रविवार, 26 जनवरी 2014

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : महात्मा गाँधी का प्रिय भजन



  
स्वरगोष्ठी – 152 में आज

रागों में भक्तिरस – 20

एक भजन जिसे राष्ट्रव्यापी सम्मान मिला 
  
‘वैष्णवजन तो तेने कहिए...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल की ओर से सभी पाठकों-श्रोताओं को आज गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक बधाई। आज के इस पावन राष्ट्रीय पर्व पर हम अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं, एक विशेष अंक। आपको स्मरण ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ जारी है। आज इस श्रृंखला की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत की है। इसके साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवाए। श्रृंखला की पिछली 19 कड़ियों में हमने हिन्दी के अलावा मराठी, कन्नड, गुजराती, राजस्थानी, ब्रज, अवधी आदि भाषा-बोलियों में रचे गए भक्तिगीतों का रसास्वादन कराने का प्रयास किया। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर हम आपसे एक ऐसे भजन पर चर्चा करेंगे, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकप्रियता प्राप्त है। पन्द्रहवीं शताब्दी के भक्तकवि नरसी मेहता का पद- ‘वैष्णवजन तो तेने कहिए...’ महात्मा गाँधी की प्रार्थना सभाओं में गाये जाने के कारण राष्ट्रीय स्तर का गीत बन चुका है। आज हम आपको यह भजन संगीत के वरिष्ठ कलासाधकों, उस्ताद राशिद खाँ, उस्ताद शाहिद परवेज़ और विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी सहित चौथे दशक की फिल्मों की सुप्रसिद्ध गायिका अमीरबाई कर्नाटकी के  स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। 
 


गुजराती साहित्य के सन्तकवि नरसी मेहता का जन्म गुजरात के जूनागढ़ अंचल में 1414 ई. में हुआ था। उनके कृतित्व की गुणबत्ता से प्रभावित होकर भारतीय साहित्य के इतिहासकारों ने ‘नरसी-मीरा’ के नाम से एक स्वतंत्र काव्यकाल का निर्धारण किया है। पदप्रणेता के रूप में गुजराती साहित्य में नरसी मेहता का लगभग वही स्थान है जो हिन्दी में महाकवि सूरदास का है। उनके माता-पिता का बचपन में ही देहान्त हो गया था। बाल्यकाल से ही साधु-सन्तों की मण्डलियों के साथ भ्रमण करते रहे। यहाँ तक कि एक बार द्वारका जाकर रासलीला के दर्शन भी किए। इस सत्संग का उनके जीवन पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि वे गृहस्थ होते हुए भी हर समय कृष्णभक्ति में तल्लीन रहते थे। नरसी मेहता तत्कालीन समाज में व्याप्त आडम्बर और रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्षरत थे। उनके लिए सब बराबर थे। वे छुआ-छूत नहीं मानते थे और हर मानव को बराबर समझते थे। उन्होने हरिजनों की बस्ती में जाकर उनके साथ कीर्तन भी किया करते थे। इससे क्रुद्ध होकर बिरादरी ने उनका बहिष्कार तक कर दिया, पर वे अपने मत से डिगे नहीं। एक जनश्रुति के अनुसार हरिजनों के साथ उनके सम्पर्क की बात सुनकर जब जूनागढ़ के राजा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो कीर्तन में लीन नरसी मेहता के गले में अन्तरिक्ष से फूलों की माला पड़ गई थी। जिस नागर समाज ने उन्हें बहिष्कृत किया था अन्त में उसी समाज ने उन्हें अपना रत्न माना और आज भी गुजरात में ही नहीं सम्पूर्ण देश में उनकी मान्यता है। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से अभिसिंचित उनकी कृतियों का एक समृद्ध भण्डार है। उनकी कुछ चर्चित कृतियाँ हैं- सुदामा चरित्र, गोविन्द गमन, दानलीला, चातुरियो, राससहस्त्रपदी, श्रृंगारमाला आदि। अनेक पदों में उन्होने मानव-धर्म की व्याख्या की है। गाँधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ में भी भक्त नरसी ने सच्चे मानव-धर्म को ही परिभाषित किया है। भजन का मूल पाठ इस प्रकार है-

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे। 

पर दुःखे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे।

सकळ लोकमाँ सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे। 

वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे। 

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। 

 जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।

मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमाँ रे। 

रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमाँ रे। 

वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। 

भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥

‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में आप इस भजन को जुगलबन्दी के रूप में सुनेगे। रामपुर सहसवान गायकी में सिद्ध उस्ताद राशिद खाँ और सितार के इटावा बाज के संवाहक उस्ताद शाहिद परवेज़ की अनूठी जुगलबन्दी में नरसी का यह भजन प्रस्तुत है। इन दोनों कलासाधकों ने भजन के भाव पक्ष को राग खमाज के स्वरों में भलीभाँति सम्प्रेषित किया है। राग खमाज की चर्चा हम इस जुगलबन्दी के बाद करेंगे।



गायन और सितार वादन जुगलबन्दी : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : उस्ताद राशिद खाँ और उस्ताद शाहिद परवेज़





महात्मा गाँधी के सर्वप्रिय भजनों में सम्मिलित नरसी मेहता के इस भजन को प्रस्तुत करने के लिए राग खमाज के स्वर सम्भवतः सबसे उपयुक्त है। अधिकतर गायक-वादक कलासाधकों ने भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ को खमाज या मिश्र खमाज में ही प्रस्तुत किया है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट के सिद्धान्त का खमाज भी एक थाट है। राग खमाज इसी थाट का आश्रय राग माना जाता है। इसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। अर्थात इसकी जाति षाड़व-सम्पूर्ण है। इसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन के लिए उपयुक्त होता है। राग खमाज श्रृंगार और भक्ति भाव की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त होता है। इसीलिए अधिकतर ठुमरी गायन में इसी राग का प्रयोग किया जाता है।

अब हम आपको नरसी मेहता का यह भजन विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनवाते है। संगीत की दक्षिण और उत्तर भारतीय, दोनों संगीत पद्यतियों में दक्ष, विश्वविख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी ने अनेक भक्त कवियों की रचनाओं को अपना स्वर देकर अविस्मरणीय कर दिया है। भारत की लगभग सभी भाषाओं में गाने वाली एम.एस. शुभलक्ष्मी को 1988 में भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारतरत्न’ से अलंकृत किया गया था। आइए इन्हीं महान गायिका से सुनते हैं, नरसी मेहता का यह पद।



नरसी भजन : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी





गुजराती के भक्तकवि नरसी मेहता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर 1940 में फिल्म ‘नरसी भगत’ का निर्माण हुआ था। उस समय के चर्चित गायक-अभिनेता विष्णुपन्त पगनीस ने इस फिल्म में भक्त नरसी की भूमिका की थी। फिल्म में अभिनेत्री दुर्गा खोटे और अमीरबाई कर्नाटकी ने भी गायन-अभिनय किया था। फिल्म के गीतो को शंकरराव व्यास ने संगीतबद्ध किया था। फिल्म में यह भजन विष्णुपन्त पगनीस और अमीरबाई कर्नाटकी ने अलग-अलग गाया था। इस भजन को गाकर अमीरबाई कर्नाटकी को अपार लोकप्रियता मिली थी। फिल्म में गाये अमीरबाई के इस भजन को सुन कर महात्मा गाँधी ने गायिका की प्रशंसा की थी। अब आप यह भजन गायिका अमीरबाई कर्नाटकी के स्वर में सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 





नरसी भजन : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म नरसी भगत





   
आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 152वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – आलाप के इस अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस आलाप में आपको किस राग का संकेत प्राप्त हो रहा है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 154वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

   
पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 150वीं कड़ी में हमने आपको गोस्वामी तुलसीदास के एक पद के गायन का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- दादरा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

150वें अंक की पहेली के साथ ही हमारी यह श्रृंखला भी पूरी हुई। इस श्रृंखला में सर्वाधिक 18 अंक लेकर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान, 12-12 अंक अर्जित कर हमारे दो प्रतियोगियों, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दूसरा स्थान तथा 5 अंक प्राप्त कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई।

   
अपनी बात


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक के साथ ही हमारी यह लघु श्रृंखला भी पूर्ण हुई। हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में हम अवसर विशेष को ध्यान में तैयार किया गया अंक प्रस्तुत करने जा रहे हैं। अगले अंक के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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