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क्या प्यार की मदहोशियाँ और सुरीली सरगोशियाँ लौटेगीं ‘आशिकी’ के नए दौर में

प्लेबैक वाणी -43 - संगीत समीक्षा - आशिकी 2



महेश भट्ट और गुलशन कुमार ने मिलकर जब आशिकी की संकल्पना की थी नब्बे के दशक में, तो शायद ये अपने तरह की पहली फिल्म थी जिसके लिए गीतों का चयन पहले हुआ और फिर उन गीतों को माला में पिरोकर एक प्रेम कहानी लिखी गयी. फिल्म के माध्यम से राहुल रॉय और अनु अग्रवाल का फिल्म जगत में पदार्पण हुआ. ये कैसेट्स क्रांति का युग था जिसके कर्णधार खुद गुलशन कुमार थे. गुलशन कुमार हीरों के सच्चे पारखी थे, जिन्होंने चुना कुमार सानु, अलका याग्निक, अनुराधा पौडवाल और नितिन मुकेश को पार्श्वगायन के लिए, संगीत का जिम्मा सौंपा नदीम श्रवण को और गीतकार चुना समीर को. ये सभी कलाकार अपेक्षाकृत नए थे, मगर इस फिल्म के संगीत की सफलता के बाद ये सभी घर घर पहचाने जाने लगे. ये विज़न था गुलशन कुमार और महेश भट्ट का, जिसने तेज रिदम संगीत के सर चढ कर बोलते काल में ऐसे सरल, सुरीले और कर्णप्रिय संगीत को मार्केट किया. फिल्म के पोस्टर्स तक बेहद रचनात्मक रूप से रचे गए थे, जिसमें बेहद सफाई से युवा नायक और नायिका का चेहरा उजागर होने से बचाया गया था. ये आत्मविश्वास था उस निर्माता निर्देशक टीम का जिन्होंने साबित कर दिया कि चमकते सितारों के चेहरों के परे भी संगीत का वजूद संभव है.

हिंदी फिल्म संगीत के सफर में आशिकी एक मील का पत्थर था, लगभग दो दशक बाद गुलशन कुमार के सुपत्र भूषण ने फिर एक बार वही आशिकी का दौर लौटने की सोची फिर एक बार महेश भट्ट के मार्गदर्शन में. पर जाहिर है दौर बदल चुका है, दो दशकों में देश की दिशा, दशा और सोच सब कुछ बदल चुका है. तो यक़ीनन बहुत कुछ आशिकी २  में भी बदलना लाजमी है. नई आशिकी के निर्देशक हैं मोहित सूरी, संगीत का जिम्मा आजकल के चलन अनुरूप सीमित हाथों में न होकर एक पूरी टीम ने मिल बाँट कर संभाला है. रोक्क् संगीत ने मेलोडी की जगह भर दी है, पर बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं बदला है यहाँ भी संगीत नामी गिरामी चेहरों का मोहताज नहीं है, किसी भी आईटम गीत का जबरदस्ती का दखल नहीं है और सबसे बढ़कर, ये आशिकी भी संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन में अच्छे और सच्चे संगीत के प्रति आस्था और उम्मीद का संचार करता है, चलिए एक नज़र डालें एल्बम के गीतों पर

बर्फी के फिर ले आया दिल की मधुरता को सुनकर ही सही पर भूषण ने अरिजीत सिंह को प्रमुख गायक के रूप में चुनकर अपने पिता के हुनर को (सही घोड़े पर दांव लगाने के) एक कदम आगे ही बढ़ाया है. अरिजीत की मखमली और जूनून से भरी आवाज़ में तुम ही हो सुनकर आनंद आ जाता है. गिटार का क्या खूब इस्तेमाल किया है संगीतकार मिथुन ने. शब्द सरल और बेहद रोमानियत से भरपूर है. ये गीत जवां दिलों को धड्कायेगा और मासूम आशिकी का सुनहरा दौर फिर से लौटा लाएगा यक़ीनन.

सुन रहा है न तू के संगीतकार गायक हैं अंकित तिवारी. गीत सोफ्ट सूफी रोक्क् जोनर का है, जहाँ गीतकार संदीप नाथ शब्दों के मानों को लेकर कुछ उलझन में सुनाई देते हैं मंजिलें रुसवा हैं और करम की अदाएं जैसे फ्रेस अपने नए थीम के बावजूद शाब्दिक रूप से गीत को कमजोर बना देते हैं, पर कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनमें किसी एक पक्ष के कमजोर होने पर भी अन्य पक्षों की उत्कृष्टता उन कमियों को छुपा से देते हैं, ये शानदार गीत भी उसी श्रेणी का है. अंत में कोरस का प्रयोग गीत को और जानदार बना देता है

चाहूँ मैं आना और हम मर जायेंगें में अल्बम रोक्क् जोनर से निकल कर मेलोडी में प्रवेश करने की एक हल्की सी कोशिश करती है. गीत बुरे नहीं है, पर ये आज के दौर के श्रोताओं को लुभा पायेगा या नहीं ये कहना जरा मुश्किल है. अगला गीत मेरी आशिकी दरअसल तुम ही हो का फेमेल संस्करण है जिसमें अरिजीत के साथ आवाज़ मिलायी है पलक मुछल ने.

पिया आये न,  के के और तुलसी कुमार की आवाज़ में नयेपन से भरपूर है, वहीँ सुन रहा है न तू का भी एक फेमेल संस्करण है जिसे श्रेया घोषाल ने भी बहुत खूब निभाया है. ये संस्करण भारतीय जोनर में है जिसमें बाँसुरी और संतूर को भी जोड़ा गया है, गीत बढ़िया है पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे अंकित का खुद का संस्करण अधिक दमदार लगा.

जीत गंगुली का स्वरबद्ध किया और संजय मासूम का लिखा भुला देना, पाकिस्तानी गायक मुस्तफा जाहिद की आवाज़ में है. यानी भट्ट कैम्प का ये टोटका भी सही काम कर गया. वहीँ आसान नहीं यहाँ में इरशाद को गीतकार चुनकर भूषण ने एक सटीक दांव खेला है पर मिलने है मुझेसे आई एक सामान्य सा गीत है

कुल मिलकार आशिकी २ एक धीमा नशा है, जिसका असर धीरे धीरे श्रोताओं पर चढेगा. अब भूषण के मार्केटिंग स्किल्स गुलशन कुमार के विज़न की कितनी बराबरी कर पाते हैं ये देखना दिलचस्प होगा. बहरहाल हम तो चाहेंगें कि आशिकी २ का संगीत फिर से माहौल में प्रेम की सरगोशियाँ बढ़ा दे और संगीत का माधुर्य फिर एक बार सर चढ कर बोले. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ४.३ की रेटिंग.    


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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