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बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से...सुरैया और उमा देवी के युगल स्वरों में ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 392/2010/92

'सखी सहेली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। महिला युगल गीतों की इस शृंखला में कल आप ने ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म का गाया एक बच्चों वाला गाना सुना था। आज हमने जिन दो गायिकाओं को चुना है वे हैं सुरैय्या और उमा देवी। बहुत ही दुर्लभ जोड़ी है, और इस जोड़ी की याद आते ही हमें झट से याद आती है १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का वही सुरीला गीत, याद है ना "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से, जिस दिन से मेरा चांद छुपा मेरी नज़र से"। बहुत दिनों से आपने यह गीत नहीं सुना होगा, है ना? तो चलिए आज उन पुरानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कीजिए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत से जिसकी तर्ज़ बनाई थी नौशाद अली ने। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण व निर्देशन किया था अब्दुल रशीद कारदार ने, जिन्हे हम ए. आर. कारदार के नाम से बेहतर जानते हैं। श्याम, नुसरत, मुअव्वर सुल्ताना, सुरैय्या, बद्री प्रसाद, हुस्न बानो, प्रतिमा देवी प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म से ही शक़ील और नौशाद की जोड़ी शुरु हुई थी। इस फ़िल्म के कुछ गीत उमा देवी ने गाए, कुछ सुरैय्या ने, और शमशाद बेग़म की भी आवाज़ थी इस फ़िल्म में। मैं पूरी यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन जितना मैंने जाना है कि इस फ़िल्म में किसी पुरुष गायक की आवाज़ नहीं थी। इस फ़िल्म की जब भी बात चलती है तो सब से पहले उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ" गीत ज़हन में आता है। इस गीत को हमने कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं पर केन्द्रित शृंखला 'हमारी याद आएगी' में हमने सुनवाया था। इस गीत का फ़िल्मांकन मुनव्वर सुल्तना पर हुआ था। अब क्योंकि इस फ़िल्म में सुरैय्या भी थीं, तो ज़ाहिर है कि उन पर फ़िल्माए गीत उन्होने ही गाए होंगे। आज का प्रस्तुत युगल गीत मुनव्वर सुल्ताना और सुरैय्या पर फ़िल्माया हुआ है, और ऐसा लगता है कि प्रेम त्रिकोण की कहानी रही होगी यह फ़िल्म, और ये दोनों नायिकाएँ अपने अपने दिल की बातें गीत के शक्ल में बयाँ कर रही हैं, लेकिन एक ही पुरुष के लिए। पहला और तीसरा अंतरा उमा देवी ने गाया है जब कि दूसरा अंतरा सुरैय्या की आवाज़ में है। हैरत की बात है कि इन दोनों की आवाज़ों में बहुत ज़्यादा कंट्रास्ट सुनाई नहीं देता इस गीत में। इस गीत की अदायगी जितनी प्यारी है, उतने ही सुंदर हैं शक़ील साहब के बोल, और नौशाद साहब ने भी क्या धुन बनाई है। गाने का जो मूल रीदम है, वह बंगाल के कीर्तन शैली की तरह सुनाई देता है।

१९९१ में उमा देवी विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और सुरैय्या के साथ उनके गाए हुए इस गीत को बजाया भी था और इसके बारे में बताया भी था। पेश है उस कार्यक्रम का वह अंश: "मेरे सज्जनों, मैं तुम्हे थोड़ी सी आप बीती सुनाती हूँ। मशहूर हीरोइन सुरैय्या, फ़िल्म स्टार सुरैय्या, हाय हाय हाय हाय, सुरैय्या के साथ मैंने फ़िल्म 'दर्द' का यह गाना गाया था। आप लोग ख़ूब सुनते हैं यह गाना। उसमें मैं भी उनके साथ खड़ी होकर, बिल्कुल उनसे लिपटी खड़ी गा रही थी, "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से"। इसमे हम दोनों ने अपने अपने गाने की अदायगी की थी, ज़रा सुनिए तो..." और इस गीत के ख़त्म होते ही उमा जी कहती हैं, "क्यों, अच्छा लगा ना? मैं आपको अच्छी लगती हूँ ना? आप भी मुझे बड़े अच्छे लगते हैं। अरे, अगर आप यहीं सामने खड़े होते तो तुम्हे गले से चिपड चिपड कर जाने ही नहीं देती।" दोस्तों, क्योंकि उमा देवी उसके बाद टुनटुन बन चुकी थीं, इसलिए विविध भारती के उस 'जयमाला' कार्यक्रम में उनकी बातों का अंदाज़ टुनटुन जैसा था और जो गानें उन्होने सुनवाए, वो उमा देवी ने सुनवाए। बहुत ही प्रतिभाशाली अदाकारा थीं वो। भली ही गायन में बहुत दूर तक नहीं पहुँचीं, लेकिन अपने हास्य अभिनय से न जाने कितने हज़ारों लाखों लोगों की होठों पर मुस्कान बिखेरा है उन्होने। और किसी के चेहरे पर मुस्कान खिलाने से बेहतर और कोई दूसरी इबादत नहीं हो सकती। दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि हमने केवल उमा देवी के बारे में ही बातें कीं, और सुरैय्या को भूल गए। हम वादा करते हैं कि इसके बाद जिस किसी भी दिन सुरैय्या जी का गाया हुआ कोई गीत सुनवाएँगे, उस दिन उनके जीवन से जुड़ी कुछ और बातें आप तक ज़रूर पहुँचाएँगे, वैसे उनसे जुड़ी बहुत सारी बातें हम पहले भी बता चुके हैं। और क्यों कि आज अभी आप बेताब होंगे इस बेताबी भरे गीत को सुनने के लिए, इसलिए हम आज यहीं रुक जाते हैं, सुनिए यह प्यारा सा गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि युं तो लोग यही जानते हैं कि उमा देवी को पहली बार नौशाद साहब ने फ़िल्म 'दर्द' में गवाया था, लेकिन हक़ीक़त यह है कि १९४६ में उमा देवी ने 'वामिक़ अज़रा' नामक एक फ़िल्म में गीत गाया था जिसके संगीतकर थे ए.आर. क़ुरेशी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"दुनिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिका बहनों ने गाया है इसे, एक लता है दूसरी का नाम बताएं- २ अंक.
3. निर्माता एस. एम. एस. नायडू की इस फिल्म के संगीतकार बताएं -२ अंक.
4. इस नटखट मस्ती भरी गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
क्या बात सब के सब चूके इस बार, पर शरद जी ने फिल्म का नाम सही बताया है, २ अंक जरूर मिलेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Comments

indu puri said…
अपलम चपलम चपलाई रे ....सारी दुनिया को छोड़ चली आई रे
padm singh said…
लता मंगेशकर जी +उषा मंगेशकर जी ने ये गाना गया है ,अब
पहले प्रश्न का पहला उत्तर ही गलत हो तो ........अपना भगवान मालिक है
गीतकार हैं : राजेन्द्र कृष्ण
anita singh said…
Music Director : Ramchandra C
AVADH said…
Indu bahin, Sharad ji, Padm Singh ji & Anita ji sabko badhai.
Padm Singh ji, aap ghabrayen nahin. Uttar shat pratishat sahi hai. Meri pakki guarrantee hai.
Avadh Lal
AVADH said…
एक बार मैंने पढ़ा था कि फिल्म आज़ाद बन कर तैयार हो गयी थी पर उसका संगीत नहीं हुआ था. निर्माता और निर्देशक चाहते थे कि जल्द से जल्द गीत रिकॉर्ड हो जाएँ जिससे फिल्म शीघ्र प्रदर्शित हो सके. तब किसी ने संगीतकार सी. (चितलकर) रामचंद्र जी का नाम सुझाया कि वोह धुनों को फ़ौरन तैयार करने में माहिर हैं. और यकीन मानिये मात्र १५ दिनों में सब गाने, धुन, शब्द, ओर्केस्ट्रा सहित पूरे हो कर रिकॉर्ड हो गए थे.
क्या गीत थे - चाहे अपलम चपलम हों या कितना हसीं है मौसम और लता दीदी के मधुर गीत. क्या कहना.
तो ऐसे थे अन्ना सी रामचंद्र.
अवध लाल
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अरसे बाद सुना यह भूला -बिसरा मधुर गीत ...

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