बुधवार, 9 मई 2012

"ससुराल गेंदा फूल..." - क्यों की जाती है ससुराल की तुलना गेंदे के फूल से?


'डेल्ही-६' फ़िल्म में "ससुराल गेंदा फूल" गीत ने हम सभी को कम या ज़्यादा थिरकाया ज़रूर है। छत्तीसगढ़ी लोक गीत पर आधारित इस गीत के बनने की कहानी के साथ-साथ जानिये कि ससुराल को क्यों गेंदे का फूल कहा जाता है। 'एक गीत सौ कहानियाँ' की 19वीं कड़ी में सुजॉय चटर्जी के साथ...

एक गीत सौ कहानियाँ # 19

हिन्दी फ़िल्मी गीतों में लोक-संगीत के प्रयोग की बात करें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र राज्यों के लोक-संगीत का ही सर्वाधिक प्रयोग इस क्षेत्र में हुआ है। पहाड़ी पृष्ठभूमि पर बनने वाले गीतों में हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तरांचल और उत्तर बंगाल व उत्तर-पूर्व के लोक धुनों का इस्तेमाल भी समय-समय पर होता आया है। पर छत्तीसगढ़ के लोक-संगीत की तरफ़ फ़िल्मी संगीतकारों का रुख़ उदासीन ही रहा है। हाल के वर्षों में दो ऐसी फ़िल्में बनी हैं जिनमें छत्तीसगढ़ी लोक-संगीत का सफल प्रयोग हुआ है। इसमें एक है आमिर ख़ान की फ़िल्म 'पीपली लाइव', जिसमें रघुवीर यादव और साथियों का गाया "महंगाई डायन" और नगीन तनवीर का गाया "चोला माटी के राम" जैसे गीतों की ख़ूब प्रशंसा हुई है। और दूसरी फ़िल्म है 'डेल्ही-६' जिसके छत्तीसगढ़ी लोक गीत पर आधारित "ससुराल गेंदा फूल" को भी उतना ही पसन्द किया गया जितना कि फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "मसक्कली"। इस तरह से आज छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की एक धारा हिन्दी फ़िल्म संगीत की धारा में आकर मिल गई है।

मूल गीतकार गंगाराम शिवारे 
"ससुराल गेंदा फूल" ७० के दशक में गंगाराम शिवारे ने लिखा था और इसकी धुन बनाई थी भुलवाराम यादव ने। गंगाराम शिवारे और भुलवाराम यादव, दोनों वर्षों से हबीब तनवीर के नाट्य-दल 'नया थियेटर' से स्थायी रूप से जुड़े थे। यह गीत अपने मूल रूप में नाटक 'गाँव के नाँव ससुरार मोर नाँव दमाद' के अन्तिम दृश्य में गाया गया है। बाद में भुलवाराम यादव ने इस गीत को तीन जोशी बहनों (रमादत्त, रेखा और प्रभादत्त जोशी) को सिखाया, जिन्होंने इसे पहली बार जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया। यह गीत छत्तीसगढ़ में इतना लोकप्रिय हुआ कि वहाँ की शादियों में इसका गाना अनिवार्य हो गया। रघुवीर यादव, जो छत्तीसगढ़ से तआल्लुक रखते हैं और जिन्हे 'डेल्ही-६' फ़िल्म में लोक-संगीत के इस्तेमाल के लिए नियुक्त किया गया था, ने जब ए. आर. रहमान को यह गीत सुनाया तो रहमान तो इतना अच्छा लगा कि उन्होंने तुरन्त इस गीत को चुन लिया। फ़िल्म के गीतकार प्रसून जोशी ने शब्दों में थोड़े-बहुत फेर-बदल किए ताकि छत्तीसगढ़ के बाहर के लोगों को आसानी से समझ में आ सके। पर इन कामों के लिए न रहमान ने क्रेडिट लिया और ना ही प्रसून जोशी ने। फ़िल्म की सीडी पर इस गीत को पारम्परिक रचना ही बताया गया है। हाँ, कर्टेसी में रघुवीर यादव और म्युज़िक सुपरविज़न में रजत ढोलकिया का नाम ज़रूर दिया गया है, जिनके ये दोनों हक़दार भी थे। पर अफ़सोस की बात यह कि इस गीत के दो जनक, गंगाराम शिवारे और भुलवाराम यादव, को किसी ने याद तक नहीं किया। ख़ैर, ए. आर. रहमान, प्रसून जोशी, रघुवीर यादव और रजत ढोलकिया, इन चारों ने मिलकर इस गीत के रंग-रूप को ऐसा निखारा कि न केवल यह लोगों के ज़ुबान पर चढ़ा, बल्कि गीत की गायिका रेखा भारद्वाज को इसके लिए पुरस्कार भी मिला।

रघुवीर यादव 
और अब इस गीत के बनने की कहानी। जैसा कि कई जगहों पर यह बताया गया है कि रघुवीर यादव ने ए. आर. रहमान के सहायक के रूप में इस गीत के लिए काम किया था, यह बात शायद सही न हो। यहाँ तक कि रहमान और यादव इस फ़िल्म के निर्माण के समय मिले भी नहीं थे। रघुवीर यादव को इस फ़िल्म के रामलीला वाले हिस्से के लिए राकेश मेहरा ने नियुक्त किया था जिसके लिए उन्हें क्रेडिट भी दिया गया है नामावली में (Ramleelaa - Written & Conceived by Raghuveer Yadav) इसी रामलीला वाले कार्यकाल में राकेश मेहरा ने रघुवीर को कहा कि इस फ़िल्म में एक दृश्य है जिसमें घरेलू औरतें मिर्च पीस रही हैं। उन्हें इस दृश्य के लिए एक अच्छे लोक-गीत की ज़रूरत है और रहमान ने इस सिचुएशन के लिए जो कम्पोज़ किया है वह उन्हें पसंद नहीं। तब रघुवीर ने "करार गेंदा फूल" को अपने अंदाज़ में उन्हें सुनाया। रघुवीर ने मेहरा को बताया कि यह एक छत्तीसगढ़ी धुन है जो वो अपनी माँ से बचपन में सुना करते थे। राकेश मेहरा को गीत पसन्द आ गया। वो चाहते थे कि रघुवीर यादव रहमान के साथ बैठकर इस गीत को रेकॉर्ड कर ले। पर रघुवीर को यह डर था कि रहमान के सीन्थेटिक बीट्स इस पारम्परिक रचना के साथ न्याय नहीं कर सकेगी। इसलिए उन्होंने रजत ढोलकिया के साथ मिलकर रेखा भारद्वाज को यह गीत सिखाया और उनसे यह गीत रेकॉर्ड करवाया और गीत के मूल शब्दों का ही सहारा लिया, बिना किसी फेर-बदल किये। पर रघुवीर यादव को जिस बात का डर था, वही हुआ। रघुवीर, रजत और रेखा के उस रेकॉर्डिंग को रहमान से रीमिक्स करवाया गया, क्योंकि गीत के पिक्चराइज़ेशन में अभिषेक बच्चन को भी दिखाया जाता है, जो हाल ही में अमरीका से लौटे थे। इसलिए उनके स्टेप्स के लिए पाश्चात्य बीट्स डालना ज़रूरी था, गीत में। पर यह क्या, गीत के बोल भी तो बदल दिए गए! "करार गेंदा फूल" को "ससुराल गेंदा फूल" बना दिया गया। और भी कई फेर-बदल किए गए बोलों में। इससे आम जनता को कितनी सहूलियत हुई यह तो नहीं कह सकते पर एक बार रेखा भारद्वाज ने एक टीवी शो में यह ज़रूर कहा था कि लिरिक्स हिंदी में करने से, लफ़्ज़ों में वो मुरकियाँ, वो बात नहीं आई, जैसे रघुवीर जी ने छत्तीसगढ़ी में सिखाया था।

और अब जो एक सवाल मन में उठता है, वह यह कि ससुराल को आख़िर गेंदे के फूल की उपमा क्यों दी गई है? इसके पीछे भी कई मत लोगों ने व्यक्त किए हैं जिनमें से दो प्रस्तुत कर रहे हैं। एक मत के अनुसार गेंदे का फूल दरअसल एक फूल नहीं बल्कि बहुत से फूलों का एक समूह है। फूल की वैज्ञानिक परिभाषा पर अगर जाएँ कि गेंदे के फूल की हर पंखुड़ी दरअसल पंखुड़ी नहीं बल्कि अपने आप में एक फूल है। गेंदे का एक फूल तभी पूरा होता है या सुंदर लगता है जब उसकी हर पंखुड़ी उससे बँधी हुई हो, जुड़ी हुई हो। ससुराल भी एक ऐसी जगह है जिसमें बहुत से चरित्र हैं - सास, ससुर, देवर, ननद आदि; जिनमें से कुछ कड़वे तो कुछ मीठे हैं, पर नई वधु यही उम्मीद करती है कि उसका ससुराल सुंदर होगा, और सभी को वो एक साथ में लेकर चलेगी जैसे कि गेंदे का फूल होता है। अब एक दूसरे मत के अनुसार छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में रहने वाले युवक-युवतियाँ अपने प्रेमी/प्रेमिका को "गोंदा फूल" (वहाँ गेंदे को गोंदा कहते हैं) कह कर भी बुलाते हैं क्योंकि इसके खिलने का समय बसन्त होता है और इसे प्यार का मौसम भी माना जाता है। अब सही-सही यह कह पाना तो मुश्किल है कि ससुराल को गेंदा फूल क्यों कहते हैं, पर जो बात हम कह सकते हैं वह यह कि यह गीत आज छत्तीसगढ़ से बाहर निकल कर पूरे देश और बल्कि विदेशों में भी पहुँच चुका है, जिसके लिए श्रेय जाता है रघुवीर यादव को।

इस गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें।



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में या आप मुझ तक पहुँच सकते हैं cine.paheli@yahoo.com के पते पर भी। इस स्तम्भ के लिए अपनी राय, सुझाव, शिकायतें और फ़रमाइशें इसी ईमेल आइडी पर ज़रूर लिख भेजें। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

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