शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

रोक्किंग जनता का आक्रोश और प्यार समेटे है सत्याग्रह का संगीत

लंबे समय तक समानांतर सिनेमा में सक्रिय रहे प्रकाश झा ने कुछ सालों पहले महसूस किया कि वास्तविकता और व्यावसायिकता के बीच का भी एक रास्ता है जिसके माध्यम से वो अपने सशक्त सन्देश मनोरंजकता में घोलकर दर्शकों के एक बहुत बड़े वर्ग तक आसानी से पहुँच सकते हैं. मृत्यदंड, गंगाजल  आरक्षण  और राजनीति  जैसी सफल और सशक्त फिल्मों के बाद अब प्रकाश झा लाये हैं एक और सोच को प्रभावित करने वाली फिल्म सत्याग्रह . आज चर्चा करगें इसी फिल्म के संगीत की, हम ताज़ा सुर ताल के नए अंक में. एल्बम में संगीत है सलीम सुलेमान, मीत ब्रोस अनजान, आदेश श्रीवास्तव और इंडियन ओशन का, गीत लिखे हैं प्रसून जोशी ने. 

पहला गीत सत्याग्रह  बापू के प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम  का आधुनिक संस्करण है. गीत के अधिकतर अंश भजन स्वरुप ही हैं पर बीच बीच में कुछ सुलगते सवाल हैं...घायल है भोला इंसान ....के बाद गीत की करवट बदलती है. इस दबे इन्कलाब को आवाज़ दी है राजीव सुंदरेशन, शिवम पाठक और श्वेता पंडित ने. सलीम सुलेमान का संगीत संयोजन कबीले तारीफ है. श्रोताओं को एक नई ऊर्जा से भरने में सक्षम है ये गीत.

प्रकाश झा की फिल्मों में शास्त्रीय रंग के गीत होते ही है. इस कड़ी में है अगला गीत आयो जी, आधुनिक अंदाज़ की ठुमरी है ये...जिसे श्रद्धा पंडित ने आवाज़ दी है, सलीम मर्चेंट के साथ. अच्छे शब्द हैं, श्रद्धा की आवाज़ में कसाव है और कशिश भी, बस संयोजन में टेक्नो का तडका कुछ जरुरत से अधिक महसूस हुआ, जो इस सुरीले गीत में अवरोध सा लगता है.

ठुमरी  की बात चली है तो याद आती है गौहर जान....जिनके लिए कहा जाता है कि पहला भारतीय रिकॉर्ड एल्बम उन्हीं की आवाज़ में जारी हुआ था. उनकी सबसे मशहूर ठुमरी रस के भरे तोरे नैन  को जाने कितने गायकों ने अपने अपने अंदाज़ में गाया है. आज भी इसके रस में वही मिठास है. सत्यग्रह  का अगला गीत भी यही ठुमरी है. शुक्र इस बात का है कि यहाँ टेक्नो ध्वनियाँ अपनी सीमा में है और गायक शफकत अमानत अली की आवाज़ का बदस्तूर नशा खुल कर बिखर पाता है. बहुत बढ़िया गीत जिसे सुकून के क्षणों में बैठकर चैन से बारोबार सुना जा सकता है. 

अगला गीत फिर से फिल्म के थीम में वापस ले आता है जनता रोक्क्स  जिसमें आवाज़ है मीत ब्रोस अनजान की. सिचुएशनल गीत है और प्रसून ने व्यंग का सुन्दर तडका लगाया है. आज के दौर का आईना है गीत. सबसे सुन्दर हिस्सा है गीत के दूसरे हिस्से में चलती घोटाला कमेंट्री और विज्ञापन सरीखा टैग लाईन...

अगले गीत में भी आक्रोश है मगर अंदाज़ है इंडियन ओशन वाला. इन्टेंस और उबाल से भरपूर मगर शांत ज्वालामुखी जैसा. राहुल राम और साथियों का ये अंदाज़ भी फिल्म के मूड को बेहद अच्छे से सप्पोर्ट करता है. रस के भरे तोरे नैन  का एक और संस्करण भी है खुद आदेश श्रीवास्तव की आवाज़ में, जो शफकत वाले संस्करण से उन्नीस ही कहा जायेगा पर आदेश का भी अपना ही एक अलग रंग है जो उनके चाहने वालों को निराश नहीं करेगा. 

सत्याग्रह से उम्मीद है कि ये एक ऐसी फिल्म होगी जो बहुत व्यापक चोट कर सकती है हमारे सामाजिक और राजनितिक ढाँचे में ...संगीत फिल्म के अनुरूप है और रस के भरे तोरे नैन  जैसा खूबसूरत गीत भी इस एल्बम की खास पहचान है. हमारी रेटिंग है ४.१  की, आप बताएं अपनी राय....

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी

 

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