गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

बुल्ला की जाणां मैं कौन ? - बुल्ले शाह पर विशेष प्रस्तुति

बुल्ला की जाणां मैं कौन ?

सवाल जो ज़ेहन को भी सोचने के लिए मजबूर कर दें कि ज़ेहन तू कौन है? कैसा दंभ? कौन सी चतुराई? किसकी अक्ल? जो बुल्ला खुद कहता है मैं की जाना मैं कौन उसके बारे में रत्ती भर भी जान सकें या समझ सकें ये दावा करना भी बुल्ले की सोच से दगा करने जैसा है। अगर बुल्ले का इतिहास लिखूं तो कहना होगा, बुल्ला सैय्यद था, उच्च जाति मुलसमान, मोहम्मद साहब का वंशज, पर खुद बुल्ला कहता है -

न मैं मोमन विच मसीतां, ना मैं विच कुफर दियां रीतां

तो कैसे कहूं कि वो मोमिन (मुसलमान) था। बुल्ला तो अल्हा की माशूक था, जो अपने नाराज़ मुरशद को मनाने पैरों में घुंघरू बांध कर गलियों में कंजरी (वैश्य) की तरह नाचती फिरती है, गाती फिरती है,

कंजरी बनेया मेरी इज्जत घटदी नाहीं मैंनू नच के यार मनावण दे

बुल्ला की जाणां - (रब्बी शेरगिल)


बुल्ले के जन्म के बारे में इतिहासकार एक राय नहीं है, बुल्ले को इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता। कहते हैं मीर अब्दुला शाह कादरी शतारी का जन्म 1680 इसवी में बहावलपुर सिंध के गांव उच गैलानीयां में शाह मुहमंद दरवेश के घर हुआ, जो मुसलमानों में मानी जाती ऊंची जाति सैय्यद थे। वह मसजिदों में तालीम देते, स्कूली तालीम और मज़हबी तालीम। सैय्यद साहब जाने-माने मौलाना थे। बुल्ले को उस्ताद गुलाम मुर्तजा के पास तालीम के लिए भेजा गया। बुल्ले शाह ने उनकी सारंगी उठा ली। अल्हा की बंदगी करने वाले परिवार में पैदा हुए बुल्ले शाह अध्यात्म से तों बचपन से ही जुड़ गए। अल्हा की बंदगी में वक्त गुज़रता, उर्दू, फारसी के विद्वानों को पढऩे का सिलसिला चलता रहा। साधना से बुल्ले ने इतनी ताकत हासिल कर ली कि अधपके फलों को पेड़ से बिना छुए गिरा दे। पर बुल्ले को तलाश थी इक ऐसे मुरशद की जो उसे खुदा से मिला दे।

उस दिन शाह इनायत अराईं (छोटी मुसलिम जात) के बाग के पास से गुज़रते हुए, बुल्ले की नजऱ उन पर पड़ी। उसे लगा शायद मुरशद की तलाश पूरी हुई। मुरशद को आज़माने के लिए बुल्ले ने अपनी गैबी ताकत से आम गिरा दिए। शाह इनायत ने कहा, नौजवान तुमने चोरी की है। बुल्ले ने चतुराई दिखाई, ना छुआ ना पत्थर मारा कैसी चोरी? शाह इनायत ने इनायत भरी नजऱों से देखा, हर सवाल लाजवाब हो गया। बुल्ला पैरों पर नतमस्तक हो गया। झोली फैला खैर मांगी मुरशद मुझे खुदा से मिला दे। मुरशद ने कहा, मुश्किल नहीं है, बस खुद को भुला दे। फिर क्या था बुल्ला मुरशद का मुरीद हो गया, लेकिन अभी इम्तिहान बाकी थे। पहला इम्तिहान तो घर से ही शुरू हुआ। सैय्यदों का बेटा अराईं का मुरीद हो, तो तथाकथित समाज में मौलाना की इज्ज़त खाक में मिल जाएगी। पर बुल्ला कहां जाति को जानता है। कहां पहनचानता है समाज के मजहबों वाले मुखौटे। बहनें-भाभीयां जब समझाती हैं,

बुल्ले नू समझावण आइयां भैणां ते भरजाइयां
बुल्ले तूं की लीकां लाइयां छड्ड दे पल्ला अराइयां


तो बुल्ला गाता है-

अलफ अल्हा नाल रत्ता दिल मेरा,
मैंनू 'बे' दी खबर न काई

'बे' पड़देयां मैंनू समझ न आवे,
लज्जत अलफ दी आई

ऐन ते गैन नू समझ न जाणां
गल्ल अलफ समझाई

बुल्लेया कौल अलफ दे पूरे
जेहड़े दिल दी करन सफाई

(जिसकी अल्फ यानि उस एक की समझ लग गई उसे आगे पढऩे की जरुरत ही नहीं। अल्फ उर्दू का पहला अक्षर है बुल्ले ने कहा है, जिसने अल्फ से दिल लगा लिया, फिर उसे बाकी अक्षर ऐन-गेन नहीं भाते)



कहते हैं बुल्ले के परिवार में शादी थी, बुल्ले ने मुरशद को आने का न्यौता दिया। फकीर तबियत इनायत शाह खुद तो गए नहीं अपने एक मुरीद को भेज दिया। अराईं मुरीद फटे पुराने कपड़ों में शादी में पहुंचा। खुद को उच्च जाति समझने वाला सैय्यद परिवार तो पहले ही नाखुश था कहां मुरशद के मुरीद का स्वागत करता। बुल्ला भी जशन में ऐसा खोया कि मुरशद के बंदे को भूल बैठा। जब वह मुरीद लौट कर शाह इनायत के पास पहुंचा और किस्सा सुनाया तो बुल्ले के रवैये पर नाराज़ हुआ। बुल्ले से ये उम्मीद ना थी। जब बुल्ला मिलने आया तो उसकी तरफ पीठ कर शाह इनायत ने ऐलान कर दिया, बुल्ले का चेहरा नहीं देखूंगा। बुल्ले को गलती का अहसास हुआ, उसका इम्तिहान शुरू हो चुका था। मुरशद नाराज़ था, मुरीद अल्हा को जाने वाले रास्ते में भटक रहा था। क्या करता बहुत मनाया, पर मुरशद तो मुरशद है, जिसको चाहे आलिम (अक्लमंद) करदे, जिसे चाहे अक्ल से खाली कर दे। बुल्ला मुरशद रांझे के लिए तड़पती हीर हो गया। उसने कंजरी से नाचना सीखा, खुद कंजरी बन पैरों में घुंघरू बांध, नंगे पांव गलियों में निकल पड़ा। शाह इनायत को संगीत पसंद था, बुल्ला संगीत में डूब कर खुद को भूल गया। एक पीर के उर्स पर जहां सारे फकीर इक्टठे होते, बुल्ला भी पहुंच गया। मुरशद से जुदाई की तड़प में बुल्ले ने दिल से खून के कतरे-कतरे को निचोड़ देने वाली काफीयां लिखी थीं। जब सब नाचने-गाने वाले थक कर बैठ गए, बुल्ला मुरशद के रंग में रंगा घंटो नाचता गाता रहा। उसकी दर्द भरी आवाज़ और समर्पण से भरे बोल मुरशद का दिल पिघला गए। जाकर पूछा तू बुल्ला है? वो पैरों पर गिर पड़ा, बुल्ला नहीं मुरशद मैं भुल्ला (भूला हुआ/भटका हआ) हां। मुरशद ने सीने से लगाकर भुल्ले को जग के बंधनों से मुक्त कर अल्हा की रमज़ से मिला दिया। बुल्ला गाने लगा -

आवो नी सईयों रल देवो नी वधाई
मैं वर पाया रांझा माही


बुल्ला ने अलाह को पाने को जो रास्ता अपनाया वो इश्क मिज़ाजी (इंसान से मोहब्बत) से होते हुए इश्क हकीकी (खुदा से मोहब्बत) को जाता है। बुल्ले ने एक (मुरशद) से इश्क किया और उस एक (खुदा) को पा लिया। बुल्ला कहता है,

राझां राझां करदी नी मैं आपे रांझा होई
सद्दो नी मैंनू धीदो रांझा हीर ना आखो कोई


जब औरंगज़ेब ने नाचने-गाने को गैर-इसलामी बताते हुए इस पर पाबंदी लगा दी तो शाह इनायत ने बुल्ले शाह को गांव-गांव घर-घर नाचते-गाते हुए जाने की ताकीद की, ताकि तानाशाही को जवाब दिया जा सके। बुल्ला नाचते-गाते हुए पंजाब में घूमता रहा। लोगों ने काफिर कहा तो बुल्ले ने मुस्कुरा कर कहा -

बुल्लेया आशिक होयों रब्ब दा, मलामत पई लाख,
लोकी काफर काफर आखदे, तूं आहो आहो आख।


बुल्ले शाह ने पंजाबी सूफी साहित्य को शाहकार रचनाएं दी। 162 काफीयां, एक अठवारा, एक बारहमाहा, तीन शीहहर्फीयां, 49 दोहे और 40 गांठे लिखी। नाम-जाति-पाति, क्षेत्र, भाषा, पाक-नापाक, नींद-जगने, आग-हवा, चल-अचल के दायरे से खुद को बाहर करते हुए खुद के अंदर की खुदी को पहचानने की बात बुल्ले शाह यूं कहता है-

बुल्ला की जाना मैं कौन

ना मैं मोमन विच मसीतां न मैं विच कुफर दीयां रीतां
न मैं पाक विच पलीतां, न मैं मूसा न फरओन
बुल्ला की जाना मैं कौन

न मैं अंदर वेद किताबां, न विच भंगा न शराबां
न रिंदा विच मस्त खराबां, न जागन न विच सौण
बुल्ला की जाना मैं कौन

न मैं शादी न गमनाकी, न मैं विच पलीती पाकी
न मैं आबी न मैं खाकी, न मैं आतिश न मैं पौण
बुल्ला की जाना मैं कौन

न मैं अरबी न लाहौरी, न मैं हिंदी शहर नगौरी
न हिंदू न तुर्क पिशौरी, न मैं रहंदा विच नदौन
बुल्ला की जाना मैं कौन

न मैं भेत मजहब दा पाया, न मैं आदम हव्वा जाया
न मैं अपना नाम धराएया, न विच बैठण न विच भौण
बुल्ला की जाना मैं कौन

अव्वल आखर आप नू जाणां, न कोई दूजा होर पछाणां
मैंथों होर न कोई स्याना, बुल्ला शौह खड़ा है कौन
बुल्ला की जाना मैं कौन


बुल्ले शाह ने मज़हब, शरीयत और जेहाद के असल मतलब समझाए। 1757 में अपने रांझे संग बुल्ला शाह तो इश्क हकीकी के गीत गाता हुआ, आसमान में तारा बन चमकने को इस धरती को अलविदा कह चला गया, लेकिन आज भी उसी कसूर पाकिस्तान में बाबा बुल्ले शाह की दरगाह पर उसके मुरीद सूफी गीत दिन भर गाते हुए, झूमते नजर आते हैं।



प्रस्तुति - जगदीप सिंह



4 टिप्‍पणियां:

anitakumar ने कहा…

जगदीप जी एक बहुत ही बेहतरीन पोस्ट, सहेज के रखने लायक्। पंजाबी सूफ़ी साहित्य और संगीत पर आप की और पोस्ट्स का इंतजार रहेगा, आशा है आप निराश नहीं करेगें।

neelam ने कहा…

jagdeepji ,
bahut dinon se talaash kar rahi thi ki ,kahi koi hai ,jo bulle shaah ke baare me kuch to bataaye ,aaj bulleshaah ke baare me jo nayab jaankaari aapne hume di hai ,uske liye hum aapka tahedil se aabhar vyakt karte hain ,

sumit ने कहा…

जगदीप जी,
बहुत ही अच्छा लेख, मैने इस गाने को सुना था पर मुझे बुल्ला शाह के बारे मे कुछ जानकारी नही थी , जब भी मै ये गीत सुनता मै इसके बोल समझने की कोशिश करता पर कभी समझ नही सका, आपके द्वारा बुल्ला शाह के बारे मे जानकारी और गीत के बोल ने मेरी दिल की तमन्ना को पूरा कर दिया

गीत के बोल और इस जानकारी के लिए धन्यवाद
सुमित भारद्वाज

Deep Jagdeep Singh ने कहा…

आप सब का आभार। यूं ही आशीश देते रहें, और लिखने का उत्साह मिलता रहेगा।

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