Skip to main content

"मन क्यों बहका री बहका आधी रात को…”, क्यों प्यारेलाल इस गीत के लिए वनराज भाटिया का शुक्रिया अदा करते हैं?



एक गीत सौ कहानियाँ - 93

'मन क्यों बहका री बहका आधी रात को...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 93-वीं कड़ी में आज जानिए 1984 की फ़िल्म ’उत्सव’ के मशहूर गीत "मन क्यों बहका री बहका आधी रात को..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और आशा भोसले ने गाया था। बोल वसन्त देव के और संगीत लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का। 

ता मंगेशकर और आशा भोसले के गाए युगल गीतों को सुनने का एक अलग ही आनन्द है। फ़िल्म-संगीत के आकाश में ये दोनों बहने सूरज और चाँद की तरह चमकते रहे हैं। और जब जब इन दोनों ने साथ में कोई गीत गाया, गीत को एक अलग ही पहचान मिली। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे कुल 84 गीत हैं जिनमें लता जी और आशा जी, दोनों की आवाज़ें शामिल हैं। इनमें से कुछ गीतों में अन्य गायक कलाकार भी शामिल हैं। अगर लता-आशा डुएट्स की बात करें तो यह संख्या 62 के करीब है। पहली बार इन बहनों को 1949 की फ़िल्म ’बाज़ार’ में साथ में गवाया था संगीतकार श्यामसुन्दर ने, जिसमें राजकुमारी की आवाज़ भी शामिल थी, गीत के बोल थे “ज़रा सुन लो हम अपना...”। इसी साल मोहम्मद रफ़ी और सतीश बत्रा के साथ इन्हें संगीतकार विनोद ने गवाया ’एक थी लड़की’ में, जिसके बोल थे “हम चले दूर...”। लता-आशा का पहला युगल गीत वर्ष 1951 में रेकॉर्ड हुआ फ़िल्म ’दामन’ के लिए। के. दत्ता के संगीत में यह गीत था “ये रुकी रुकी हवायें...”। फिर इसके बाद तो इन बहनों को कई संगीतकारों ने गवाये जैसे कि रोशन, शंकर जयकिशन, हेमन्त कुमार, सी. रामचन्द्र, नौशाद, मदन मोहन, वसन्त देसाई, एस. एन. त्रिपाठी, सचिन देव बर्मन, आदि नारायण राव, रवि, दत्ताराम, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, ख़य्याम, राम लक्ष्मण और दिलीप सेन – समीर सेन। छोटे भाई हृदयनाथ मंगेशकर ने बड़ी बहनों और आशा जी के पुत्र हेमन्त भोसले ने भी अपनी माँ और मासी को एक साथ माइक के सामने ला खड़ा किया था। लता जी और आशा जी ने आख़िरी बार 1997 की फ़िल्म ’लवकुश’ में साथ में गाया था राम लक्ष्मण के संगीत में। वैसे वर्ष 2000 में जगजीत सिंह के ऐल्बम में “कहीं कहीं से हर चेहरा...” गीत साथ में गाया था। इस गीत में जगजीत सिंह की आवाज़ भी शामिल थी।

80 के दशक में जिस लता-आशा डुएट ने सर्वाधिक धूम मचाई, वह था फ़िल्म ’उत्सव’ का “मन क्यों बहका री बहका आधी रात को...”। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ कार्यक्रम में प्यारेलाल जी ने इस गीत का उल्लेख करते हुए कहा था, “देखिए सबसे मज़े की बात क्या थी इसमें कि एक तो वह गाना जो लिखा गया, वह बहुत ही अच्छा, वसन्त देव जी। उसके बाद जब उसके धुन बनी, सबसे जो मैंने उसमें एन्जॉय किया वह लता जी और आशा जी। मेरे ख़याल से उसके बाद उन्होंने साथ में गाया है कि नहीं, मुझे मालूम नहीं, लेकिन जो दोनो गा रही थीं, उसका हम आनन्द ले रहे थे; एक ज़रा बोले ऐसे, फिर दूसरी बोलती थीं, इतना ख़ूबसूरत लगा और मतलब, मैं तो बोलूंगा कि नेक टू नेक बिल्कुल, जैसे लता जी ने गाया, वैसा ही आशा जी ने गाया है। इस पूरे पिक्चर के अन्दर बड़ी मेहनत की हमने, क्योंकि क्या है कि गिरिश कारनाड जी बहुत ही सेन्सिबल टाइप के आदमी हैं, हर एक चीज़ प्री-प्लान्ड, बल्कि लास्ट क्लाइमैक्स के पहले दो तीन रील तो गाने ही गाने हैं, दो रील में ख़ाली गाने हैं, गाने चल ही रहे थे और बहुत मेहनत किया हम लोगों ने। और मुझे सबसे ख़ुशी क्या हुई जो मैं आपको बोलना चाहूंगा, कि शशि कपूर जी की पिक्चर, हमेशा श्याम बेनेगल या वो करते थे, और गिरिश कारनाड, जो भी करते थे, हमेशा म्युज़िक होता था वनराज भाटिया का। तो मुझे सबसे बड़ी ख़ुशी तब हुई कि एक दिन मुझे फ़ोन किया वनराज जी ने, बोले, I am very very impressed and very glad and both of you have done a great job। मुझे लगा कि आज भी अच्छे लोग हैं दुनिया में, नहीं तो होता है कि हमारी पिक्चर छीन गई, यह बड़प्पन है उन लोगों का, जो अच्छे लोग होते हैं, तो I am real thankful to Mr Vanraj Bhatia।" 

इस गीत की रेकॉर्डिंग् से जुड़ा एक और क़िस्सा प्यारेलाल जी ने एक अन्य साक्षात्कार में बताया था। जैसा कि सभी जानते हैं कि लता जी और आशा जी में हेल्दी प्रोफ़ेशनल राइवलरी हमेशा ही रही है, इस वजह से जब भी कभी एक साथ डुएट गाने की बारी आती तो दोनों अपने अपने तरीके से एक दूसरे से बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिशें करते। इस गीत में भी यही हुआ। रिहर्सल होकर गीत रेकॉर्डिंग् तक जा पहुँचा। लता जी और आशा जी आमने-सामने शीशे के केबिनों में गा रही थीं। जैसा कि इस गीत का स्वरूप है कि हर पंक्ति का पहला भाग लता जी गाती हैं, और दूसरा भाग आशा जी, तो एक तरह से लता जी सुर को लेती हैं और आशा जी सुर को छोड़ती हैं। तो गीत के एक जगह पर रिहर्सल के दौरान दोनों बहनों ने जिस तरह से गाया था, असली रेकॉर्डिंग् के समय आशा जी ने एक अलग ही मुड़की ले ली। लता जी ने जैसे ही यह महसूस किया, तो वो आशा की तरफ़ देखीं और मुस्कुरायीं और सहमती से सर हिलाया। आपस में प्रतिस्पर्धा होते हुए भी दोनों एक दूसरे की अच्छी बातों को सराहने में पीछे नहीं रहती थीं। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Comments

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...

छम छम नाचत आई बहार....एक ऐसा मधुर गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 366/2010/66 "ए क बार फिर बसंत जवान हो गया, जग सारा वृंदावन धाम हो गया, आम बौराई रहा, सरसों भी फूल रहा, खेत खलिहान शृंगार हो गया, पिया के हाथ दुल्हन शृंगार कर रही, आज धूप धरती से प्यार कर रही, बल, सुंदरता के आगे बेकार हो गया, सृष्टि पे यौवन का वार हो गया, रात भी बसंती, प्रभात भी बसंती, बसंती पिया का दीदार हो गया, सोचा था फिर कभी प्यार ना करूँगा, पर 'अंजाना' बसंत पे निसार हो गया, एक बार फिर बसंत जवान हो गया।" अंजाना प्रेम ने अपनी इस कविता में बसंत की सुंदरता को शृंगार रस के साथ मिलाकर का बड़ा ही ख़ूबसूरत नज़ारा प्रस्तुत किया है। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं इस रंगीले मौसम को और भी ज़्यादा रंगीन बनानेवाले कुछ रंगीले गीत इस 'गीत रंगीले' शृंखला के अंतर्गत। आज प्रस्तुत है राग बहार पर आधारित लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'छाया' का गीत "छम छम नाचत आई बहार"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। १९६१ की यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल...