Skip to main content

अभिनेत्री नन्दा को श्रद्धांजलि आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में...


एक गीत सौ कहानियाँ - 26
 

‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम...’



"मुझे अभी-अभी पता चला कि अभिनेत्री नन्दा, जिसे हम बेबी नन्दा कहते थे, वो अब हमारे बीच नहीं रही। यह सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। बेबी नन्दा जब 4-5 साल की थी, तब उसने 'मन्दिर' फ़िल्म में मेरे छोटे भाई की भूमिका निभायी थी। मैं नन्दा के पिताजी मास्टर विनायक जी की कम्पनी में बतौर बाल कलाकार 1943 से काम करती थी। मेरी और नन्दा और उसकी बड़ी बहन मीना के साथ बड़ी दोस्ती थी। नन्दा की पहली फ़िल्म 'तूफ़ान और दीया' से मैंने नन्दा के लिए प्लेबैक शुरु किया। बहुत अच्छी इंसान थी। भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे।" --- लता मंगेशकर


भिनेत्री नन्दा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लता जी के उपर्युक्त शब्दों से पता चलता है कि कितना अन्तरंग रिश्ता रहा होगा दोनों में। आज नन्दा जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए लता जी के गाये और नन्दा जी पर फ़िल्माये फ़िल्म 'हम दोनो' के भजन "अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" से बेहतर कोई रचना नहीं होगी। गाँधीवादी विचारधारा लिये राग गौड़ सारंग आधारित इस भजन को सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पारम्परिक रचना होगी। पर नहीं, यह एक फ़िल्मी गीत है जिसे साहिर लुधियानवी ने लिखा है और जयदेव ने स्वरबद्ध किया है। फ़िल्मी भजनों की श्रेणी में शायद सर्वोपरि है यह भजन। यह केवल भजन ही नहीं, बल्कि साप्रदायिक एकता और अहिंसा का संदेश भी है। ख़ास बात यह है कि स्वतंत्र संगीतकार के रूप में यह जयदेव की पहली भक्ति रचना थी। जयदेव के ही शब्दों में, "बतौर स्वतन्त्र संगीतकार, मेरी पहली फ़िल्में थीं 'जोरु का भाई', 'किनारे-किनारे' और 'नवकेतन' की एक फ़िल्म, जो सारे के सारे नाकामयाब रहे। फिर मुझे मिला 'हम दोनो"। तो पहली ही भजन में इस तरह की सफलता यकायक देखने को नहीं मिलती। इस भजन की गायिका, स्वयं लता जी कहती हैं, "इस भजन को अगर सुबह और रात के वक़्त सुना जाये तो एक अजीब सी सुकून मिलता है" (जयमाला, विविध भारती)। लता जी को यह भजन इतना पसन्द है कि नूरजहाँ जब कई वर्ष बाद भारत आयीं थीं और उनके स्वागत में -'Mortal Men, Immortal Melodies' नामक शो आयोजित किया गया था, उस शो में लता जी ने इसे शामिल किया था। रूपक ताल में स्वरबद्ध यह भजन सुनने में कितना सीधा-सरल लगता है, ध्यान से सुनने पर अहसास होता है कि जयदेव ने कितनी मेहनत की होगी इस पर। गीत निचले स्वर से शुरू होकर क्रमश: ऊपर के स्वरों तक पहुंचता चला जाता है। एक तरफ़ लता की आवाज़ और दूसरी तरफ़ कोरस की आवाज़, इन दो आवाज़ों के साथ जयदेव ने क्या ख़ूब प्रयोग किया हैं। दो आवाज़ों को एक बार मिला दिया और फिर किस सुन्दरता से दोनों को अलग कर दिया, इन सब छोटी-छोटी बातों से भी इस भजन में निखार आया है।

केवल लता जी ही नहीं, इस भजन के कद्रदानों की संख्या बहुत बड़ी है। फ़िल्म-संगीत के पहले दौर के कलाकारों से लेकर आज के दौर के कलाकारों में इस भजन के चाहनेवाले शामिल हैं। तिमिर बरन और उमा देवी ने अपने अपने 'जयमाला' कार्यक्रमों में इस भजन को चुना था। कलात्मक फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार अजीत वर्मन ने इस भजन के बारे में अपने 'जयमाला' में फ़ौजी भाइयों से कहा है, "मेरे भाई, अभी जो गाना मैं सुनाने जा रहा हूँ, सच्ची, जब मैं अकेला, अकेला तो मैं हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरा दिल मेरे साथ रहता है, my heart is my inspiration, हाँ तो यह गाना जयदेव का "अल्लाह तेरो नाम" इतना अच्छा भजन बहुत कम बना है। इतना सिम्पल वो ही बना सकता है जो बहुत लम्बी राह चला हो।" अनूप जलोटा द्वारा प्रस्तुत 'हिट सुपरहिट फ़ेवरिट फ़ाइव' कार्यक्रम में अपने मनपसन्द पाँच गीतों में सर्वप्रथम उन्होंने इसी भजन को चुना और कहा, "मुझे बहुत पसन्द है लता जी का गाया "अल्लाह तेरो नाम"। यह कहूँगा कि इसकी ख़ूबी है कि कितनी सरल कम्पोज़िशन और कितनी पावरफ़ुल कम्पोज़िशन है जिसे जयदेव जी ने बनायी है, लता जी ने गाया तो अच्छा ही है, लेकिन आपको एक छोटा सा उदाहरण दे दूँ इस गाने के बारे में, कि इससे ज़्यादा सरल क्या हो सकती है कम्पोज़िशन की कि इसका स्थायी और अन्तरा एक ही धुन पर है। सिर्फ़ "स" को "म" कर दिया।" इस भजन के कद्रदानों में कविता कृष्णमूर्ती, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, स्वानन्द किरकिरे और सोनू निगम भी शामिल हैं।

जयदेव और लता
फ़िल्म 'हम दोनों' में लता के गाये दो भजन हैं - एक तो "अल्लाह तेरो नाम" और दूसरा भजन है राग धानी आधारित "प्रभु तेरो नाम, जो ध्याये फल पाये"। कुछ लोगों के अनुसार "अल्लाह तेरो नाम" "प्रभु तेरो नाम" का ही एक दूसरा संस्करण है, पर सच्चाई यह है कि ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग, और स्वतंत्र रचनाएँ हैं। दोनों भजन नन्दा पर फ़िल्माया गया है। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा, यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी की उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। "अल्लाह तेरो नाम" भजन में दो अन्तरे हैं। फ़िल्म के पर्दे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर, दोनों में दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं। पर एक बात ध्यान देने योग्य हैं कि जब जयदेव जी ने विविध भारती पर अपनी 'जयमाला' प्रस्तुत की थी, उसमें इस भजन को सुनवाते हुए कहा था, "फ़ौजी भाइयों, जो सेवा आप हमारी कर रहे हैं, इस देश की रक्षा कर रहे हैं, हम सब आप लोगों के शुक्रगुज़ार हैं, आप जहाँ भी हों, पहाड़ों में, सहराओं में, समन्दरों में, भगवान आप को ख़ुश रखें, आप के परिवारों को ख़ुशहाल रखें। इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान। सबको मिले सुख-शान्ति, यही है ईश्वर से मेरी प्रार्थना"। अगर आप इन शब्दों पर ग़ौर करें तो साफ़-साफ़ इस भजन का तीसरी अन्तरा हमारे सामने आ जाता है - "इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान, सबको सन्मति दे भगवान"। तो क्या यह तीसरा अन्तरा भी साहिर साहब ने लिखा था जिसे गीत में जगह नहीं मिली? या फिर ये शब्द जयदेव जी के ही थे इस कार्यक्रम के लिए? क्या पता!

साहिर
इस दौर के सुप्रसिद्ध गीतकार स्वानन्द किरकिरे ने हाल में इस भजन की सुन्दर स्मीक्षा की है, जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस तरह का है - "पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो अहसास होता है कि बहुत सालों तक मैंने सही मायने में इस भजन के शब्दों पर ग़ौर नहीं किया था। अपनी उम्र के तीसरे दशक में पाँव रखने के बाद मैं इस भजन के बोलों की ओर आकर्षित हुआ और समझ आया कि ये बोल क्या संदेश दे रहे हैं। मैंने आविष्कार किया कि "अल्लाह तेरो नाम" महज़ एक भजन नहीं है, यह युद्ध के ख़िलाफ़ एक दरख्वास्त है। कुछ तो बात है इस गीत में कि यह मेरे साथ रहा है इतने सालों से। इसे मैं गीत नहीं समझता, यह तो एक प्रार्थना है, श्लोक है, अमृत वाणी है, और मेरे अनुसार यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। इस गीत के साथ मेरी जो सबसे पुरानी स्मृतियाँ हैं, वो ये कि इसे हमारे स्कूल में स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर गाया जाता था। और मेरी यह धारणा थी कि मैं इसे जानता हूँ, समझता हूँ। पर उस वक़्त मैं ग़लत था। बोलों की अगर बात करें तो मुझे नहीं लगता कि साहिर साहब से बेहतर कोई इसे लिख पाते, जिनकी शायरी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। यह उनका ही कमाल है कि एक साधारण प्रार्थना गीत में उन्होंने ऐसी सोच, ऐसे उच्च विचार भरे हैं कि यह एक यूनिवर्सल प्रेयर बन गया है। अगर पहला अन्तरा हीरा है तो दूसरे अन्तरे में तो साहिर साहब ने काव्य के गहराई की हर सीमा पार कर दी है। "ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले, बलवानों को दे दो ज्ञान" हमें एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। इसमें मीटर है, मेलडी है, अर्थ है, गहराई है। युद्ध में विश्वास रखने वालों और बिना कुछ जाने एक दूसरे को मारने वालों के लिए यह गीत जैसे एक व्यंग है, वार है। इस गीत का एक और आकर्षण है साज़ों का अरेन्जमेण्ट और कम्पोज़िशन। कमचर्चित संगीतकार जयदेव ने इस गीत में कई रागों को इस तरह से छिड़का है कि एक आकर्षण करने वाली ख़ुशबू सी आती है जब जब इसे सुनते हैं। इसे हर बार सुनते हुए मेरी आँखें भर आती हैं। लता जी ने यह गीत गाया है। सोनू निगम एक और गायक हैं जो इसे बहुत ख़ूबसूरती से गाते हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूँ, अपने दोस्तों के साथ बैठ जाता हूँ उनसे यह गीत सुनने के लिए। यह गीत एक बेहतरीन उदाहरण है एक सशक्त और सर्वव्यापी प्रार्थना का जो मुझे अपने जज़्बातों और देशभक्ति भावना को जगाने में मदद करती है। इस भजन के सुर मेरे विवेक में और मुझमें समाया हुआ है, हमेशा हमेशा।"

इसी गीत के माध्यम से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से स्वर्गीय अभिनेत्री नन्दा को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे!

फिल्म - हम दोनों : अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...' : लता मंगेशकर : संगीत - जयदेव : गीतकार - साहिर लुधियानवी 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज और आलेख - सुजॉय चटर्जी व कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Comments

वाकई एक अद्भुत गीत. नन्दा जी को श्रद्धान्जलि.

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...

छम छम नाचत आई बहार....एक ऐसा मधुर गीत जिसे सुनकर कोई भी झूम उठे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 366/2010/66 "ए क बार फिर बसंत जवान हो गया, जग सारा वृंदावन धाम हो गया, आम बौराई रहा, सरसों भी फूल रहा, खेत खलिहान शृंगार हो गया, पिया के हाथ दुल्हन शृंगार कर रही, आज धूप धरती से प्यार कर रही, बल, सुंदरता के आगे बेकार हो गया, सृष्टि पे यौवन का वार हो गया, रात भी बसंती, प्रभात भी बसंती, बसंती पिया का दीदार हो गया, सोचा था फिर कभी प्यार ना करूँगा, पर 'अंजाना' बसंत पे निसार हो गया, एक बार फिर बसंत जवान हो गया।" अंजाना प्रेम ने अपनी इस कविता में बसंत की सुंदरता को शृंगार रस के साथ मिलाकर का बड़ा ही ख़ूबसूरत नज़ारा प्रस्तुत किया है। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुन रहे हैं इस रंगीले मौसम को और भी ज़्यादा रंगीन बनानेवाले कुछ रंगीले गीत इस 'गीत रंगीले' शृंखला के अंतर्गत। आज प्रस्तुत है राग बहार पर आधारित लता मंगेशकर की आवाज़ में फ़िल्म 'छाया' का गीत "छम छम नाचत आई बहार"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत की तर्ज़ बनाई है सलिल चौधरी ने। १९६१ की यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल...