Thursday, April 25, 2013

कारवाँ सिने-संगीत का : 1933 की दो उल्लेखनीय फिल्में



भारतीय सिनेमा के सौ साल – 42

कारवाँ सिने-संगीत का

वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ और हिमांशु राय की ‘कर्म’



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1933 में ‘वाडिया मूवीटोन’ के गठन और इसी संस्था द्वारा निर्मित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत पहली ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म ‘कर्म’ की चर्चा भी कर रहे हैं।

1933 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन। वाडिया भाइयों, जे. बी. एच. वाडिया और होमी वाडिया, ने इस कंपनी के ज़रिए स्टण्ट और ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु किया। दरअसल वाडिया भाइयों ने मूक फ़िल्मों के जौनर में ‘तूफ़ान मेल’ शीर्षक से एक लो-बजट थ्रिलर फ़िल्म बनाई थी, जिसे ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। इसी सफलता से प्रेरित होकर इन दो भाइयों ने ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन किया और इस बैनर तले पहली सवाक फ़िल्म ‘लाल-ए-यमन’ 1933 में प्रदर्शित की। ऐक्शन फ़िल्मों में ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है और इसी वजह से ‘वाडिया’ की फ़िल्मों में गीत-संगीत का पक्ष अन्य फ़िल्मों के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ करता था। ज़बरदस्ती गीत डालने से थ्रिलर फ़िल्मों की रोचकता में कमी आती है, इस बात का वाडिया भाइयों को पूरा अहसास था, इसीलिए इस कंपनी ने बाद के वर्षों में संगीत-प्रधान लघु फ़िल्मों का अलग से निर्माण किया।
फिरोज दस्तूर 

इन लघु फ़िल्मों के ज़रिए कई संगीतज्ञों ने लोकप्रियता भी हासिल की, जिनमें शामिल थे अहमद जान थिरकवा, सखावत हुसैन ख़ान, हबीब ख़ान, मलिका पुखराज, बाल गंधर्व, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और फ़िरोज़ दस्तूर। दस्तूर ने पहली बार ‘लाल-ए-यमन’ में संगीतकार जोसेफ़ डेविड के निर्देशन में गीत गाये जिनमें शामिल थे “अब नहीं धरत धीर”, “जाओ सिधारो फ़तेह पाओ”, “खालिक तोरी नजरिया”, “मशहूर थे जहाँ में जो”, “तसवीर-ए-ग़म बना हूँ” और “तोरी हरदम परवर आस” आदि। फ़िल्म के संगीतकार मास्टर मोहम्मद ने इस फ़िल्म में एक सूफ़ी फ़कीर की भूमिका निभाने के अतिरिक्त “गाफ़िल बंदे कुछ सोच ज़रा” गीत भी गाया। अब हम आपको फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ से फिरोज दस्तूर का गाया गीत- ‘मशहूर थे जहाँ में...’ सुनवाते हैं।


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



अभिनेत्री सरदार अख़्तर अभिनीत पहली फ़िल्म 1933 में बनी, ‘ईद का चांद’ शीर्षक से ‘सरोज मूवीटोन’ के बैनर तले। पिछले वर्ष की तरह सुंदर दास भाटिया का संगीत ‘सरोज’ की फ़िल्मों में सुनने को मिला। संवाद व गीतकार के रूप में अब्बास अली और एम. एस. शम्स ने इस फ़िल्म में काम किया था। हरिश्चन्द्र बाली, जो ख़ुद एक संगीतकार थे, सरदार अख़्तर के साथ फ़िल्म ‘नक्श-ए-सुलेमानी’ में अभिनय किया। सुंदर दास के ही संगीत में ‘सरोज’ की एक और उल्लेखनीय फ़िल्में रही ‘रूप बसंत’ जिसके गीतकार थे मुन्शी ‘शम्स’। इन सभी फ़िल्मों में गुजराती नाट्य जगत से आये गायक अशरफ़ ख़ान ने कई गीत गाये जो लोगों को ख़ूब भाये।

देविका रानी और हिमांशु रॉय 
‘कर्म’ पहली भारतीय बोलती फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन इंग्लैण्ड में हुआ था। इसके अंग्रेज़ी संस्करण का शीर्षक था ‘फ़ेट’। देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत यह फ़िल्म एक ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी जिसका प्रीमियर लंदन में 1933 के मई के महीने में हुआ था। इसका हिन्दी संस्करण 27 जनवरी, 1934 को बम्बई में रिलीज़ हुआ था। ‘कर्म’ के संगीतकार थे अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट, जिन्होंने देविका रानी से एक अंग्रेज़ी गीत “now the moon her light has shed” भी गवाया था। टैगोर ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी, जिन्हें ‘फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इण्डियन स्क्रीन’ की उपाधि दी जाती है, लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ़ आर्ट ऐण्ड म्युज़िक’ गई थीं पढ़ाई के सिलसिले में। वहाँ उनकी मुलाक़ात हिमांशु राय से हुई और उनसे शादी कर ली। 1929 की मूक फ़िल्म ‘प्रपांच पाश’ में देविका रानी एक ‘फ़ैशन डिज़ाइनर’ के रूप में काम किया, जिसके लिए दुनिया भर में उनके काम को सराहा गया। ‘प्रपांच पाश’ और ‘कर्म’ के बाद देविका और हिमांशु भारत चले आये और 1934 में गठन किया ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का। इस बैनर तले बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, बहुत से कलाकारों (जिनमें अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार शामिल हैं) को ब्रेक दिया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के स्तंभ कलाकार बने। फ़िल्म-संगीत को भी एक नया आयाम देने का श्रेय ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को दिया जा सकता है। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को पहली भारतीय ‘पब्लिक लिमिटेड “फ़िल्म” कंपनी’ होने का गौरव प्राप्त है। लीजिए, अब आप फिल्म ‘कर्म’ का एक दुर्लभ गीत सुनिए।


फिल्म कर्म : ‘मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे...’ : संगीतकार - अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


शोध व आलेख सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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