अंश ध्यान से सुनिए और राग का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६९वें अंक में हमने आपको १९६३ की भोजपुरी फिल्म ‘विदेशिया’ के गीत- 'हँसी हँसी पनवाँ खियौले बेईमनवा...’ का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- मन्ना डे और महेन्द्र कपूर तथा दूसरे का उत्तर है- भोजपुरी फिल्म विदेशिया। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर, बैंगलुरु से पंकज मुकेश और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई। इनके अलावा सुर-गन्धर्व मन्ना डे के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में प्रस्तुत दो अंकों की श्रृंखला की अनेक पाठकों ने न केवल सराहना की है, बल्कि अपने सुझावों के साथ फरमाइशें भी की हैं। इन सभी पाठकों-श्रोताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से आभार।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ का आगामी अंक सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर जी की स्मृति में समर्पित होगा। आगामी २१ मई को इस संगीत-मनीषी की ९२वीं जयन्ती है। आगामी रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

Comments

Sajeev said…
excellent post
swargoshthi said…
'स्वरगोष्ठी' के इस 71वें अंक के आलेख में अपनी दो गलतियों के लिए क्षमायाचना के साथ संशोधन करना चाहता हूँ।
1- तीसरे पैराग्राफ में जहाँ राग सोहनी को पूर्वाङ्ग प्रधान बताया गया है, इसके स्थान पर उत्तराङ्ग प्रधान पढ़ें।
2- "झरोखा अगले अंक का" में पण्डित दातात्रेय विष्णु पलुस्कर की जन्मतिथि 21 मई लिखी है। इसके स्थान पर यह जन्मतिथि 28 मई होनी चाहिए।
भूल के लिए पुनः क्षमा-प्रार्थी हूँ।

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