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दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छायी...जब स्वीट सिक्सटीस् में परवान चढा प्रेम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 554/2010/254

जीव जगत की तमाम अनुभूतियों में सब से प्यारी, सब से सुंदर, सब से सुरीली, और सब से मीठी अनुभूति है प्रेम की अनुभूति, प्यार की अनुभूति। यह प्यार ही तो है जो इस संसार को अनंतकाल से चलाता आ रहा है। ज़रा सोचिए तो, अगर प्यार ना होता, अगर चाहत ना होती, तो क्या किसी अन्य चीज़ की कल्पना भी हम कर सकते थे! फिर चाहे यह प्यार किसी भी तरह का क्यों ना हो। मनुष्य का मनुष्य से, मनुष्य का जानवरों से, प्रकृति से, अपने देश से, अपने समाज से। दोस्तों, यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल है, जो बुना हुआ है फ़िल्म संगीत के तार से। और हमारी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों का केन्द्रबिंदु भी देखिए प्रेम ही तो है। प्रेमिक-प्रेमिका के प्यार को ही केन्द्र में रखते हुए यहाँ फ़िल्में बनती हैं, और इसलिए ज़ाहिर है कि फ़िल्मों के ज़्यादातर गानें भी प्यार-मोहब्बत के रंगों में ही रंगे होते हैं। दशकों से प्यार भरे युगल गीतों की परम्परा चली आई है, और एक से एक सुरीले युगल गीत हमें कलाकारों ने दिए हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर से चु्ने हुए कुछ सदाबहार युगल गीत 'एक मैं और एक तू' लघु शृंखला के अंतर्गत। यह तो सच है कि केवल दस गीतों में हम सुनहरे दौर के सदाबहार युगल गीतों की फ़ेहरिस्त को समेट नहीं सकते। यह बस एक छोटी सी कोशिश है इस विशाल समुंदर में से कुछ दस मोतियाँ चुन लाने की जो फ़िल्म संगीत के बदलते मिज़ाज को दर्शा सके, कि किस तरह से ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक फ़िल्मी युगल गीतों का मिज़ाज, उनका रूप रंग बदला। ३०, ४० और ५० के दशकों से एक एक गीत सुनने के बाद आज हम क़दम रख रहे हैं ६० के दशक में। ६० का दशक, जिसे हम 'स्वीट सिक्स्टीज़' भी कहते हैं, और इस दशक में ही सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत बनें हैं। इसलिए हम इस दशक से एक नहीं बल्कि तीन तीन युगल गीत आपको एक के बाद एक सुनवाएँगे। इन गीतों का आधार हमने लिया है उन तीन गायिकाओं का जो इस दशक में सब से ज़्यादा सक्रीय रहे। ये गायिकाएँ हैं लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर।

आज के अंक में प्रस्तुत है आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में फ़िल्म 'कश्मीर की कली' का सदाबहार युगल गीत "दीवाना हुआ बादल, सावन की घटा छायी"। युं तो यह १९६४ की फ़िल्म है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे इस फ़िल्म के गीतों पर वक़्त की ज़रा सी भी आंच नहीं लग पायी है। आज भी इस फ़िल्म के तमाम गानें उसी रूप में ब-दस्तूर बजते चले जा रहे हैं जैसे फ़िल्म के प्रदर्शन के दौर में बजे होंगे। ओ. पी. नय्यर के ६० के दशक की शायद यह सफलतम फ़िल्म रही होगी। शम्मी कपूर, शर्मीला टैगोर और नज़ीर हुसैन अभिनीत इस फ़िल्म के गीत लिखे थे एस.एच. बिहारी साहब ने। शक्ति दा, यानी शक्ति सामंत की यह फ़िल्म थी, और आप में से कुछ दोस्तों को याद होगा कि शक्ति दा के निधन के बाद जब हमने उन पर एक ख़ास शृंखला 'सफल हुई तेरी आराधना' प्रस्तुत की थी, उसमें हमने इस फ़िल्म की विस्तारीत चर्चा की थी। आज इस गीत के बारे में बस यही कहना चाहते हैं कि इसके मुखड़े का जो धुन है, वह दरअसल नय्यर साहब ने एक पीस के तौर पर "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया" गीत के इंटरल्युड म्युज़िक में किया था। यह १९५६ की फ़िल्म 'सी.आइ.डी' का गीत है, और देखिये इसके ८ साल बाद इस धुन का इस्तमाल नय्यर साहब ने दोबारा किया और यह गीत एक माइलस्टोन बन गया ना केवल उनके करीयर का बल्कि फ़िल्म संगीत के धरोहर का भी। तो आइए अब इस गीत का आनंद उठाते हैं। रुत तो नहीं है सावन की, लेकिन ऐसे मधुर गीतों की बौछार का तो हमेशा ही स्वागत है, है न!



क्या आप जानते हैं...
कि 'कश्मीर की कली' फ़िल्म साइन करने के वक़्त शर्मीला टैगोर की उम्र केवल १४ वर्ष थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - किसी अन्य सूत्र की दरकार नहीं.

सवाल १ - लता जी के साथ किस गायक ने दिया है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत बढ़िया चल रहे हैं इस बार, प्रतिभा जी और रोमेंद्र जी बहुत दिनों में दिखे

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Comments

geetkar : mazarooh sultanpuri
uff ye sharad bhai pkke jwel thiif hai
वाह सुजोय दा! क्या अदभुत लिखा है, "जीव जगत की तमाम अनुभूतियों में सब से प्यारी, सब से सुंदर, सब से सुरीली, और सब से मीठी अनुभूति है प्रेम की अनुभूति, प्यार की अनुभूति।"

इस गीत में आशा जी की गाई हुई पंक्ति "तिनके की तरह मैं बह निकली, सैलाब मेरे रोके न रुका" मेरे दिल के बेहद क़रीब है| कुछ ऐसा ही हाल मेरा भी हुआ था जब मुझे किसीसे प्रेम का एहसास हुआ| प्यार की राह पे आलम ये था के सैलाब मेरी आँखों से बहता ही रहा|

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