सोमवार, 15 अप्रैल 2013

एक डायन जो डराती नहीं, सुरीली तान छेड़ माहौल खुशगवार बनाती है!

प्लेबैक वाणी -42 - संगीत समीक्षा - एक थी डायन

इस साल की शुरुआत विशाल और गुलज़ार की टीम रचित मटरू की बिजिली का मंडोला से हुई थी. यही सदाबहार जोड़ी एक बार फिर श्रोताओं के समक्ष है इस बार एक डायन की कहानी के बहाने. जी हाँ एक थी डायन के संगीत एल्बम के साथ वापसी कर रही है विशाल की पूरी की पूरी टीम. चलिए मिलते हैं इस संगीतमय डायन से आज.  

सूरज से पहले जगायेंगें, और अखबार की सारी सुर्खियाँ पढ़ के सुनायेंगें...मुँह खुली जम्हायीं पर हम बजायेंगें चुटकियाँ....बड़े ही अनूठे अंदाज़ से खुलता है ये गीत, जहाँ पहली पंक्ति से ही गुलज़ार साहब श्रोताओं के कान खड़े कर देते हैं. हालाँकि विशाल की धुन में कहीं कहीं सात खून माफ केओ मामा की झलक मिलती है, पर सच मानिये शब्दों का नयापन सारी खामियों को भर देता है, उस पर सुनिधि की आवाज़ जादू सा असर करती है. हालाँकि क्लिंटन की आवाज़ भी उनका भरपूर साथ देती है.

सपने में मिलती है में खनकती सुरेश वाडकर की आवाज़ आज भी दिल को गुदगुदा जाती है. संजीदा आवाज़ वाले सुरेश से मस्ती वाले ऐसे गीत विशाल बखूबी गवा सकते हैं. तोते उड़ गए एक ऐसा ही गाना है. हरी हरी जो लागे, घास नहीं है काई....गुलज़ार साहब एक बार फिर पूरे फॉर्म में हैं यहाँ. गीत के तीन हिस्से हैं, सुरेश की आवाज़ के बाद रेखा कमान संभालती है और उनकी जुगलबंदी को कुछ और शरारत और देसी अंदाज़ से रोशन करते हैं सुखविंदर. विशाल की धुन जुबाँ पे चढ़ने वाली है और आजकल के आईटम गीतों पर ये मिटटी से जुडा मगर कदम थिरकाता गीत भारी पड़ता है.

अगला गीत काली काली आँखों का एक सुरीला आश्चर्य लेकर आता है. क्लिंटन की आवाज़ एकदम सही इस्तेमाल किया है विशाल ने. उनकी लो टोन का असर गजब का है उस पर गुलज़ार साहब के शब्द श्रोताओं को एक और ही दुनिया में पहुंचा देते हैं. विशाल का एक और मास्टर पीस है ये गीत. सुन्दर संयोजन और सरल धुन इस गीत को लंबे समय तक श्रोताओं के जेहन में ताज़ा रखेगा.

जब बात डायन की हो तो कुछ हौन्टिंग गीत का होना लाजमी है. विशाल मूड बनाते है गूंजते सन्नाटों और पायल की हल्की हल्की झंकारों से. लौटूंगी मैं तेरे लिए रेखा की आवाज़ में कशिश भरा अवश्य है, पर कहीं कहीं धुन और संयोजन में माचिस के याद न आये कोई की झलक है. फिल्म के मूड और थीम के हिसाब से सही लगता है गीत, पर शायद ये और थोडा असरकारक हो सकता था.

बारह साल के पद्मनाभ गायकवाड की आवाज़ में है अंतिम गीत सपना रे सपना. पद्मनाभ सारेगामापा लिटटल चैम्प का हिस्सा थे. भूरे भूरे बादलों के भालू, लोरियाँ सुनाये ला ला लू, तारों के कंचों से रात भर खेलेंगें....वाह, कहाँ सुनने को मिलते हैं है ऐसे काव्यात्मक गीत इन दिनों. एक मधुरतम गीत जिसमें बाँसुरी का पीस लाजवाब है. और पद्मनाभ की आवाज़ वाकई में एक खोज है. एक यादगार गीत. शुक्रिया गुलज़ार साहब और विशाल इस अनूठे तोहफे के लिए.

बहरहाल एक थी डायन का संगीत मधुर भी है और सुरीला भी. शब्दों की गहराई इसे हर मायने में एक शानदार एल्बम बनाती है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इसे ४.५ की रेटिंग.   

संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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