Wednesday, December 31, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ३० से २१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ३० से २१ तक

पिछले अंक में हम आपको ४०वीं पायदान से ३१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

३० वीं पायदान - मेरी माटी (रामचंद पाकिस्तानी)

पाकिस्तान के जानेमाने निर्देशक महरीन जब्बार ,जिन्होंने पहचान, कहानियाँ, पुतली घर जैसे नामचीन टीवी धारावाहिकों एवं नाटकों का निर्देशन किया है, "रामचंद पाकिस्तानी" लेकर फिल्म-इंडस्ट्री में उपस्थित हुए हैं। यह फिल्म अपने अनोखे नाम के कारण दर्शकों को आकर्षित करती है। नगरपरकर गाँव में रहने वाली "चंपा"(नंदिता दास द्वारा अभिनीत) की जिंदगी में तब उथलपुथल मच जाता है,जब उसका पति एवं उसका लड़का "रामचंद" अनजाने हीं सरहद पारकर भारत आ जाता है और भारतीय फौज उन्हें घुसपैठिया मान लेती है। यह फिल्म उसी चंपा की दास्तान है। देबज्योति मिश्रा द्वारा संगीतबद्ध एवं अनवर मक़सूद द्वारा लिखित "मेरी माटी" गायकों (शुभा मुद्गल एवं शफ़क़त अमानत अली) की अनोखी जुगलबंदी के कारण श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित होती है।



२९ वीं पायदान - बंदया(खुदा के लिए)

यूँ तो बुल्ले शाह की नज़्में साढे तीन सदियाँ पुरानी हैं,लेकिन उनकी नज़्मों का नूर अब भी ताज़ातरीन है। नब्बे की दशक में पाकिस्तानी रौक बैंड "जुनून" ने पहली मर्तबा बुल्ले शाह की नज़्मों को युवाओं के दरम्यान मौजूद कराया था,उसके बाद उनके कलामों पर सबसे ज्यादा काम "रब्बी शेरगिल" ने किया है। "बुल्ला की जाना" इसका जबर्दस्त उदाहरण है। "खुदा के लिए" का "बंदया" भी इसी कड़ी का एक अनमोल मोती है। इस गाने को अपने संगीत से संवारा है खवर जावेद ने तो अपनी गलाकारी से सजाया है खवर जावेद एवं फराह ज़ाला ने।


२८ वीं पायदान - जी करदा(सिंह इज किंग)

आलोचकों की मानें तो प्रीतम ने धुन की चोरी में अन्नु मल्लिक एवं बप्पी लहरी को अगर पीछे नहीं छोड़ा है तो बराबरी तो कर हीं ली है और अगर जनता की माने तो प्रीतम की धुन सबके दिलॊ को अपनी-सी लगती है। इसी उहाफोह के बीच का गीत है "जी करदा"। धुन कितनी मौलिक है,यह तो पता नहीं,लेकिन इसके सूत्रों का अब तक पता नहीं चला है और इसी कारण यह गीत हमारे गीतमाला में शामिल है। "सिंह इज किंग" यूँ तो हाँगकाँग की एक फिल्म "जी जी" की सर से पाँव तक नकल है ,लेकिन अक्षय कुमार की बिंदास अदायगी ने इसे इस साल की दूसरी सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म बना दिया है। रही बात गाने की तो इस गाने के बोल लिखे हैं मयूर पुरी ने और इसे अपनी आवाज़ दी है लभ जंजुआ (सोणी दे नखरे, प्यार करके पछताया फेम) एवं सुज़ी ने।


२७ वीं पायदान -सीता राम सीता राम(वेलकम टू सज्जनपुर)

समानांतर-सिनेमा के बेताज बादशाह श्याम बेनेगल की पहली हल्की-फुल्की एवं पूर्णतया व्यावसायिक फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" आशा के अनुरूप दर्शकों को गुदगुदाने में सफल साबित होती है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे - श्रेयस तालपडे एवं अमृता राव, लेकिन अपनी अदायगी से सबसे ज्यादा प्रभावित किया रवि झंकल ने। इस फिल्म में सामाजिक असामानता एवं राजनीतिक तनावों को हास्य का पुट देकर प्रस्तुत किया गया है एवं हँसाकर हीं सही फिल्म असर तो कर हीं जाती हई। "लगे रहो मुन्नाभाई","खोया खोया चाँद" एवं "लागा चुनरी में दाग" के बाद संगीतकार शांतनु मोइत्रा एवं गीतकार स्वानंद किरकिरे की जोड़ी एक बार फिर अपना कमाल दिखाती है। कृष्ण कुमार की आवाज झूमने पर मजबूर करती है।


२६ वीं पायदान -मम्मा(दसविदानिया)

दिल को छूता कैलाश, नरेश और परेश का संगीत एवं कैलाश के बोल किसी भी संवेदनशील इंसान को रूलाने के लिए काफी है। कैलाश की आवाज एक झटके में असर करती है। इस गाने का फिल्मांकन विनय पाठक, गौरव गेरा एवं सरिता जोशी पर किया गया है और जिस तरह से इन कलाकारों ने अपने इमोशन एक्सप्रेस किए हैं, देखकर हृदय रोमांचित हो जाता है। हैट्स आफ टू कैलाश एंड विनय पाठक..........


२५ वीं पायदान -दिल हारा(टशन)

यूँ तो टशन इस साल की सबसे बड़ी फ्लाप फिल्मों से एक है और आलोचकॊं की मानें तो यश राज फिल्म्स के लिए एक धब्बा है,लेकिन विशाल-शेखर का संगीत डूबते के लिए तिनका साबित होता है। यह साल विशाल-शेखर के लिए बहुत हीं सफल रहा है। "दिल से" एवं "मक़बूल" जैसे फिल्मॊं में अदायगी कर चुके एवं "लीजेंड और भगत सिंह" के पटकथा-लेखक "पियुष मिश्रा" ने इस फिल्म के गीत लिखे हैं। रही बात इस गाने की तो "छप्पन तारे तोर नाच लूँ" की स्वरलहरियाँ जैसे हीं हवाओं में उतरती है, "सुखविंदर" के अज़ीम-ओ-शान आगमन का अंदाजा हो जाता है।


२४ वीं पायदान -मन मोहना(जोधा अकबर)

कुछ सालों पहले जी०टी०वी० के "सा रे गा मा" में (जब सोनु निगम उद्घोषक हुआ करते थे) बेला शिंदे ने अपनी गायिकी से सबको मोहित किया था और विजेता भी हुई थी। लेकिन उसके बाद बेला शिंदे कुछ खास नहीं कर पाई। इस साल आई
"जोधा अकबर" से इस गायिका ने अपनी वापसी की है। "मन मोहना" यूँ तो एक भजन है,लेकिन जिस खूबी से जावेद अख्तर ने इसे लिखा है, निस्संदेह हीं नास्तिकों पर भी असर करने में यह समर्थ है। इस गाने से ए०आर०रहमान अपने रेंज का अनूठापन दर्शाते हैं।


२३ वीं पायदान -कभी कभी अदिति(जाने तू या जाने ना)

मीठी-सी पतली आवाज़ सुनकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस गाने को किसी २०-२२ साल के युवा ने आवाज़ नहीं दी,बल्कि ४२ साल के युवा(?) की मैच्युर आवाज़ है। जी हाँ, मैं रहमान की नई खोज राशिद अली की बात कर रहा हूँ। रहमान से राशिद अली की मुलाकात लगभग छह साल पहले हुई थी, बड़ी ही कैजुअल मुलाकात थी वह। इसके बाद रहमान के ट्रुप में राशिद गिटारिस्ट के तौर पर शामिल हो गए और "बाम्बे ड्रीम्स" की सफलता के भागीदार बने। यहाँ तक कि "कभी कभी अदिति" का गिटार पीस भी राशिद के म्युजिकल आईडियाज से प्रेरित है। इस गीत के बोल लिखे हैं "आती क्या खंडाला" फेम अब्बास टायरवाला ने।


२२ वीं पायदान -बाखुदा(किस्मत कनेक्शन)

आतिफ असलम(पहली नज़र फेम) की आवाज़ का जादू खुद हीं सर चढकर बोलता है,उस पर अल्का याग्निक की मीठी आवाज का तरका.... माशा-अल्लाह! इस गाने में प्रीतम अपने रंग में नज़र आते हैं। खुदा की गवाही देकर प्यार का इकरार करने की अदा काबिल-ए-तारीफ है, वैसे तो यह काम सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पहले हीं कर चुके हैं "खुदा गवाह" में। इस गीत के बोल लिखे हैं सब्बीर अहमद ने। वैसे तो यह फिल्म बाकस-आफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी,लेकिन शाहरूख के बिना पहली मर्तबा अजीज मिर्जा को देखना अलग अनुभव दे गया। शाहिद और विद्या की जोड़ी भी लीक से हटकर लगी।


२१ वीं पायदान -जलवा(फैशन)

सलीम-सुलेमान जब "फैशन" के लिए टाईटल ट्रैक बना रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि "फैशन" से राईम करता हुआ (फैशन की तुक में) शब्द खोजना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है, तभी सलीम ने "जलवा" शब्द सुझाया। वही से आगे बढते हुआ बना "फैशन का है यह जलवा" और यह पंक्ति कमाल कर गई। मज़े की बात यह है कि "फैशन" फिल्म की पूरी कहानी इसी पंक्ति के इर्द-गिर्द घुमती है। इस गाने के बोल लिखे हैं अतिथि गीतकार "संदीप नाथ" ने और अपनी आवाज़ से सुसज्जित किया है सुखविंदर सिंह, सत्या हिंदुजा और रोबर्ट बौब ओमुलो ने। रैंप पर चलती प्रियंका,कंगना,मुग्धा और पृष्ठभूमि में बजता यह गीत रोमांचित कर देता है।



बाकी के गीत लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे।

सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

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Tuesday, December 30, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ४० से ३१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ४० से ३१ तक

पिछले अंक में हम आपको ५०वीं पायदान से ४१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

४० वीं पायदान - आशियाना(फैशन)

४०वें पायदान पर फिल्म "फैशन" का गीत "आशियाना" काबिज़ है। इस गीत के बोल लिखे हैं इरफ़ान सिद्दकी ने और सुरबद्ध किया है सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने। इस गीत को सलीम मर्चैंट(सलीम-सुलेमान की जोड़ी से एक) ने अपनी आवाज़ से जीवंत किया है। मधुर भंडारकर की यह फिल्म "फैशन" अपने विषय के साथ-साथ अपने गीतों के कारण भी चर्चा में रही है।



३९ वीं पायदान - अलविदा(दसविदानिया)

कैलाश खेर यूँ तो अपनी आवाज़ और संगीत के कारण संगीत-जगत में मकबूल हैं। लेकिन जो बात बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह है कि अमूमन अपने सभी गानों के बोल कैलाश हीं लिखते हैं।अलविदा भी उनकी त्रिमुखी प्रतिभा का साक्षात उदाहरण है। "दसविदानिया" अपनी सीधी-सपाट कहानी, हद में किए गए अभिनय और "कौमन मैन" की छवि वाले नायक के कारण फिल्मी जगत के लिए मील का पत्थर साबित हुई है। जिन्हें "दसविदानिया" का अर्थ न मालूम हो या जिन्होंने जानने की कभी कोशिश न की हो, उन्हें बता दूँ कि "दसविदानिया" एक रसियन वर्ड है,जिसका अर्थ होता है "गुड बाय/अलविदा" ।


३८ वीं पायदान - ओए लकी लकी ओए(ओए लकी लकी ओए)

आजकल हिन्दी फिल्म-उद्योग में पंजाबी गानों की धूम मची हुई है।इसी का असर है कि पिछले साल आई "मौजा हीं मौजा" या फिर इस साल आए "सिंह इज किंग" में अपनी आवाज का लोहा मनवाए हुए मिका सिंह इस गाने में भी अपनी मौजूदगी का अहसास दिला जाते हैं। इस गीत को अपनी धूनों से सजाया है "स्नेहा खनवल्कर" ने, जिन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत राम गोपाल वर्मा के "गो" से की थी। निस्संदेह "गो" का किसी को पता नहीं,लेकिन "ओए लकी लकी ओए" से बालीवुड में स्नेहा की री-इंट्री कई उम्मीदें जगाती है। इस गीत के बोल लिखे हैं निर्देशक दिवाकर बनर्जी( खोसला का घोसला फेम), उर्मी जुवेकर एवं मनु ऋषि ने। तेज धुन की यह गीत झूमने पर मजबूर करती है।


३७ वीं पायदान - मन्नताँ(हीरोज)

यूँ तो "हीरोज" बाक्स-आफिस पर पीट गई,लेकिन फिल्म का यह गीत दर्शकों और श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित हुआ। इसे सोनू निगम और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ का जादू कहें , साजिद-वाजिद की स्वर-लहरियों का नशा या फिर जलीस शेरवानी-राहुल सेठ की कलम का हुनर,यह गीत कहीं से भी निराश नहीं करता। इस गाने की सबसे बड़ी खासियत है फिल्म इंडस्ट्री में कविता कृष्णमूर्ति की वापसी।


३६ वीं पायदान - सहेली जैसा सैंया(यू,मी और हम)

बाक्स आफिस के अब तक के रिकार्ड यही बताते हैं कि अजय देवगन ने अभिनय के अलावा जिस भी क्षेत्र में अपने कदम बढायें है, सौदा नुकसानदायक हीं साबित हुआ है, फिर चाहे वो फिल्म-निर्माण हो(राजू चाचा,यू मी और हम) या फिर निर्देशन(यू,मी और हम)। इस फिल्म में अजय देवगन सातवीं बार अपनी पत्नी काजोल के साथ अभिनय करते नज़र आए हैं,लेकिन इस बार "लेडी लक" भी अजय देवगन की नौका पार नहीं करा पाया। रही बात गाने की तो, इस गाने का मूल आकर्षण है "सुनिधि चौहान" की आवाज़। वैसे तो "मुन्ना धीमन" के अनकन्वेंशनल बोल एवं विशाल भारद्वाज का रूमानी संगीत भी बेहतरीन है,लेकिन "सुनिधि" का जादू हीं इस गाने की जान है।


३५ वीं पायदान - नज़रें मिलाना(जाने तू या जाने ना)

ए०आर० रहमान-- नाम हीं काफी है, किसी ने सच हीं कहा है। इस गाने की यू०एस०पी० का पूरा श्रेय ए०आर० रहमान को जाता है। फिल्म-इंडस्ट्री में यह विख्यात है कि जिस खूबी से रहमान गायकों का प्रयोग करते हैं,वैसा कोई भी संगीतकार नहीं कर पाता। इस गाने को सात गायकों ने अपनी आवाज़ दी है- अनुपमा देशपांडे, बेनी दयाल(आवाज़ हूँ मैं(युवराज),कैसे मुझे तू मिल गई(गज़नी) फेम),दर्शना, नरेश अय्यर(पाठशाला,रूबरू फेम), सतीश चक्रवर्ती, श्वेता भार्गवे एवं तन्वी। इस गाने के बोल लिखे हैं, इस फिल्म के लेखक एवं निर्देशक अब्बास टायरवाला ने। यह फिल्म अपनी अप्रत्याशित सफलता के कारण अब्बास टायरवाला के लिए निर्देशक के रूप में ड्रीम डेब्यु साबित हुई है।


३४ वीं पायदान - हा रहम(महफ़ूज़)(आमिर)

साधारण स्टार-कास्ट लेकिन असाधारण कहानी के साथ आई यह फिल्म सबों के दिल को छू गई। ऎसा लगा मानो अपनी हीं कहानी है। टीवी जगत से आए "राजीव खंडेलवाल" ने लाचार लेकिन आत्मविश्वासी "आमिर" के रूप में अपनी अदायगी से अपनी क्षमता का लोहा मनवा दिया। निर्देशन के क्षेत्र में पहली बार उतरे "राज कुमार गुप्ता" ने अपनी हीं कहानी "आमिर" को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारा है। अमिताभ वर्मा के बोल और अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे "महफ़ूज" में वह सारी बात है जो दिल को छूने के लिए काफ़ी होती है। गायकी में अमित और अमिताभ का साथ दिया है ए०आर०रहमान की खोज मुर्तजा कादिर( चुपके से(साथिया) फेम) ने।


३३ वीं पायदान - अल्लाह अल्लाह(खुदा के लिए)

"खुदा के लिए" एक पाकिस्तानी उर्दू फिल्म है,जिसे अपने लेखन एवं निर्देशन से संवारा है शोएब मंसूर ने।प्रमुख सितारे हैं- पाकिस्तान के सुपर स्टार शान, ईमान अली एवं फवाद खान। यह फिल्म पाकिस्तान की सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म साबित हुई है।यह फिल्म अपने कंटेंट के कारण विवादों में रही और इस कारण इसके कई दृश्यों पर कैंची चली। इस बदकिस्मती की मार इस फिल्म के सबसे बेहतरीन सीन पर भी पड़ी,जिस कारण दर्शक नसीरूद्दीन शाह की लाजवाब अदायगी का जलवा देखने से वंचित रह गए। "अल्लाह-अल्लाह" गाने की बात करें , तो इसे संगीत से सजाया है खवर जवाद ने और आवाजें दी हैं सईन ज़हूर एवं ज़रा मदानी ने। इस गाने में "अल्लाह-अल्लाह" कहने का तरीका श्रोता को अंदर तक रोमांचित कर देता है।


३२ वीं पायदान - जाने तू मेरा क्या है(जाने तू या जाने ना)

फिर से ए०आर०रहमान एवं अब्बास टायरवाला का जादू। इस साल ए०आर०रहमान ने पाँच फिल्मों का संगीत-निर्माण किया और हर फिल्म के हर गीत का मूड दूजे से जुदा। इस गाने को अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है रूना रिज़वी ने। इस गाने के साथ एक दिलचस्प कहानी जुड़ी है। इस फिल्म के निर्माता आमिर खान, निर्देशक अब्बास टायरवाला एवं आमिर खान के भाई एवं इस फिल्म के निर्देशन-सहयोगी मंसूर खान इस गाने का वीडियो फिल्म में नहीं रखना चाहते थे,इसलिए फिल्म इस गाने के बिना हीं रीलिज की गई। इस बात का जिक्र आमिर ने खुद अपने ब्लाग पर किया है।एक सप्ताह बाद दर्शकों की माँग पर इस गाने को फिल्म में डाला गया। और लोगों की मानें तो इस गाने का पिक्चराईजेशन कमाल का है, काले लिबास में जेनेलिया को देखकर युवाओं की साँसें रूकी की रूकी रह जाती है।


३१ वीं पायदान - बहका(गज़नी)

इस गाने के साथ ए०आर०रहमान ने अलग हीं तरह का प्रयोग किया है,विशेषकर "धक-धक धड़कन" वाली पंक्ति में। चूँकि यह गाना नया है और कहा जाता है कि रहमान का संगीत शराब की तरह धीरे-धीरे चढता है,इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में यह गीत लोगों के सर चढ कर बोलेगा। प्रसून जोशी ने बेहतरीन बोल लिखे हैं। रंग दे बसंती के बाद प्रसून जोशी एवं रहमान की एक साथ यह दूसरी फिल्म है। गुलज़ार, जावेद अख्तर, महबूब जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुके स्वयं रहमान ने इस गाने में प्रसून की पंक्तियों एवं लेखन-कला की बड़ाई की है। इस गाने को अपनी आवाज़ से सजाया है साऊथ के सेनसेशन एवं रहमान के फेवरिट कार्तिक ने।


सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

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सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

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डॉ॰ मृदुल कीर्ति का साक्षात्कार

वेदों, उपनिषदों जैसे अनेकों धार्मिक ग्रंथों का काव्यानुवाद कर चुकी एक विदुषी का साक्षात्कार


Doctor Mridul Kirti - image courtesy: www.mridulkirti.com
डॉक्टर मृदुल कीर्ति
आवाज़ के श्रोता डॉ॰ मृदुल कीर्ति को पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के संचालक के तौर पर पहचानते हैं। लेकिन इस महात्मा के साहित्य-जगत में कई ऐसे उल्लेखनीय योगदान हैं, जिन्हें जानकर हर कोई नतमस्तक हो जाता है। 07 अक्तूबर 1951 को उत्तर प्रदेश में जन्मी मृदुल कीर्ति ने वेदों, उपनिषदों का काव्यानुवाद किया है। साहित्य में अनुवाद को बहुत कठिन काम माना गया है, उसपर भी काव्यानुवाद, अपने-आप में एक तप-कर्म है। डॉ॰ मृदुल कीर्ति ने सामवेद का पद्यानुवाद (1988), ईशादि नौ उपनिषद (1996), अष्टावक्र गीता - काव्यानुवाद (2006), ईहातीत क्षण (1991), श्रीमद भगवद गीता का ब्रजभाषा में अनुवाद (2001) किया है। इसके अतिरिक्त "ईशादि नौ उपनिषद" में इन्होंने नौ उपनिषदों का हरिगीतिका छंद में हिन्दी अनुवाद किया है।

पांतजलि योग्रसूत्र के सभी चार अध्यायों का चौपाई छंद में अनुवाद हुआ है, जिसको संगीतबद्ध करने का काम हिन्द-युग्म की आवाज़ टीम कर रही है। मृदुल जी के बारे में ज्यादा कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। आज हम इनकी पूजा अनिल के साथ हुई बातचीत के कुछ अंश लेकर आये हैं, जिससे इस विदुषी और जानने में आपको मदद मिलेगी।

पूजा-मृदुल कीर्ति जी, आपने हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद किया हुआ है। इस अतुलनीय योगदान के लिए आपको साधुवाद। आपको इन ग्रंथों के अनुवाद का ख्याल कैसे आया और इसके लिए आपने प्रेरणा कहाँ से पाई?

मृदुल- अनुवाद की पृष्ठभूमि में इनके विचार और प्रेरणा स्रोत्र के बिन्दु हमें दर्शन की गहराई में ले जाते हैं। इसमें तीन शक्तियाँ काम करती हैं। पहली आपके पूर्वकृत कर्म ( भगवत गीता १५/ ८ , पातंजल योग दर्शन , कैवल्य पाद १ ) दूसरे माता-पिता के अणु-परमाणु और तीसरे आपका परिवेश। कौन सी गुण ग्राह्यता, कब, कैसे और किन कारणों से प्रबल हो जाती है, वही उसका कारण बन जाता है।

पूजा-प्रेरणा कहाँ से मिली ?

मृदुल- कुछ खोजने का अर्थ हैं कुछ मनचाहा पाने की चाह, कुछ अधूरापन जो पूर्णता की ओर उन्मुख होना चाहता है। कुछ ऐसा जो कोई छीन न सके, कुछ ऐसा जो पूर्ण हो। वह केवल पूर्ण ब्रह्म ही है।

अगर जिन्दगी में अंधेरे न होते, उजालों को यों प्राण उन्मुख न होते।
पीड़ा सहचरी सी साथ ही रही, अंधेरे और पीड़ा कभी धोखा नहीं देते।


कर्म भोग अनिवार्य हैं और सर्वज्ञ के विधान में अनिवार्य का निवारण नहीं, उसका अर्थ समझ आते ही पीड़ा ज्ञान का रूप ले लेती है। दग्ध मन की दाहकता की खोज ये अनुवाद हैं।
मूल संस्कृत से हिन्दी में इनका काव्यानुवाद हुआ है।

पूजा- लेखन कब और कैसे आरम्भ किया?

मृदुल- मेरे माता-पिता बहुत ही विद्वान और ज्ञानी थे। पिता आयुर्वेदाचार्य थे, उन दिनों संस्कृत में ही आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी। वे संस्कृत में रचनाएँ करते थे तो मैं हिन्दी में कुछ लिखती। माँ को पूरी गीता कंठस्थ और धारा प्रवाह उपनिषदों और अद्वैत्व वाद पर बोलतीं। मुझे चार से पाँच शाम को नियमित स्वाध्याय से आक्रोश होता तो वे कहतीं-
राम नाम आराधिबो तुलसी बृथा न जाए।
लारिकबे को पाढ़बो, आगे हथा सहाय।

सच में यही आगे मेरा सहारा बने। हृदय में बिखरे बीजों के अंकुरित होने का समय आया तो अनुवाद का स्वरुप ले लिया।

पूजा- कभी पारिवारिक कारणों से आपने कोई रुकावट महसूस की?

मृदुल- मेरा मन जगत में कम ही लगा। चोट उसे ही लगती है जब निर्दोष को दोषी माना जाए। चोट खाए मन के संकल्प गहरे होते हैं। मेरा बेटा हाई स्कूल की परीक्षा दे रहा था उसी के साथ मैं भी पढ़ती, मेरा शोध का विषय था ' वेदों में राजनीतिक व्यवस्था'। उसी के अनंतर सामवेद देखते हुए मन में काव्य रचित हुए. पुनः-पुनः हुए, बस पूरा करने को संकल्पित हो गयी। यह ग्रन्थ दो साल सात महीनों में पूरा हुआ।

सामवेद चौपाई छंद में, इसमें १८७५ मंत्र है। ( राष्ट्रपति श्री वेंकटा रमन द्वारा विमोचित )

"शक्ति श्रोत अथाह अनुपम, ध्वनित मुझमें कर गए
दिव्यता अनुपम अलौकिक कौन मुझमें भर गए .
क्षण वही अनुपम विलक्षण मुझको प्रेरित कर गए
अनुवाद गीता, वेद उपनिषदों के मुखरित कर गए
पल अलौकिक दिव्य अनुपम देह में विदेह था.
ज्ञात न कतिपय हुआ क्या प्रभु तुम्हारा नेह था.?"


पूजा- अंतरजाल पर हिन्दी का भविष्य कैसा है?

मृदुल- वट-वृक्ष का बीज सबसे छोटा होता हैं पर वृक्ष सबसे ही विशाल होता है। अंतरजाल के माध्यम से यह वट-वृक्ष और बोध-वृक्ष भी बनेगा और इसका अधिकांश श्रेय हिन्द-युग्म को ही मिलेगा।

पूजा- मंच संचालन और संयोजन में आप सिद्ध हस्त हैं। हमारे श्रोताओं और पाठकों को भी कुछ इस बारे में बताएं।

मृदुल- मंच-संचालन एक बहुत ही उत्तरदायित्व पूर्ण काम होता है। एक-एक उच्चारित शब्द के प्रति बहुत ही सजग रहना होता है यह संवेदनायों का जगत है। संयोजन में कुशलता का सहारा लेना होता है। श्रोताओं को एक भाव से दूसरे भावजगत में ले जाते हुए कोई झटका नहीं लगना चाहिए। उसे तैराते हुए ही परिवर्तित भाव में लाना होता है। इसके प्रमाण में हिन्द-युग्म के कवि सम्मलेन साक्षी हैं।

पूजा-आप स्वयं को ईश्वर का संदेश वाहक मानती हैं, तो जन सामान्य तक क्या संदेश पहुँचाना चाहेंगी?

मृदुल- एक बहुत ही सामान्य और अति सामान्य इंसान हूँ पर जीवन के इन उबलते हुए दुखों का कारण --विकारी चिंतन और समाधान शुद्ध चिंतन, ही मैं खोज पाई हूँ। हम खाते अच्छा हैं, पहनते अच्छा हैं तो सोचते अच्छा क्यों नहीं हैं----मन को शुद्ध विचारों का भोजन क्यों नहीं देते? व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सब ही समस्यों का समाधान केवल और केवल शुद्ध चिंतन है। धी यो यो नः प्रचोदयात . " धी " पवित्र विचार ही हमारी प्रार्थना के मूल हों।

Monday, December 29, 2008

मैं पैयम्बर तो नहीं, मेरा कहा कैसे हो

दूसरे सत्र के २७ वें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज

अपनी पहली दो ग़ज़लों से श्रोताओं और समीक्षकों सभी पर अपना जादू चलाने के बाद रफ़ीक़ शेख लौटे हैं अपनी तीसरी और इस सत्र के लिए अपनी अन्तिम प्रस्तुति के साथ. शायर है इस बार मुंबई के दौर सैफी साहब, जिनके खूबसूरत बोलों को अपनी मखमली आवाज़ और संगीत से सजाया है रफ़ीक़ ने. तो दोस्तों आनंद लें हमारी इस नई प्रस्तुति का और हमें अपनी राय से अवश्य अवगत करवायें.

सुनने के लिए नीचे के प्लयेर पर क्लिक करें -





Rafique Sheikh is back again for the last time in this season with his new ghazal, "jo shajhar..." written by a shayar from Mumbai Daur Saifii Sahab, hope you enjoy this presentaion also as most of his ghazals so far has been loved by audiences and critics as well.

to listen, please click on the player below -




Lyrics - ग़ज़ल के बोल -

जो शज़र सूख गया है वो हरा कैसे हो,
मैं पैयम्बर तो नहीं, मेरा कहा कैसे हो.

जिसको जाना ही नही, उसको खुदा क्यों माने,
और जिसे जान चुके हैं वो खुदा कैसे हो,

दूर से देख के मैंने उसे पहचान लिया,
उसने इतना भी नही मुझसे कहा, कैसे हो,

वो भी एक दौर था जब मैंने तुझे चाहा था,
दिल का दरवाज़ा हर वक्त खुला कैसे हो.

SONG # 27, SEASON # 02, "JO SHAJHAR.." OPENED ON 29/12/2008 ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.

Sunday, December 28, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ५० से ४१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ५० से ४१ तक

५० वीं पायदान

नम्बर ५० पर है फ़िल्म "किड्नाप" का दर्द भरा गीत जिसे गाया है संदीप व्यास ने और वही इस गीत की सबसे बड़ी खासियत भी हैं. संगीत भी ख़ुद संदीप और उनके भाई संजीव का बनाया हुआ है, बोल भी ख़ुद संदीप और संजीव ने ही रचे हैं. संजय गाधवी की इस फ़िल्म को दर्शकों का प्यार नही मिला, इस साल के हॉट शॉट हीरो इमरान खान की खलनायकी भी इसे डूबने से नही बचा पायी. पर संगीत प्रेमियों के इस बेहद प्रभाशाली संगीत जोड़ी का काम अनदेखा नही होने दिया. "मिट जाए" मिट कर भी नही मिटा, तभी कोई इसे पचासवीं पायदान से नही पाया हटा.


४९ वीं पायदान

४९ वीं पायदान पर है अज़ीज़ मिर्जा के निर्देशन में बनी रोमांटिक फ़िल्म किस्मत कनेक्शन का गीत "कहीं न लागे मन", पहला नशा की तर्ज पर बने इस गीत में वही सवाल है जो हर नया नया प्रेमी ख़ुद से पूछता है यानी - क्या यही प्यार है. थीम वही पुराना है पर गीत फ़िर भी सुनने में मधुर लगता है. शब्बीर अहमद के बोलों को सुरों से सजाया है प्रीतम ने और आवाजें हैं श्रेया घोसाल और मोहित चौहान की. "डूबा डूबा" से शुरुआत करने वाले मोहित अब इंडस्ट्री में अपने पैर जमा चुके हैं, उनकी आवाज़ में मिठास भी है और मौलिकता भी. "कहीं न लागे मन" ने हासिल किया है ४९ वां स्थान, श्रेया और मोहित की आवाजों ने दिया गीत को नया आसमान...



४८ वीं पायदान

अन्विता दत्त गुप्तन के बोलों को विशाल शेखर ने संगीत से सजाया है और गाया है इसी जोड़ी ने विशाल ददलानी ने अपने अलग अंदाज़ में. दोस्ती और दोस्ताने पर पहले भी हिन्दी फिल्मों में ढेरों गीत लिखे जा चुके है. पर ये पूरी तरह से आज के दौर का गीत है. इसकी मौलिकता ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. अभिषेक बच्चन, जॉन अब्राहम और प्रियंका चोपडा के अभिनय से सजी ये फ़िल्म बेहद मनोरंजक है. और ये गीत भी है कुछ विशिष्ट. ४८ वीं पायदान पर जमाया कब्जा दोस्ताना के दोस्ताने ने, फ़िल्म को भी खूब सराहा शहरों के जवानों ने....


४७ वीं पायदान

बच्चों के लिए एक बेहद मनोरंजक फ़िल्म आई थी साल के शुरू में, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक. जिसके लेखक निर्माता और निर्देशक थे कुणाल कोहली. यश राज बैनर के तले बनी ये फ़िल्म कुणाल की पिछली फ़िल्म फ़ना जैसी कमियाबी तो नही पा सकी पर गीत सभी बेहद बेहद अच्छे बने थे इस फ़िल्म के. प्रसून जोशी यहाँ अपने तारे ज़मीन पर वाले फॉर्म में नज़र आए तो शंकर एहसान और लॉय का संगीत भी दमदार रहा, इस मधुर गीत की आवाज़ दी है ख़ुद शंकर महादेवन ने. "प्यार के लिए" थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक मांगता है, इस मधुर गीत में प्रसून में शब्दों का जादू बोलता है.



४६ वीं पायदान

एक कदम और आगे बढ़ते हैं. मुंबई हादसे के बाद इस गीत ने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा. इस साल की एक बेहद चर्चित लीक से हट कर बनी फ़िल्म आमिर ने फ़िल्म निर्माण का एक नया पहलू दुनिया के लिए खोला. गीत को लिखा है अमिताभ वर्मा ने और स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने. अमिताभ वर्मा और शिल्पा राव की के गाये इस गीत में संवेदनाएं उभरकर सामने आती है. "एक लौ" ने रुलाया हर हिन्दुस्तानी को, सबने याद किया शहीदों की कुर्बानी को.


४५ वीं पायदान

जावेद जब्बार की लिखी एक बेहद सशक्त कहानी जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, को निर्देशित किया महरीन जब्बार ने और यकीन मानिये अपने पहली ही निर्देशित फ़िल्म में इस निर्देशक ने कमाल का काम किया है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी की जिसके इस नर्मो नाज़ुक गीत को बेहद उन्दा गाया है शफ़क़त अमानत अली ने. बोल लिखे हैं अनवर मक़सूद ने और संगीतकार हैं देब्याज्योती मिश्रा. "फ़िर वही रास्ते" गीत ने मिटाई सरहदी रेखा, रॉक बैंड फ़ुज़ोन के लीड गायक का एक नया रूप सबने देखा...



४४ वीं पायदान

तारा राम पम और सलाम नमस्ते जैसी फिल्में बनाने के बाद निर्देशक सिद्धार्थ आनंद ने अपनी नई फ़िल्म बचना ऐ हसीनों के लिए चुना रणबीर कपूर और दीपिका पदुकोन की चर्चित रोमांटिक जोड़ी को. हिट संगीत दिया एक बार फ़िर विशाल शेखर ने. अन्विता दत्त गुप्तन ने एक बार फ़िर कलम का जौहर दिखलाया. इस गीत की एक और खासियत है बहुत दिनों में सुनायी पड़ी लक्की अली की आवाज़, साथ में है श्रेया घोसाल. चढ़ता है नशा इस गीत का अहिस्ता अहिस्ता, सुन कर लक्की और श्रेया की मधुर आवाजें होश हो जाते हैं लापता...


४३ वीं पायदान

नीरज श्रीधर और सुनिधि चौहान का गाया "ख्वाब देखे" गीत है इस पायदान पर. संगीतकार हैं प्रीतम और लिखा है इसे समीर ने. इस तेज़ रफ़्तार फ़िल्म का संगीत भी काफी तेज़ रफ़्तार है. सितारों से भरी इस फ़िल्म की खासियत ये है की इस फ़िल्म में सभी किरदार नेगेटिव हैं. "ख्वाब देखे झूठे मूठे" गाया जब सुनिधि ने, जवान दिल झूम उठे वो समां बंधा सुनिधि ने.



४२ वीं पायदान

माँ दा लाडला एक साधारण गीत नही एक स्टेटमेंट है. बेशक फ़िल्म विदेश में शूट हुई है और अजय ब्रहमत जी ने इस कहा कि ये भारतीय परिवेश की फ़िल्म नही है. सही है, पर इस फ़िल्म में एक संवेदनशील मुद्दे को बेहद हलके फुल्के अंदाज़ में दिखाया गया है. बिगड़ रहे हैं कहीं न कहीं माँ दे लाडले अगर हम संकेत समझें इस गीत का. समीर मर्चंट के गाये इस गीत को लिखा है अन्विता दत्त गुप्तन ने और संगीत है एक बार फ़िर विशाल शेखर का. बिगड़ रहे हैं माँ दे लाडले संकेत है ऐसा मिलता, बिन आग के कभी धुवाँ नही उठता...


४१ वीं पायदान

साल की सबसे अन्तिम फ़िल्म गजिनी को मिला संगीतकार ऐ आर रहमान का साथ, प्रसून अपने बेहतरीन फॉर्म में नही हैं यहाँ पर रहमान के प्रिये गायक बेन्नी दयाल और श्रेया ने अपनी आवाजों से इस गीत में जान डाल दी है. फ़िल्म को खासी लोकप्रियता मिल रही है और संगीत भी लोगों की जुबान पे चढ़ रहा है. "कैसे मुझे तू मिल गयी" पुछा जब बेन्नी दयाल ने, गीत को पहुँचाया ४१ वीं पायदान पर रहमान के कमाल ने





चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन - दिसम्बर २००८

Doctor Mridul Kirti - image courtesy: www.mridulkirti.com
डॉक्टर मृदुल कीर्ति

कविता प्रेमी श्रोताओं के लिए प्रत्येक मास के अन्तिम रविवार का अर्थ है पॉडकास्ट कवि सम्मेलन। देखते ही देखते पूरा वर्ष कब गुज़र गया, पता ही न लगा. श्रोताओं के प्रेम के बीच हमें यह भी पता न लगा कि आज का कवि सम्मलेन वर्ष २००८ का अन्तिम कवि सम्मलेन है। आवाज़ के सभी श्रोताओं और पाठकों को नव वर्ष की शुभ-कामनाओं के साथ प्रस्तुत है दिसम्बर २००८ का पॉडकास्ट कवि सम्मलेन। इस बार भी इस ऑनलाइन आयोजन का संयोजन किया है हैरिसबर्ग, अमेरिका से डॉक्टर मृदुल कीर्ति ने।

आवाज़ की ओर से हर महीने प्रस्तुत किए जा रहे इस प्रयास में गहरी दिलचस्पी, सहयोग और आपके प्रेम के लिए हम आपके आभारी हैं। हमें अत्यधिक संख्या में कवितायें प्राप्त हुईं और हमें आशा है कि आप अपना सहयोग इसी प्रकार बनाए रखेंगे। इस बार भी हम बहुत सी कविताओं को उनकी उत्कृष्टता के बावजूद इस माह के कार्यक्रम में शामिल नहीं कर सके हैं और इसके लिए क्षमाप्रार्थी है। कुछ कवितायें तो बहुत ही अच्छी थीं मगर वे हमें अन्तिम तिथि के बाद तब प्राप्त हुईं जब हम कार्यक्रम को अन्तिम रूप दे रहे थे। उनके छूट जाने से हमें भी दुःख हुआ है इसलिए हम एक बार फ़िर आपसे अनुरोध करेंगे कि कवितायें भेजते समय कृपया समय-सीमा का ध्यान रखें और यह भी ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। ऑडियो फाइल के साथ अपना पूरा नाम, नगर और संक्षिप्त परिचय भी भेजना न भूलें क्योंकि हमारे कार्यक्रम के श्रोता अच्छे कवियों के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं।

प्रबुद्ध श्रोताओं की मांग पर सितम्बर २००८ के सम्मेलन से हमने एक नया खंड शुरू किया है जिसमें हम हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कवियों का संक्षिप्त परिचय और उनकी एक रचना को आप तक लाने का प्रयास करते हैं। इसी प्रयास के अंतर्गत इस बार हम सुना रहे हैं एक ऐसे कवि को जिन्हें कई मायनों में हिन्दी का सर्वमान्य कवि कहा जा सकता है। अपने जन्म के ४७६ वर्ष बाद भी इनकी रचनाएं न सिर्फ़ हिन्दी-भाषियों में बल्कि समस्त विश्व में पढी और गाई जाती हैं। उनकी सुमधुर रचनाओं का आनंद उठाईये।

नीचे के प्लेयर से सुनें:


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भूल सुधार: पारुल जी द्वारा गाया गया गीत "भोर भये तकते पिय का पथ ,आये ये ना मेरे प्रियतम, आली" दरअसल श्रीमती लावण्या शाह द्वारा रचित है. लावण्या जी का नाम छूट जाने के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं.
पिछले सम्मेलनों की सफलता के बाद हमने आपकी बढ़ी हुई अपेक्षाओं को ध्यान में रखा है। हमें आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि इस बार का सम्मलेन आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा और आपका सहयोग हमें इसी जोरशोर से मिलता रहेगा। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं तो अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के नववर्ष के पहले अंक का प्रसारण २४ जनवरी २००९ को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है १७ जनवरी २००९

हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हिन्द-युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने इसी बावत एक पोस्ट लिखी है, उसकी मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 6. Month: December 2008.

कॉपीराइट सूचना: हिन्द-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

Saturday, December 27, 2008

वार्षिक गीतमाला से पहले वो गीत वो टॉप ५० में स्थान नही पा सके.

इससे पहले कि हम अपनी वार्षिक गीतमाला का शुभारम्भ करें, कुछ बातें हम साफ़ कर देना चाहेंगें. टॉप ५० गीत को आवाज़ के एक पैनल ने बहुत सोच विचार के बाद चुना है जिसमें मुख्य रूप से चार बातों का ध्यान रखा गया है. गीत का नया पन, गीत की मौलिकता, गीत की रिपीट वैल्यू, और गीत की लोकप्रियता. गौर करें कि गीत की लोकप्रियता इन बताये गए चार घटकों में से एक ही है, अर्थात ये हो सकता है कि कोई गीत बहुत लोकप्रिय होने के बावजूद आपको टॉप ५० से नदारद मिले और कोई गीत बहुत कम सुना गया हो पर अपनी मौलिकता, नयेपन, लंबे समय तक सुने जा सकने की योग्यता के दम पर इस सूची में स्थान प्राप्त कर पाने में सफल रहा हो. गीतों की अन्तिम सारणी हमने अपने सुधी श्रोताओं के वोटिंग के आधार पर निर्धारित की है. अन्तिम दिन टॉप १० गीतों के साथ साथ हम अपने श्रोताओं को वर्ष के ५ गैर फिल्मी गीत भी सुनवायेंगे.

पर इससे पहले कि हम अपने टॉप ५० की तरफ़ बढ़ें सुन लेते हैं १० ऐसे गीत जो पिछले साल बेहद मकबूल हुए पर हमारे टॉप ५० में स्थान नही बना सके.

१०. टल्ली - अगली और पगली - पिछले साल ये गीत खूब बजा पर न तो गाने में कोई नयापन है न ही रिपीट वैल्यू.
९. ठ कर के - गोलमाल रिटर्न - ये फ़िल्म पिछले साल की सबसे कामियाब फिल्मों में से एक है, और इस गीत के फिल्मांकन में पानी की तरह पैसा बहाया गया है. गाने की रिपीट वैल्यू शून्य है.
८. तंदूरी नाइट्स - क़र्ज़ - एक बेहद कामियाब पुरानी फ़िल्म का बकवास रीमेक. फ़िल्म संगीत प्रधान होकर भी हिमेश कुछ भी नया नही कर पाये यहाँ. अब इस बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार को नए सिरे से अपना संगीत प्लान करने की बहुत सख्त ज़रूरत है. ये गीत हालाँकि खूब बजा पिछले साल पर इसकी धुन "रेस" के एक गीत "ज़रा ज़रा" से बहुत मिलती जुलती है हो सकता है दोनों गीत एक ही जगह से "प्रेरणा' लेकर गढे गए हों.
७. रेस सांसों की - रेस - इस फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए संगीतकार ने जम कर यहाँ वहां से धुन उठा कर हिट गीत दिए हैं. गीत सिर्फ़ आपके पैरों को थिरकाता है.
६. सिंग इस किंग - सिंग इस किंग - एक और चुराया हुआ गीत. फ़िल्म अक्षय कुमार के उत्कृष्ट अभिनय के लिए बरसों याद की जायेगी, फ़िल्म का संगीत ओवारोल अच्छा है, पर ये कॉपी गीत चाँद पर दाग जैसा है.
५. फ़िर मिलेंगें चलते चलते -रब ने बना दी जोड़ी - बॉलीवुड को यादगारी देते हुए बहुत गीत बन चुके हैं, फ़िल्म "ओम् शान्ति ओम्" के शीर्षक गीत के बाद ये गीत मात्र नक़ल ही लगता है. नयेपन का अभाव.
४. पहली नज़र में - रेस - बेअकल नक़ल, मौलिकता लेश मात्र भी नही....दुखद.
३. तू है मेरी सोणिये - किस्मत कनेक्शन - थिरकने पर मजबूर करने वाला गीत. पर मौलिकता और रिपीट वैल्यू का अभाव.
२.अक्सा बीच - गोड़ तुसी ग्रेट हो - नयापन नही है गाने में, पर हास्य का अच्छा पुट है शब्दों में और संगीत संयोजन भी उसे बढ़ावा देता है.
१. लेज़ी लम्हें - थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक - शब्द और संगीत का बढ़िया मेल. बेहद करीब रहा ये गीत टॉप ५० के.

सुनिए ये सभी गीत इसी क्रम में और तैयार हो जाईये हमारे टॉप ५० गीतों पर झूमने के लिए -

रफ़िक़ शेख की ग़ज़ल ने ली जबरदस्त बढ़त, छोडा खुशमिजाज़ मिटटी को पीछे

अक्तूबर के अजय वीर गीत हैं फ़िर एक बार आमने सामने, और पहले चरण के तीसरे और अन्तिम समीक्षक की पैनी नज़र है उन पर. देखते हैं कि क्या फैसला उनका-

डरना झुकना छोड़ दे

गीत बेहद प्रभावी है । बोल बढिया हैं । अच्‍छी बात ये है कि ये गीत एक संदेश देता है । संयोजन और गायकी में भी ये गीत एकदम युवा है । क्‍लब मिक्‍स में जो टेक्‍नो इफेक्‍ट्स हैं वो अच्‍छे लगते हैं । लेकिन मुझे लगता है कि पंजाबी तड़का मिक्‍स ज्‍यादा अच्‍छा बन पड़ा है । इसे हम सूफी मिक्‍स कहते तो ज्‍यादा अच्‍छा लगता । अब तक का सर्वश्रेष्‍ठ गीत ।
गीत—पूरे पांच. धुन और संगीत संयोजन-पूरे पॉँच, गायकी और आवाज़-पूरे पांच, ओवारोल प्रस्तुति-पूरे पांच
कुल- २०/२०: १०/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 20.5 / 30

ऐसा नहीं कि आज मुझे चांद चाहिए---

इस ग़ज़ल की शायरी ज़रा कमज़ोर लगी । गायकी और संगीत संयोजन उत्‍तम ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १८/२०: ९/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30


सूरज चांद और सितारे

ये ठीक है कि ये हिंद युग्‍म पर अब तक का सबसे बड़ा ग्रुप है । लेकिन दिक्‍कत ये है कि जिस गीत को चुना गया है वो काफी कमज़ोर है । बोलों और भावों में गहराई नहीं है । गायकी और संगीत-संयोजन अच्‍छा है । मुझे लगता है कि अगर ये बैंड उत्‍कृष्‍ट बोलों वाले गीतों को लेकर प्रस्‍तुत हो तो बहुत संभावनाएं खुल सकती हैं ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-४, गायकी और आवाज़-३, ओवारोल प्रस्तुति-४
कुल- १५/२०: ७.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 22.5 / 30


तेरा दीवाना हूं
आवाज़ अच्‍छी है । पर नज़्म कमज़ोर है । नज़्म के कुछ हिस्‍से अच्‍छे बन पड़े हैं । संगीत संयोजन उम्‍दा ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-५, गायकी और आवाज़-५, ओवारोल प्रस्तुति-५
कुल- १९ /२०: ९.५/१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 27 / 30


ओ साहिबां

गीत को सुनते ही पहली पंक्ति में ही एक बात खटकती है । गायक को नुक्‍तों का अंदाज़ा नहीं है । ख़ामख़ां को ‘खामखां’ और ‘ख़ुमारी’ को ‘खुमारी’ गाने से गीत का मज़ा बिगड़ गया है । संगीत औसत है ।

गीत—४, धुन और संगीत संयोजन-३, गायकी और आवाज़-३, गायकी और आवाज़-३
कुल- १३ /२०: ६.५ /१०, कुल अंक (पहले चरण की समीक्षा के बाद) - 24 / 30

अक्तूबर के गीतों का पहले चरण की परीक्षा को पार करने का बाद अब तक का समीकरण इस प्रकार है -

तेरा दीवाना हूँ - २७ / ३०.
खुशमिजाज़ मिटटी - २५ / ३०.
जीत के गीत - २४.५ / ३०.
सच बोलता है - २४.५ / ३०.
संगीत दिलों का उत्सव है - २४ / ३०.
आवारा दिल - २४ / ३०.
ओ साहिबा - २४ / ३०
ऐसा नही - २४ / ३०.
सूरज चाँद और सितारे - २२.५ / ३०.
चले जाना - २१.५ / ३०.
तेरे चहरे पे - २१ / ३०.
डरना झुकना - २०.५ / ३०.
बेइंतेहा प्यार - २०.५ / ३०.
बढे चलो - २० / ३०.
ओ मुनिया - १९.५ / ३०.
मैं नदी - १९ / ३०.
राहतें सारी - १८ / ३०.
मेरे सरकार - १६.५ / ३०.



सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'मन्त्र'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'मन्त्र'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना ''दूसरी शादी'' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी "मन्त्र", जिसको स्वर दिया है लन्दन निवासी कवयित्री शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 31 मिनट और 38 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

कल हम आपके लिए लेकर आ रहे हैं दिसम्बर महीने का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन, इसी जगह, इसी समय - सुनना न भूलें!
मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८३१-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

 बूढ़े मॉँ-बाप के जीवन का यही एक आधार था। इसी का मुँह देख कर जीते थे। इस दीपक के बुझते ही जीवन की अँधेरी रात भॉँय-भॉँय करने लगी। बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी।
(प्रेमचंद की "मन्त्र" से एक अंश)

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#Nineteenth Story, Mantra: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/18. Voice: Shanno Aggarwal

Friday, December 26, 2008

मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी...

दूसरे सत्र के २६ वें गीत विश्वव्यापी उदघाटन आज

दोस्तों आज यूँ तो हमारे नए गीतों के प्रकाशन के इस वर्तमान सत्र का अन्तिम शुक्रवार है पर इस प्रस्तुत गीत को मिलकर हमारे पास ३ प्रविष्टियाँ हैं ऐसी जो इस सत्र में अपना स्थान बनाना चाहती है, जिनका प्रकाशन हम क्रमश आने वाले सोमवार और बुधवार को करेंगें यानी कि सत्र का समापन २८ वें गीत के साथ होगा जो वर्ष की अन्तिम तारिख को प्रकाशित होगा, फिलहाल आनंद लेते हैं २६ वें गीत का. ये संयोग ही है की पिछले सत्र के अंत में भी जिस कलाकारा ने आकर अपनी आवाज़ और गायकी से सबके मन को चुरा लिया था उसी युवा संगीतकार/गायिका के दो नए गीत हैं दूसरे सत्र के अन्तिम ३ गीतों में भी.पिछले सत्र में भी आभा मिश्रा और निखिल आनंद गिरी की जोड़ी ने "पहला सुर" एल्बम दो खूबसूरत ग़ज़लें दी थी. कुछ श्रोताओं ने हिदायत दी थी कि यदि उन ग़ज़लों का संगीत संयोजन अच्छा होता तो और बेहतर होता. इस बार इसी कमी को दुरुस्त करने के लिए हमने सहारा लिया युग्मी संगीतकार साथी रुपेश ऋषि का. तो दोस्तों हिंद युग्म गर्व के साथ प्रस्तुत करता है एक बार फ़िर आभा मिश्रा को, जिन्होंने इस गीत को न सिर्फ़ अपनी आवाज़ दी है, वरन इसकी धुन भी उन्होंने ख़ुद बनाई है, संयोजन है रुपेश ऋषि का और गीत के बोल लिखे हैं निखिल आनंद गिरी ने. सुनें और बतायें कि कैसी लगी आपको हमारी ये ताज़ातरीन प्रस्तुति.

सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -






Song # 26, marks the return of very talented composer/singer of Hind Yugm family, Abha Mishra is here again along with lyricist Nikhil Anand Giri, and for their first song for this present season "mujhe waqt de jindagi" music arrangement has been done by our very own Rupesh Rishi. So guys, listen to this brand new song from this great musical "jodi", and do let us know what you feel about this new offering from Hind Yugm Awaaz.

To listen, please click on the player -




Lyrics - गीत के बोल -

मुझे वक्त दे मेरी जिंदगी, तेरा हाथ थामे चल सकूं,
मुझे भर ले मेरी मांग में, कि न रेत बन के फिसल सकूं,
मुझी वक्त दे, मुझे वक्त दे.....

अभी रौशनी की न बात कर, मैं हूँ आंसुओं से घिरा हुआ,
मेरे यार मुझको दे हौसला, मैं हूँ आंसुओं से घिरा हुआ....
मेरे आंसुओं में वो बात हो, लिखा वक्त का भी बदल सकूं...
मुझे वक्त दे....मुझे वक्त दे.....

अभी हूँ सवालों की क़ैद में, कई उलझनें, मजबूरियाँ,
अभी रहने भी दे ये दूरियां, कई उलझनें, मजबूरियां...
अभी उस मुकाम पे हूँ खड़ा, कि न गिर सकूं, न संभल सकूं,
मुझे वक्त दे.....मुझे वक्त दे....

मुझे एक रात नवाज़ दे, तुझे मैं खुदा-सा प्यार दूँ,
गुनाह सारे उतार दूँ, तुझे मैं खुदा-सा प्यार दूँ...
मुझे मां की तरह गोद में, तू चूम ले, मैं मचल सकूं....
मुझे वक्त दे, मुझे वक्त दे.....

SONG # 26, SEASON # 02, "MUJHE WAQT DE MERI JINDAGI", OPENED ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ HInd Yugm, Where music is a passion.



Thursday, December 25, 2008

सुनिए हरिवंश राय बच्चन की बाल कविता 'रेल'

बच्चो,

पिछले सप्ताह से आपके लिए नीलम आंटी कविताओं को सुनाने का काम कर रही हैं। हरिवंश रा बच्चन की कविता 'गिलहरी का घर' आप सभी ने बहुत पसंद किया। आज सुनिए बच्चन दादा की ही कविता 'रेल'। ज़रूर बताइएगा कि कैसा लगा?



Baal-Kavita/Harivansh Rai Bachchan/Rail

Wednesday, December 24, 2008

आयी फरिश्तों की मीठी आवाज़...मैरी क्रिसमस

इस क्रिसमस पर शास्त्री जे सी फिलिप का विशेष संदेश

दुनिया में लगभग हर कौम को कभी न कभी गुलामी देखनी पडी है. और लगभग हर कौम ने गुलामी करवाने वालों के विरुद्ध बगावत की है. ऐसी ही एक खुनी बगावत के लिए मशहूर है कौम यहूदियों की भी.

ईस्वी पूर्व 42 की बात है, धनी यहूदियों पर एक शक्तिशाली गैर-यहूदी का राज्य हो गया. हेरोद-महान नामक यह गैर-यहूदी राजा जानता था कि यहूदियों से लोहा लेना आसान नहीं है अत: उसने हर तरह से यहूदियों को प्रसन्न रखा. राजकाज ठीक से चलता रहा. लेकिन लगभग तीन दशाब्दी राज्य करने के बाद उसके राज्य की नींव हिलने लगी. उसने अपनी शक्तिशाली गुप्तचर सेना की सहायता से हर शत्रु का उन्मूलन कर दिया और राज्य अपने हाथ से न जाने दिया.

उसकी क्रूरता के कारण यहूदी फिर दब कर रहने लगे. रहस्यमय राजनैतिक हत्यायें चलती रहीं और उसके परिवार के कई प्रतिद्वन्दी एक एक करके लुप्त होने लगे. हेरोद और उसकी गुप्तचर सेना के मारे हर कोई थर्राता था. अचानक एक दिन एक दुर्घटना हुई और हर यहूदी का कलेजा मुँह को आ गया.

उस दिन यहूदियों के देश के पूर्वी देशों से विद्वानों का एक बडा काफिला हेरोद-महान के दरबार पहुंचा और बताया कि एक नये राजा का जन्म हुआ है और आसमान में उदित एक नया तारा इसका चिन्ह है. यह चिन्ह देख हेरोद एकदम डर गया. वह लगभग 75 साल की उमर का हो गया था और उसके हाथ से राज्य के छिन जाने के डर के कारण वह अपने परिवार, मित्र, और राज्य में हर संभावित प्रतियोगी की रहस्य में हत्या करवा चुका था. अचानक अब कौन पैदा हो गया!

इस बीच सारे यहूदी बुरी तरह घबरा गये क्योंकि राजपरिवार में कोई बच्चा नहीं जन्मा था और वे समझ गये कि इस खबर के कारण किसी आम परिवार के बच्चे पर तलवार गिरने वाली है.

हेरोद समझ गया कि नक्षत्र जरूर किसी यहूदी राजपुत्र के जन्म की खबर लेकर आया है. उसने यहूदियों के पंडितों को बुलाया जिन्होंने इस बात की पुष्टि की कि वे एक राजाधिराज के जन्म का इंतजार कर रहे हैं और उनका पदार्पण "बेतलेहेम" नामक यहूदी गांव में होगा. हेरोद बहुत चालाक था. उस ने विद्वानों को रहस्य में बुलाकर तारे के उदय होने की तारीख एवं उस बालक की संभावित उमर वगैरह की जानकारी लेकर विद्वानों को बेतलेहेम गांव की ओर भेज दिया. उनसे यह भी कहा कि जब वे बालक का पता लगा कर उसे दंडवत कर लें तो उसके ठिकाने की खबर बादशाह को भी दें जिससे वे भी जाकर बालक को माथा टेक आयें.

विद्वान लोग जैसे ही उस सुदूर गांव की ओर चल दिये कि अचानक वह तारा पुन: आकाश में दिखने लगा और इस बार उनके आगे आगे उस गांव की ओर चलने लगा जिस के बारे में यहूदियों के पंडितों ने इशारा किया था. बेतलेहेम पहुंच कर वह तारा उस घर के उपर ठहर गया जहां मुक्तिदाता ईसा अपने माँ-बाप के साथ थे. उनकी उमर दो साल होने ही वाली थी.

पूर्वी देशों से पधारे विद्वानों ने अपने ऊंटों के ऊंटों के काफिले से उतर कर ईसा के समक्ष माथा टेका और महाराजाधिराजों के लिये उपयुक्त कुंदन, लोहबान, और गंधरस भेंट किया. अनुमान है कि लोहबान और गंधरस हिन्दुस्तान से (हिमालय से) ले जाये गये थे. ईसा के मांबाप ने उनको बताया कि वे ईश्वरीय प्रेरणा से ईसा को माथा टेकने के लिये पधारे दूसरे झुंड हैं. पहला झुंड गडरियों का था जो एक आसमानी वाणी सुन कर लगभग दो साल पहले ईसा के जन्म के दिन उनके दर्शन के लिये आये थे.

विद्वान लोग वापसी की तैयारी कर रहे थे कि उनको ईशवाणी हुई के वे हेरोद बादशाह के पास वापस न जायें क्योंकि उसका लक्ष्य ईसा का दर्शन नहीं बल्कि हत्या करवाना है. ईशवाणी के कारण वे बादशाह के पास जाने के बदले सीधे अपने देश चले गये. इस बीच ईसा के पितामाह को ईशवाणी हुई कि हेरोद बादशाह ईसा की हत्या की सोच रहे हैं. इस दिव्य वाणी को सुन वे लोग ईसा को लेकर चुप के से मिस्र देश चले गये.

विद्वानों की वापसी के इंतजार में बैठे बादशाह को आखिर उनके गुप्तचरों ने आकर खबर दी कि जीजान कोशिश करने के बावजूद किसी अनजान कारण से वे न तो विद्वानों पर नजर रख सके, न ही बालक ईसा का घर ढूंढ सके. इसे सुन कर हेरोद के क्रोध का पारा ऐसा चढा कि उसने आज्ञा दी कि यहूदियों के दो साल से कम उमर के सारे बालकों को तलवार के घाट उतार दिया जाये. तारे के उदय होने का समय उसने विद्वानों से पूछ लिया था और उस आधार पर उसका अनुमान था कि ईसा उस समय दो साल से कम उमर के थे.

यहूदियों के सारे गांवों और नगरों में हाहाकार मच गया जब सैनिकों ने निर्दयता से एक एक घर पहुंच कर दो साल व उस से कम उमर के सारे बालकों को निर्दयता के साथ तलवार के घाट उतार दिया. इस तरह हेरोद बादशाह को बडा सकून मिला कि अब उनका राय उन से कोई भी छीन न सकेगा. लेकिन अचानक एक घटना हुई.

बादशाह को एक एक करके कई प्रकार के असाध्य रोगों ने घेर लिया. खाल फट कर रिसने लगा. वह मानसिक रूप से विक्षिप्त भी होने लगा. लोगों को ऐसा लगने लगा कि कोई पागल मानवनुमा जंगली जानवर अब उन पर राज्य कर रहा है. मुश्किल से एक साल नहीं बीते कि उसके बदन में कीडे पड गये और अचानक एक दिन वह "महान" बादशाह न रहा.

इस बीच ईसा को कोई हानि न हुई एवं तीस साल की उमर तक वे अपने मांबाप के साथ रहे. उनके पितामाह इमारती लकडी का कार्य करते थे जो कि उस जमाने में श्रमसाध्य कार्य होता था. ईसा ने हर तरह से इस कार्य में अपने परिवार का हाथ बटाया. लेकिन इस बीच धर्म और दर्शन में उनके अगाध ज्ञान को देख कर लोग चकित होने लगे थे क्योंकि ईसा किसी भी प्रकार के गुरुकुल में नहीं गये थे. उनकी मां इस बात को जानती थी, लेकिन बाकी अधिकतर लोग इस बात को समझ नहीं पाये थे कि जिस धर्म एवं दर्शन का स्रोत परमात्मा स्वयं हैं, उसे सीखने के लिये ईसा को किसी का शिष्य बनने की जरूरत नहीं थी.



तीस साल की उमर में वे सामूहिक सेवा के लिये निकल पडे और साढे तीन साल में अपना लक्ष्य पा लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि यहूदियों ने उनको रहस्यमय तरीके से पकडवा दिया और सूली पर टंगवा कर उनकी हत्या करवा दी. लेकिन जैसा यहूदियों के शास्त्रों में कई बार भविष्यवाणी हुई थी, ईसा अपनी मृत्यु के तीन दिन बाद पुनर्जीवित हो गये और चालीस दिन तक जनसाधारण को दर्शन एवं प्रवचन देते रहे. इस बीच उनके हत्यारों के बीच बडी बेचैनी और खलबली मच गई, लेकिन उन्होंने ईसा पर पुन: हाथ डालने की कोशिश न की. इन चालीस दिनों के पश्चात वे स्वार्गारोहण कर गये.



इस घटना के लगभग दो सहस्त्र साल के बाद की स्थिति जरा देखें! आज महान बादशाह हेरोद को कोई नहीं जानता. इस लेख को लिखने के पहले मुझे विश्वकोश में देखकर उनके बारे में सीखना पडा. लेकिन आज ईसा का नाम हर कोई जानता है.यहाँ तक की जिन (लगभग) गुमनाम विद्वानों ने ईसा को माथा टेका, वे आज भी अमर हैं क्योंकि क्रिसमस या ईसाजयंती पर जो कार्ड भेजे जाते हैं उन में अकसर ऊंटों पर सफर करते इन विद्वानों का चित्र दर्शाया जाता है. इतना ही नहीं, ईसा के जन्म के दिन जिन गुमनाम गडरियों को ईसा के जन्म के बारे में खबर दी गई थी उनका चित्र भी अकसर क्रिसमस-कार्ड पर दर्शाया जाता है. यह ईसा की शिक्षा को बहुत ही सुंदर तरीके से प्रदर्शित करता है कि मनुष्य क्या है इससे वह महान नहीं बनता, बल्कि ईश्वर के साथ उसका क्या नाता है उस पर सब कुछ आधारित रहता है. जो कोई दूसरों से उसका हक छीन कर बडा बनना चाहता है वह मटियामेट हो जाता है. यह भी ईसा की शिक्षा में हम देखते हैं.

आज सारी दुनियां में लोग ईसाजयंती मना रहे हैं. अपनी सुरक्षा के लिये जब एक व्यक्ति लोगों से उनका जीवन छीन रहा था तब ईसा ने लोगों को शाश्वत जीवन प्रदान के लिये अपना जीवन कुर्बान कर दिया था. यह है इस साल ईसाजयंती पर हम सब के लिये एक चिंतनीय संदेश.


आईये क्रिसमस का स्वागत करें इस गीत के साथ - (सौजन्य - मसीही गीत डॉट कॉम)



प्रस्तुति - शास्त्री जे सी फिलिप

सुनिए श्रीलाल शुक्ल की व्यंग्य कहानी 'काश'

श्रीलाल शुक्ल के एक व्यंग्य 'काश' का प्रसारण

'सुनो कहानी' के अंतर्गत आज हम आपके लिए लेकर आए हैं श्रीलाल शुक्ल का एक व्यंग्य काश। इस व्यंग्य में प्रशासनिक कार्य व्यवस्था पर प्रहार करते हुए आकस्मिक दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की स्थिति का बड़ा सजीव चित्रण किया गया है जो आपको हंसाता भी है और सताता भी है। आईये सुनें  "काश", जिसको स्वर दिया है शोभा महेन्द्रू ने। शोभा जी का नाम आवाज़ के श्रोताओं के लिए नया नहीं है। उनकी रचनाएं हमें हिंद-युग्म पर पढने को और पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में सुनने को मिलती रही हैं। शिक्षक दिवस के अवसर पर हमने प्रेमचंद की कहानी प्रेरणा को शोभा जी के स्वर में प्रस्तुत किया था। इसके अलावा शोभा जी की आवाज़ को विमल चंद्र पाण्डेय की कहानी 'स्वेटर' के नाट्य रूपांतर में और मन्नू भंडारी की कहानी अकेली में भी बहुत पसंद किया गया था. सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

नीचे के प्लेयर से सुनें:
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आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं, तो यहाँ देखें।


आवाज़ पर आगामी आकर्षण:
शनिवार, दिनांक २७ दिसम्बर २००८: प्रेमचंद की अमर कहानी "मन्त्र"
रविवार, दिनांक २८ दिसम्बर २००८: पॉडकास्ट कवि सम्मेलन

#Suno Kahani, Story, Kaash: Shreelal Shukla/Hindi Audio Book. Voice: Shobha Mahendru

Tuesday, December 23, 2008

अपनी पसंद के साल 2008 के टॉप 10 गीत बतायें

आपकी नज़र में ऐसे कौन से 50 गाने हैं जो हमेशा सुने जायेंगे?

हिन्द-युग्म के आवाज़ मंच पर आपने पूरे वर्ष गीतों का, गीत से जुड़ी बातों का आनंद लिया। महान कलाकारों से मिले। अपने 25 गीतों को एक-एक करके हिन्द-युग्म ने भी रीलिज किया। वर्ष 2008 के खत्म होने में अब बस एक सप्ताह शेष हैं। साल के अंत में देश का हर बड़ा-छोटा मनोरंजन उद्यम वर्ष भर में रीलिज हुए फिल्मी गीतों का काउंट-डाउन ज़ारी करता है। हमने भी सोचा कि इस तरह का एक प्रयास हिन्दी वेबसाइट की ओर से भी होना चाहिए। जबकि हिन्द-युग्म साल भर गीत-संगीत की बात कर रहा है, तब तो हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी बन जाती है।

तो हिन्द-युग्म की आवाज़ टीम ने यह निर्णय लिया कि वर्ष 2008 के अंतिम 5 दिनों में (मतलब 27, 28, 29, 30 और 31 दिसम्बर 2008 को) शीर्ष 50 गीतों का काउंटडाउन चलायेगा। आवाज़ की टीम ने शीर्ष 50 गीतों का काउँटडाउन बनाते वक़्त इस बात का ध्यान रखा कि वो गीत चुने जायें, जिन्हें हो सकता है कि रेडियो/टीवी पर कम बजाया गया हो, लेकिन उनकी उम्र लम्बी हो। जैसाकि बहुत से ब्लॉगरों ने इस बात का खुलासा किया था कि इस साल के बहुत से चर्चित गीतों की धुन विदेशी धुनों की शत-प्रतिशत नकल है। तो ऐसे गीतों को इस गीतमाला में नहीं शामिल किया गया है। काउट-डाउन चलाने से पूर्व हम अंतिम 50 गीतों और उनके क्रम पर पुनर्विचार करना चाहते हैं। हम चाहते हैं आप भी हमें अपनी पसंद बतायें।



कृपया नीचे के फॉर्म से अपनी पसंद बतायें ताकि इस गीतमाल का क्रम निर्धारण हो सके।





जब अक्टूबर के अजय वीर गीत दूसरी बार भिडे...

किन्हीं कारणों वश हम अपनी समीक्षाओं की प्रस्तुति में कुछ पीछे छूट गए थे. पर कोशिश हमारी रहेगी कि जनवरी के पहले सप्ताह के अंत तक हम इस सत्र के सभी गीतों की पहले चरण की समीक्षा और अंक तालिका आपके समुख रख सकें. तो सबसे पहले नज़र करें कि क्या कहते हैं हमारे दूसरे समीक्षक अक्टूबर के अजय वीर गीतों के बारे में -

डरना झुकना छोड दे, सारे बंधन तोड दे..

इस अच्छे गीत की शुरुआत में ही गायकों से हारमोनी के सुरों में गडबड हो गयी है.सुरों की पकड किसी भी सूरत में स्थिर हो नही पाती, जिसकी वजह से आगे चल कर भी गीत प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है. जोगी सुरिंदर और अमनदीप का गला तरल ज़रूर है, मगर इस गफ़लत की वजह से पेरुब द्वारा रचे गये सुरों के इस अज़ीम शाहकार में बॆलेंस नहीं रह पाता.

इसी वजह से पंजाबी तडके में भी स्वाद में उतना जायका नही ले पाता सुनने वाला श्रोता, जो आगे चलकर थोडा सुरीला ज़रूर हो जाता है.मगर कर्णप्रिय या लोकप्रिय होना याने गुणवता में उच्च कोटी का होना यह समीकरण नहीं है, कम से कम मेरे विचार से.सुर और ताल किसी भी गाने के मूल तत्व हैं, और इसमें कमी-बेशी पूरे गीत के स्ट्रक्चर को विकलांग बनाता है.

यूं नहीं की इसमें कोई अच्छाई नहीं है. शुरुआत की संयोजन में हुई कमी के बावजूद गायको के वोईस थ्रो और उर्जा का भंडार असीमित लगता है.गायकों में उम्मीद की किरण नज़र आती है.

मगर एक बात की तारीफ़ किये बगैर समीक्षा पूर्ण नही होगी. सजीव सारथी द्वारा लिखे इस गीत के बोलों में जो आग का, चेतना का प्रस्फ़ुटन हुआ है, उसकी वजह से युवा मन के विद्रोह के स्वर और जोश के तूफ़ान की अभिव्यक्ति अचूक हो पाई है.इस तरह के गीतों से रसोत्पत्ति के माध्यम -संगीत और स्वर का शुद्ध समन्वय हमें सुनने को मिलता है.

इसीलिये,यह गीत खत्म होने के बाद भी मन के पीछे याद के किसी कोने में सहज कर रखा गया और बाद में भी किसी दूसरे कार्य के बीच जुगाली की तरह हमारे कानों के इंद्रियों के समक्ष रिकॊल हो जाता है. चलो ये भी क्या कम है.

गीत - 3.5, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 14.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 10.5/20

ऐसा नही के आज मुझे चांद चाहिये..

शिवानी द्वारा लिखा गया यह गीत बेहद श्रवणीय बन पडा है, इसका पूरा श्रेय संगीतकार ऋषि को जाता है. इस गीत के हर शब्द में छिपी हुई वेदना को प्रतिष्ठा की मासूमियत भरी आवाज़ नें अच्छी तरह से उभारा है.

मगर उनकी आवाज़ के लोच और माधुर्य के साथ साथ स्वर नियंत्रण और सुरों पर ठहरने चलने की सरगम यात्रा का एक सुर से दूसरे पर जाने का सफ़र थोडा़ और सुरीला होता तो इस प्रस्तुति को अधिक अंक मिल सकते थे.गीत को कालजयी बनने में इन सभी का योगदान होता है, तब कहीं जाकर गीत आपके जेहन में हमेशा के लिये कैद हो जाता है.

फ़िर भी ऋषि के स्वरों के और वाद्यों के चयन, इंटरल्युड में हारमोनी के पुट की वजह से मैं तो इसे बार बार सुन रहा हूं, और नारी हृदय के भावों में मन की निश्छलता प्रतिष्ठा जी की आवाज़ से निकल कर सीधे आपके मन की गहराई में जाती है, और आप उसके सुख दुख में एकाकार हो जाते है. चांद की ख्वाहिश ना रख कर विश्वास को प्राधान्यता देना अपने आप में एक बडी बात कह जाती है इस गीत का भावार्थ, जिसके लिये गीतकार को साधुवाद.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 3.5, प्रस्तुति - 4, कुल - 15.5 ; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/२०

सूरज चांद और सितारे

कृष्णा पंडित और साथियों द्वारा यह गीत बडे ही जोश और जुनून से गाया है. इस रॊक गीत की शुरुआत से ही जो रिदम की उर्जा का स्रोत फूट पडा है, वह गीत के बोलों को समर्थन करते हुए युवा स्पंदन का प्रतिनिधित्व करता है.

गीत के बोल जिस तरह इस धुन में संजय द्विवेदी नें पिरोये है,या जिस तरह से संगीतकार चैतन्य भट्ट नें इन नई पीढी की भावनाओं के प्रतिबिंब गीतों के बोलों को अपनी गतिवान धुन से चैतन्य बनाया है, दोनो ही बधाई के पात्र है.

मगर गायक समूह इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी इस द्रुत लय के गीत में टेम्पो पकडने में कहीं कहीं पिछड़ जाते है,या फ़िर कहीं कहीं समय पर सम पर पहुंचने के लिये शब्दों को अस्पष्ट या जल्द डिलेवर कर जाते है.

फिर भी धुन की आकर्षकता और ऑवरोल प्रस्तुती इसे पार पहूंचा देती है,और यादगार भी बना देती है.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 3.5, गायकी - 4, प्रस्तुति - 3.5, कुल - 15; 7.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 15/20.

आखरी बार बस.

प्रस्तुत गीत के हर पहलू में एक उत्तमता , उत्तुंगता और गहराई के दीदार होते है, इसमें कोई शक नहीं. मोईन नज़र नें लिखे इस प्रसिद्ध गज़ल के हर शब्द का अपना खुद का वज़्न और सौंदर्य है, जो विरह की इन्तेहां का खूब बयां करता है, साथ ही एक उम्मीद का शेड़ दिखा जाता है. ऐसी गज़ल कृति को स्वर बद्ध कर पाना और निभा जाना कठिन है, जो संगीतकार रफ़ीक शेख़ नें सहजता से और बखूबी निभाया है.

साथ ही उनका गायन गीत को और मेलोडियस,श्रव्य एवं सुकून भरा बना जाता है. उनकी जादुई आवाज़ सधी, नियंत्रित , गज़ल गाने को पूरी तरह मुआफ़िक और मॊड्युलेशन के कणों से भरपूर है. फ़िल्मी संगीत या रेकोर्डेड नॊन फ़िल्मी गीत या गज़ल की सारी खूबियां अपनें में समाये हुए इस गीत की रिपीट वॆल्यु भी साबित होती है जब मन इस गज़ल को सुनने को फिर मांग उठता है.

वैसे इस तरह की तर्ज़ काफ़ी परिभाषित लगती है, और किसी आश्चर्य या अनूठेपन से मरहूम होने से युवाओं के आज की पीढी की मान्यताओं और मांगों को शायद ही पूर्ण कर पायेगी. मगर फ़िर वही बात- कर्णप्रियता या मधुरता में कोई ट्विस्ट की दरकार नही हो सकती. शायद इसीलिये, ऐसी धुनें काल के थपेडों को भी झेल जाती है, और लंबी दूरी का घोडा़ साबित होती है.यकीन ना हो तो फ़िल्मी गीतों का इतिहास पलट कर चेक कर लिजिये.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4.5, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 17; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/20

ओ साहिबा

विश्वजीत एक अच्छे गायक है, और इस गीत में अलग अंदाज़ में अलग जॊनर का गीत बखूबी गाया है. इस गीत का यु एस पी भी यही मुख्त़लिफ़ अंदाज़े बयां है. थोडा और परिश्रम कर स्वरों के ठहराव पर ज़्यादा ध्यान देते तो और चार चांद लग जाते.

सजीव सारथी हमेशा की तरह यहां एक मुख्त़लिफ़ सा विचार लेकर निराला माहौल रचते है. उनके तरकश में शब्दों के तीर भरे हुए है,और सही जगह सही और उचित शब्दों को रखनें में महारत हासिल कर चुके है. उनके बोलों में क्लिष्टता के अभाव की वजह से,और मीटर में घड़न होने की वजह से गेत के गेय बनने के कारण, इस फ़्रंट पर गीत के गायक और संगीतकार को बंदिश में सरलता और तरलता दोनो का लाभ दे जाती है. दिन के जलने का और रात के बुझने का मौलिक खयाल मन मोह लेता है .(कब जले दिन यहां और कब बुझे रातें...) बहूत खूब.

यही बात सुभोजित के बारे में भी कही जा सकती है.गाने के संगीत का एक अपना रिदम है,चैतन्य है.उन्होनें अपनी तरफ़ से से कहीं भी गाने को सुरों द्वारा या वाद्यों द्वारा लाऊड़ नहीं होने दिया है. बेकरारी और खुमारी का चित्रण सुरों के ब्रश से स्ट्रोक देकर रंगा गया है. मन की उहापोह की स्थिति ज़रूर ग्रुप वायोलीन (सिन्थेसाईज़र) के घुमावदार सरगम की मदत से दिखाया है, मगर वह भी नियंत्रित.

गीत - 4, धुन व् संगीत संयोजन - 4, गायकी - 4, प्रस्तुति - 4.5, कुल - 16.5 ; 8.5/10,
कुल अंक अब तक (दो समीक्षाओं के बाद) - 17.5/२०

Monday, December 22, 2008

सुनिए मुकेश के गाये दुर्लभ गैर फिल्मी ग़ज़लों का संकलन


महान गायक मुकेश के बारे में हम आवाज़ पर पहले भी कई बार बात कर चुके हैं. संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर जी का संस्मरण हमने प्रस्तुत किया था, साथ ही मशहूर संगीत विशेषज्ञ संजय पटेल जी ने उन पर एक विशेष प्रस्तुति दी थी, तो तपन शर्मा जी ने आप सब के लिए लेकर आ चुके हैं उनका जीवन परिचय और संगीत सफर की तमाम जानकारियाँ. हमारे कुछ श्रोताओं ने हमसे फरमाईश की, कि हम उन्हें मुकेश जी के गाये कुछ गैर फिल्मी गीतों और ग़ज़लों से भी रूबरू करवायें. तो आज हम अपने श्रोताओं के लिए लेकर आए हैं, मुकेश की गैर फिल्मी ग़ज़लों का एक नायाब गुलदस्ता...

सुनिए और आनंद लीजिये -

Sunday, December 21, 2008

कहाँ है जरुरत रीमिक्स गीतों की...

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (7)

ऐ आर आर ने फ़िर किया करिश्मा

ऐ आर रहमान ने फ़िर ये कर दिखाया. ब्रिटिश निर्देशक डैनी बोयले की फ़िल्म "स्लम डोग मिलेनियर" के लिए उनके संगीत को अंतर्राष्ट्रीय प्रेस एकेडमी का सेटालाइट पुरस्कार प्राप्त हुआ है. फ़िल्म पूरी तरह से मुंबई में शूट हुई है और एक साधारण सी बस्ती में रहने वाले १८ साल के अनाथ लड़के की एक "गेम शो" में भाग लेकर करोड़पति बनने की बेहद दिलचस्प कहानी कहती है. सर्वश्रेष्ठ संगीत के आलावा फ़िल्म ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार भी जीता है. गौरतलब है कि रहमान का ये संगीत गोल्डन ग्लोब पुरस्कार के लिए भी नामांकित हुआ है. वहां भी अपने रहमान बाज़ी मारे हम तो यही कामना करेंगें.


कुछ ख़ास है नेहा में


एक संगीत चैनल की विजेता रही और पूर्व "वीवा" बैंड की गायिका नेहा इन दिनों बेहद खुश है. फ़िल्म "फैशन" के लिए उनका गाया गीत "कुछ ख़ास है..." बेहद चर्चा में जो है आजकल. और इसी के साथ दिल्ली की कुडी नेहा भासिन का संगीत कैरियर अब उठान पकड़ चुका है. ओनिर कि अगली फ़िल्म "किल छाबरा" के लिए भी वो गा रही हैं संगीतकार गौरव दयाल के निर्देशन में. पर नेहा अभी भी तलाश में है उस जबरदस्त गीत की जो उन्हें शिखर तक ले जाए. वो दिन भी दूर नही हैं ....नेहा..


रीमिक्स गुरु अकबर सामी की वापसी

रीमिक्स गीतों की हमें क्यों जरुरत पड़ती है. जब कोई संगीतकार किसी फ़िल्म या एल्बम के लिए गीत बनाते हैं तो वो वाध्य यंत्रों का पार्श्व में केवल उसी मात्रा में इस्तेमाल करते हैं जिससे कि बोलों की सरलता, धुन की तरलता और आवाज़ की मधुरता बनी रही और वाध्यों के शोर में कहीं गीत की आत्मा खो न जाए. पर बदलते समय में सोशल पार्टियाँ लोगों के व्यस्त जीवन से एक राहत का काम कर रही हैं. अब इन पार्टियों में लोगों को झूमने और नाचने के लिए भी संगीत चाहिए. इसी उद्देश्य से रीमिक्स और DJ परम्परा की शुरुआत हुई. जहाँ गीत वही लिए जाते हैं जो लोगों ने सुने हुए होते हैं ताकि नाचने वालों को कुछ भाव मिल सके और संगीत में कुछ अतिरिक्त पर्कशन और जोड़ तोड़ का तड़का लगा कर लोगों को नचाने का प्रबंध किया जाता है. अब ये कितना सही है कितना नही इसका फैसला हम आप पर छोड़ते हैं वैसे झूमने और नाचने के लिए कुछ ऐसे देसी गीत भी होते हैं जिनको हम शायद भूल से गए हैं...खैर तो बात रीमिक्स गीतों की हो रही थी, यहाँ ये भी बहुत ज़रूरी है कि किन गीतों को रीमिक्स के लिए इस्तेमाल किया जाए...पर फिलहाल यहाँ इस प्रकार की कोई चुनाव प्रक्रिया मौजूद नही दिखती है तभी तो कुछ बेहद दर्द भरे संवेदनशील गीतों का बेहद फूहड़ तरीके से रीमिक्स कर मार्किट में उतरा जाता है. भारत में इस परम्परा के गुरु रहे डी जे अकबर सामी ने बरसों पहले जब अपना रीमिक्स एल्बम "जलवा" प्रस्तुत किया था तब इस बात की जरुरत की तरफ़ इशारा किया था. एक लंबे अंतराल ९लग्भग ५ साल) के बाद सामी लौटे है अपने नए रीमिक्स एल्बम "जलवा रिटर्न्स" के साथ. एक बार फ़िर आर डी के हिट गीतों को इस एल्बम में शामिल किया गया है. रीमिक्स के शौकीन अपनी पार्टियों के लिए इसे खरीद सकते हैं. बाकी संगीत प्रेमियों के लिए मूल गीत तो है ही....

Saturday, December 20, 2008

सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'दूसरी शादी'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'दूसरी शादी'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने लन्दन निवासी कवयित्री शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में प्रेमचंद की रचना 'पूस की रात' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की कहानी "दूसरी शादी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 5 मिनट और 19 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८३१-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

जब तक यह कलंक हमारी कौम से दूर नहीं हो जाता, मैं हर्गिज, कुंवारी तो दूर की बात है, किसी विधवा से भी ब्याह न करूंगा। (प्रेमचंद की "दूसरी शादी" से एक अंश)


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#Eighteenth Story, Shadi Ki Vajah: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2008/17. Voice: Anurag Sharma

Friday, December 19, 2008

सारी बस्ती निगल गया है (नई धुन, नई ग़ज़ल)

दूसरे सत्र के २५वें गीत के रूप में सुनिए एक ग़ज़ल


कुमार आदित्य
नाज़िम नक़वी
हम वर्ष २००८ के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। हिन्द-युग्म की बड़ी उपलब्धियों में से एक उपलब्धि यह भी रही कि ४ जुलाई से अब तक हमने हर शुक्रवार एक नया गाना रीलिज किया। अब तक १७ संगीतकारों से अपना तार जोड़ा। ऐसे ही एक संगीतकार हमें मिले जो फिल्मों में जाने की तमन्ना रखते हैं, जिनके द्वारा कम्पोज एक गीत हमने पिछले शुक्रवार इस सत्र के २४वें गीत के रूप में ज़ारी किया था। आप इनके ऊर्जावान होने का अंदाज़ा यहाँ से लगा सकते हैं कि यह शुक्रवार आया और इन्हें एक नया गीत तैयार कर लिया। जिसमें फिर से इन्हीं की आवाज़ है। जी हाँ, हम अपने २५ गीत के रूप में हिन्द-युग्म के कवि नाज़िम नक़वी की एक ग़ज़ल 'जिस्म कमाने निकल गया है' रीलिज कर रहे हैं, जिसे संगीतबद्ध किया है ग्वालियर के संगीतकार कुमार आदित्य विक्रम ने और आवाज़ है खुद संगीतकार की। तो चलिए सुनते हैं हिन्द-युग्म का २५वाँ गीत-

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(सही उच्चारण के साथ)


We are heading towards the end of present session. We have releasing released a fresh song on every friday since 4 July 2008. This is one of the big achievements of Hind-Yugm. Today, we are going to rock you with a fresh Ghazal that is written by Poet Nazim Naqvi and composed by Kumar Aditya Vikram. Kumar Aditya Vikram has also given his voice to this new combo . Please listen and leave your comment.

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(With right pronounciation)

ग़ज़ल के अशआर

सूरज हाथ से फिसल गया है
आज का दिन भी निकल गया है

तेरी सूरत अब भी वही है
मेरा चश्मा बदल गया है

ज़ेहन अभी मसरूफ़ है घर में
जिस्म कमाने निकल गया है

क्या सोचें कैसा था निशाना
तीर कमां से निकल गया है

जाने कैसी भूख थी उसकी
सारी बस्ती निगल गया है

ग़ज़ल पसंद आने पर इसे अपने मित्रों तक पहुँचायें। अपने ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'जिस्म कमाने निकल गया है' का पोस्टर लगाने के लिए पसंदीदा पोस्टर का कोड कॉपी करें।



SONG # 25, SEASON # 02, JISM KAMANE NIKAL GAYA HAI, OPENED ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.



Thursday, December 18, 2008

एक आम आदमी जिसने भोजपुरी को बना दिया खास...

भिखारी ठाकुर की जयंती पर हमारी संगीतमयी प्रस्तुति

भिखारी ठाकुर
एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर... बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं... दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है...फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया.

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास....18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया.....उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी...आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है....
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भिखारी ठाकुर के स्वर में उन्हीं की कविता 'डगरिया जोहता ना".
यह काव्यपाठ 'बिदेसिया' फिल्म से ली गई है
बिदेसिया, गबर-घिचोर, बेटी-बियोग भा बेटी-बेचवा सहित उनके सभी नाटकों में बदलाव को दिशा देने वाले एक सामाजिक चिंतक की व्यथा साफ दिखती है....सबसे बड़ी बात कि उनके नाटकों में पात्र कभी केंद्र में नहीं रहे, हमेशा परिवेश केंद्र में रहा....यही वजह थी कि उनके पात्रों की निजी पीड़ा सार्वभौमिक रुप अख्तियार कर लेती थी... हर नयी शुरुआत को टेढ़ी आंखों से देखने वाले भिखारी के दौर में भी थे...सामाजिक व्यवस्था के ऐसे ठेकेदारों से भिखारी अपने नाटकों के साथ लड़े...वो अक्सर नाटकों में सूत्रधार बनते और अपनी बात बड़े चुटीले अंदाज़ में कह जाते....अपनी महीन मार की मार्फत वो अंतिम समय तक सामाजिक चेतना की अलख जगाते रहे....
कोई उन्हें भरतमुनि की परंपरा का पहला नाटककार मानता हैं तो कोई भोजपुरी का भारतेंदू हरिश्चंद्र.....महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो उन्हें "भोजपुरी का शेक्सपियर" की उपाधि दे दी.....इसके अलावा उन्हें कई और उपाधियाँ व सम्मान भी मिले....भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया..... इतना सम्मान मिलने पर भी भिखारी गर्व से फूले नहीं, उन्होंने बस अपना नाटककार ज़िंदा रखा...पूर्वांचल आज भी भिखारी से नाटकों से गुलज़ार है....ये बात अलग है कि सरकारी उपेक्षा का शिकार इनके गांव तक अब भी नाव से ही जाना पड़ता है....

राममुरारी के साथ निखिल आनंद गिरि



सन् १९६३ में भिखारी ठाकुर के अमर नृत्य-नाटक बिदेशिया पर एक फिल्म बनी, इसी नाम से। जिसका संगीत बहुत हिट हुआ। भिखारी ठाकुर का लिखा एक गीत 'हँसी-हँसी पनवा खियौलस बेइमनवा, अ रे बसेला परदेस' जिसे एस॰ एन॰ त्रिपाठी ने संगीतबद्द किया था और मन्ना डे गाया था। बहुत प्रसिद्ध हुआ। हम आज अपने श्रोताओं के लिए वह गीत तो लाये ही हैं, साथ में बिलकुल नये तरह से कम्पोज किया गया यही गीत लाये हैं।

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(फिल्म- बिदेसिया, संगीत- एस॰एन॰ त्रिपाठी, आवाज़- मन्ना डे)

यह प्रस्तुति हिन्द-युग्म से सितम्बर २००८ में जुड़े राजकुमार सिंह की है, जो न्यूयार्क रहते हैं। ये अपने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। फिल्म का नाम होगा 'लूंगी, लोटा और सलाम'। राज भिखारी ठाकुर के इस गीत को अपनी फिल्म में रखना चाहते हैं। और यह गीत नये तरीके से तैयार भी हो गया है। 'हँसी-हँसी पनवा' को नया रूप दिया है 'Valley Of Flower' फिल्म के संगीत निर्देशक विवेक अस्थाना ने। गीत को गाया है भोजपुरी गीतों की चर्चित गायिका पूनम जैन ने। हम उम्मीद करते हैं कि यह नया प्रयोग आपको पसंद आयेगा।

इस फिल्म की बातें फिर कभी, पहले आप गीत सुनें।



(फिल्म- लूँगी, लोटा और सलाम (प्रस्तावित) , संगीत- विवेक अस्थाना और राजकुमार सिंह, आवाज़- पूनम जैन)

इस गीत के माध्यम से हम राजकुमार सिंह के साथ मिलकर अमर नाटककार भिखारी ठाकुर को श्रद्धाँजलि देना चाहते हैं।


साथ में पढ़िए भिखारी ठाकुर का दुर्लभ साक्षात्कार

Wednesday, December 17, 2008

हम भूल न जाए उनको, इसलिए कही ये कहानी...

आईये नमन करें उन शहीदों को जो क्रूर आतंकवादियों का सामना करते हुए शहीद हो गए


२६ नवम्बर की वह रात कितनी भयावह थी, जब चारों ओर आग बरस रही थी और सम्पूर्ण भारतीय आतंकित और भयभीत था। एक पिता के कानों में पुत्र की करूण पुकार गूँज रही थी और अपने लाल को बचाने के लिए वह दीवार पर सिर पटक रहा था, प्रशासन के सामने गिड़गिड़ा रहा था। कितनी ही माताएँ अपनी गोद उजड़ने का दृश्य अपनी आँखों से देख रही थी। देश-विदेश के अतिथि किंकर्तव्य विमूढ़ थे। । सबकी साँसें रूकी हुई थी। पल-पल की खबर सबकी धड़कनों को तीव्र कर रही थी। आतंकवादियों ने हमारे स्वाभिमान को ठेस लगाई। मानवता पर कलंक लगाया। कुछ लोगों के कुकृत्यों एवं हिंसक योजनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। वीरों की संतान कहलाने वाले हम सब कितने असहाय,कितने कमजोर और कितने असावधान थे। अपनी सुरक्षा व्यवस्था के सुराग बहुत स्पष्ट दिखाई दिए। देश के नागरिकों ने अपने दायित्वों को भी जाना ।

सुरक्षा बल अपनी सम्पूर्ण लगाकर भी इसे रोक पाने में असमर्थ था। ऐसे में देश के बलिदानी निकल पड़े जान हथेली पर लेकर। उनकी आँखों में बस एक ही सपना था। देश की सुरक्षा का । उन्होंने माता की आँखों के आँसुओं को पोंछा और उसे अभय प्रदान किया। आतंक का सामना किया । आग उगलती गोलियों की वर्षा उनका मार्ग अवरूद्ध ना कर सकी। उस समय सुरक्षा बल के कमांडो भगवान बन गए। प्रत्यक देशवासी बहुत आशापूर्ण दृष्टि से उन्हें निहार रहा था उस पल यदि वो जा भी चूक जाते तो आतंक का राक्षस विजयी हो जाता। धन्य है उनकी शक्ति और उनका बलिदान। इस पुन्य कार्य को करते हुए उन्हें अपनी जान भी गँवानी पड़ी। उनका परिवार सारा देश बन गया। उनके बलिदान पर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊँचा हो गया। तुमने देखा होगा आकाश से कि सम्पूर्ण भारत मुक्त कंठ से उन्हें दुआएँ दे रहा था । उनपर पुष्प वर्षा कर रहा था। वो मरे नहीं अमर हो गए। हर भारतीय के दिल में हमेशा-हमेशा रहेंगें। उन्होने भारत के उस स्वरूप का दर्शन करा दिया जो विश्व के लिए वन्दनीय है। तुमने आज भारत की ही नहीं विश्व की भी आँखें नम कर दी तथा सभी को कर्तव्य उन्मुख बना दिया। तुम्हारा बलिदान प्रत्येक भारतीय के दिल को दहला गया। तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसने हम सब के हृदयों में राष्ट्रीयता की एक तीव्र लहर का संचार किया, बिखरे देश को एकता के सूत्र में बाँध दिया तथा मदहोशी की नींद में सोए भारतीयों को होश में ला दिया। हर भारतीय आँखों में आँसू और दिल में नूतन संकल्प लिए तुम्हारे सामने नत पूरे भारत ने मोमबत्तियाँ जलाकर तुम्हारे प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं। हम हिन्दुस्तानी कोमल हृदय हैं, तुम्हारे बलिदान ने हमारे दिलों को द्रवित कर दिया है। मेरे देश के शहीद वीरों! हमारे श्रद्धा सुमन स्वीकार करो।


(यह विशेष कार्यक्रम NDTV पर प्रसारित हुआ था)

प्रस्तुति- शोभा महेन्द्रू

Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...

ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

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