शनिवार, 31 जुलाई 2010

'ओल्ड इज़ गोल्ड' - ई-मेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें - ०१

नमस्कार दोस्तों! आज आप मुझे यहाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के स्तंभ में देख कर हैरान ज़रूर हो रहे होंगे कि भई शनिवार को तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल नहीं सजती है, तो फिर यह व्यतिक्रम कैसा! है न? दरअसल बात कुछ ऐसी है कि जब से हमने 'ओल इज़ गोल्ड' को दैनिक स्तंभ से बदल कर सप्ताह में पाँच दिन कर दिए हैं, हम से कई लोगों ने समय समय पर इसे फिर से दैनिक कर देने का अनुरोध किया है। हमारे लिए यह आसान तो नहीं था, क्योंकि अपनी रोज़-मर्रा की व्यस्त ज़िंदगी से समय निकाल कर ऐसा करना ज़रा मुश्किल सा हो रहा था, लेकिन आप सब के आग्रह और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आपकी दिलचस्पी को हम नज़रंदाज़ भी तो नहीं कर सकते थे। इसलिए हमें एक नई बात सूझी। और वह यह कि कम से कम शनिवार को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजाएँगे ज़रूर, लेकिन उस स्वरूप में नहीं जिस स्वरूप में रविवार से गुरुवार तक सजाते हैं। बल्कि क्यों ना कुछ अलग हट के किया जाए इसमें। नतीजा यह निकला कि आज से सम्भवत: हर शनिवार की शाम यह ख़ास महफ़िल सजेगी, जो कहलाएगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' एक तरह से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का साप्ताहिक विशेषांक होगा जिसमें बातें होंगी आपकी, आपके मनपसंद गीतों की, उनसे जुड़ी हुई आपकी यादों की। इसके अलावा आप पुराने फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों के बारे में जो भी विचार रखना चाहें इस विशेषांक के लिए भेज सकते हैं। इस स्तंभ में आगे चलकर हम पुराने फ़िल्मी गीतों से जुड़े पहलुयों पर बहस भी करेंगे जैसे कि डिबेट में होता है, और भी कई नई चीज़ें शामिल होंगी इन विशेषांकों में। तो आपको बस इतना करना होगा कि अपने विचार, अपने पसंद के गानें और उनसे जुड़ी बातें और यादें, या फिर फ़िल्म-संगीत से जुड़ी आपका कोई भी अनुभव या संस्मरण या फ़ोटो हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजना होगा, और हम उन्हे पेश करेंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस ख़ास अलबेले, सजीले, सुरीले विशेषांक में जिसका नाम है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

यह तो थी इस विशेषांक के स्वरूप और नियमों की जानकारी। तो आइए अब शुरु किया जाए 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की पहली कड़ी। आज का यह अंक रोशन है हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक वरिष्ठ श्रोता व पाठिका की यादों के उजालों से। आप हैं हम सब की प्यारी गुड्डो दादी, जो रहती हैं अमरीका के शिकागो शहर में। गुड्डो दादी ने समय समय पर हमें टेलीफ़ोन कर और ईमेल के ज़रिए हमारा हौसला बढ़ाया है, हमारी तारीफ़ें की हैं, और अपनी स्नेहाशीष दी है। दादी से हमें पता चला कि गुज़रे ज़माने के कई फ़िल्मी कलाकारों से उनके परिवार का संबंध रहा है। उनके और उनके परिवार की कई तस्वीरें भी हैं जिनमें फ़िल्म जगत के नामचीन हस्तियों के चेहरे नज़र आ जाते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर उन्होने हमें भेजी हैं जिसमें वो नज़र आ रही हैं गायिका सुरिंदर कौर के एक कार्यक्रम का आनंद उठाते हुए.


दरअसल हुआ युं था कि जब हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में 'दुर्लभ दस' के अंतर्गत सुरिंदर कौर का गाया फ़िल्म 'नदिया के पार' का गीत सुनवाया था "अखियाँ मिलाके अखियाँ", उसे सुन कर दादी की उस ज़माने की यादें ताज़ा हो गईं, और ईमेल के माध्यम से उन्होने अपने विचार कुछ इस तरह से व्यक्त किये - "आपके पास तो कुबेर का ख़ज़ाना है। सुरिंदर कौर जी का गीत सुनवाकर कहाँ पहुँचा दिया सितारों से आगे! सुरिंदर कौर जी का शो १९६७ में दिल्ली के रिज़र्व बैंक के आगे जिसका चित्र भी भेज रही हूँ। १९५२ से जानती हूँ सुरिंदर कौर जी को और उनकी बहन प्रकाश कौर जी को। इस चित्र में साथ में बेटी है और दूसरी ओर मुंह किये बेटा बैठा है।" दोस्तों, क्योंकि यह अंक यादों के ख़ज़ाने को और ज़्यादा समृद्ध करने का है, और गुड्डो दादी की यादें हम अनुभव कर रहे हैं जो रहती हैं अमरीका में, तो क्यों ना सुरिंदर कौर के गानें किस तरह से 'वॊयस ऒफ़ अमेरिका' पर बजाया गया था ३१ दिसंबर १९९२ को, उसका एक ज़िक्र यहाँ पेश किया जाए। यह जानकारी हमने प्राप्त की है 'लिस्नर्स बुलेटिन' के अंक-९१ से जो प्रकाशित हुआ था मार्च १९९३ में। रेडियो सीलोन पर १५-१६ वर्षों तक कार्य करने के बाद १९८४-८५ से Voice of America (VOA), वाशिंगटन में कार्यरत श्रीमती विजयलक्ष्मी डिसेरम एक अनोखी उद्‍घोषिका हैं। वे 'मनोरंजन' एवं 'संगीतकार' कार्यक्रमों में अक्सर हिंदी फ़िल्मों के गायकों, संगीतकारों, निर्माता-निर्देशकों, आदि पर प्रोग्राम पेश करती आईं हैं। ३१ दिसंबर १९९२ को इन्होंने गायिका सुरिंदर कौर के गाए हमेशा जवान गीतों को लेकर एक आकर्षक कार्यक्रम पेश किया था। गायिका के बारे में उन्होंने संगीतकार एस. मोहिंदर तथा 'हिंदी फ़िल्म गीत कोश' के संकलक हर मंदिर सिंह 'हमराज़' के विचार प्रस्तुत कर प्रोग्राम में चार चांद लगा दिए। गायिका सुरिंदर कौर के बारे में नई जानकारी देते हुए 'हमराज़' साहब ने बताया कि उनका गाया प्रथम गीत "इतने दूर है हुज़ूर, कैसे मुलाक़ात हो" (फ़िल्म- प्यार की जीत, '४९) था, न कि "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना" (फ़िल्म- शहीद, '४९)। दरअसल 'प्यार की जीत' के लिए ही उन्होंने सब से पहले गीत गाए थे लेकिन उसी वर्ष निर्मित 'शहीद' (जिसमें उन्होंने बाद में गीत गाए) पहले रिलीज़ हो जाने के कारण यह भान्ति पैदा हो गई थी। तो दोस्तों, आइए आज के इस विशेषांक में सुना जाए सुरिंदर कौर की आवाज़ में फ़िल्म 'शहीद' के उसी हिट गीत को जिसके बोल हैं "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना"।



तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' जिसमें हमने गुड्डो दादी की यादों का सहारा लेकर गायिका सुरिंदर कौर को याद किया।

और अब एक सूचना: १४ अगस्त शनिवार को स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में हम चढ़ाएँगे देश भक्ति रंग। आपको इतना करना है कि इस ख़ास दिन से जुड़ी अपने बचपन की यादों को हमारे साथ बांटिए। कैसे मनाया करते थे इस पर्व को? बचपन में कौन कौन सी देश भक्ति और बच्चों की फ़िल्में देखी है आपने? कौन सा देश भक्ति गीत आपको सब से ज़्यादा पसंद है? देश भक्ति और देश भक्ति फ़िल्मों और गीतों से जुड़ी कोई भी याद, कोई भी संस्मरण आप हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिए अगले ७ दिनों के अंदर। आपकी यादों को हम पूरी दुनिया के साथ बांटेंगे १४ अगस्त की शाम।

अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ पुन: हाज़िर होंगे। मोहम्मद रफ़ी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित हुए और यह भी बताते हुए कि कल के अंक में आप रफ़ी साहब की ही आवाज़ सुनेंगे, आपसे आज विदा ले रहे हैं, नमस्कार!



प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

सुनो कहानी: रामचन्द्र भावे की वारिस

रामचन्द्र भावे की कन्नड कहानी वारिस

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में जयशंकर प्रसाद की अमर कहानी 'पुरस्कार' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं रामचन्द्र भावे की कन्नड कहानी "वारिस", जिसको स्वर दिया है कविता वर्मा ने। कहानी का हिन्दी अनुवाद डी.एन.श्रीनाथ ने किया है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 18 मिनट 39 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।


कन्नड साहित्यकार रामचन्द्र भावे की सभी कहानियाँ अंत में सोचने पर विवश करती हैं।

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

पिताजी का व्यवहार न जाने क्यों विचित्र सा लगा।
(रामचन्द्र भावे की "वारिस" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#Eighty Fifth Story, Varis: Ramchandra Bhave/Hindi Audio Book/2010/29. Voice: Kavita Verma

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

मिलिए आवाज़ के नए वाहक जो लायेंगें फिर से आपके लिए रविवार सुबह की कॉफी में कुछ दुर्लभ गीत

दोस्तों यूँ तो आज शुक्रवार है, यानी किसी ताज़े अपलोड का दिन, पर नए संगीत के इस सफर को जरा विराम देकर आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं आवाज़ के एक नए वाहक से. दोस्तों आपको याद होगा हर रविवार हम आपके लिए लेकर आते थे शृंखला "रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत". जो हमारे नए श्रोता हैं वो पुरानी कड़ियों का आनंद यहाँ ले सकते हैं. कुछ दिनों तक इसे सजीव सारथी सँभालते रहे फिर काम बढ़ा तो तलाश हुई किसी ऐसे प्रतिनिधि की जो इस काम को संभाले. क्योंकि इस काम पे लगभग आपको पूरे हफ्ते का समय देना पड़ता था, दुर्लभ गीतों की खोज, फिर आलेख जिसमें विविधता आवश्यक थी. दीपाली दिशा आगे आई और कुछ कदम इस कार्यक्रम को और आगे बढ़ा दिया, उनके बाद किसी उचित प्रतिनिधि के अभाव में हमें ये श्रृखला स्थगित करनी पड़ी. पर कुछ दिनों पहले आवाज़ से जुड़े एक नए श्रोता मुवीन जुड़े और उनसे जब आवाज़ के संपादक सजीव ने इस शृंखला का जिक्र किया तो उन्होंने स्वयं इस कार्यक्रम को फिर से अपने श्रोताओं के लिए शुरू करने की इच्छा जतलाई. तो दोस्तों हम बेहद खुशी के साथ आपको बताना चाहेंगें कि इस रविवार से मुवीन आपके लिए फिर से लेकर आयेंगें रविवार सुबह की कॉफी से संग कुछ बेहद बेहद दुर्लभ और नायाब गीत. जिन्हें आप हमेशा हमेशा सजेह कर रखना चाहेंगें. लेकिन पहले आपका परिचय मुवीन से करवा दें.



नाम : मुवीन
जन्म स्थान : गाँव दुलखरा, जिला बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
जन्मतिथि : ०६ मार्च, १९८१
शिक्षा : स्नातक
कार्य क्षेत्र : दिल्ली में प्राइवेट कम्पनी में नौकरी



तीसरी कक्षा पास की ही थी कि पिताजी गर्मियों कि छुट्टियों में दिल्ली घुमाने सपरिवार लेकर आये. आए दिल्ली घूमने के लिए और यहीं के होकर रह गए, ये बात १९८८ की है. बचपन से ही गीत सुनने और गुनगुनाने का शौक था. गाँव के स्कूल में कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं होता था जिसमें मैंने न गाया हो ये सिलसिला दसवीं कक्षा तक चलता रहा. उसके बाद कुछ पढाई के दबाव के कारण सिलसिला टूट गया और आज तक नहीं जुड़ पाया.

मगर सुनने का शौक अब भी बरक़रार रहा. गीतों का संग्रह करने का विचार पहली बार १९९६ में आया और लगभग ५०० से ज्यादा ऑडियो केसेट संग्रह कर जमां कर लीं. कुछ खरीदी तो कुछ में अपनी पसंद के गीत खाली केसेट में रिकॉर्ड करवाए. अभी संग्रह करने की प्यास लगी ही थी कि प्रोधिगिकी ने ऐसी करवट बदली के ऑडियो केसेट की जगह CD ने ले ली. खैर उन गीतों को CD में उतारा. आज जब कंप्यूटर का ज़माना है तो ऑडियो केसेट या CD दोनों को पीछे छोड़ दिया.

आज मेरे संग्रह की शुरुआत १९०५ में गाये हुए रागों से होती है जो अब्दुल करीम (११ नवम्बर, १८७२-१९३७) के हैं. इसके अलावा अमीर खान, अनजानीबाई, आज़मबाई, अजमत खान, बड़े गुलाम अली खान, बड़ी मोती बाई, फैय्याज खान, गौहर जाँ आदि का संग्रह है. भारतीय संगीत को सुनना और इसकी जानकारी को उन संगीत प्रेमियों तक पहुचाना अच्छा लगता है जिन तक ये संगीत किसी न किसी वजह से नहीं पहुच सका.

मैं किसी विशेष गायक या गायिका, संगीतकार, गीतकार इत्यादि की सीमा में बंधकर नहीं रहा सभी के गीतों को सामान आदर के साथ सुनता हूँ. लेकिन फिर भी मोहम्मद रफ़ी साब की आवाज़, नौशाद अली, शंकर जयकिशन का संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र की शायरी कुछ ज्यादा ही मुझपर असर करती है.

संपर्क : -
anwarsaifi@gmail.com
+91 9971748099

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

ठंडी हवा ये चाँदनी सुहानी.....और ऐसे में अगर किशोर दा सुनाएँ कोई कहानी तो क्यों न गुनगुनाये जिंदगी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 450/2010/150

'गीत अपना धुन पराई', आज हम आ पहुँचे हैं इस शृंखला की अंतिम कड़ी पर। पिछले नौ कड़ियों में आपने नौ अलग अलग संगीतकारों के एक एक गीत सुनें जिन गीतों की प्रेरणा उन्हे किसी विदेशी धुन से मिली थी। हमने उन विदेशी गीतों की भी थोड़ी चर्चा की। आज अंतिम कड़ी के लिए हमने चुना है संगीतकार किशोर कुमार को। जी हाँ, एक ज़बरदस्त गायक तो किशोर दा थे ही, एक अच्छे संगीतकार भी थे। उन्होने बहुत ज़्यादा फ़िल्मों में संगीत तो नहीं दिया, लेकिन जितने भी दिए लाजवाब दिए। उनकी धुनों से सजी 'झुमरू', 'दूर का राही' और 'दूर गगन की छाँव में' जैसे फ़िल्मों के संगीत को कौन भुला सकता है भला! तो आज हमने उनकी सन् १९६१ की फ़िल्म 'झुमरू' का एक गीत चुना है उन्ही का गाया हुआ - "ठण्डी हवा ये चांदनी सुहानी, ऐ मेरे दिल सुना कोई कहानी"। कुछ कुछ वाल्ट्स की रीदम जैसी इस गीत की धुन प्रेरित है १९५५ में बनी जुलिअस ल रोसा के "दोमानी" गीत से। "दोमानी" व्क इटालियन शब्द है जिसका अर्थ है "कल" (tomorrow)| गीत की शुरुआत तो हू-ब-हू इसी गीत की धुन जैसी है। लेकिन मजरूह साहब के असरदार बोल और किशोर दा की दिलकश गायकी ने इस हिंदी गीत को एक अलग ही मुक़ाम तक पहुँचाया है, शायद मूल गीत से बेहतर। 'झुमरू' फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के शुरुआती दिनों में १७-वीं कड़ी में ही सुनवा दिया था और फ़िल्म की तमाम जानकारियाँ भी दी थीं, इसलिए आज आइए हम "दोमानी" गीत की बात करें।

"दोमानी" गीत का पूरा मुखड़ा है - "May be you'll fall in love with me domani, may be tomorrow night the sun will shine, I'll change my name from Johnny...."| इसे लिखा था उल्पिओ मिनुसी ने, संगीतबद्ध किया टोनी वेलोना ने। इसका सब से लोकप्रिय वर्ज़न जुलिअस ल रोसा ने गाया जिसे कैडेन्स रेकॊर्ड्स ने जारी किया। 'बिलबोर्ड चार्ट्स' में इस गीत की एंट्री हुई १३ जुलाई १९५५ को और ७ हफ़्तों तक इस काउण्ट डाउन में रहा और १३-वे पायदन तक चढ़ पाया था यह गीत। जुलिअस ल रोसा अमरीकी पारम्परिक पॊप सिंगर हैं जिन्होने रेडियो और टेलीविज़न, दोनों में ही काम किया है ५० के दशक से। २ जनवरी १९३० में न्यूयार्क में जन्मे जुलिअस ने १९४७ में यूनाइटेड स्टेट्स नेवी जॊयन कर लिया। संगीत की तड़प उन्हे रेडियो और टेलीविज़न की दुनिया में खींच ही लाई। जुलिअस को ज़बरदस्त प्रसिद्धि मिली उनके तीसरे गीत "ए कुम्परी" के ज़रिए जो 'कैश बॊ़ चार्ट्स' में पहला स्थान अर्जित किया तो 'बिलबोर्ड चारट्स' में नंबर-२ तक चढ़े। १९५३ में जुलिअस को Best New Male Vocalist का पुरस्कार भी मिला था। तो आइए सुनते हैं आज का यह गीत किशोर दा की आवाज़ में। और इसी के साथ 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला हुई पूरी और साथ ही पूरे हुए 'ओल इज़ गोल्ड' के ४५० अंक। आपको यह शृंखला कैसी लगी, हमें बताइएगा ई-मेल के ज़रिए। आप हमें ई-मेल कर सकते हैं oig@hindyugm.com के पते पर। आपके सुझावों, विचारों, फ़रमाइशों, किसी गीत से जुड़ी यादों, संस्मरणों और दिल की बातों का हम इसी पते पर इंतज़ार करते हैं। हो सकता है कि आने वाले दिनों में हम आपके ई-मेल और फ़रमाइशों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक साप्ताहिक विशेषांक भी प्रस्तुत करें। इसलिए दोस्तों, थोड़ी सी फ़ुर्ती दिखाइए और लिख डालिए हमारे ई-मेल पते पर जो भी आप का दिल कहे। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप से फिर मुलाक़ात होगी रविवार की शाम एक नई लघु शृंखला के साथ, तब तक के लिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की टीम को दीजिए इजाज़त, लेकिन आप बने रहिए 'आवाज़' के साथ। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि 'बढ़ती का नाम दाढ़ी' (१९७४) फ़िल्म में संगीतकार किशोर कुमार ने बप्पी लाहिड़ी से गायक के रूप में उनका पहला गीत गवाया था "ये जवानी चार दिन, प्यार कर ले मेरे यार"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. रफ़ी साहब का साथ किस गायिका ने दिया है इस महकती ग़ज़ल में - ३ अंक.
२. संगीतकार के मामा है हैं इस गीत के गीतकार, नाम बताएं - २ अंक.
३. संगीतकार की पहली फिल्म थी ये, कौन हैं ये आज के दौर के सफल संगीतकार - २ अंक.
४. हरमेश मल्होत्रा की इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बिलकुल सही जवाब है शरद जी, पवन जी आपको भी दो अंक मुबारक और किश जी आपको भी, प्रतिभा जी आप नयी हैं जाहिर है सवाल आपके लिए मुश्किल रहा होगा, वैसे हमने झुमरू का शीर्षक गीत सुनवाया था, ओल्ड इस गोल्ड की सत्रहवीं कड़ी में देखिये यहाँ

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 28 जुलाई 2010

गोरे गोरे ओ बांके छोरे....प्रेरित धुनों पर थिरकने वाले गीतों की संख्या अधिक है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 449/2010/149

संगीतकार सी. रामचन्द्र को क्रांतिकारी संगीतकारों की सूची में शामिल किया जाता है। ४० के दशक में जब फ़िल्म संगीत पंजाब, बंगाल और यू.पी. के लोक संगीत तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत में ढल कर लोगों तक पहुँच रही थी, ऐसे में सी. रामचन्द्र ने पाश्चात्य संगीत को कुछ इस क़दर इंट्रोड्युस किया कि जैसे फ़िल्मी गीतों की प्रचलित धारा का रुख़ ही मोड़ दिया। इसमें कोई शक़ नहीं कि उनसे पहले ही विदेशी साज़ों का इस्तेमाल फ़िल्मी रचनाओ में शुरु हो चुका था, लेकिन उन्होने जिस तरह से विदेशी संगीत को भारतीय धुनों में ढाला, वैसे तब तक कोई और संगीतकार नहीं कर सके थे। १९४७ की फ़िल्म 'शहनाई' में "आना मेरी जान मेरी जान सन्डे के सण्डे" ने तो चारों तरफ़ तहलका ही मचा दिया था। उसके बाद १९५० की फ़िल्म 'समाधि' में वो लेकर आए "ओ गोरे गोरे ओ बांके छोरे, कभी मेरी गली आया करो"। इस गीत ने भी वही मुक़ाम हासिल कर लिया जो "सण्डे के सण्डे" ने किया था। उसके बाद १९५१ में फ़िल्म 'अलबेला' में फिर एक बार "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के" ने भी वही कमाल किया। तो दोस्तों, आज हमने 'गीत अपना धुन पराई' के लिए चुना है फ़िल्म 'समाधि' के "ओ गोरे गोरे" गीत को। पता है इसकी धुन किस मूल धुन से प्रेरीत है? यह है एडमुण्डो रॊस की क्लासिक "चिको चिको ओ पोरटिको" से। वैसे यह भी कहना ज़रूरी है कि केवल मुखड़ा ही इस धुन से लिया गया है, अंतरे की धुन सी. रामचन्द्र की मौलिक धुन है। राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा था और आवाज़ें है लता मंगेशकर, अमीरबाई कर्नाटकी और साथियों की। जैसे कि गीत के बोलों से ही ज़ाहिर है कि दो नायिकाओं में एक लड़की है तो दूसरी बनी है लड़का। लता ने लड़की का प्लेबैक दिया है तो अमीरबाई ने लड़के का। 'समाधि' रमेश सहगल निर्देशित फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नलिनी जयवन्त, कुलदीप कौर, श्याम, मुबारक़, एस.एल. पुरी, बद्री प्रसाद आदि। प्रस्तुत गीत फ़िल्माया गया है नलिनी जयवन्त और कुलदीप कौर पर जिनके किरदारों के नाम थे लिली डी'सूज़ा और डॊली डी'सूज़ा। १९५० की सब से ज़्यादा व्यापार करने वाली फ़िल्म साबित हुई थी 'समाधि' जिसने १,३५,००,००० र का व्यापार किया था।

आइए आज बात करें एडमुण्डो रॊस की जिनकी बनाई धुन पर आधारित है हमारा आज का गीत। ७ दिसंबर १९१० को पोट ऒफ़ स्पेन, त्रिनिदाद, वेस्ट इण्डीज़ में एडमुण्डो विलियम रॊस के नाम से जनम लेने के बाद १९३९ से लेकर १९७५ तक वो संगीत की दुनिया में सक्रीय रहे। आज भी वो १०० वर्ष की आयु में हमारे बीच मौजूद हैं। रोस ने अपने करीयर में एक बेहद लोकप्रिय लातिन-अमेरिकन ऒरकेस्ट्रा का निर्देशन किया, रेकॊर्डिंग् के क्षेत्र में भी लम्बी पारी खेली और लंदन के एक जाने माने नाइट क्लब के मालिक रहे। १९४० में उन्होने अपना बैन्ड बनाया जिसका नाम उन्होने रखा 'एडमुण्डो ओस ऐण्ड हिज़ रम्बा बैण्ड'। इस बैण्ड में धीरे धीरे १६ म्युज़िशिअन्स शामिल हुए। १९४९ में बना उनका गीत 'दि वेडिंग साम्बा' इतना ज़्यादा लोअक्प्रिय हुआ कि ३ मिलियन ७८-आर.पी.एम के रेकॊर्ड्स बिके। जहाँ तक "चिको चिको" गीत का सवाल है, यह एक क्यूबन गीत है, जो एडमुण्डो रॊस की 'दि क्यूबन लव सॊंग्‍ ऐल्बम' में शामिल किया गया है। जहाँ एक तरफ़ सी. रामचन्द्र ने इस धुन का इस्तेमाल १९५० की इस फ़िल्म में किया, वहीं अगले साल १९५१ में तमिल संगीतकार आर. सुदर्शनम ने तमिल फ़िल्म 'ओर इरवु' के गीत "अय्या सामी अवोजि सामी" में किया जिसे गाया था एम. एल. वसंतकुमारी ने। तो इन तमाम जानकारियों के बाद आप भी बेचैन हो रहे होंगे इस चुलबुले गीत को सुनने के लिए, तो सुनते हैं....



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'समाधि' की कहानी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की 'आज़ाद हिंद सेना' की पृष्ठभूमि पर बनाई गई थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. May be you'll fall in love with me domani से कुछ प्रेरित है ये गीत, कौन हैं इस मधुर गीत के गायक संगीतकार - ३ अंक.
२. गीतकार बताएं - २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. इस फिल्म का और कौन स गीत है जो ओल्ड इस गोल्ड पर बज चुका है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने कल लपक लिए ३ अंकों का सवाल. अवध जी भी चुस्त दिखे. किश और प्रतिभा जी (क्या हम इन्हें अलग अलग मानें? मान लेते हैं) भी ऑन स्पोट रहे. इंदु जी नयी तस्वीर में खूब लग रहीं हैं, राज जी आपकी फिल्म का इन्तेज़ार रहेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सरकती जाये है रुख से नक़ाब .. अमीर मीनाई की दिलफ़रेब सोच को आवाज़ से निखारा जगजीत सिंह ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९४

वो बेदर्दी से सर काटे 'अमीर' और मैं कहूँ उन से,
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता।

आज की महफ़िल इसी शायर के नाम है, जो मौत की माँग भी अपने अलहदा अंदाज़ में कर रहा है। इस शायर के क्या कहने जो औरों के दर्द को खुद का दर्द समझता है और परेशान हो जाता है। तभी तो उसे कहना पड़ा है कि:

खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

इन दो शेरों के बाद आप समझ तो गए हीं होंगे कि मैं किन शायर कि बात कर रहा हूँ। अरे भाई, ये दोनों शेर दो अलग-अलग गज़लों के मक़ते हैं और नियमानुसार मक़ते में शायर का तखल्लुस भी शामिल होता है। तो इन दो शेरों में तखल्लुस है "अमीर"। यानि कि शायर का नाम है "अमीर" और पूरा नाम... "अमीर मीनाई"।

अमीर मीनाई के बारे में बहुत कुछ तो नहीं है अंतर्जाल पर. जितना कि इनके समकालीन "दाग़ दहलवी" के बारे में है। और इसकी वज़ह जानकारों के हिसाब से यह है कि दाग़ उस जमाने के "हिन्दी और उर्दू" के सबसे बड़े शायर थे और उन्होंने हीं "हिन्दी-उर्दू" शायरी को "फ़ारसी" के फ़ंदे से बाहर निकाला था, वहीं अमीर की मक़बूलियत बस कुछ ग़ज़लों और "पैगम्बर-ए-इस्लाम" के लिए लिखे हुए उनके कुछ क़सीदों के कारण थी। चाहे जो भी सबब हो और भले हीं अमीर की प्रसिद्धि दाग़ से कम हो, लेकिन सादगी के मामले में अमीर का कोई सानी न था। यह जानते हुए भी कि लोग दाग को ज्यादा सराहते थे, अमीर उन लोगों में हीं शामिल हो जाते थे और खुलकर दाग का पक्ष लेते थे। इस बारे में एक वाक्या बड़ा हीं प्रसिद्ध है:

एक बार मुंशी ‘मुनीर’ शिकोहाबादी ने सरे-दरबार हजरत ‘दाग़’ का दामन थामकर कहा कि-‘क्या तुम्हारे शेर लोगोंकी ज़वानों पर रह जाते हैं और मेरे शेरों पर लोंगों की न ख़ास तवज्जह होती है, न कोई याद रखता है।’ इसपर जनाब ‘अमीर मीनाई’ ने फ़र्माया- "यह खुदादाद मक़बूलियत है, इसपर किसीका बस नहीं।"

तो ऐसा खुला-दिल और साफ़-दिल थे अमीर मीनाई। चलिए इनके बारे में थोड़ा और जानते हैं:

अमीर अहमद अमीर मीनाई का जन्म १८२८ में लखनऊ में हुआ था। उन्होंने बहुत हीं कम उम्र (१५ साल) में जनाब मुज़फ़्फ़र अली असीर की शागिर्दगी में शायरी लिखनी शुरू कर दी थी और इस कारण लड़कपन में हीं अपनी शायरी के कारण खासे मक़बूल भी हो गए। महज़ २४ साल की उम्र में उन्हें राज-दरबार में सम्मानित किया गया। १८५७ में जब लखनऊ अपने पतन की ओर अग्रसर हो उठा तो अमीर मीनाई की माली हालत भी धीरे-धीरे खराब होने लगी। अपनी इस हालत को सुधारने के लिए उन्हें रामपुर के नवाब का आग्रह मानना पड़ा। और वे लखनऊ छोडने को विवश हो उठे। रामपुर जाने के बाद वे वहाँ ३४ साल रहे। वहाँ वे पहले नवाब युसूफ़ अली खाँ और फिर कलब अली खाँ के दरबार में रहे। रामपुर के नवाबों के इंतक़ाल के बाद अमीर हैदराबाद की ओर कूच कर गए। वहाँ वे निज़ामों के लिए शायरी करने लगे। लेकिन उन्हें यह बंदगी रास न आई और सिर्फ़ ९ साल के बाद हीं वे जहां-ए-फ़ानी को छोड़ने पर आमादा हो उठे। इस तरह १९०० ईस्वी में शायरी और ग़ज़लों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।

अमीर मीनाई न सिर्फ़ साहित्य के अनमोल रत्न थे(हैं), बल्कि वे एक जाने-माने दार्शनिक और शब्द-कोषकर्त्ता (lexicographer) भी थे। उन्होंने एक शांत और संयम से भरी आध्यात्मिक ज़िंदगी व्यतीत की। वे घमंड और ईर्ष्या से दूर एक बड़े हीं नेक इंसान थे। उनकी यह खासियत उनकी शायरी में बःई दिखती है, जो बिना किसी लाग-लपेट के लिखी हुई मालूम पड़ती है।

अमीर मीनाई ने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों की प्रशंसा में बहुत से कसीदे लिखे हैं। उनकी कुल २२ पुस्तकें हैं, जिनमें "मसनविए नूरे तजल्ली" , "मसनविए अब्रे तजल्ली" और "शामे अबद" का नाम सबसे आगे आता है। जहाँ तक शायरी के संकलन का सवाल है तो इस मामले में उनके दो संकलन खासे मक़बूल हुए - "मराफ़ उल गज़ब" और "सनम खान ए इश्क़"।

हमने अमीर के उस्ताद के बारे में तो जान लिया। अब बारी है इनके शागिर्दों की। यूँ तो अमीर के कई शागिर्द थे, लेकिन जिन दो का नाम बड़ी इज़्ज़त से लिया जाता है - उनमें से एक थे "जां निसार अख़्तर" के अब्बा मुज़तर ख़ैराबादी और दूसरे मुमताज़ अली ’आह’। ’आह’ ने अमीर मीनाई पर एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम है -"सीरत-ए-अमीर अहमद अमीर मीनाई"। इस कि़ताब में अमीर मीनाई से जुड़े ढेर सारे वाक़यात हैं। उन्हीं में से एक है "अमीर मीनाई" द्वारा "ग़ालिब" की जमीन पर दो-दो गज़लों का लिखा जाना। नहीं समझे? अच्छा तो आपने ग़ालिब की वो ग़ज़ल तो पढी हीं होगी जिसका मतला है:

यह न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तिज़ार होता !

जिस दौरान (लगभग १८६० में) ग़ालिब ने यह ग़ज़ल लिखी थी, उस समय अमीर नवाब युसुफ़ अली ख़ान ’नाज़िम’ वाली-ए-रामपुर के दरबार से मुन्सलिक थे। नवाब साहब की फ़रमाईश पर अमीर ने इसी जमीन पर ग़ज़ल लिखी थी। ये तो सभी जानते हैं कि अमीर बहुत बिसयार-गो (लंबी-लंबी ग़ज़लें लिखने वाले) थे, तो उन्होंने इसी जमीन पर दूसरी भी ग़ज़ल लिख डाली। मैं दोनों ग़ज़लें पूरी की पूरी यहाँ पेश तो नहीं कर सकता, लेकिन हाँ उन ग़ज़लों के दो-दो शेर आपको उपलब्ध करवाए देता हूँ। पूरी ग़ज़ल पढनी हो तो यहाँ जाएँ:

ग़ज़ल १:

मिरे बस में या तो यारब ! वो सितम-शि’आर होता
ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता !

मिरी ख़ाक भी लहद में न रही ’अमीर’ बाक़ी
उन्हें मरने ही का अब तक नहीं ऐतिबार होता !


ग़ज़ल २:

नयी चोटें चलतीं क़ातिल जो कभी दो-चार होता
जो उधर से वार होता तो इधर से वार होता

शब-ए-वस्ल तू जो बेख़ुद नो हुआ ’अमीर’ चूका
तिरे आने का कभी तो उसे इन्तिज़ार होता !


इन दो ग़ज़लों से रूबरू कराने के बाद चलिए अब आपके सामने अमीर साहब के दो-तीन फुटकर शेर भी पेश किए देता हूँ:

मेहरबाँ होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ

तेरी मस्जिद में वाइज़ ख़ास हैं औक़ात रहमत के,
हमारे मयकदे में रात-दिन रहमत बरसती है।

गर्द उड़ी आशिक़ की तुरबत से तो झूंझलाकर कहा,
वाह! सिर पे चढने लगी पाँव की ठुकराई हुई।


इतनी बातचीत के बाद अब हमें आज की ग़ज़ल की ओर रूख करना चाहिए। क्या कहते हैं आप? है ना। तो आज हम जो ग़ज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं, उसे गाया है ग़ज़ल गायकी के उस्ताद और अपने चहेतों के बीच "जग्गू दादा" के नाम से जाने जाने वाले "जगजीत सिंह" जी ने। जग्गू दादा यह ग़ज़ल जितनी दफ़ा गाते हैं, उतनी दफ़ा वे इसमें अलग-अलग तरह का तड़का डालते हैं, क्योंकि उनके हिसाब से इसी ग़ज़ल से उन्हें मक़बूलियत हासिल हुई थी। मैं यह ग़ज़ल आपको सुनवाऊँ, उससे पहले यह बताना चाहूँगा कि किस तरह इसी जमीन का इस्तेमाल कर दो अलग-अलग शायरों/गीतकारों ने दो अलग-अलग गानों को तैयार किया है। हसरत जयपुरी ने लिखा "मोहब्बत रंग लाएगी जनाब आहिस्ता-आहिस्ता" तो निदा फ़ाज़ली साहब ने इसी तर्ज़ पर "नज़र से फूल चुनती है नज़र आहिस्ता-आहिस्ता" को जन्म दिया। है ना ये कमाल की बात। ऐसे कमाल तो रोज हीं हिन्दी फिल्मों में होते रहे हैं। जनाब हसरत जयपुरी ने ऐसा तो मोमिन खाँ मोमिन के शेर "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता" के साथ भी किया था, जब उन्होंने इसी शेर को एक-दो शब्द काँट-छाँटकर अपने गाने "ओ मेरे शाहे-खुबाँ" में जोड़ लिया था। अरे भाई, अगर किसी का शेर पसंद आ जाए तो उसे जस-का-तस अपने गाने/गज़ल में रखो, लेकिन हाँ उसे क्रेडिट भी दो। ओह्ह.. क्रेडिट की बात अगर हमने शुरू कर दी तो फिर "बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।" इसलिए इस बहस को यही विश्राम देते हैं और सुनते हैं जग्गू दादा की मखमली आवाज़ में आज की ग़ज़ल:

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा
हया यकलख़्त आई और ____ आहिस्ता-आहिस्ता

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता

सवाल-ए-वस्ल पर उन को उदू का ख़ौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सबा" और शेर कुछ यूँ था-

किसी खयाल की खुशबू, किसी बदन की महक,
दर-ए-क़फ़स पे खड़ी है सबा पयाम लिए।

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

सबा से ये कह दो कि कलियाँ बिछाए, वो देखो वो जानेबहार आ रहा है,
चुरा ले गया है जो इन आँखों की नींदें, वोही ले के दिल का करार आ रहा है. - जलील "मलीहाबादी"

जो आके रुके दामन पे ’सबा’, वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से,उस अश्क की कीमत होती है - सबा अफ़गानी (नीलम जी, ये तो बड़ा गज़ब किया आपने। शेर ऐसा डालना था जिसमें ’सबा’ का कोई मतलब निकले, लेकिन यहाँ तो "सबा" रचनाकार का हीं नाम है.. चलिए इस बार मुआफ़ किया :) अगली बार से ध्यान रखिएगा।)

उसकी बातों से बेरुखाई की सबा आती है
पर यादों ने दम तोड़ना न सीखा अब तक. (शन्नो जी)

किसी की शाम ए सादगी सहर का रंग पा गयी
सबा के पाव थक गये मगर बहार आ गयी। (’अनाम’ शायर)

बस चार शेरों को देखकर आप सब सकते में तो आ हीं गए होंगे। क्योंकि जहाँ पिछली महफ़िल में २९ टिप्पणियाँ (यह पोस्ट लिखने तक) आईं, उनमें काम के बस ४ हीं शेर निकले। तो दर-असल बात ये है कि आपकी "ग़ज़ल" बिना सुने टिप्पणी देने की आदत ने हीं आप सबों का लुटिया डुबोया है। आशीष जी ने जैसे हीं यह लिख दिया कि सही शब्द "हवा" है, आप सब "हवा" के पीछे पड़ गए और शेर पर शेर उड़ेलने लगे। अरे भाईयों, कम से कम एक बार ग़ज़ल को सुन तो लिया होता। उसके बाद आराम से शेर लिखते, किस चीज की जल्दीबाजी थी। अब मैं यह नहीं समझ पा रहा कि जब आपके पास ग़ज़ल सुनने को वक़्त नहीं तो मैं इतना बड़ा पोस्ट जो लिखता हूँ, उसे पढने की जहमत आप उठाते होंगे भी या नहीं। क्योंकि ग़ज़ल सुनने में तो कोई मेहनत भी नहीं करनी पड़ती, जबकि पढने में आँखों और दिमाग को कष्ट देना होता है। फिर जब आप सुनने की हीं मेहनत नहीं करना चाहते (अब आप यह नहीं कहिएगा कि ग़ज़ल सुने थे, और वह गायब शब्द हवा हीं था.... यह संभव हीं नहीं है क्योंकि आबिदा परवीन की आवाज़ इतनी भी उलझाऊ/कन्फ़्यूज करने वाली नहीं) तो और किसी चीज की उम्मीद तो बेबुनियाद हीं है। मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ? पता नहीं... मुझे बस इतना पता है कि मैं आप सबको अपने परिवार का एक अंग, एक सदस्य मानता हूँ और इसीलिए महफ़िल में पूरी तरह से रम जाता हूँ। अब अगर आप इतना भी सहयोग नहीं करेंगे कि कम से कम ग़ज़ल सुन लें तो फिर मेरा हौसला तो जाता हीं रहेगा.. ना? शायद मैं हद से ज्यादा भावुक हो रहा हूँ। अगर यह बात है तो भी मैं शांत नहीं रहने वाला। फिर आप चाहे इसे मेरा बाल-हठ समझें या कुछ और.. लेकिन अगली बार से आपने ऐसी गलती की तो मैं इससे भी बड़ा "सेंटी"(दू:ख से जन्मा, दु:ख से भरा और दु:खी कर देने वाला) नोट लिखूँगा। ठीक है? :) हाँ तो, "हवा" और "सबा" की इस रस्सा-कस्सी में ’सबा’ की जीत हुई और इस नाते "अवध" जी पिछली महफ़िल के "सरताज़" घोषित किए जाते हैं।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

आ अब लौट चलें.....धुन विदेशी ही सही पर पुकार एकदम देसी थी दिल से निकली हुई

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 448/2010/148

राये धुनों को अपने अंदाज़ में ढाल कर हमारे फ़िल्मी संगीतकारों ने कैसे कैसे सुपरहिट गीत हमें दिए हैं, उसी के कुछ नमूने हम इन दिनों पेश कर रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई' के अंतर्गत, और साथ ही साथ उन मूल विदेशी धुनों से संबंधित थो़ड़ी बहुत जानकारियाँ भी दे रहे हैं जो इंटरनेट में गूगलिंग् के ज़रिए हमने खोज निकाला है। एक और संगीतकार जिन्होने बेशुमार विदेशी धुनें अपने गीतों में अपनाई, वो हैं सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन। आपको एक फ़ेहरिस्त यहाँ दे रहे हैं जिससे आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि एस.जे की जोड़ी ने किन किन गीतों में यह शैली अपनाई।

१. दिल उसे दो जो जाँ दे दे (अंदाज़) - 'With a little help from my friends'
२. है ना बोलो बोलो (अंदाज़) - 'Papa loves mama'
३. कोई बुलाए और कोई आए (अपने हुए पराए) - 'Old Beirut'
४. ले जा ले जा (ऐन ईवनिंग् इन पैरिस) - The Shadows, "Man of Mystery"
५. जाने भी दे सनम मुझे (अराउण्ड दि वर्ल्ड) - 'I'll get you' by Beatles
६. आज की रात (अमन) - "Too much tequila" by the Champs
७. घर आया मेरा परदेसी (आवारा) - Egyptian Diva Umm Khalthoum - 'Ala Balad El Mahboub'
८. बिन देखे और बिन पहचाने (जब प्यार किसी से होता है) - 'Dancing Eyes' (Abbo Oubib Ghanoura)
९. मैं आशिक़ हूँ बहारों का (आशिक़) - 'Return to Paradise' (Sanargi'u)
१०. जिया हो जिया हो जिया कुछ बोल दो (जब प्यार किसी से होता है) - Sarah Vaughan's 1958 track, Broken Hearted Melody
११. कौन है जो सपनों में आया (झुक गया आसमान) - Elvis Presley's song Margarita from the movie Fun in Acapulco
१२. सुकू सुकू (जंगली) - Nina and Frederik's 'Sucu sucu'
१३. देखो अब तो किसको नहीं है ख़बर (जानवर) - 'I want to hold your hand' by Beatles
१४. जान-एचमन शोला बदन (गुमनाम) - Les feuilles mortes (Yves Montand) | Autumn Leaves (Édith Piaf)
१५. गुमनाम है कोई (गुमनाम) - Henry Mancini's theme for the movie Charade
१६. पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ - Scottish song, 'Coming through the rye'
१७. आजा सनम मधुर चांदनी में हम (चोरी चोरी) - Italian folk tune, 'Tarantella'
१८. अजीब दासताँ है ये (दिल अपना और प्रीत पराई) - Jim Reeves 1956 hit, 'My lips are sealed'
१९. इतनी बड़ी महफ़िल और इक दिल (दिल अपना और प्रीत पराई) - Harry Belafonte number 'Banana Boat Song
२०. दो मस्ताने (मैं सुंदर हूँ) - Elvis number, 'Wooden heart'
२१. सोच रही हूँ कि कहूँ ना कहूँ (एक फूल चार कांटें) - Italian track by name, 'Piccolissima Serenata'.
२२. अ‍इगा अ‍इगा (बॊयफ़्रेण्ड) - Connie Francis' 1958 swinging chartbuster, 'Stupid Cupid'
२३. सायोनारा (लव इन टोकियो) - Albert Ketelby's 1920 orchestral piece, 'In a Persian Marke'
२४. रसा सायंग (सिंगापुर) - Indonesian folk song of the same name Rasa Sayang

इस लिस्ट में आपने ग़ौर किया होगा कि शंकर जयकिशन ने केवल अंग्रेज़ी गीतों के धुनों का ही इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि ईजीप्ट, स्कॊटलैण्ड, इटली और इंडोनेशिया जैसे देशों के लोक संगीत का भी किस सुंदरता से हिंदी फ़िल्मी रचनाओं में प्रयोग किया। चलिए आपको एक ऐसा गीत सुनवाया जाए जो उपर की लिस्ट में तो नहीं है लेकिन जिस मूल धुन से प्रेरीत है वह धुन है इटली का। यह गीत है 'जिस देश में गंगा बहती है' फ़िल्म का मशहूर देश भक्ति गीत "आ अब लौट चलें"। मुकेश, लता मंगेशकर और साथियों की आवाज़ों में इस गीत के धुन की प्रेरणा एस.जे को मिली "सिआओ सिआओ बैम्बिना" (Ciao, ciao bambina) से। आपने ग़ौर किया होगा कि आज की युवा पीढ़ी 'Ciao' शब्द का प्रयोग ख़ूब करते हैं, जिसका अर्थ है 'Bye'। इस तरह से Ciao, ciao bambina का मतलब हुआ Bye, Bye Baby। इस गीत को १९५९ में यूरोविज़न सॊंग्‍ कॊण्टेस्ट में इटली की तरफ़ से भेजा गया था जिसे परफ़ॊर्म किया था डोमेनिको मोदुगनो ने। यह एक नाटकीय बैलेड है जिसमें अपनी प्रेमिका से यह कहा जा रहा है कि उनका रिश्ता अब बस ख़त्म होने ही वाला है। वो उसे एक किस करे और जाने दे। फिर वापस मुड़ कर ना देखे और वहाँ से चली जाए क्योंकि उसके दिल में अब भी प्यार बाकी है, कहीं वो कमज़ोर ना पड़ जाए। और दोस्तों, इत्तीफ़ाक़ देखिए कि हिंदी वाले गीत में भी जुदाई का ही माहौल है। अपने देश लौटने की बात हो रही है, इसका मतलब कहीं से तो बिछड़ ही रहे हैं ना! क्या ख़ूब ऒरकेस्ट्रेशन है इस गीत में। कोरस का क्या सही इस्तेमाल है, बिलकुल choir के अंदाज़ का। युं भी कह सकते हैं कि प्रील्यूड और इंटरल्यूड म्युज़िक पूरी तरह से इसी कोरल सिंगिंग् को आधार बनाकर तैयार किया गया है। "आ जा रे" की आलाप के साथ लता जी इतनी ऊँची पट्टी पर पहुँचती हैं कि आज भी हम चमत्कृत रह जाते हैं। तो आइए एस.जे की एक और लाजवाब कृति सुनते हैं। आप में से जो भी इस वक्त अपनी मिट्टी से दूर हैं, विदेश में हैं, इस गीत को सुनते ही आपकी आँखें नम हो जाएँगी। हम चाहते तो नहीं कि आपकी आँखें कभी भी नम हों, लेकिन इस नमी का अर्थ भी तो अपने देश के लिए प्यार ही है ना!



क्या आप जानते हैं...
कि "आ अब लौट चलें" गीत की रिकार्डिंग् से पहले ३६ घण्टे की रिहर्सल हुई थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एडमुण्डो रॊस के क्लासिक "चिको चिको ओ पोरटिको" से प्रेरित है ये मस्ती भरा गीत, संगीतकार बताएं - २ अंक.
२. इस महिला युगल में लता का साथ किस गायिका ने दिया है - ३ अंक.
३. रमेश सहगल निर्देशित इस हिट फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे वाह अवध जी, ३ अंक कमाए आपने, शरद जो और किश जी को भी २ अंक मिलेंगें. सिंह जी फिर पीछे रह गए. पी एन जी ने बहुत अच्छी जानकारी दी, इंदु जी हम भी आपको मिस करते हैं, जल्दी फ्री हो के आईये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

महंगाई डायन को दुत्कारकर बाहर किया "पीपलि" वालों ने और "खट्टे-मीठे" पलों को कहा नाना ची टाँग

ताज़ा सुर ताल २८/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत है इस स्तंभ में, और विश्व दीपक जी, आपको भी नमस्कार!

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! आज की कड़ी में हम दो फ़िल्मों के गानें सुनने जा रहे हैं। भले ही इन दो फ़िल्मों की कहानी और संगीत में कोई समानता नज़र ना आए, लेकिन इन दो फ़िल्मों में एक समानता ज़रूर है कि इनके निर्माता फ़िल्म जगत के अनूठे फ़िल्मकार के रूप में जाने जाते हैं, और इन दोनों की फ़िल्मों में कुछ अलग हट के बात ज़रूर होती है। अपने अपने तरीके से और अपने अपने मैदानों में ये दोनों ही अपने आप को परफ़ेक्शनिस्ट सिद्ध करते आए हैं। इनमें से एक हैं प्रियदर्शन और दूसरे हैं आमिर ख़ान। जी हाँ, वही अभिनेता आमिर ख़ान जो हाल के समय से निर्माता भी बन गए हैं अपने बैनर 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' से ज़रिए।

सुजॊय - प्रियदर्शन की फ़िल्म 'खट्टा-मीठा' और आमिर ख़ान की 'पीपलि लाइव' की संगीत-समीक्षा के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। पहले कुछ 'खट्टा-मीठा' हो जाए! इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं अक्षय कुमार, त्रिशा कृष्णन और राजपाल यादव। प्रीतम का संगीत है, गानें लिखे हैं इरशाद कामिल, शहज़ाद रॊय और नितिन रायकवार ने। विश्व दीपक जी, आपने इन दो फ़िल्मों की समानता की बात कही तो मुझे ऐसा लगता है, हालाँकि मैं पूरी तरह से श्योर तो नहीं हूँ, कि इन दोनों फ़िल्मों की कहानियों में हास्य रस का अंश शायद ज़्यादा है किसी और पक्ष के मुक़ाबले। कम से कम प्रोमोज़ से तो ऐसा ही लग रहा है!

विश्व दीपक - हो सकता है। 'खट्टा-मीठा' प्रियदर्शन की मलयालम फ़िल्म 'वेल्लानकलुडे नाडु' का रीमेक है। अक्षय कुमार की यह छठी फ़िल्म है प्रियदर्शन के साथ, और त्रिशा कृष्णन का हिंदी फ़िल्मों में यह पदार्पण है। तो आइए सुना जाए 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का पहला गीत "नाना चि टांग"।

गीत - त्याचा नाना चि टांग


सुजॊय - बहुत दिनों के बाद कुणाल गांजावाला की आवाज़ सुनने को मिली। मैं कुछ दिनों से सोच ही रहा था कि कुणाल कहाँ ग़ायब हो गए, और लीजिए वो आ गए वापस! इससे पहले शायद उनकी आवाज़ हमने 'सावरिया' फ़िल्म में सुनी थी। "नाना चि टांग" एक पेप्पी नंबर है जैसा कि हमने अभी अभी सुना। कैची रीदम है और लगता है कि यह चार्ट-बस्टर साबित होगी। गीत के आरंभ में और इंटरल्युड में भी आपने महसूस किया होगा मराठी रैप का जिसे गाया यू.आर.एल ने। हिंदी-मराठी रैप का संगम और उसके साथ रॊक शैली का संगीत, एक बिल्कुल ही नया प्रयोग। प्रीतम, कीप इट अप!

विश्व दीपक - ड्रम्स और गिटार का जम के इस्तेमाल हुआ है और धुन कुछ ऐसी है कि जल्द ही सुनने वाला आकर्षित हो जाता है और तन-मन थिरकने लगता है। कुणाल की आवाज़ बहुत दिनों के बाद एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आई है और कोई शक़ नहीं कि यह गीत एक लम्बी पारी खेलने वाला है। अच्छा सुजॊय जी, इस गीत में जिन मराठी शब्दों का प्रयोग हुआ है, वो ग़ैर-मराठी लोगों को समझ कैसे आएगी?

सुजॊय - मुझे ऐसा लगता है कि बहुत ध्यान से अगर सुना जाए तो कुछ कुछ ज़रूर समझ में आ ही जाता है, जैसे कि "जिथे मी जाते तिथे तू दिस्ते, हवात तुझे सुगंध पसरते, मनात तू माझ्या ध्यानात तू, चार दिशाणा तू च तू..."। इसे पढ़ते हुए कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि इसका अर्थ है कि जहाँ भी मैं जाता हूँ, वहीं तू दिखती है, हवा में तेरी ख़ुशबू है, मेरे मन में तू ही तू है, हर दिशा में तू ही तू है। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, सुनते हैं एक प्यारा सा डुएट के.के और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में।

गीत - सजदे किए हैं लाखों


विश्व दीपक - जिसे हम कह सकते हैं कि पूरी तरह से इस मिट्टी की ख़ुशबू लिए हुए था यह गीत, और इन दोनों अभिज्ञ गायकों ने अपना अपना कमाल दिखाया। प्रीतम की मेलोडी बरकरार है, इरशाद कामिल ने भी ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं इस गीत के लिए। गीत की विशेषता है इसका सादापन, जिसे एक बार सुनते ही दिल अपना बना लेता है और मन ही मन हम दिन भर गुनगुनाने लग पड़ते हैं। पहले गीत के मुक़ाबले बिल्कुल ही अलग अंदाज़। गी की धुन सुन कर ऐसा लग रहा है कि किसी लोक गीत से प्रेरित होगा।

सुजॊय - मेरा भी यही ख़याल है क्योंकि आपको याद होगा राहुल देव बर्मन ने एक गीत बनाया था फ़िल्म 'बरसात की एक रात' फ़िल्म के लिए - "नदिया किनारे पे हमरा बगान, हमरे बगानों में झूमे आसमान"। लताजी के गाए इस गीत की धुन "सजदे किए" से मिलती जुलती है। हो सकता है उत्तर बंगाल के चाय बगानों के किसी लोक धुन पर आधारित होगा! वैसे हमारी यह सोच बेबुनियाद नहीं है, क्योंकि एलबम के सीडी पर इस गाने के लिए किसी पारंपरिक धुन को क्रेडिट दिया गया है। लगता हैं प्रीतम धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। इस गीत में हिंदुस्तानी साज़ों जैसे कि बांसुरी, तबला, सितार, और पायल की ध्वनियाँ सुनाई देती है जो गीत को और भी ज़्यादा मधुर बनाते हैं। उम्मीद है यह गीत इस साल के सब से लोकप्रिय युगल गीत की लड़ाई में सशक्त दावेदार सिद्ध होगा। प्रीतम और अक्षय कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो 'सिंह इज़ किंग' में "तेरी ओर" गीत की तरह इस गीत को भी उतनी ही लोकप्रियता हासिल हो, यही हम कामना करते हैं, और सुनते हैं 'खट्टा-मीठा' फ़िल्म का एक और गीत।

गीत - आइ ऐम ऐलर्जिक टू बुल-शिट


विश्व दीपक - भले ही गीत के शीर्षक से गीत के बारे में लोग ग़लत धारणा बना लें, लेकिन गीत को सुनते हुए पता चलता है कि दर-असल यह गीत फ़िल्म का थीम सॉंग है जो राजनीति और सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घूसखोरी जैसी मुद्दों की तरफ़ व्यंगात्मक उंगली उठाता है। इस गीत को लिखा है शहज़ाद रॉय ने, उन्होने ही गाया है और संगीत तय्यार किया है शनि ने।

सुजॊय - दर-असल इस गीत को सुन कर ही मैंने यह अनुमान लगाया था कि फ़िल्म में कॊमेडी का बहुत बड़ा हाथ होगा। यह एक पूरी तरह से सिचुएशनल गीत है जो लोगों की ज़ुबान पर तो नहीं चढ़ेगा, लेकिन फ़िल्म की नैरेशन में महत्वपूर्ण किरदार अदा करेगा। "मुझे फ़िकर यह नहीं कि देश कैसे चलेगा, मुझे फ़िकर यह है कि ऐसे ही ना चलता रहे", "यहाँ बोलने की आज़ादी तो है, पर बोलने के बाद आज़ादी नहीं है", इस तरह के संवाद आज के राजनीति पर व्यंगात्मक वार करती है। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "शहज़ाद रॉय" के हीं गानों "लगा रह" और "क़िस्मत अपने हाथ में" गानों का एक रीमेक मात्र है। शनि ने ओरिज़िनल गानों के संगीत में ज्यादा परिवर्त्तन न करते हुए, उसमें बस बॉलीवुड का तड़का डाला है, बाकी का जादू तो शहज़ाद रॉय का है। चलिए अब अगले गीत की ओर रूख करते हैं।

विश्व दीपक - 'खट्टा-मीठा' का चौथा और अंतिम गीत है "आइला रे आइला" दलेर मेहंदी और कल्पना पटोवारी की आवाज़ों में जो एक मराठी उत्सव गीत है। यह एक थिरकता हुआ गीत है नितिन रायकवार का लिखा हुआ। मराठी अंदाज़ का नृत्य गीत है। नितिन ने अपने शब्दों से मराठी माहौल को ज़िंदा कर दिया है तो वहीं दलेर मेंहदी ने यह साबित किया है कि वे बस भांगड़ा के हीं उस्ताद नहीं, बल्कि मराठी गीतों को भी ऐसा गा सकते हैं कि सुनने वाले के मुँह से "आइला" निकल जाए।

गीत- आइला रे आइला


विश्व दीपक - अब हम बढ़ते हैं 'पीपलि लाइव' के संगीत पर। आमिर ख़ान निर्मित इस फ़िल्म की निर्देशिका हैं अनुषा रिज़्वी। फ़िल्म का अनूठा संगीत तैयार किया है इण्डियन ओशन, राम सम्पत, भडवई गाँव मंडली और नगीन तनवीर ने; और गानें लिखे हैं स्वानंद किरकिरे, संजीव शर्मा, नून मीम रशीद और गंगाराम सखेत ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रघुवीर यादव, ओम्कार दास माणिकपुरी, मलैका शेनोय, नसीरुद्दिन शाह और आमिर बशीर।

सुजॊय - जैसा कि आजकल प्रोमोज़ में दिखाया जा रहा है, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 'पीपलि लाइव' की कहानी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित है, और इसी वजह से इसका संगीत भी बिल्कुल ग्राम्य है, लोक संगीत की मिठास के साथ साथ एक रूखापन (रॊवनेस) भी है जो फ़िल्म की कहानी और कथानक को और ज़्यादा सजीव बनाता है। सुन लेते हैं फ़िल्म का पहला गीत "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू", फिर उसके बाद बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

गीत - देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन के अपने स्टाइल का गाना था; इस बैण्ड की जानी पहचानी आवाज़ें और साज़ें। इकतारा, तबला, मृदंग, सितार जैसे भारतीय साज़ों के साथ साथ बेस गिटार की भी ध्वनियाँ आपने महसूस की होंगी इस अनोखे गीत में। देश भक्ति गीत होते हुए भी यह बिल्कुल अलग हट के है। इस गीत के लिए संजीव शर्मा और स्वानंद किरकिरे को ही सब से ज़्यादा क्रेडिट मिलना चाहिए क्योंकि इस गीत की जान इसके बोल ही हैं।

सुजॊय - बिलकुल सही! "देस मेरा रंग्रेज़ ये बाबू, घाट घाट यहाँ घटता जादू, कहीं पहाड़ है कंकड़ शंकड़, बात है छोटी बड़ा बतंगड़, इण्डिया सर ये चीज़ धुरंधर, रंग रंगीला परजातंतर"। इसी गीत का एक और वर्ज़न भी है जिसमें थोड़ी कॊमेडी डाली गई है और पहले के मुक़ाबले बोलों में गम्भीरता थोड़ी कम है। फ़िल्म की पृष्ठभूमि के हिसाब से बिलकुल परफ़ेक्ट है यह गीत और इस ग़ैर पारम्परिक फ़िल्मी रचना को सुन कर दिल-ओ-दिमाग़ जैसे ताज़ा हो गया।

विश्व दीपक - अब फ़िल्म का दूसरा गीत "सखी स‍इयाँ तो खूबई कमात है, महँगाई डायन खाए जात है"। यह पूर्णत: एक लोक गीत है रघुवीर यादव और साथियों की आवाज़ों में। भडवई गाँव मंडली ने इस गीत की स्वरबद्ध किया है। पहले गीत का आनंद लीजिए, फिर इस पर और चर्चा करेंगे।

गीत - महँगाई डायन खाए जात है


सुजॊय - बिना कोई मिक्सिंग किए, बिना किसी ऒरकेस्ट्रेशन के इस्तेमाल के, इस गीत को बिलकुल ही लाइव लोक संगीत की तरह रेकोर्ड किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे उत्तर मध्य भारत के गाँवों में लोक गीत गाए जाते हैं। रघुवीर यादव की लोक शैली वाली आवाज़ ने गीत में जान डाल दी है। हारमोनियम, ढोलक, और कीर्तन मंडली के साज़ों का वैसे ही इस्तेमाल हुआ है जैसे कि इस तरह की मंडलियाँ लोक गीतों में करती हैं। और एक बार फिर स्वानंद किरकिरे ने अपने शब्दों का लोहा मनवाया है। मनोज कुमार की फ़िल्म 'रोटी कपड़ा और मकान' के गीत "बाकी कुछ बचा तो महँगाई मार गई" की याद भी करा जाता है।

विश्व दीपक - पहले गीत में भी देश के कुछ समस्याओं की तरफ़ इशारा किया गया था, इस गीत में तो आज की सब से बड़ी समस्या, महँगाई की समस्या की तरफ़ आवाज़ उठाया गया है थो़ड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में। खड़ी बोली और अवधी भाषा में यह गीत है।

सुजॊय - और सब से बड़ी बात यह कि लता मंगेशकर को यह गीत इतना पसंद आया कि उन्होने ट्विटर पर आमिर ख़ान को ट्वीट भेज कर इस गीत की तारीफ़ें भेजीं और फ़िल्म की सफलता के लिए उन्हे शुभकामनाएँ भी दी हैं। इस मज़ेदार लोक गीत के बाद अब आइए थोड़ा सा सीरियस हो जाएँ और सुनें "ज़िंदगी से डरते हो"।

गीत - ज़िंदगी से डरते हो


विश्व दीपक - इण्डियन ओशन की आवाज़ और संगीत था इस गीत में। रॊक शैली में बना यह गीत एक प्रेरणादायक रचना है जो निकले हैं नून मीम रशीद की कलम से। कुल ७ मिनट के इस गीत को पार्श्व संगीत के रूप में इस्तेमाल किया गया होगा ऐसा लगता है। फ़िल्म 'लगान' में "बार बार हाँ बोलो यार हाँ" गीत की तरह इसमें भी समूह स्वरों का विशेष इस्तेमाल किया गया है।

सुजॊय - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत नगीन तनवीर की आवाज़ में सुनवाते हैं - "चोला माटी के राम"। इस गीत को सुनते हुए आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि कैसी रूहानी आवाज़ है इस थिएटर आरटिस्ट की। नगीन तनवीर कभी हबीब तनवीर थिएटर ग्रूप की सदस्या हुआ करती थीं। नगीन का नाम हबीब तनवीर से इसलिए भी जुड़ा है, क्योंकि नगीन हबीब तनवीर की सुपुत्री हैं। नगीन लोक गीत गाती हैं और इस गीत को भी क्या अंजाम दिया है उन्होने। गंगाराम सखेत के लिखे इस गीत की भाषा छत्तीसगढ़ी है।

विश्व दीपक - इसकी धुन उत्तर और मध्य भारत के विदाई गीत की तरह है। बांसुरी और इकतारे का क्या सुंदर प्रयोग हुआ है, जिन्हे सुनते हुए हम जैसे किसी सुदूर ग्रामांचल में पहुँच जाते हैं। एक इंटरनेट साइट पर किसी ने लिखा है इस गीत के बारे में - "चोला माटी के राम की भाषा निन्यानवे फ़ीसदी छत्तीसगढी हीं है। इसके संगीत में भी छत्तीसगढ के लोग धुन "करमा" की छाप है। करमा एक लोक-नृत्य है, जो गाँवों में लगने वाले मेलों और उत्सवों का विशेष आकर्षण होता है। इन उत्सवों के दौरान गाँव के सारे मर्द सजते-सँवरते हैं और "लुगरा" धारण करते हैं। फिर गाँव की जनता एक गोल चक्कर बना लेती है, जिसके केंद्र में नर्त्तक अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये सारे नर्त्तक "मांदर" (यह छत्तीसढ का खास साज़ है... ढोल-ताशों का एक प्रकार) की धुन पर बिना रूके बिना थके नाचते जाते हैं। ऐसे अवसरों पर कम से कम पाँच या छह मांदरों के बिना तो काम हीं नहीं चलता।"

सुजॊय - यह अच्छी जानकारी थी। इकतारे का जिस तरह का प्रयोग हुआ है, ठीक ऐसा ही प्रयोग बंगाल के बाउल भटियाली गायक भी करते हैं। इसलिए इस गीत को सुनते हुए बंगाल के गाँवों की भी सैर हो जाती है। तो देखिए एक ही गीत है लेकिन कितने प्रदेशों के लोक संगीत से मेल खाती है। इसी को तो हम कहते हैं 'अनेकता मे एकता' और यही इस देश की शक्ति का राज़ है। एक और बात यह कि इसकी धुन जैसा कि आपने कहा विदाई धुन है, तो इस लोक धुन का प्रयोग थोड़े से तेज़ अंदाज़ में कल्याणजी-आनंदजी ने किया था फ़िल्म 'दाता' के गीत "बाबुल का यह घर बहना, कुछ दिन का ठिकाना है" में। तो आइए इस भजन को सुनते हैं।

गीत - चोला माटी के राम


सुजॊय - वाह! नगीन तनवीर की आवाज़ ने तो आँखें नम कर दी। हाँ तो विश्व दीपक जी, आज की दोनों फ़िल्मों के गानें तो हमने सुन लिए, अब बारी है अंतिम विचारों की। जहाँ तक 'खट्टा-मीठा' का सवाल है "नाना चि टांग" और "सजदे किए हैं लाखों", ये दो गीत मुझे पसंद आए और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ५ में ३.५ की रेटिंग। और 'पीपलि लाइव', भई इससे पहले कि मैं अपनी रेटिंग दूँ, सब से पहले तो मैं नतमस्तक होकर आमिर ख़ान को सलाम करना चाहूँगा, उन्होने एक बार फिर से साबित किया कि वो अलग हैं, नंबर वन हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और भी तो कई फ़िल्में हाल के सालों में बनी हैं, लेकिन ऐसा जादूई संगीत किसी में भी सुनने को नहीं मिला। आज के फ़िल्मकार अक्सर क्या करते हैं कि जब भी ऐसे किसी लोक गीत की बारी आती है तो लोक गीत के बहाने किसी सस्ते और अश्लील गीत की रचना कर बैठते हैं। 'पीपलि लाइव' के गीतों को सुन कर ऐसा लगा कि अगर हमारे फ़िल्मकार, संगीतकार और गीतकार चाहें तो आज भी फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर वापस आ सकता है। युं तो इस फ़िल्म के सभी गानें मुझे अच्छे लगे लेकिन यह जो अभी अभी हमने "चोला माटी के राम" सुना, इस गीत का तो मैं दीवाना हो गया। नगीन तनवीर की आवाज़ ने दिल को ऐसा छुआ है कि अभी तक उनकी आवाज़ कानों में गूँज रही है। मेरी तरफ़ से 'पीपलि लाइव' को ४.५ की रेटिंग्‍ और ख़ास इस गीत को १० में १०। आमिर ख़ान को ढेरों शुभकामनाएँ कि उनकी यह फ़िल्म सफल हो और वो इसी तरह से फ़िल्मों और फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध करते रहें।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं क्या कहूँ.. आपने तो सब कुछ हीं कह दिया है। आपने सही कहा कि अगर कोई दूसरा इंसान होता तो पीपलि लाइव का संगीत शायद ऐसा नहीं होता, जैसा अभी सुनने को मिल रहा है। वो कहते हैं ना कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी भी चीज को हाथ में ले तो उसे सोना बनाकर हीं दम लेते हैं। आमिर खान भी वैसे हीं इंसान हैं। एक कम-बज़ट की फिल्म, जिसमें कोई भी पहचान का कलाकार न हो और जिसमें किसी "गंभीर" मुद्दे को उठाया गया हो, उसे कोई भी हाथ में लेना नहीं चाहता। आमिर के आगे आने से ये अच्छा हुआ कि फिल्म को पहचान मिली और फिल्म के गाने भी लोगों की नज़रों में आ गए। निर्माता/निर्देशिका ने गीतकारों, संगीतकारों और गायको का चुनाव बड़े हीं ध्यान से किया है। "रघुवीर यादव" और "नगीन" को सुनने के बाद हर किसी को इस चुनाव की दाद देनी होगी। वैसे हाल में यह फिल्म अपने गाने "सखी सैंया" के कारण विवाद में भी आई थी, जिसका ज़िक्र सजीव जी पहले हीं कर चुके हैं,इसलिए मैं दुहराऊँगा नहीं। जहाँ तक इस एलबम की बात है तो यकीनन "पीपलि लाइव" "खट्टा-मीठा" से "इक्कीस" पड़ती है। "खट्टा-मीठा" चूँकि पूरी तरह से एक मनोरंज़क फिल्म है तो उसमें "पीपलि लाइव" जैसा संगीत देने की कोई गुंजाईश भी नहीं थी। फिर भी प्रीतम और शनि ने हर-संभव कोशिश की है। इसलिए मुझे "खट्टा-मीठा" से कोई शिकायत नहीं। चलिए तो इस तरह दो अच्छे और बेहतर एलबमों को सुनने के बाद इस समीक्षा पर ब्रेक लगाई जाए। अगली बार कौन-सी फिल्म होगी? यही सोच रहे हैं ना? चूँकि पिछली दो समीक्षाओं से हम बताते आ रहे हैं तो इस बार भी राज़ से पर्दा हटा हीं देते हैं। "लफ़ंगे परिंदे" या फिर "दबंग" या फिर दोनों। यह जानने के लिए अगली भेंट तक का इंतज़ार कीजिए।

आवाज़ रेटिंग्स: खट्टा-मीठा: ***१/२, पीपलि लाइव: ****१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८२- 'भूल भुलै‍या' और 'खट्टा-मीठा' फ़िल्मों में कम से कम तीन समानताएँ बताइए।

TST ट्रिविया # ८३- आपका जन्म २८ नवंबर १९६४ को हुआ था। आप ने पंजाब युनिवर्सिटी चण्डीगढ़ से म्युज़िक की मास्टर डिग्री हासिल की सुलोचना बृहस्पति की निगरानी में। आपकी माँ का नाम मोनिका है। बताइए हम किनकी बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८४- २००९ की एक फ़िल्म में रघुवीर यादव ने अपनी आवाज़ के जल्वे दिखाए थे एक गीत में। बताइए उस फ़िल्म का नाम, गीत के बोल और सहगायकों के नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "इकतारा" (वेक अप सिड)।
२. "जा रे, जा रे उड़ जा रे पंछी" (माया)।
३. इस गीत को लिखा था मशहूर शायर मजाज़ लखनवी ने जो जावेद अख़्तर के मामा थे।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

सोमवार, 26 जुलाई 2010

बाबूजी धीरे चलना.....ओ पी ने बनाया इस प्रेरित गीत को इतना लोकप्रिय

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 447/2010/147

विदेशी धुनों पर आधारित हिंदी फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई' इन दिनों जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। ५० के दशक से क्लब सॊंग्स का एक ट्रेण्ड चल पड़ा था हिंदी फ़िल्मों में। यक़ीनन इन गीतों का आधार पाश्चात्य संगीत ही होना था। ऐसे में हमारे कई संगीतकारों ने इस तरह के क्लब सॊंग्स के लिए सहारा लिया विदेशी धुनों का, विदेशी गीतों का। ओ. पी. नय्यर साहब ने ५० के दशक में गीता दत्त से बहुत से ऐसे नशीले क्लब सॊंग्स गवाए और उन्ही में से एक बेहद मशूर गीत आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं। १९५४ की फ़िल्म 'आर पार' का वही मशहूर गीत "बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना"। मजरूह साहब के बोल और गीता जी की नशीली आवाज़। 'आर पार' से पहले ओ.पी. नय्यर तीन फ़िल्मों में संगीत दे चुके थे - 'आसमान', 'छम छमा छम', और 'बाज़'। ये तीनों ही फ़िल्में फ़्लॊप हो जाने की वजह से इस नए संगीतकार की तरफ़ किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब १९५४ में 'आर पार' हिट हुई तो नय्यर साहब का यूनिक स्टाइल को लोगों ने महसूस किया और इतना पसंद किया गया कि देखते ही देखते नय्यर साहब बन गए फ़िल्म इंडस्ट्री के रीदम किंग। 'आर पार' गुरु दत्त की फ़िल्म थी। प्रभात फ़िल्म कंपनी में नृत्य निर्देशक के रूप में करीयर शुरु करने के बाद देव आनंद ने उन्हे १९५१ में अपनी फ़िल्म 'बाज़ी' निर्देशित करने का मौका। उसके बाद आई 'जाल' और 'बाज़'। १९५४ में गुरु दत्त ने अपना बैनर स्थापित किया और 'आर पार' इस बैनर की पहली फ़िल्म थी। उधर नय्यर साहब, जो अपने पहले तीन फ़िल्मों की असफलता से निराश होकर बम्बई नगरी छोड़ने का प्लान बना रहे थे, 'आर पार' की सफलता ने उनके क़दमों को रोक लिया और जिसकी वजह से हमें अगले दो दशकों तक मिलते रहे एक से एक लाजवाब गीत।

"बाबूजी धीरे चलना" की धुन जिस विदेशी धुन से प्रेरीत है वह गीत है "परहैप्स परहैप्स परहैप्स"। गीत का मुखड़ा कुछ इस तरह का है - "You won't admit you love me, And so how am I ever to know? You always tell me, Perhaps, perhaps, perhaps"। दरअसल यह एक स्पैनिश गीत है जिसके बोल हैं "Quizás, Quizás, Quizás" जिसे लिखा व स्वरबद्ध किया था क्यूबा के गीतकार ओसवाल्डो फ़ारे ने सन् १९४७ में। बाद में इसी धुन पर अंग्रेज़ी के बोल लिखे जो डेविस ने, लेकिन यह बताना ज़रूरी है कि यह स्पैनिश गीत का अनुवाद नहीं है, बल्कि सिर्फ़ उसकी धुन का इस्तेमाल किया गया है। यह धुन इतनी प्रचलित हुई कि उसके बाद बहुत सारे वर्ज़न बने जो समय समय पर रेकॊर्ड कंपनियों ने जारी भी किए। पहले दस वर्ज़नों की सूची हम यहाँ आपको दे रहे हैं (सौजन्य: विकिपीडिया):

1949: The Gordon Jenkins version, with Tony Bavaar as vocalist, was recorded on August 12, 1939 and released by Decca Records as catalog number 24720.

1958: Nat King Cole regularly performed the song with a heavy American accent. His version appeared on his 1958 album Cole Español.

1958: The Algerian Abdelhakim Garami wrote the Arabic lyrics "Chehilet laayani" inspired by the music of "Quizas quizas".

1959: Finnish singer Olavi Virta recorded this song in Spanish.

1960s: The Jamaican ska musician Prince Buster recorded the song in the 1960s as "Rude, Rude, Rudee".

1964: The Doris Day version was recorded on November 5, 1964 for Columbia Records and not released as a single, but only on albums (see Latin for Lovers). It was featured in the Australian film Strictly Ballroom in 1992.

1964: The Trini Lopez version was recorded for Reprise Records and also not released as a single; from the album entitled The Latin Album released as "RS 6125".

1965: Celia Cruz originally recorded a version of the song; later re-released on the 1994 greatest-hits album Irrepetible.

1965: The Skatalites recorded "Perhaps" on Blue Beat in 1965 for the Latin American Music Company, similar to Prince Buster's "Rude, Rude, Rudee" version of the song.

1969: Paco de Lucia recorded an instrumental flamenco version on the album Hispanoamérica.

तो चलिए, इस विदेशी धुन का आनंद लेते हैं देशी अंदाज़ में गीता दत्त की आवाज़ में। इस फ़िल्म में श्यामा और शकीला ने अभिनय किया था गुरु दत्त के साथ, यह गीत फ़िल्माया गया था शकीला पर। सुनते हैं...



क्या आप जानते हैं...
कि अभी इसी साल यानी २०१० में इस गीत का एक अरबी वर्ज़न निकला है जिसे ईजीप्शियन सिंगर रूला ज़ाकी ने गाया है अपने ऐल्बम "ज़िक्रायती' में और जिसके बोल हैं "अहवक अहवक अहवक"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. Ciao, ciao bambina से प्रेरित है ये गीत, गायक बताएं - २ अंक.
२. संगीतकार जोड़ी कौन सी है - ३ अंक.
३. ग्रेट शो मैन की इस कामियाब फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. गीतकार कौन है इस राष्ट्प्रेम की बात करने वाले गीत के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत बढ़िया अवध जी, ३ शानदार अंक आपके खाते में आये, शरद जी २ अंकों से सुन्तुष्ठ होना पड़ेगा आज आपको, पवन कुमार जी आप तनिक लेट हो गए, रोमेंद्र बहुत दिनों बाद आपको देखकर अच्छा लगा, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार, 25 जुलाई 2010

ये रास्ते हैं प्यार के.....जहाँ कभी कभी "प्रेरणा" भी काम आती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 446/2010/146

'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ के सभी संगीत रसिकों का एक बार फिर से स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में जो रोशन है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के सुनहरे सदाबहार नग़मों से। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई', जिसके अंतर्गत हम कुछ ऐसे हिट गीत सुनवा रहे हैं जिनकी धुन किसी ना किसी विदेशी धुन से प्रेरित है। ये दस गीत दस अलग अलग संगीतकारों के संगीतबद्ध किए हुए हैं। पिछले हफ़्ते इस शृंखला के पहले हिस्से में आपने जिन पाँच संगीतकारों को सुना, वो थे स्नेहल भाटकर, अनिल बिस्वास, मुकुल रॊय, राहुल देव बर्मन और सलिल चौधरी। अब आइए अब इस शृंखला को इस मुक़ाम से आगे बढ़ाते हैं। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है संगीतकार रवि को। रवि ने भी कई गीतों में विदेशी धुनों का सहारा लिया था जिनमें से एक महत्वपूर्ण गीत है गीता दत्त का गाया फ़िल्म 'दिल्ली का ठग' का "ओ बाबू ओ लाला, मौसम देखो चला"। यह गीत आधारित है मूल गीत "रम ऐण्ड कोकाकोला" की धुन पर। वैसे आज की कड़ी के लिए हमने रवि साहब के जिस गीत को चुना है वह है फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' का शीर्षक गीत आशा भोसले की आवाज़ में। और यह गीत प्रेरित है लोकप्रिय गीत "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" से। इससे पहले कि इस मशहूर विदेशी गीत की थोड़ी जानकारी आपको दें, फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' के बारे में यह बताना चाहेंगे कि यह फ़िल्म १९६३ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था सुनिल दत्त साहब ने और निर्देशन था आर. के. नय्यर का। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, सुनिल दत्त, लीला नायडु, मोतीलाल, रहमान, राजेन्द्र नाथ और शशिकला। फ़िल्म के गानें लिखे राजेन्द्र कृष्ण ने।

"दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" एक बेहद लोकप्रिय गीत रहा है जो एक स्पैनिश गीत "ऐण्डालुसिआ" पर आधारित है। मूल गीत को लिखा था अर्नेस्टो लेक्योना ने और जिसके स्पैनिश में बोल थे "एमिलियो दि तोरे"। इसके अंग्रेज़ी वर्ज़न के बोल लिखे अल स्टिलमैन ने। इस गीत के भी समय समय पर कई वर्ज़न निकले हैं, जिनमें सब से लोकप्रिय जो दो वर्ज़न हैं, उनमें एक है १९४० में आई जिम्मी डॊरसे का गाया, और दूसरा है १९५५ में कैटरीना वैलेन्टे की आवाज़ में। वैलेन्टे के इस गीत को उस साल अमेरीका में १३-वाँ स्थान और इंगलैण्ड में ५-वाँ स्थान मिला था। जिम्मी डॊरसे वाले वर्ज़न में बॊब एबर्ली का वोकल भी शामिल था, और इस गीत को जारी किया था डेक्का रेकॊर्ड्स ने। इसे बिलबोर्ड मैगज़ीन चार्ट्स में पहली बार एंट्री मिली थी २० जुलाई १९४० के दिन। यानी कि आज से ठीक ६० बरस और ५ दिन पहले। लोकप्रियता की पायदान दर पायदान चढ़ते हुए कुल ९ हफ़्तों तक इस हिट परेड शो की शान बना रहा और दूसरे नंबर तक पहुँच सका था। उधर पॊलीडोर के लिए कैटरीना वैलेन्टे वाला वर्ज़न जारी किया डेर्क्का रेकॊर्ड्स ने ही इंगलैण्ड में, और इसे बिलबोर्ड मैगज़ीन चार्ट्स में प्रथम एंट्री मिली थी ३० मार्च १९५५ को, और यह १४ हफ़्तों तक इस काउण डाउन में रही, और यह १३-वीं पायदान तक ही चढ़ सका था। यह तो था "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" के बारे में कुछ जानकारी, तो लीजिए सुनिए रवि के संगीत में फ़िल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' का शीर्षक गीत आशा भोसले की आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार हेमंत कुमार के सहायक के रूप में काम करते हुए फ़िल्म 'जागृति' के मशहूर गीत "हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के" की धुन दरसल रवि ने बनाई थी। लेकिन फ़िल्म क्रेडिट्स में हेमन्त दा का ही नाम छपवाया गया।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. You won't admit you love me, And so how am I ever to know? You always tell me, Perhaps, perhaps, perhaps....ये है मूल अंग्रेजी गीत, संगीतकार बताएं देसी संस्करण का - २ अंक.
२. गीतकार बताएं - ३ अंक.
३. कौन है इस गीत की गायिका - २ अंक.
४. गुरुदत्त की ये फिल्म थी, किस पर फिल्माया गया था ये नशीला गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी कैसे न माने आपको महागुरु, फिर एक बार सही है जवाब आपका, इंदु जी और अवध जी भी स्पोट ऑन हाँ, किश जी, मुझे लगता है अब आप एकदम सही समझ पाए हैं पहेली को, पहल जवाब गलत हुआ तो क्या हुआ, संभले तो सही, सही जवाब देकर बधाई, आपका खाता खुल चुका है.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

"खुद पे यकीं" एक मिशन है, जिसका उद्देश्य स्पष्ट है और अब दरकार है बस आपके सहयोग की

अभी कुछ दिन पहले हमने एक खास गीत जारी किया था, जिसका उद्देश्य शारीरिक विकलांगता से झूझ रहे लोगों के मन में आत्मविश्वास भरना था, जी हाँ, आपने सही पहचाना, ये गीत था "खुद पे यकीं", जिसे आप सब ने बेहद सराहा है, इस गीत के सन्देश को और अधिक लोगों तक पहुँचाने के उद्देश्य से इस गीत के गायक बिस्वजीत नंदा ने खोज निकला एक ऐसा शख्स जो इस गीत से सम्बंधित तस्वीरों और कथनों को जोड़ कर एक वीडियो बना सके, पोलैंड का ये शख्स हिंदी नहीं समझता है पर बिस्वजीत ने उनका साथ दिया और बन गया ये वीडियो. जिसको आज हम आवाज़ पर खोल रहे हैं. जिस शख्स की हम बात कर रहे हैं उनके बारे में आप अधिक जानकारी अवश्य लें यहाँ अब देखिये ये वीडियो और अगर पसंद आये तो अपने मित्रों को भी अवश्य दिखाएँ, ताकि ये सन्देश अधिक से अधिक जरूरतमंदों तक पहुँच सकें

शनिवार, 24 जुलाई 2010

सुनो कहानी: जयशंकर प्रसाद की पुरस्कार

जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कहानी पुरस्कार

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में कृश्न चन्दर की रचना 'एक गधे की वापसी - भाग 2/3' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं जयशंकर प्रसाद की अमर कहानी "पुरस्कार", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 7 मिनट 17 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



झुक जाती है मन की डाली, अपनी फलभरता के डर में।
~ जयशंकर प्रसाद (30-1-1889 - 14-1-1937)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

पेड़ के नीचे, हाथ पर सर रखकर मधुलिका सो रही थी।
(जयशंकर प्रसाद की "पुरस्कार" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें।
VBR MP3

#Eighty Fourth Story, Puraskar: Jaishankar Prasad/Hindi Audio Book/2010/28. Voice: Archana Chaoji

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

दुम न हिलाओ, कान काट खाओ.....उबलता आक्रोश युवाओं का समेटा वी डी, ऋषि और उन्नी ने इस नए गीत में

Season 3 of new Music, Song # 15

"जला दो अभी फूंक डालो ये दुनिया...", गुरु दत्त के स्वरों में एक सहमा मगर संतुलित आक्रोश था जिसे पूरे देश के युवाओं में समझा. बाद के दशकों में ये स्वर और भी मुखरित हुए, कभी व्यंग बनकर (हाल चाल ठीक ठाक है) कभी गुस्सा (दुनिया माने बुरा तो गोली मारो) तो कभी अंडर करंट आक्रोश (खून चला) बनकर. कुछ ऐसे ही भाव लेकर आये हैं आज के युवा गीतकार विश्व दीपक "तन्हा" अपने इस नए गीत में. ऋषि पर आरोप थे कि उनकी धुनों में नयापन नहीं दिख रहा, पर हम बताना चाहेंगें कि हमारे अब तक के सभी सत्रों में ऋषि के गीत सबसे अधिक बजे हैं, जाहिर है एक संगीतकार के लिहाज से उनका अपना एक स्टाइल है जो अब निखर कर सामने आ रहा है, रही बात विविधता की तो हमें लगता है कि जितने विविध अंदाज़ ऋषि ने आजमाए हैं शायद ही किसी ने किये होंगें. अब आज का ही गीत ले लीजिए, ये उनके अब तक के सभी गीतों से एकदम अलग है. गायक उन्नी का ये दूसरा गीत है इस सत्र में, पर पहला एकल गीत भी है ये उनका. गीत के अंत में कुछ संवाद भी हैं जिन्हें आवाज़ दी है खुद विश्व दीपक ने, बैक अप आवाज़ तो ऋषि की है ही....तो लीजिए सुनिए आज का ये जोश से भरा दनदनाता गीत.

गीत के बोल -

सादी या आधी या पौनी थालियाँ,
भूखे को सारी……. हैं गालियाँ….

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

भुलावे में जिये अभी तक,
चढावे में दिये उन्हें सब,
मावे की लगी जो हीं लत,
वादों पे लगी चपत…….

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?
लुट के, घुट के, फुट के, रोना क्या?

बढ के गढ ले…. आ जा………. बरछा धर ले…….

ऐसी की तैसी….

मौका है ये
जाने ना दे
कांधे पर से

बेताल फिर डाल पर….

छलावे से छिने हुए घर ,
अलावे जां जमीं मुकद्दर,
दावे से तेरे होंगे सब,
हो ले जो ऐसा अजब…

झटका ज़रा दो,
फ़टका जमा दो,
हक़ ना मिले तो,
ऐसी की तैसी……

दुम ना हिलाओ,
कान काट खाओ,
हड्डियाँ चबाओ,
ऐसी की तैसी….

कचरा हटा दो,
ऐसी की तैसी….
लफ़ड़ा मिटा दो,
ऐसी की तैसी…

तुम्हें बिगड़ा कहे जो,
पिछड़ा कहे जो,
उसकी तो
ऐसी की तैसी…



ऐसी की तैसी - द रीबेल है मुज़ीबु पर भी, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा है... देखिए यहाँ

मेकिंग ऑफ़ "ऐसी की तैसी- द रीबेल" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस: ये शायद मेरा पहला गाना है जो मेलोडी पर आधारित नहीं है। ऐसे गानों की उम्र कम होती है क्योंकि ५ या १० सालों बाद समकालीन संगीत (contemporary music) का साउंड बदल जाएगा और ऐसे गानों को सुनने में तब मज़ा नहीं आएगा जितना आज आता है। ऐसी हालत में गाने को जीवित रखने वाली बात उसके बोल में होती है, और इस गाने में वीडी ने सामाजिक मुद्दों से जुड़ा विषय चुना है। गाने में जो संदेश है वही इस गाने को समय के साथ बिखरने, बिगड़ने और पुराना होने से बचाएगा और यही संदेश गाने में जो मेलोडी की कमी है उसे पूरा करेगा। इसलिए मुझे इस गाने पर फख्र है। उन्नी के साथ यह मेरा पहला गाना है। भले हीं उन्नी ने इस जौनर का कोई भी गाना पहले नहीं गाया है, लेकिन पहले प्रयास में हीं उन्नी ने इस गाने को बखूबी निभाया है।

उन्नीकृष्णन के बी: ये एक बहुत ही शानदार तजुर्बा रहा मेरे लिए. अमूमन मैं कुछ शास्त्रीय या राग आधारित रोमांटिक गीत गाना अधिक पसंद करता था, पर ये गाना अपने संगीत में, शब्दों में ट्रीटमेंट में हर लिहाज से एकदम अलग था. इसे गाने के लिए मुझे अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना था, ऋषि और वी डी का ये आईडिया था और उन्हें इस पर पूरा विश्वास भी था, संशय था तो बस मुझे था क्योंकि मेरे लिए ये स्टाईल बिलकुल अलग था, पर इन दोनों के निर्देशन में मैंने ये कोशिश की, और मुझे गर्व है जो भी अंतिम परिणाम आया है, इस गीत का हिस्सा मुझे बनाया इसके लिए मैं ऋषि और वी डी का शुक्रगुजार हूँ.

विश्व दीपक तन्हा: बहुत दिनों से मेरी चाहत थी कि ऐसा हीं कुछ लिखूँ, लेकिन सही मौका नहीं मिल पा रहा था। फिर एक दिन ऋषि जी ने इस गाने का ट्युन भेजा। पहली मर्तबा सुनने पर हीं यह जाहिर हो गया कि इसके साथ कुछ अलग किया जा सकता है। लेकिन ऋषि जी ने समय की कमी का हवाला देकर यह कह दिया कि आप जो कुछ भी लिख सकते हो, लिख दो, जरूरी नहीं कि हम कोई ठोस संदेश दे हीं। फिर भी मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि कुछ न कुछ संदेश तो होगा हीं, क्योंकि किसी मस्ती भरे गाने के माध्यम से अगर हम समाज को मैसेज़ देने में कामयाब होते हैं तो इसमें हमारी जीत है। मैने उन्हें यह भी यकीन दिलाया कि मैं इसे लिखने में ज्यादा समय न लूँगा, इसलिए आप मेरी तरफ से निश्चिंत रहें। गाना लिखने के दौरान मैंने एक-दो जगहों पर ट्युन से भी छेड़-छाड़ की, जैसे "बेताल फिर डाल पर" यह पंक्ति कहीं भी फिट नहीं हो रही थी, फिर भी ऋषि जी ने मेरी भावनाओं का सम्मान करते हुए बोल के हिसाब से धुन में परिवर्त्तन कर दिया। गाने के बोल और धुन तैयार हो जाने के बाद गायक की बात आई तो ऋषि जी ने उन्नी के नाम का सुझाव दिया। मैने उन्नी को पहले सुना था और मुझे उनकी आवाज़ पसंद भी आई थी, इसलिए मैंने भी हामी भर दी। मेरे हिसाब से उन्नी ने इस गाने के लिए अच्छी-खासी मेहनत की है और यह मेहनत गाने में दिखती है। हम तीनों ने मिलकर जितना हो सकता था, उतना "आक्रोश" इस गाने में डाला है.. उम्मीद करता हूँ कि आप तक हमारी यह फीलिंग पहूँचेगी। और हाँ, इस गाने के अंतिम ५ या १० सेकंड मेरी आवाज़ में हैं। ऋषि जी कहते हैं कि यह मेरी गायकी की शुरूआत है, आपको भी ऐसा लगता है क्या? :)
उन्नीकृष्णन के बी
उन्नीकृष्णन पेशे से कम्प्यूटर इन्जीनियर हैं लेकिन संगीत का शौक बचपन से ही रखते हैं। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में इन्होंने विधिवत शिक्षा प्राप्त की है तथा स्कूल व कालिज में भी स्टेज पर गाते आये हैं। नौकरी शुरू करने के बाद कुछ समय तक उन्नी संगीत को अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं कर पाये मगर पिछले काफी वक्त से वो फिर से नियमित रूप से रियाज़ कर रहे हैं‚ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे हैं‚ गाने रिकार्ड कर रहे हैं और आशा करते हैं कि अपनी आवाज़ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक तन्हा
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Aaissi Kii Taiisi
Voice - Unnikrishnan K B
Backup voice - Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak Tanha
Graphics - samarth garg


Song # 15, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

इस गीत का प्लेयर फेसबुक/ऑरकुट/ब्लॉग/वेबसाइट पर लगाइए

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

दिल तड़प तड़प के.....सलिल दा की धुन पर मुकेश (जयंती पर विशेष) और लता की आवाजें

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 445/2010/145

'गीत अपना धुन पराई' लघु शृंखला में इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कुछ ऐसे सदाबहार नग़में जो प्रेरित हैं किसी मूल विदेशी धुन या गीत से। ये दस गीत दस अलग अलग संगीतकारों के हमने चुने हैं। पिछले चार कड़ियों में हम सुन चुके हैं स्नेहल भाटकर, अनिल बिस्वास, मुकुल रॊय और राहुल देव बर्मन के स्वरबद्ध गीत; आज बारी है संगीतकार सलिल चौधरी की। सलिल दा और प्रेरीत गीतों का अगर एक साथ ज़िक्र हो रहा हो तो सब से पहले जो गीत याद आता है, वह है फ़िल्म 'छाया' का - "इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा", जो कि मोज़ार्ट की सीम्फ़नी से प्रेरीत था। लेकिन आज हमने आपको सुनवाने के लिए यह गीत नहीं चुना है, बल्कि एक और ख़ूबसूरत गीत जो आधारित है पोलैण्ड के एक लोक गीत पर। फ़िल्म 'मधुमती' का यह सदाबहार गीत है "दिल तड़प तड़प के दे रहा है ये सदा, तू हम से आँख ना चुरा, तुझे क़सम है आ भी जा"। लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ों में गीतकार शैलेन्द्र की रचना। मूल पोलैण्ड का लोक गीत कुछ इस तरह से है - "Szła Dzieweczka do Laseczka, do zielonego". दोस्तों, अब आप मुझसे यह मत पूछिएगा कि इसका उच्चारण किस तरह से होगा! बस यही कहेंगे कि सलिल दा ने क्या ख़ूब भारतीयकरण किया है। लगता ही नहीं कि इसकी धुन किसी विदेशी गीत पर आधारित है। पोलैण्ड के ही किसी वेबसाइट से इस गीत के बारे में कुछ जानकारी हासिल हुई है, उसे रोमन में ही प्रस्तुत कर रहे हैं - "The lyrics are mostly nonsense. The girl goes into the green woods and meets a handsome hunter. She asks his advice, then she tells him she would have given him bread and butter, but she already ATE it! It's just a FUN song to sing!!"

और आइए अब बात करें सलिल दा के कुछ ऐसे गीतों की जो उन्होने किसी ना किसी विदेशी धुन से प्रेरित होकर बनाई है। 'छाया' और 'मधुमती' के इन दो गीतों के अलावा सलिल दा के कुछ और ऐसे प्रेरीत गीत इस प्रकार हैं:

१. धरती कहे पुकार के (दो बिघा ज़मीन) - मूल गीत: "मीडोलैण्ड्स" (लेव निपर)
२. हल्के हल्के चलो सांवरे (तांगेवाली) - मूल गीत: "दि वेडिंग् साम्बा" (एडमुंडो रॊस)
३. ज़िंदगी है क्या सुन मेरे यार (माया) - मूल गीत: "थीम म्युज़िक ऒफ़ लाइमलाइट" (चारली चैपलिन)
४. आँखों में तुम दिल में तुम हो (हाफ़ टिकट) - मूल गीत: "बटन्स ऐण्ड बोज़" (दिना शोर)
५. बचपन बचपन (मेमदीदी) - मूल गीत: "ए-टिस्केट ए-टास्केट" (नर्सरी राइम)

सलिल दा ने करीब ७५ हिंदी फ़िल्मों में संगीत दिया। इनके अलावा ४० बंगला और २६ मलयालम फ़िल्मों में भी उन्होने संगीत दिया। विदेशी संगीतज्ञों में उनके ख़ास चहेते थे मोज़ार्ट, बीथोवेन, चैकोव्स्की और चोपिन आदि। तो आइए आज सलिल दा के नाम करते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह कड़ी और सुनते हैं फ़िल्म 'मधुमती' का यह एवरग्रीन हिट। इसके साथ ही 'गीत अपना धुन पराई' लघु शृंखला का पहला हिस्सा होता है पूरा। रविवार की शाम को हम इसी शृंखला को आगे बढ़ाने के लिए पुन: उपस्थित होंगे, तब तक के लिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की टीम को इजाज़त दीजिए, लेकिन आप बने रहिए 'आवाज़' के साथ, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि सलिल चौधरी की पुत्री एवं गायिका अंतरा चौधरी ने सोनू निगम के साथ फ़िल्म 'खोया खोया चांद' में एक युगल गीत गाया है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. लोकप्रिय गीत "दि ब्रीज़ ऐण्ड आइ" से प्रेरित है ये गीत, संगीतकार बताएं - ३ अंक.
२. फिल्म के प्रमुख अभिनेता ही फिल्म ने निर्माता है, नाम बताएं - २ अंक.
३. गीतकार बताएं इस शीर्षक गीत के - २ अंक.
४. गायिका कौन है, बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी इस बार भी आपका अंदाजा एकदम सही है, और इंदु जी भी ऑन स्पोट है. किश जी इस बार आप एकदम सही है अपने जवाबों के साथ. बस इतना और समझ लीजिए कि आपने सिर्फ एक सवाल का ही जवाब देना है, सभी का नहीं....बहुत अच्छे, स्कोर अब तक - शरद जी - ६५, अवध जी ५७ और इंदु जी हैं २७ पर.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 21 जुलाई 2010

कैसा तेरा प्यार कैसा गुस्सा है सनम...कभी आता है प्यार तो कभी गुस्सा विदेशी धुनों से प्रेरित गीतों को सुनकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 444/2010/144

किसी विदेशी मूल धुन से प्रेरित होकर हिंदी फ़िल्मी गीत बनाने वाले संगीतकारों की अगर चर्चा हो, और उसमें संगीतकार राहुल देव बर्मन का ज़िक्र ना करें तो चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। दोस्तों, पिछली तीन कड़ियों में हमने क्रम से १९६०, १९५७ और १९५८ के तीन गीत आपको सुनवाए, यानी कि ५० के दशक के आख़िर के सालों के गानें। आज हम एक छलांग मार कर सीधे पहुँच रहे हैं ८० के दशक में और सुनवाएँगे एक ऐसा गीत जिसकी धुन का राहुल देव बर्मन ने एक विदेशी गीत से सहारा लिया था। अब आप यह कहेंगे कि ५० के दशक से यकायक ८० के दशक में क्यों! दरअसल आज २१ जुलाई, गीतकार आनंद बक्शी साहब का जन्मदिवस। इसलिए हमने सोचा कि उन्हे याद करते हुए क्यों ना उनका लिखा एक ऐसा गीत सुनवा दिया जाए जिसकी धुन विदेशी मूल धुन से प्रेरित हो! तभी हमें ख़याल आया कि आर. डी. बर्मन के साथ उन्होने कई इस तरह के गीत किए हैं। हमने जिस गीत को चुना है वह है १९८३ की फ़िल्म 'लव स्टोरी' का "कैसा तेरा प्यार कैसा गु़स्सा है तेरा, तौबा सनम तौबा सनम"। लता मंगेशकर और अमित कुमार ने इस गीत को गाया था और अपने ज़माने की यह बेहद मक़बूल फ़िल्म थी कुमार गौरव और विजेयता पण्डित के अभिनय से सजी हुई। इस फ़िल्म का हर एक गीत सुपरहिट था, शायद आपको याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। जहाँ तक प्रस्तुत गीत की बात है, तो यह गीत स्वीडिश पॊप ग्रूप 'ए.बी.बी.ए' के गीत "आइ हैव अ ड्रीम" से लिया गया है। इस मूल गीत को लिखा था बेनी ऐंडरसन और जोर्ण उलवेऊस ने, और यह गीत आया था इस ग्रूप के १९७९ के ऐल्बम 'वूले-वू' (Voulez-Vous) में। इस गीत में मुख्य गायक थे ऐनी फ़्रिड लींगस्टैड। इसे दिसंबर १९७९ को सिंगल रिकार्ड के रूप में रिलीज़ कर दिया गया था और दूसरे साइड में "टेक अ चांस ऒन मी" का लाइव वर्ज़न डाल दिया गया था। 'ABBA Gold: Greatest Hits' और 'Mamma Mia!' जैसे हिट ऐल्बम्स में इस गीत को शामिल किया जा चुका है।

आज बक्शी साहब के जन्मदिवस के बहाने जब पंचम के गीत को हमने चुन ही लिया है तो लगे हाथ आपको पंचम के कुछ "प्रेरित" गीतों के बारे में भी बताना चाहेंगे। एक बार उषा उथुप जी विविध भारती के स्टूडियो में तशरीफ़ लाई थीं और उन्होने पंचम के बारे में बताते हुए कहा था कि वो और पंचम मिलकर बहुत से विदेशी गीतों से प्रेरणा ली और एक से एक सुपरहिट गीतों के कम्पोज़िशन्स तैयार किए। कुछ कुछ गीत तो उषा जी ही सुझाए थे पंचम को। आइए उसी इंटरव्यू से कुछ अंश यहाँ पर पढ़ें। "It is tuesday this must be Belgium, it is wednesday it must be Rome, it is thursday it must be Monteal, it is friday I must go home" - यह गाना मैंने उनको बहुत साल पहले दिया था, इस गाने से इन्स्पायर्ड होकर बना "चुरा लिया है तुमने जो दिल को, नज़र नहीं चुराना सनम"। एक और गाना था "When the moon is in the Jupiter.....", इससे बनाया "जब अंधेरा होता है आधी रात के बाद"। ऐसा ही एक और गाना था "ओ हंसिनी, मेरी हंसिनी, कहाँ उड़ चली"। ""When I was seventeen, it was a goody......" से बना "राजू, चल राजू, अपनी मस्ती में तू"। R D Burman was really a man of the world. उन्होने किसी धुन की कॊपी नहीं की, बल्कि उनसे इन्स्पायर्ड होकर he produced such nice music. Its not one man's thinking, its not like that. We two created so many songs. There was a song in French accent, "धन्नो की आँखों में रात का सूरमा, चाँद का चुम्मा"। और भी कितने गानें हम ऐसे, ऐसे ही बहुत सारे बैकग्राउण्ड म्युज़िक भी है, फ़िल्म 'शान', 'शालीमार', 'दि ट्रेन', 'कारवाँ' मे कितने ही पीसेस हैं। तो दोस्तों, आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' राहुल देव बर्मन और आनंद बक्शी साहब की सदाबहार जोड़ी के नाम, सुनते हैं फ़िल्म 'लव स्टोरी' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि गायक अमित कुमार का गाया पहला हिंदी फ़िल्मी गीत है "मैं एक पंछी मतवाला रे", जो उन्होने अपने पिता किशोर कुमार की फ़िल्म 'दूर का राही' में गाया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. पोलैंड के एक लोक गीत पर आधारित था ये गीत, संगीतकार बताएं - ३ अंक.
२. लता जी के साथ किस गायक ने दिया है इस युगल गीत में - २ अंक.
३. शैलेन्द्र का रचा ये गीत किस बिमल रॉय फिल्म फिल्म का है - २ अंक.
४. किस जोड़ी पर फिल्माया गया है ये शानदार सदाबहार गीत - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आप बिलकुल सही हैं, राजेन्द्र कुमार जी का जन्मदिन २० को ही आता है. पर अब आप समझ गए होंगें कि इस गीत से जुड़े किस कलाकार की जयंती आज यानी २१ जुलाई को है...जी हाँ आनंद बक्षी साहब. तो आज हम आपको ३ अंक नहीं दे पायेंगें...अवध जी को २ अंक अवश्य मिलेंगें, कुछ जी अभी भी शायद समझ नहीं आये हैं पहेली का स्वरुप ठीक से. ये बात हम अपने उन श्रोताओं के लिए भी एक बार फिर दोहरा रहे हैं जो हमें मेल करते हैं, विशेषकर पी के कुमार जी के लिए कि आपने सभी सवालों के जवाब नहीं देने हैं, मात्र एक सवाल का जवाब देना है, और बेहतर तभी रहेगा जब आप भारतीय समयानुसार ६.३० पर आवाज़ पर आयें ताकि, आपके जवाब पहले आ सकें.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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