Skip to main content

रुक जा सुबह तक कि न हो ये रात आखिरी...- मन्ना डे की गैर फिल्मी ग़ज़लें

सुनिए मन्ना डे की ६ दुर्लभ गैर फिल्मी ग़ज़लें

मन्ना डे को कामयाबी आसानी से नहीं मिली। वे कहते हैं:"मैं लड़ना जानता हूँ,किसी भी हालात से जूझना सीखा है मैंने। मैंने सारी ज़िन्दगी मेहनत करी है और अब भी कर रहा हूँ। मैंने कभी हार नहीं मानी। संघर्ष में सबसे अच्छी बात होती है कि वो पल जब सब कुछ खत्म होता सा दिखाई पड़ता है उस पल ही कहीं से हिम्मत और आत्मविश्वास सा आ जाता है जो मुझे हारने नहीं देता। शास्त्रीय संगीत में रुचि रखने वाले हों या उससे अनभिज्ञ,सभी को मेरे गाने पसंद आते हैं। मेरी मेहनत, ट्रेंनिंग और अनुशासन की वजह से लोग मुझे विश्व भर में जानते हैं और सम्मान देते हैं।"

मन्ना डे को इस बात से दुख नहीं होता कि बाकी गायकों के मुकाबले उन्हें कम मौके मिले। उन्होंने लगभग सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया है। वे बताते हैं कि कईं बार संगीतकार उनसे गाना गवाना चाहते थे परन्तु हर बार संगीतकार ही निर्णय नहीं लेते। फिल्मी जगत में अभिनेताओं के पसंदीदा गायक हुआ करते हैं और गायक भी उसी कलाकार से पहचाने जाते रहे हैं। जैसे,रफी हमेशा नौशाद की पसंद रहे और उन्होंने दिलीप कुमार के अधिकतर गाने गाये। उसी तरह से राजकपूर के गाने मुकेश,देव आनंद और राजेश खन्ना के गाने किशोर कुमार गाया करते थे। मन्ना डे की अद्वितीय प्रतिभा बेकार नहीं गई और उन्हें हमेशा तारीफ व सम्मान मिला। संगीतकारों ने फिल्म में स्थिति के अनुरूप मन्ना डे के लिये गाने बनाये।

मशहूर गाने "लागा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे" के लिये मन्ना डे कहते हैं कि ये मेरे मित्र रोशन द्वारा दिया गया एक बेहतरीन गाना है। ये दुर्लभ गीतों में से एक है। मैं कहीं भी जाऊँ, देश अथवा विदेश, ये गाना जरूर गाता हूँ। यह एक कठिन गीत है जिसमें शास्त्रीय संगीत का माधुर्य छिपा हुआ है। ये गीत मेरे दिल और आत्मा से जुड़ा हुआ है। मैं पिछले ६० बरस से यह गा रहा हूँ और मैंने जब भी गाया है, पूरी ईमानदारी से गाया है।

जब उनसे पूछा गया कि अब तक का सबसे कठिन गाना कौन सा लगा, जिसमें सबसे ज्यादा मेहनत और रियाज़ करना पड़ा। उनका जवाब था फिल्म काबुलीवाला से गाना : "ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन"। ये गाना मुझे गले के एक ही हिस्से गाना था ताकि मैं इस गीत के द्वारा लोगों के दिलों तक इस गाने के भाव पहुँचा सकूँ।

सच में मन्ना, आप इसमें सफल हुए।
पद्मभूषण मन्ना डे भारतीय संगीत के महानतम व्यक्तित्व हैं। उनका जो योगदान भारतीय संगीत में रहा है उसे कोई नहीं भुला सकता। उनकी प्रसिद्धि केवल भारत में ही नहीं रही बल्कि विश्व के हर देश व स्थान में पहुँची जहाँ कहीं भी भारतीय रहते हैं या फिर भारतीय संगीत को चाहने वाले रहते हैं। लोग न केवल उनके संगीत का आदर करते हैं अपितु जिस तरह से वे मेलोडी और काव्य का मिश्रण करते हैं उसके सब कायल हैं।

मन्ना डे को पद्मष्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से नवाज़ा गया है। मन्ना डे को दिये गये अन्य सम्मान हैं:

* १९६९ में हिन्दी फिल्म "मेरे हुज़ूर" में सर्वोत्तम पार्श्व गायन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
* १९७१ में बंगाली फिल्म "निशि पद्म" में सर्वोत्तम पार्श्व गायन का राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड
* १९७१ में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अवार्ड
* १९८५ में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा लता मंगेशकर अवार्ड
* १९८८ में रेनेसां सांस्कृतिक परिषद,ढाका द्वारा माइकल साहित्यो पुरस्कार
* १९९० में मिथुन फैन एसोसियेशन द्वारा श्यामल मित्र अवार्ड
* १९९१ में श्री खेत्र कला प्रकाशिका, पुरी द्वारा संगीत स्वर्णाचुर्र अवार्ड
* १९९३ में पी.सी चंद्र ग्रुप की ओर से पी.सी. चंद्र अवार्ड
* १९९९ में कमला देवी ग्रुप की ओर से कमला देवी रॉय अवार्ड
* २००१ में आनंद बाज़ार समूह द्वारा की ओर से आनंदलोक लाइफटाइम अवार्ड
* २००२ में स्वरालय येसुदास अवार्ड
* २००३ में प.बंगाल सरकार द्वारा अलाउद्दीन खान अवार्ड
* २००४ केरल सरकार द्वारा राष्ट्रीय सम्मान
* २००५ महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाईफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड
* २००५ भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण

आइये ज़रा देखते हैं गानों की वो फेहरिस्त जिसको पढ़ने के बाद आपको लगने लगेगा कि मन्ना डे जैसा विभिन्न शैलियों में गाने वाला कलाकार कोई नहीं है। अगर बड़े बड़े साथी कलाकार उनका सम्मान करते थे और यहाँ तक कह डाला कि यह शख्स किसी भी अन्य गायक के गाने बड़ी आसानी से गा सकता है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं थी। यहाँ लिखे गानों में शायद ही कोई गाना होगा जो आपने नहीं सुना होगा। उनके द्वारा संगीतबद्ध और गाये हुए कुछ गाने निम्न प्रकाशित हैं:

उन्होंने कव्वाली (ये इश्क इश्क है, ए मेरी ज़ोहरा जबीन, यारी है ईमान मेरा), रोमांटिक (प्यार हुआ इकरार हुआ, आजा सनम मधुर, दिल की गिरह खोल दो,ये रात भीगी भीगी, सोच के ये गगन झूमे,मुड़-मुड़ के न देख,ओ चाँद मुस्कराया, शाम ढ्ले जमुना किनारे,ज़िन्दगी है खेल), शास्त्रीय संगीत में (पूछो न कैसे, सुर न सजे, लागा चुनरी में दाग, लपक झपक तू,नाचे मयूरा, केतकी गुलाब जूही,भय भंजना बंदना, भोर आई गया अँधियारा), इमोशनल(ज़िन्दगी कैसी है पहेली, कस्में वादे,दूर है किनारा, नदिया चले रे धारा) गाने तो दर्शकों को दिये ही बल्कि उस के साथ लोगों लोगों थिरकने पर मजबूर कर देने वाले गाने जैसे आओ ट्विस्ट करें,ज़िन्दगी है खेल कोई पास कोई फेल,दुनिया रंग बिरंगी,एक चतुर नार और चुनरी सम्भाल गोरी भी गाये।

देशभक्ति के गीतों की बात करें तो ऐ मेरे वतन के लोगों, जाने वाले सिपाही से पूछो, होके मजबूर, हिन्दुस्तान की कसम जैसे मशहूर गाने उनके नाम रहे। अन्य कुछ बेहतरीन गाने थे "तू प्यार का सागर है, मेरे सब कुछ मेरे गीत, तू है मेरा प्रेमदेवता, हे राम वगैरह। मेरा नाम जोकर के गाने "ऐ भाई जरा देख कर चलो" के लिये उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।

मन्ना के बहुत से फिल्मी गीत हम आपको इस लेख के पहले अंक में सुनवा चुके हैं और आगे भी सुनवाते रहेंगे, पर मन्ना डे की गायकी का एक और पहलू भी है जिससे बारे में बहुत कम कहा सुना गया है. मन्ना डे के गैर फिल्मी ग़ज़लें अपनी ख़ास अदायगी के चलते अपना एक विशिष्ट ही स्थान रखती है, हमें यकीं है मन्ना की जो ग़ज़लें आज हम आपको सुन्वायेंगें उन्हें सुनकर आप भी यही कहेंगे, तो आनंद लीजिये आवाज़ और अंदाज़ के इस खूबसूरत संगम का -

दर्द उठा फ़िर हल्के हल्के....


हैरान हूँ ऐ सनम...


मेरी भी एक मुमताज़ थी...


मुझे समझाने मेरे...


ओ रंग रजवा रंग दे ऐसी चुनरिया ...


और अंत में सुनिए-
रुक जा सुबह तक न हो ये रात आखिरी...


प्रस्तुति - तपन शर्मा

Comments

छा गए यार .....मजेदार

अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
मन्ना दा के बारें में एक बेहद रोचक और कलात्मक लेख!

मन्ना दा एक बेहतरीन गायक थे और ये बात शत प्रतिशत सत्य है, कि वे कोई भी गाना , किसी भी मूड का, रंग का , और किस्म का, गा सकते थे. उनकी रेंज और विविधता , साथ ही में उनके गले का लोच, तानें मुरकीयां, सभी सर्वोत्तम थी. उनके आगे प्रतिभा में सिर्फ़ रफ़ी ही टिक पाये, रेंज में और विविधता में.

यूं शास्त्रीयता में , या Rap - डायलॊग टाईप के गानों में वे रफ़ी से आगे निकल गये.मगर सिर्फ़ एक बात में रफ़ी की आवाज़ नें बाज़ी मारी , उनकी आवाज़ में youthful presence.मन्ना दा की आवाज़ के Timbre में धीर गंभीर गोलाई की वजह से किसी भी गायक नें उन्हे अपनाया नही.

यही वजह रही होगी, संगीतकारों नें सिर्फ़ कठिन गानों के लिये ही मन्ना दा को याद किया. सिर्फ़ मेहमूद को छोड अन्य किसी नायक की आवाज़ को स्थायित्व नही दे पाये.
तपन भाई, जब आपने पोस्ट किया था, तब सुनना रह गया था। आज सुना। 'ओ रंगरेजवाँ' सुनकर क़ास आनंद आया। हैप्पी बर्थडे टू मन्ना डे।

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT

स्वरगोष्ठी – 214 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया