Tuesday, August 30, 2011

ना बोल पी पी मोरे अंगना, ओ पंछी जा रे जा...एक अंदाज़ ये भी शमशाद का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 733/2011/173



मशाद बेगम के गाये गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की आज है तीसरी कड़ी। कुछ वर्ष पहले वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के नेतृत्व में विविध भारती की टीम पहुँची थी शमशाद जी के पवई के घर में, और उनसे लम्बी बातचीत की थी। उसी बातचीत का पहला अंश कल हमनें पेश किया था, आइए आज उसी जगह से बातचीत के कुछ और अंश पढ़ें।



शमशाद जी: मैंने मास्टरजी (ग़ुलाम हैदर) से फिर कहा कि दूसरा गाना गाऊँ? उन्होंने कहा कि नहीं, इतना ठीक है। फिर १२ गानों का ऐग्रीमेण्ट हो गया, हर गाने के लिए १२ रुपये। मास्टरजी नें उन लोगों से कहा कि इस लड़की को वो सब फ़ैसिलिटीज़ दो जो सब बड़े आर्टिस्टों को देते हो। उस ज़माने में ६ महीनों का कॉनट्रैक्ट हुआ करता था, ६ महीने बाद फिर रेकॉर्डिंग् वाले आ जाते थे। सुबह १० से शाम ५ बजे तक हम रिहर्सल किया करते म्युज़िशियन्स के साथ, मास्टरजी भी रहते थे। आप हैरान होंगे कि उन्हीं के गाने गा गा कर मैं आर्टिस्ट बनी हूँ।



कमल जी: आप में भी लगन रही होगी?



शमशाद जी - मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब कहा करते थे कि इस लड़की में गट्स है, आवाज़ भी प्यारी है। शुरु में हर गीत के लिए १२ रूपए देते थे। पूरा सेशन ख़त्म होने पर मुझे ५००० रूपए मिले। जब रब मेहरबान तो सब मेहरबान! (यहाँ शमशाद जी भावुक हो जाती हैं और रो पड़ती हैं) जब रेज़ल्ट निकलता है तो फिर क्या कहने!



कमल जी: आप फिर रेडियो से भी जुड़ गईं, इस बारे में कुछ बतायें।



शमशाद जी: जब मैंने गाना शुरु किया था तब रेडियो नहीं था, सिर्फ़ ग्रामोफ़ोन कंपनीज़ थीं, और बहुत महंगा भी था, १०० रूपए कीमत थी ग्रामोफ़ोन की और हर रेकॉर्ड की कीमत होती थी २.५० रुपये। दो साल बाद जब हम तैयार हो गए, तब रब ने रेडियो खोल दिया और मैं पेशावर रेडियो में शामिल हो गई।



कमल जी: रेडियो में किसी प्रोड्युसर को आप जानती थीं, आपको मौका कैसे मिला?



शमशाद जी: उस वक़्त प्रोड्युसर नहीं, स्टेशन डिरेक्टर होते थे, उनके लिए गाने वाले कहाँ से आयेंगे? वो ग्रामोफ़ोन कंपनी वालों से पूछते थे गायकों के बारे में। जिएनोफ़ोन कंपनी से भी उन्होंने पूछा और इस तरह से मेरा नाम उन्हें मिल गया। मैंने पेशावर रेडियो से शुरुआत की, पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी प्रोग्राम करने लगी। फिर लाहौर और दिल्ली रेडियो से भी जुड़ी।



और दोस्तों, जुड़े हुए तो हम हैं पिछले ६ दशकों से शमशाद बेगम के गाये हुए गीतों के साथ। उनकी आवाज़ में जो आकर्षण है, रौनक है, जो चंचलता है, जो शोख़ी है, उसके जादू से कोई भी नहीं बच सकता। तीन दशकों में उनकी खनकती आवाज़ नें सुनने वालों पर जो असर किया था, वह असर आज भी बरकरार है। आइए आज की कड़ी में भी एक और असरदार गीत सुनते हैं १९४९ की फ़िल्म 'दुलारी' से। ग़ुलाम हैदर और राम गांगुली के बाद, आज बारी संगीतकार नौशाद साहब की। जैसा कि पहली कड़ी में हमनें ज़िक्र किया था कि नौशाद साहब के मुताबिक़ शमशाद जी की आवाज़ में पंजाब के पाँच दरियाओं की रवानी है। आइए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को सुनते हुए नौशाद साहब के इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं। नौशाद साहब को याद करते हुए शमशाद जी नें अपनी 'जयमाला' में कहा था, "संगीतकार नौशाद साहब के साथ मैंने कुछ १६-१७ फ़िल्मों में गाये हैं जैसे 'शाहजहाँ', 'दर्द', 'दुलारी', 'मदर इण्डिया', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'दीदार', 'अनमोल घड़ी', 'आन', 'बैजु बावरा', वगेरह। मेरे पास उनके ख़ूबसूरत गीतों का ख़ज़ाना है। लोग आज भी उनके संगीत के शैदाई हैं। मेरे स्टेज शोज़ में भी लोग ज़्यादातर उनके गीतों की ही फ़रमाइश करते हैं।" लीजिए, नौशाद साहब और शमशाद जी, इन दोनों को समर्पित आज का यह गीत सुनते हैं।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



इन तीन सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -

१. मुख्या रूप से इस फिल्म में गीता रॉय के गाये गीत थे.

२. आवाज़ है शमशाद बेगम की.

३. एक अंतरे में "दिलवाले"- "मतवाले" का काफिया है



अब बताएं -

इस गीत के गीतकार - ३ अंक

इस गीत के संगीतकार - २ अंक

फिल्म का नाम - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

एक बार फिर अमित जी को टक्कर मिल मात्र इंदु जी से, अरे भाई बाकी धुरंधर कहाँ है ? या सवाल ज्यादा मुश्किल लग रहे हैं ? खैर इंदु जी आपके जवाब गलत हों संभावना कम ही होती है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

3 comments:

अमित तिवारी said...

sahir ludhianvi

Kshiti said...

Film - Baazi
Kuchh na soch matwale
Dil ki maan dilwale

indu puri said...

लेट आने का एक फायदा है क्लू मिल जाते हैं और...इंटेलिजेंट स्टूडेंट के पीछे रहने से टीपने को मिल जाता है.हा हा हा अब भई अमित जी गलत हो ही नही सकते इसलिए इस फिल्म के संगीतकार का नाम 'सचिन देव बर्मन' लोक कर दिया जाये.
लोक वो लगाना जिसे जरूरत पड़ने पर मैं तोड़ सकूं....खोलूंगी नही.
क्या करू?ऐसिच हूँ मैं तो-टीपनतरु

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