शनिवार, 23 अप्रैल 2016

BAATON BAATON MEIN - 18: INTERVIEW OF SHAMSHAD BEGUM (PART-1)

बातों बातों में - 18

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत
भाग-1


"मुझे अपने दम पर काम मिलता गया , कभी किसी लॉबी की ज़रूरत नहीं पड़ी "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत। गजेन्द्र खन्ना के वेबसाइट www.shamshadbegum.com पर यह साक्षात्कार अंग्रेज़ी में पोस्ट हुआ था जनवरी 2012 में। गजेन्द्र जी की अनुमति से इस साक्षात्कार को हिन्दी में अनुवाद कर हम ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है साक्षात्कार का पहला भाग।

    


यह एक आश्चर्यपूर्ण संयोग की ही बात है कि आज 23 अप्रैल है, शमशाद जी की पुण्यतिथि। सच में, इस साक्षात्कार को आज की तारीख़ में प्रस्तुत करने की हमारी मनशा नहीं थी और ना ही हमने इस बात पर ध्यान दिया कि आज उनकी पुण्यतिथि है। यह क़ुदरत का करिश्मा ही है कि आज के दिन के लिए इस साक्षात्कार को हमने चुना।


वह 26 जनवरी 2012 का दिन था जब मेरी उड़ान मायानगरी मुंबई में उतरी। और मैं वहाँ था अपने एक बहुत पुराने सपने को लिए, सपना स्वर्णिम युग की एक स्वर्णिम आवाज़ से मिलने का जिसने लाखों, करोड़ों संगीत रसिकों के दिलों को प्रसन्न किया है, चकित किया है, गुदगुदाया है। अनूठी लय और भावबोधक गुणवत्ता से परिपूर्ण उनकी उत्कृष्ट आवाज़ ने उस दिन मेरे कानों में ऐसे रस घोले कि वह दिन मेरे जीवन का एक अविस्मरणीय दिन बन कर रह गया। कहने की ज़रूरत नहीं, मैं पूरी प्रत्याशा से वहाँ पहुँचा क्योंकि शमशाद बेगम जी मेरी सबसे पसन्दीदा गायिका रही हैं और रात्रा परिवार (उषा रात्रा शमशाद जी की पुत्री हैं जिनके साथ शमशाद जी रहती थीं) प्रेरणा और प्रोत्साहन की वजह से ही मैं शमशाद जी के वेबसाइट पर निरन्तर कार्य कर पा रहा हूँ।

जैसे जैसे पवई स्थित उनका घर क़रीब आता जा रहा था, मेरे मन में ख़ुशी की लहर उमड़ती चली जा रही थी। राष्ट्रीय अवकाश होने की वजह से सड़कों पर ज़्यादा वाहन नहीं चल रहे थे और कुछ ही देर में हम पहुँच गए अपने गनतव्य स्थल के द्वार पर। बिल्डिंग् के कम्पाउण्ड में बच्चे खेल रहे थे। गणतन्त्र दिवस पर छोटे-छोटे तिरंगा लिए बच्चे इधर से उधर भाग रहे थे। सीक्युरिटी गार्ड के निर्देशानुसार लिफ़्ट का इस्तमाल करते हुए हम जा पहुँचे रात्रा परिवार के दरवाज़े पर। करनल रात्रा (उषा जी के पति) ने एक चौड़ी मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया। रात्रा जी के साथ कई बार फ़ोन और ई-मेल पर बातचीत हुई, उनके साक्षात दर्शन पा कर मन प्रसन्न हो गया। जिस गर्मजोशी से उन्होंने हमारा स्वागत किया, वह उनकी आँखों में भी साफ़ दिखाई दे रही थी। तभी मैंने पीछे से उषा जी की मीठी आवाज़ सुनी। उनकी जो छवि मेरे मन में बनी हुई थी, उसके साथ पूरा पूरा न्याय करते हुए मुझसे कहा, "अच्छा तो आप हैं वो जनाब जो सारे उन फ़ोन कॉल्स और वेबसाइट के पीछे हैं!" बैठने का इशारा करती हुईं उषा ने कहा कि मम्मी अभी-अभी नहाकर नमाज़ अदा कर रही हैं, बस आती ही होंगी!

और कुछ ही क्षणों में वो कमरे में प्रवेश हुईं। बिलकुल ठेठ पंजाबी कुलमाता की तरह दिखने वाली, सादे सलवार-कमीज़ पहनी हुईं, बाल सुन्दर तरीके से बंधे हुए, स्पष्ट मुखमंडल वाली मूर्ति मेरे सामने खड़ी थीं। शमशाद बेगम। मैं कुछ पल उन्हें निहारता रहा। वो ऐसी लग रही थीं जैसे वो अपनी ज़िन्दगी से बहुत संतुष्ट हों, बहुत सुकून और शान्ति की छाया थी उनकी आँखों में। वो सावधानी से धीरे धीरे नज़दीक आईं और नमस्ते कह कर हमारा स्वागत किया। मैंने उनका आशीर्वाद लिया और कहा कि वो पद्म पुरस्कार के दिन की तुलना में कुछ ज़्यादा कमज़ोर लग रही हैं। सहमती के साथ उन्होंने बताया कि बुखार इसकी वजह है, पर अब वो बिलकुल ठीक हैं। जैसे ही उन्होंने सुना कि मैं इन्दौर से हूँ, वो मुस्कुराईं और कहा कि जब मेरा दामाद मऊ में था, तब हम लोग वहाँ अक्सर जाया करते थे। मुझे वहाँ के कचौड़ियों और गुलाबजामुनों का स्वाद अब भी याद है! हम लोग डाइनिंग् टेबल पर बैठते हैं साक्षात्कार के लिए और जल्दी ही खो जाते हैं शमशाद जी की यादों के गलियारों में।


शमशाद जी, आपके शुरुआती दिनों के बारे में बताइए। आप का जन्म लाहोर में हुआ था न?
गजेन्द्र खन्ना और पुत्री उषा रात्रा के साथ शमशाद जी

जी हाँ, मैं लाहोर में पैदा हुई थी। कहीं कहीं पर यह लिखा हुआ है कि मेरा जन्म अमृतसर में हुआ है जो कि ग़लत है। मैं लाहोर में 14 अप्रैल 1919 में पैदा हुई थी। हमारा परिवार एक आम रूढ़िवादी मुस्लिम जाट परिवार था। मेरे वालिद मियाँ हुसैन बक्श और मेरी वालिदा ग़ुलाम फ़ातिमा, बहुत अच्छे लोग थे वो जिन्होंने हम सब पर बहुत प्यार बरसाये और बचपन के वो दिन मेरी ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से थे।


आप कितनी भाई-बहनें हैं?

मेरे पाँच भाई और तीन बहनें हैं।

आज भी आप अपने भाई-बहनों से मिलती हैं कभी-कभार?

जी नहीं! मैं पीचले पन्द्रह साल से वहाँ नहीं गई। बढ़ती उम्र के साथ-साथ अब मुझे दूसरे कमरे तक चल कर जाने से पहले भी सोचना पड़ता है (उनकी उस मशहूर खनक वाली हँसी, जो अब भी उसी तरह से बरकरार है, पूरे कमरे में गूंजने लगती है)


आपका बचपन कैसा था?

हम लाहोर के एक पारम्परिक मुस्लिम जाट परिवार वाले थे, जिसमें ढेर सारा प्यार-दुलार थ। उस वक़्त ज़िन्दगी बहुत सादा हुआ करती थी। लाहोर के वो दिन आज भी मैं बड़े शिद्दत से याद करती हूँ।

आपके पति के बारे में कुछ बताइए।

उनका नाम है गणपत लाल बट्टो, जो एक वकील थे, MA, LLB। हम दोनों एक दूसरे से बिलकुल अलग थे, लेकिन फिर यह बात भी तो है कि विपरीत की आकर्षित करती है। मैंने उनसे कह दिया था कि निकाह के बाद भी मैं गाना नहीं छोड़ूँगी, जिस बात कओ उन्होंने इज़्ज़त और अहमियत दोनों दी। उन्होंने गाने से कभी मुझे नहीं रोका, पर ख़ुद को गीत-संगीत से कोई ख़ास लगाव नहीं था। लेकिन यह बात है कि उन्होंने हमारी बेटी को अच्छी आवाज़ होने के बावजूद एक प्रोफ़ेशनल सिंगर बनने की इजाज़त नहीं दी और चाहते थे कि वो डॉक्टर बने। वो एक सख़्त क़िस्म के वालिद थे। फ़ोटोग्राफ़ी का उन्हें बहुत शौक़ था।

यह सभी को मालूम है कि आपके चाचा जी अमीरुद्दीन ने आपको जिएनोफ़ोन में ले गए थे जहाँ पर मास्टर ग़ुलाम हैदर ने आपका ऑडिशन लिया था और आपको ट्रेनिंग् भी दी। इसके बारे में बताइए, उस ट्रेनिंग् के बारे में बताइए।

जी हाँ, मेरे चाचा अमीरुद्दीन मेरा हमेशा हौसला-अफ़ज़ाई करते थे। जब उन्होंने मोहर्रम के मौक़े पर अच्छा गाने की वजह से दो पैसे इनाम में दिए, उस समय मुझे लगा कि जैसे मेरे पास दो लाख रुपय आ गए हैं। ये वो ही थे जिन्होंने मेरे वालिद से कहा कि जिएनोफ़ोन वाले एक नई आवाज़ ढूंढ़ रहे हैं। उस ज़माने में अच्छे घर की लड़कियों का इस तरह का पैसों के लिए गाना बजाना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन चाचा जी ने उनसे कहा कि मेरी आवाज़ ख़ुदा की देन है और मुझे रोकना अल्लाह की नज़रों में एक गुनाह होगा। उन्होंने कहा कि आप चाहे तो अपने शर्त रख दो पर एक बार कोशिश कर लेने दो इसे। मेरे वालिद ने मजबूरी में हामी भर दी पर कुछ शर्त रख दिए - सिर्फ़ गाना गाओ, किसी को अपनी तसवीर खींचने मत देना, कभी कोई पार्टी अटेण्ड मत करना, और रेकॉर्डिंग् ख़त्म होते ही सीधे घर वापस आना। ये सब उनके दिए हुए उसूलों का मैंने अपनी पूरी करीअर में पालन किया। चाचा जी मुझे ऑडिशन में ले गए जो उस कंपनी के मौसिकार मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब ने लिया। ऑडिशन में मैंने बहादुर शाह ज़फ़र की एक ग़ज़ल पेश की जिसके अलफ़ाज़ थे "मेरा यार गर मिले मुझे जान दिल फ़िदा करूँ" और कुछ मरसिया। मास्टर साहब को मेरी आवाज़ अच्छी लगी और उसी दिन उन्होंने मुझे कॉन्ट्रैक्ट साइन करने को कहा। मुझे 12.50 रुपये प्रति गीत के हिसाब से कुल 12 गीत गाने थे, ये उस कॉन्ट्रैक्ट में लिखा हुआ था। यह रकम उस ज़माने के हिसाब से बहुत ज़्यादा थी। मैंने फिर पूछा, और तालीम? उन्होंने कहा कि मुझे कोई तालीम नहीं चाहिए, बस वो जैसे जैसे कहते हैं मैं वैसे वैसे करती जाऊँ। 

क्या उम्र रही होगी आपकी उस वक़्त?
मास्टर ग़ुलाम हैदर

मैं कुछ 12-13 बरस की थी। मास्टर साहब बहुत बड़े इंसान थे। उन्होंने मेरी आवाज़ में दिलचस्पी ली और इस बात का ख़याल रखा कि हमें संगीत और गायिकी की बारीकियाँ समझ में आए। वो ख़ुद भी बहुत बड़े जानकार थे साज़ों के, और सारे साज़िन्दे उनसे सीखते रहते थे। उनका तालीम देने का अंदाज़ भी अनोखा था। हमें अलग अलग तरह के गीतों को गवाते हुए हमारी आवाज़ को भी इस तरह से तराश देते थे कि फिर हम किसी भी तरह का गीत गा सके। उनकी तालीम का यह तरीक़ा रवायती तरीक़ों से सौ गुना ज़्यादा कारगर था। हीरा तराशने जैसा काम वो किया करते थे। मैं यह कभी नहीं भूल सकती जो उन्होंने मेरे लिए किया है। मेरा उस्ताद जन्नत में झूले! वो मुझे अपना चौमुखिया गायिका कहते थे जो किसी भी तरह के गीत के साथ पूरा न्याय करती हो। उन्होंने मुझे दो ज़रूरी बातें सिखाई। पहला, एक अच्छा इंसान बनो, और दूसरा, जिस तरह से पानी जिस बरतन में रखो उस बरतन का आकार ले लेती है, वैसे ही तुम भी अपने आप को किसी भी हालात में उसके अनुसार ढाल लेना।

आपका सबसे पहला ग़ैर-फ़िल्मी गीत कौन सा था? उसकी रेकॉर्डिंग् के बारे में कुछ याद है?

वह गाना था "जय जगदीश हरे"। मैंने बहुत अच्छा गाया था लेकिन मैं हैरान रह गई जब रेकॉर्ड के उपर ’उमा देवी’ का नाम छपा हुआ देखा। बात यूं थी कि कंपनी ने सोचा कि एक मुस्लिम लड़की की गाई हिन्दू आरती को पब्लिक किस तरह से लेगी, इस नाज़ुक मसले को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया। मुझे इसका बुरा लगा और चाहती थी कि मेरा जो अगला गाना हो उसके साथ मेरा नाम लिखा जाए। मेरा पंजाबी गीत "हथ जोड़िया पंखिया दा कसम ख़ुदा दी" बहुत हिट हुआ और कंपनी ने मेरी फ़ीस के उपर और 6 रुपये इनाम के तौर पर दिए।

उस तालीम के बाद आप फिर रेडियो से जुड़ीं, है ना?

जी हाँ! उस वक़्त संगीत का शौक़ काफ़ी महंगा शौक़ हुआ करता था। एक ग्रामोफ़ोन की कीमत तीन सौ रुपये हुआ करती थी और उसका जो पिन है उसकी कीमत एक रुपय थी। इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा लीजिए कि उस समय एक रुपय में आप 40 मन आटा ख़रीद सकते थे (1 मन = 40 सेर; एक सेर एक किलो से थोड़ा ज़्यादा होता है)। इस वजह से ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स केवल अमीरों के पास ही होता था जबकि आम लोगों के मनोरंजन का ज़रिया रेडियो हुआ करता था।

आप सबसे पहले पेशावर रेडियो पर गई थीं?

दरसल ऑल इण्डिया रेडियो सबसे पहले दिल्ली में शुरु हुई थी। मुझे दिल्ली से ऑफ़र मिला था गाने का, लेकिन मैं वह काम नहीं ले पाई क्योंकि मैं अचानक बीमार पड़ गई थी। इसलिए जब 1934 में पेशावर में भी ऑल इण्डिया रेडियो ने अपना स्टेशन खोल दिया, तब मैं वहाँ पर गाने लगी।

ओह, मेरे लिए यह नई जानकारी है, मुझे इस बात का पता नहीं था कि आपको दिल्ली रेडियो स्टेशन पर सबसे पहले गाने का न्योता मिला था!

जी हाँ, यह सच है। मैंने क़रीब तीन सालों तक पेशावर में काम किया। शुरु शुरु में मैं चन्द प्रोग्रामों के लिए जाया करती थी, पर बाद में मुझसे कहा गया कि लाहौर से पेशावर का जो आना-जाना है उसे ख़त्म करके पेशावर में घर ले लूँ।

पेशावर के दिनों के बारे में बताइए। यह पहली बार आप अपने घर से दूर जा रही थीं, मुश्किल रहा होगा आपके लिए?

जी हाँ, वह एक अलग ही अनुभव था। मेरे वालिद ने मेरे बड़े भाई फ़ज़लदीन को मेरे साथ भेजे दिया ताकि कोई तो हो मेरी देखरेख के लिए। भाई साहब मुझे बहुत प्यार करते थे। ज़िन्दगी में पहली बार मुझे बुरक़ा पहनने पर मजबूर होना पड़ा।

मतलब आप लाहौर में बुरक़ा नहीं पहनती थीं?

नहीं, यह ज़रूरी नहीं था। पेशावर में अपनी महफ़ूसी के लिए पहनना ज़रूरी था। लोग मेरे वालिद साहब को कहते थे कि पठान चुक लई जासाँ (पठान इसे ले जायेंगे)। इसलिए मैं बुरक़ा पहनने लगी। आम लोग पठानों से डरते थे। यहाँ तक कि पेशावर रेडियो स्टेशन वाले लोग भी मुझसे बुरक़ा पहन कर बाहर निकलने को कहते थे।

पेशावर की और कौन सी यादें हैं आपके दिल में?

मुझे पेशावर के खाने की बहुत याद आती है। वहाँ की नान, तीतर, बटर, चपली कबाब का ज़ायका अभी तक मेरी ज़ुबान पर लगी है। मैं अपना खाना ख़ुद ही बनाती थी लेकिन मुझे फुल्के (रोटी) बनाना नहीं आता था उस ज़माने में, इसलिए रोज़ बाहर से नान मंगवा लेती थी। मेरी सेहत काफ़ी अच्छी हो गई वहाँ का खाना खा कर (हँसते हुए)। यहाँ तक कि जब मैं लाहौर के लिए निकल रही थी और बैंक गई पैसे निकालने, तो कैशियर साहब बोले, "पैसे किस गल दे? आई सी ते पतली सी, हुण ते लाल सुइ हो गई ऐ" (पैसे किस बात के? जब आप यहाँ आई थीं तब पतली थीं, और अब अपने आप को देखिए, आप यहाँ से अच्छी सेहत लेकर जा तो रही हैं!)

पेशावर के उन दिनों आप के द्वारा गाए गीतों में से कोई भी गीत उपलब्ध है?

अफ़सोस, नहीं! हालाँकि मैंने कई सौ गीत गाए होंहे, वो सारे डायरेक्ट ब्रॉडकास्ट हुआ करते थे, उनकी रेकॉर्डिंग् नहीं होती थी। वो लाइव प्रोग्राम्स होते थे जिसमें ग़ज़लें, नगमें, और ग़ैर फ़िल्मी गाने शामिल होते थे। हर दिन मैं अलग क़िस्म का गीत गाती थी और कुछ गाने इतने पॉपुलर हुए कि उनकी बार बार फ़रमाइशें आती थीं। मसलन, मेरा गीत "इक बार फिर कहो ज़रा" बहुत हिट हुआ था, जिसका बाद में रेकॉर्ड भी बना। मैं यह गीत रेडियो पर गाते गाते थक चुकी थी। और हर बार इसे कम से कम दो बार गाना पड़ता था।

जब लहौर में रेडियो स्टेशन बना, तब आप वहाँ काम करने लगीं, है ना? वहाँ के बारे में कुछ बताइए।

अपने घर-परिवार में वापस आकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई। वहाँ दिन में काम होता था और शाम को स्टेशन बन्द होने के बाद हम वापस घर आ जाते थे। मुझे याद है वहाँ के Flatty's Hotel हुआ करती थी जहाँ लोग जा कर खाना खाते थे। हम सब आर्टिस्ट्स तांगे में घर जाते थे।

उस ज़माने में आपने ढेर सारी ग़ैर फ़िल्मी रेकॉर्डिंग्स की हैं, और अफ़सोस की उनमें से ज़्यादातर ही आज मौजूद नहीं है।

जी हाँ, यह अफ़सोस की बात है। सिर्फ़ वो रेकॉर्डिंग्स ही क्यों, मेरे दूसरे भी बहुत से गीत अलग अलग वजहों से खो गए हैं। मैंने 1945 की फ़िल्म ’फूल’ में गीत गाए थे, पर वो अब कहीं पे नहीं मिलते। ’जिएन-ओ-फ़ोन’ के साथ कॉन्ट्रैक्ट होने की वजह से बहुत सी फ़िल्मों में मैंने सिर्फ़ फ़िल्म वर्ज़न के लिए गाए जो उन फ़िल्मों के साथ खो गए हैं। मेरे बहुत से गीत ऐसे हैं जो कई वजहों से रिलीज़ ही नहीं हो पाए।

उस ज़माने में गाने किस तरह से बनने थे, इस बारे में बताइए।

आम तौर पर हम सुबह सुबह पहुँच जाते थे और रिहर्सल शुरु कर देते। रेकॉर्डिंग्स होती थी शाम छह बजे के बाद जब ज़्यादा शोर नहीं होता। उस ज़माने में अच्छी रेकॉर्डिंग रूम नहीं हुआ करती थी, साउण्ड प्रूफ़ रूम नहीं थे। इसलिए हम स्टेज पर रेकॉर्डिंग् करते थे; दिन में उन स्टेजों पर नाटक होते थे और शाम को रेकॉर्डिंग्। हर तरफ़ लकड़ी के बोर्ड होते और उस पर सरेश की बू चारों तरफ़ से आती थी। हमें पहले वह जगह साफ़ करना पड़ता और तब जाकर रेकॉर्डिंग् शुरु होती। इतनी बदबूदार कि मुंह खोलना भी मुश्किल वहाँ; ऐसे में हमें मूड बना कर "सावन के नज़ारे हैं" गाना पड़ता (हँसते हुए)! उस ज़माने में माइक्रोफ़ोन की कीमत 500 रुपये होती थी और उसमें दो उंगलियों जितनी चौड़ी लाइन होती थी। हमें उस लाइन में गाना पड़ता था। सीम्गर को मुशियनों के साथ तालमेल बना कर रेकॉर्डिंग् करनी पड़ती। तकनीक उस ज़माने में कमज़ोर थी, इसलिए आर्टिस्ट को ही पूरे पर्फ़ेक्शन के साथ गाना पड़ता था। अगर एक भी ग़लती हो गई तो दुबारा पूरा फिर से गाना पड़ता था। इसलिए रेकॉर्डिंग् से पहले बहुत बार रिहर्सल करना पड़ता था। शुरु में कम्पोज़र के साथ चार-पाँच बार रिहर्सल करते, उसके बाद पूरे म्युज़िक और साज़िन्दों के साथ रिहर्सल करते। हर एक शख्स अपनी तरफ़ से कोशिश करता कि गाना अच्छे से अच्छा बने। हम अपने फ़न के लिए जीते थे और यही हमारा अहम मक़सद होता था। बाक़ी सब कुछ उसके बाद। रिहर्सलों के बाद जब हमें लगता कि अब हम पूरी तरह से तैयार हैं, तब हम एक स्पेशल स्टुडियो में जाते फ़ीते (टेप) पर रेकॉर्ड करने के लिए जो फ़िल्म वर्ज़न के लिए इस्तमाल होता। क्योंकि फ़ीते पर रेकॉर्डिंग की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं होती, इसलिए रेकॉर्डिंग् कंपनियाँ हमें फिर से बुलाते ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के लिए वही गाना दुबारा रेकॉर्ड करने के लिए। यानी कि एक गाना हम दो बार गाते, एक बार फ़िल्म के फ़ीते पर और एक बाद ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के लिए। यह सिलसिला बाद में भी कई सालों तक चलता रहा। कई बार तो ऐसा भी होता था कि फ़िल्म के परदे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर अलग अलग गायकों की आवाज़ होती थी एक ही गीत के लिए। ’जिएन-ओ-फ़ोन’ के कॉन्ट्रैक्ट की वजह से मैं बहुत से रेकॉर्डिंग् कंपनियों के लिए गा न सकी। ऐसे में मेरी आवाज़ फ़िल्म के लिए ली जाती पर रेकॉर्ड पर उन्हें किसी और गायिका से गवा लिया जाता। बाद में जब HMV ने ’जिएन-ओ-फ़ोन’ को ख़रीद लिया, तब जा कर यह मसला सुलझा। तब मेरी जो पाबन्दी थी, वह ख़त्म हुई। 

फ़िल्मों में आपका कैसे आना हुआ?

जब मैं बाहर थी, तब नूरजहाँ मास्टर साहब के लिए गा रही थीं। उनका गाया "शाला जवानियाँ माने" बहुत हिट
हुआ था। उनका ’हीर स्याल’ का गीत "सोनेया देसाँ विचों देस पंजाब नई सी ओ, जिवें फूलाँ विचों फूल गुलाब नई सी" भी ख़ूब चला था। वो उस वक़्त ऐसी उम्र में थीं कि उनकी आवाज़ ना तो एक छोटी लड़की की थी और ना ही किसी औरत की। इसलिए प्रोड्युसरों ने उनकी आवाज़ को मच्योर होने तक इन्तज़ार करने का फ़ैसला लिया। प्रोड्युसर दलसुख पंचोली जी मेरी आवाज़ के शौक़ीन थे, और उन्होंने मुझे बुलाया उनकी फ़िल्म में गाने के लिए।

ओह, इसका मतलब यह कि मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब ने आपको नहीं बुलाया सबसे पहले फ़िल्मी गीत गाने के लिए?

नहीं, मास्टर साहब ने नहीं बुलाया था मुझे। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें डर था कि अगर वो मुझे बुलायेंगे तो लोग यह कहेंगे कि वो वहाँ पर अपना कैम्प बना रहे हैं अपने जान-पहचान वाले लोगों के साथ। वो इतने शरीफ़ इंसान थे। वो चाहते थे कि मैं अपने बलबूते, अपनी काबलियत से वहाँ पहुँचूँ, ना कि किसी की सिफ़ारिश से। उनका और अल्लाह का करम था कि मुझे अपने दम पर काम मिलता गया और हमेशा मिला; कभी किसी लॉबी की ज़रूरत नहीं पड़ी, या किसी का पीठ थपथपाना नहीं पड़ा।

और उसके बाद आपका करीयर निरन्तर आगे बढ़ता चला गया?

जी हाँ! मैं जिन फ़िल्मों में गा रही थीं, वो सारी फ़िल्में हिट हो रही थीं। एक के बाद एक चार सिल्वर जुबिली हमारी फ़िल्मों ने मनाई - ’यमला जट’, ’गवान्डी’ - ’गवान्डी’ भी उसी साल रिलीज़ हुई जिसमें संगीत श्याम सुन्दर का था। एक दूसरी ’गवान्डी’ भी थी जो 1941-42 में बनी थी जिसमें संगीत था पंडित अमरनाथ। ये पंजाबी फ़िल्में थीं जो बहुत हिट हुई थीं। और उसके बाद ’ख़ज़ांची’ आई जिसने गोल्डन जुबिली मनाई और एक बहुत बड़ी कामयाब फ़िल्म साबित हुई। मैं शायद हिन्दी फ़िल्मों की अकेली गायिका हूँ जिसे अपनी पहली फ़िल्मे के सभी गीत गाने के मौक़े मिले। उस फ़िल्म के गाने भी बहुत हिट हुए थे। मास्टर जी ने मुझे बताया था कि लोग थिएटरों में स्क्रीन के उपर सिक्कों की बारिश करते जब भी मेरा गीत "लौट गई पापाँ" शुरु होता। और फिर "सावन के नज़ारे हैं" गीत पर भी तालियाँ बजतीं। हम सब बहुत ख़ुश थे इस फ़िल्म की कामयाबी पर। लाहौर फ़िल्म इंडस्ट्री में उस वक़्त तक की यह सबसे कामयाब फ़िल्म थी। मेरे शुरुआती सारे डुएट गीत मास्टर ग़ुलाम हैदर के साथ ही होते थे।


तो दोस्तों, यह था सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की लम्बी बातचीत का पहला भाग, जिसमें शमशाद जी ने अपने जीवन के शुरुआती दिनों का हाल विस्तृत तरीके से बताया। और बातचीत का सिलसिला आकर रुका उनकी पहली सुपरहिट हिन्दी फ़िल्म ’ख़ज़ांची’ पर। यहाँ से बातचीत का सिलसिला हम आगे बढ़ायेंगे अगले महीने।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



साक्षात्कार : गजेन्द्र खन्ना
अनुवाद एवं प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





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