Skip to main content

सचिन जिगर को मिला बड़ा कैनवस शुद्ध देसी रोमांस के रूप में

रोमांस हमारी फिल्मों का एक अहम हिस्सा है. विवधता लाने के लिए इसे नए नए पहनावे दे दिए जाते हैं. इसी चिर परिचित रोमांस का नया नामकरण हुआ है शुद्ध देसी रोमांस  के रूप में. यश राज बैनर की इस ताज़ा पेशकश में संगीत है सचिन जिगर का. गो गोवा गोन  के विवादास्पद मगर हिट गीतों के बाद ये गुज्जू संगीतकार जोड़ी इन दिनों काफी अच्छे फॉर्म में है. 

साईकिल  की घंटियाँ, सीटी और होर्न जैसी ध्वनियाँ गीत पहले गीत तेरे मेरे बीच में  का मूड बनाते हैं. मोहित और सुनिधि की आवाजों में ये गीत कमाल का है. शब्दों और धुन का ऐसा मेल बहुत दिनों में सुनने को मिला है. जबरदस्त संगीत संयोजन इसे और भी लाजवाब बना देता है. जयदीप सहानी के शब्द गजब हैं. 

 जिगर और प्रिया की युगल आवाजों में गुलाबी  गीत जयपुर शहर को समर्पित है. धुन कैची है और मधुर है. और पार्श्व संगीत के रूप में प्रभावी भी. 

हवन  कुंड  के बाद दिव्या कुमार की जोशीली आवाज़ एक बार फिर रोक्किंग फॉर्म में है चंचल मन  गीत में. लोक राजस्थानी अंदाज़ को पाश्चात्य पहनावे में ढालकर बढ़िया सजाया गया है गीत को. 

एल्बम का सबसे शानदार गीत है टाईटल ट्रेक जो है बेनी दयाल और सुनिधि के स्वरों में. जितने बढ़िया शब्द हैं उतनी ही सुरीली और गुनगुनाने पर मजबूर करने वाली धुन है. एक और शानदार गीत. 

इस एल्बम में भी ढेर सारे वाध्य पीसस् हैं जिन्हें बेहद दिलचस्प नाम दिए गए हैं जैसे मुझे किस कर सकते हो, तेज वाला अट्रेक्शन, बॉय फ्रेंड बनोगे  आदि. हमारी राय में ये सचिन जिगर का सर्वश्रेष्ठ काम है. इसे सुनते हुए हमारे श्रोता एक बार फिर पहले प्रेम की फुलकारियाँ महसूस कर पायेंगें ऐसा हमें लगता है. 

एल्बम के सर्वश्रेष्ठ गीत  -   तेरे मेरे बीच में, शुद्ध देसी रोमांस 
हमारी रेटिंग - ४.३ 

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी

Comments

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

‘बरसन लागी बदरिया रूमझूम के...’ : SWARGOSHTHI – 180 : KAJARI

स्वरगोष्ठी – 180 में आज वर्षा ऋतु के राग और रंग – 6 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय रूप   उपशास्त्रीय रंग में रँगी कजरी - ‘घिर आई है कारी बदरिया, राधे बिन लागे न मोरा जिया...’ ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम वर्षा ऋतु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...