गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

यह ऐसी प्यास है जिसको मिले मुद्दत से मयखाना..... ’कहकशाँ’ में आज जगजीत सिंह सीखा रहे हैं प्यार का पहला ख़त लिखना



कहकशाँ - 7
जगजीत सिंह की आवाज़ में 
"प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है जगजीत सिंह की आवाज़ में एक ग़ज़ल, जिसमें वो प्यार में पहला ख़त लिखने की बातें बता रहे हैं।




’कहकशाँ’ में आज हम जिस फ़नकार को ले आए हैं, उन्हें अगर ग़ज़ल-गायकी का बेताज बादशाह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। कई ज़माने बीत गए, लेकिन इनकी गायकी की मिठास उनके दुनिया-ए-फ़ानी को अलविदा कहने तक क़ायम रही। इन्होंने लगभग सभी शायरों को अपनी आवाज़ दी है। तो चलिए फिर लगे हाथ हम उस ग़ज़ल की भी बात कर लेते हैं जिसके लिए आज की इस महफ़िल को सजाया गया है। १९९६ में "फ़ेस टू फ़ेस" नाम की ग़ज़लों की एक ऐल्बम आई थी, जिसमें ९ गज़लें थी। आप सभी श्रोताओं के लिए हम उन सभी नौ ग़ज़लों को उनके ग़ज़लगो के नाम के साथ पेश कर रहे हैं, फिर आप ख़ुद अंदाज़ा लगाइए कि इसमें से वह कौन सी ग़ज़ल है जो हमारे आज की महफ़िल की शान है और हाँ वह फ़नकार भी:

१) सच्ची बात: सबीर दत्त
२) दै्र-ओ-हरम: ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
३) बेसबब बात: शाहिद कबीर
४) ज़िंदगी तूने: राजेश रेड्डी
५) तुमने बदले हमसे: दाग़ दहलवी,अमीर मीनाइ
६) प्यार का पहला ख़त: हस्ती
७) ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी : ज़क़ा सिद्दक़ी
८) शेख जी: सुदर्शन फ़ाकिर
९) कोई मौसम: अज़हर इनायती

उम्मीद है अब तक आपने अंदाज़ा लगा ही लिया होगा और अगर नहीं भी लगाया तो हम किसलिए हैं। तो हज़ूर आज हम जिस गज़ल की बात कर रहे हैं वह है "प्यार का पहला ख़त" जिसे लिखा है हस्ती ने और जिसे अपनी साज़ और आवाज़ से सजाया है पद्म भूषण "गज़लजीत" जगजीत सिंह जी ने। गज़ल-गायकी में जगजीत सिंह का एक अपना मुकाम है। सत्तर के दशक में जब नूरजहां, मल्लिका पुखराज, बेग़म अख्तर, तलत महमूद और ग़ुलाम अली जैसे नामी-गिरामी फ़नकारों की गज़लें क्लासिकल और सेमि-क्लासिकल भारतीय रागों पर आधारित हुआ करती थीं, तभी १९७६ में "द अनफौरगेटेबल्स" नाम के मेलोडी से सनी गज़लों की पहली एलबम के साथ ही जगजीत सिंह ने इस मैदान में अपनी मौजूदगी दर्शा दी थी। ग़ज़लें पहले बुद्धिजीवी वर्ग को ही समझ आती थी, लेकिन जगजीत सिंह ने यह ढर्रा ही बदल दिया। और उस पर आश्चर्य यह कि जगजीत सिंह भारतीय वाद्ययंत्रों के साथ पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं, तब भी उनकी गज़लों में वही पुराना हिन्दुस्तानी अंदाज दिखता है।

सदियों पहले कबीर ने कहा था:

कारज धीरे होत है काहे होत अधीर,
समय पाये तरूवर फले केतक सींचो नीर।

और कुछ ऐसे विचार थे रहीम के:

रहीमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाए,
टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।

"प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है" इस गज़ल में इन्हीं दो भावनाओं को पिरोया गया है। प्यार ऐसी कोमल भावना है जिसे पनपने में अच्छा खासा वक़्त लगता है, इसलिए जल्दबाज़ी जायज़ नहीं। वहीं दूसरी ओर प्यार ऐसी कोमल डोर है जो अगर टूट जाए तो जुड़ने में भी वक्त लगता है और यह भी मुमकिन है कि गांठ पड़ी डोर में वैसी पकड़ न हो और आलम यह भी है कि अगर खोलना चाहें तो इस गांठ को खुलने में भी वक़्त लगता है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि प्यार एक ऐसी शय है जो न आसानी से मिलती है, न आसानी से भुलाई जाती है और खोने के बाद आसानी से लौटती भी नहीं है। मैंने कभी इन्हीं भावों को अपने शब्दों में उकेरने की कोशिश की थी। मुलाहज़ा फरमाइयेगा:

मोहब्बत की जरूरत हो तो फुर्सत से कभी आना,
यह ऐसी प्यास है जिसको मिले मुद्दत से मयखाना।


आइये हम सब प्यार के इन्हीं इशारों को समझते हुए पहले ख़त के अनुभव को महसूस करते हैं और हस्ती के बोल और जगजीत सिंह के धुनों में खो जाते हैं:


प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है,
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।

गांठ अगर लग जाए तो फिर रिश्ते हो या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है।

हमने इलाज-ए-जख़्म-ए-दिल तो ढूँढ लिया लेकिन,
गहरे जख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।





’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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