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पाकिस्तान में एक ब्राह्मण की आत्मा - लघु संस्मरण

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा के स्वर में मुंशी प्रेमचन्द की मार्मिक कहानी "बालक" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा का एक लघु संस्मरण पाकिस्तान में एक ब्राह्मण की आत्मा जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत कथा का गद्य "बर्ग वार्ता ब्लॉग" पर उपलब्ध है। "पाकिस्तान में एक ब्राह्मण की आत्मा" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 37 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



प्रश्न कठिन हो जाते हैं, हर उत्तर पे इतराते हैं
मैं चिंता में घुल जाता हूँ, चलूँ तो पथ डिग जाते हैं।
 ~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"क्यों, आपमें क्या किसी बाम्भन की रूह आ गयी है जो मांस खाना छोड़ दिया?”
 (अनुराग शर्मा कृत "पाकिस्तान में एक ब्राह्मण की आत्मा" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
पाकिस्तान में एक ब्राह्मण की आत्मा MP3

#27th Story, Pakistan Mein Ek Brahman Ki Atma: Anurag Sharma Hindi Audio Book/2013/27. Voice: Anurag Sharma

Comments

बहुत भावनात्मक संस्मरण. और खूबसूरती से आवाज दी है. बधाई अनुराग जी.
Smart Indian said…
धन्यवाद पाण्डेय जी!
आपके संस्मरण मे बड़ी रोचक बात मालूम चली ....!!
सुंदर संस्मरण ।
आभार अनुपमा जी!
Madhavi Charudatta said…
Short, Simple but very lovely story. Thank you Anuragji
DKM said…
Come to think of it, perhaps a large number of people in Pakistan must have Brahminical origins. I remember the life story of the great singer Ustad Alladiya Khan Sahib, who used to wear an insignia all through that showed his Brahmin origins. He even knew his GOtRa, the R^shi heritage, etc. Perhaps his ancestors had to embrace Islam to continue to practice music at the court of the new rulers after the defeat of the original Raaja. Perhaps giving up life as a Brahmin was considered a worthy sacrifice so that such a supremely spiritual art as classical music could be saved from extinction and preserved. In any case, truth be told that many Indian singers benefited from that sacrifice and Khan Sahib was very generous about sharing his superb musical heritage with Hindus and others.

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