सोमवार, 31 दिसंबर 2012

संगीत 2012 - कैसा था संगीत के लिहाज से बीता वर्ष -एक अवलोकन

वर्ष २०१२ में श्रोताओं ने क्या क्या सुना, किसे पसंद किया और किसे सिरे से नकार दिया, किन गीतों ने हमारी धडकनों को धड़कने के सबब दिया, किन शब्दों ने हमारे ह्रदय को झकझोरा, और किन किन फनकारों की सदाएं हमारी रूह में उतर कर अपनी जगह बनने में कामियाब रहीं, आईये इस पोडकास्ट में सुनें पूरे वर्ष के संगीत का एक मुक्कमल लेखा जोखा. साथ ही किन संगीत योद्धाओं को हमारे श्रोताओं ने दिया वर्ष-सर्वश्रेष्ठ का खिताब, ये भी जाने. कुछ कदम थिरकाने वाले गीतों के संग आईये अलविदा कहें वर्ष २०१२ को और स्वागत करें २०१३ का. नववर्ष आप सबके लिए मंगलमय हो. इसी कामना के साथ प्रस्तुत है रेडियो प्लेबैक का ये पोडकास्ट. 



रविवार, 30 दिसंबर 2012

संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर विशेष -2


स्वरगोष्ठी-102 में आज 

संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर विशेष -2
  
खमाज, केदार, सोहनी, वृन्दावनी सारंग और भैरवी में पगे नौशाद के गीत  


क्षिति, पी.के. और प्रकाश संगीत-पहेली के महाविजेता बने



‘स्वरगोष्ठी’ के 102वें अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों के बीच उपस्थित हूँ। आपको स्मरण ही होगा कि गत रविवार को हमने फिल्म जगत के यशस्वी संगीतकार नौशाद अली के 94वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से जुड़े कुछ प्रसंगों का स्मरण किया था। पिछले अंक में हमने नौशाद के संगीतबद्ध, 1946 से लेकर 1955 के बीच कुछ राग-आधारित गीतों का चयन किया था। आज हम उससे अगले दशक अर्थात 1956 से लेकर 1967 के बीच के कुछ राग-आधारित गीत आपको सुनवाएँगे। ये गीत खमाज, केदार, सोहनी, वृन्दावनी सारंग और भैरवी रागों पर आधारित हैं जिनका रसास्वादन आप करेंगे।  
इसके साथ ही आज के इस अंक में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के वार्षिक महाविजेता और उप-विजेताओ की घोषणा भी कर रहे हैं।


रम्भ से ही नौशाद ने अपने संगीत को उत्तर प्रदेश के लोक संगीत और राग आधारित संगीत पर केन्द्रित रखा। यही नहीं आवश्यकता पड़ने पर दिग्गज शास्त्रीय गायकों को भी अपनी फिल्मों में गवाया। 1957 की फिल्म ‘मदर इण्डिया’ और ‘गंगा जमुना’ में तो नौशाद ने लोक संगीत के श्रेष्ठतम उदाहरण प्रस्तुत किये। नौशाद ने इन फिल्मों के कुछ गीतों में तो लोक धुनों के साथ रागदारी संगीत का अनूठा समिश्रण कर फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा दिया। आज सबसे पहले हम आपको फिल्म ‘मदर इण्डिया’ का एक गीत सुनवाते हैं, जिसे मन्ना डे ने स्वर दिया है। गीत के बोल हैं- ‘चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया घटती जाए...’। नौशाद ने इस गीत में पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक प्रचलित लोकधुन के साथ-साथ राग खमाज के स्वरों का उपयोग भी किया है। वर्तमान में प्रचलित राग खमाज ठुमरियों के लिए एक आदर्श राग है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ का प्रयोग नहीं होता और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कई फिल्म-संगीतकारों ने खमाज का प्रयोग किया है। नौशाद के संगीत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे विविध रागों के स्वरों का सरल लोक रूपान्तरण कर लेते थे। फिल्म ‘मदर इण्डिया’ के इस गीत में भी उनकी इस प्रतिभा का स्पष्ट दिग्दर्शन होता है। मन्ना डे के स्वरों में सुनिए राग खमाज का एक अनूठा फिल्मी रूप।

राग - खमाज : ‘चुनरिया कटती जाए रे...’ : मन्ना डे : फिल्म - मदर इण्डिया


नौशाद की संगीत प्रतिभा को शिखर पर ले जाने में 1960 की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस फिल्म का पूरा संगीत ही अविस्मरणीय रहा है। आज के इस अंक में हमने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के दो गीत लिये हैं। पहला लता मंगेशकर का गाया गीत है- ‘बेकस पे करम कीजिये सरकार-ए-मदीना...’, जिसे नौशाद ने राग केदार के स्वरों का आधार लेकर संगीतबद्ध किया था। राग केदार कल्याण थाट से संचालित होता है। प्राचीन ग्रन्थकार इसे बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे। इस राग में दोनों मध्यम तथा अन्य स्वर शुद्ध लगते हैं। शुद्ध मध्यम आरोह-अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम केवल आरोह में प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ तथा अवरोह में गन्धार स्वर वर्जित होता है। नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ का यह गीत राग केदार पर आधारित गीतों की सूची में एक अच्छा उदाहरण है। आपके लिए प्रस्तुत है यह गीत-

राग - केदार : ‘बेकस पे करम कीजिये...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मुगल-ए-आज़म


फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग वे कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके...’। इस ठुमरीनुमा गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। आइए, अब हम आपको उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वर में फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ की राग सोहनी, दीपचन्दी ताल में निबद्ध ठुमरी सुनवाते हैं।

राग – सोहनी : ‘प्रेम जोगन बनके...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : फिल्म - मुगल-ए-आज़म



लोकधुनों और राग आधारित गीतों के अलावा गज़लों की संगीत-रचना में भी नौशाद सिद्ध थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’, ‘मेरे महबूब’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘पालकी’ आदि फिल्मों में उनकी संगीतबद्ध गज़लें बेहद लोकप्रिय हुई थीं। फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ में मोहम्मद रफी का गाया- ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’ और ‘गुजरे हैं आज इश्क़ में...’ की धुनें बेहद आकर्षक थीं। परन्तु आज हम आपको इस फिल्म का जो गीत सुनवा रहे हैं, वह राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है। मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वरों में प्रस्तुत इस युगल गीत के बोल हैं- ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है...’। तीनताल और कहरवा में निबद्ध इस गीत का आनन्द आप लीजिए।

राग – वृन्दावनी सारंग : ‘सावन आए या न आए...’ : आशा भोसले और रफी : फिल्म – दिल दिया दर्द लिया




नौशाद द्वारा लोक धुनों के आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण के लिए यदि फिल्म ‘मदर इण्डिया’ को याद रखा जाएगा तो 1961 में बनी फिल्म ‘गंगा जमुना’ का संगीत भी कुछ कम नहीं था। पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोकप्रिय धुनों में राग खमाज, पीलू, पहाड़ी, भैरवी आदि रागों का स्पर्श देकर नौशाद ने इस फिल्म के संगीत के स्तर को नई ऊँचाईयों तक पहुँचा दिया था। फिल्म ‘गंगा जमुना’ के एक गीत- ‘दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे...’ को नौशाद ने लोक धुन बिरहा का आधार दिया तो राग भैरवी के कोमल स्वरों का स्पर्श देकर गीत के विरह भाव को उत्प्रेरित भी किया। सितार और सारंगी का प्रयोग कर उन्होने गीत को अतुलनीय कर्णप्रियता प्रदान की है। संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित दो कड़ियों की इस लघु श्रृंखला का समापन हम फिल्म ‘गंगा जमुना' के इसी गीत से कर रहें हैं। लता मंगेशकर की आवाज़ में राग भैरवी के स्वरों की चाशनी में पगे इस गीत का आप रसास्वादन करें और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दें।

राग – भैरवी : ‘दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – गंगा जमुना

आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत के संगीतकार कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 104वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 100वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ की आवाज़ में वर्ष 1954 की फिल्म ‘शबाब’ के गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मुलतानी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

वर्ष 2012 के महाविजेता


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ 51वें अंक अर्थात वर्ष 2012 के प्रारम्भिक अंकों से हमने आप सबके परामर्श से संगीत पहेली प्रतियोगिता का आयोजन शुरू किया था। गत 16 दिसम्बर के अंक में 100वीं पहेली सम्पन्न हुई है। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे कुछ पाठक नियमित तो कुछ पाठक बीच-बीच में भाग लेते रहे हैं। 100वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त हो जाने के बाद हमने सभी प्रतिभागियों द्वारा पूरे एक वर्ष तक के अर्जित प्राप्तांकों का योग किया और प्रथम तीन सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागियो का चयन किया।

सर्वाधिक 82 अंक अर्जित कर जबलपुर, मध्य प्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी वर्ष 2012 की महाविजेता बनीं है। इस क्रम में 57 अंक पाकर जौनपुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने प्रथम उप-महाविजेता का और 39 अंक पाकर लखनऊ, उत्तर प्रदेश के श्री प्रकाश गोविन्द द्वितीय उप-महाविजेता बने हैं। इन सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। यहाँ हम पहेली के कुछ अन्य प्रतिभागियों का भी उल्लेख करना चाहते हैं। पटना, बिहार की सुश्री अर्चना टण्डन और बैंगलुरु, कर्नाटक के श्री पंकज मुकेश ने आरम्भिक तीन सेगमेंट तक अपनी बढ़त बना ली थी। परन्तु अचानक ये दोनों प्रतिभागी प्रतियोगिता में अनियमित हो गए। यही कारण था कि तीसरे सेगमेंट के बीच से भाग लेने वाले श्री प्रकाश गोविन्द इनसे आगे निकल आए। इनके अलावा अहमदाबाद, गुजरात के डॉ. कश्यप दवे, लखनऊ के श्री अवध लाल, राजस्थान के राजेन्द्र सोनकर, राकेश रमण, दयानिधि वत्स, अभिषेक मिश्रा, अखिलेश दीक्षित और दीपक ‘मशाल’ ने भी बीच-बीच में संगीत पहेली में अपनी सहभागिता की है। इन सभी प्रतिभागियों को हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित हैं।

100वें अंक की समाप्ति के बाद बने हमारे तीनों शीर्ष स्थान के विजेताओं से अनुरोध है कि वे अपने डाक का पूरा पता हमें शीघ्रातिशीघ्र swargoshthi@gmail.com पर भेज दें, ताकि हम आपका पुरस्कार आपके पते पर भेज सकें।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक वर्ष 1013 का पहला अंक होगा। इस अंक से हम एक नई लघु श्रृंखला- ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से आरम्भ कर रहे हैं। काल गणना के अनुसार दिन और रात्रि को तीन-तीन घण्टों की अवधि के आठ प्रहर में बाँटा जाता है। परम्परागत रूप से गायन-वादन के लिए सभी राग किसी प्रहर विशेष अथवा ऋतु विशेष में ही उपयोगी माने जाते हैं। अगले अंक में हम दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर आपसे चर्चा करेंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 29 दिसंबर 2012

वर्ष की अंतिम 'सिने पहेली' में आज 2012 की फ़िल्मों से जुड़ी पहेली


29 दिसम्बर, 2012
सिने-पहेली - 52  में आज 

पहचानिये 2012 के कुछ फ़िल्मी चेहरों को

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। 'सिने पहेली' की 50-वीं कड़ी को लेकर जो विवाद/ गतिरोध उत्पन्न हुआ है, यह निर्णय लिया गया था कि प्रतियोगियों के मतदान के द्वारा इस निर्णय तक पहुँचा जाये कि उस एपिसोड को निरस्त कर दोबारा प्रस्तुत किया जाये या नहीं। कुल 12 प्रतियोगियों ने मतदान किया है और आश्चर्यजनक रूप से 6 प्रतियोगियों ने पक्ष में और 6 प्रतियोगियों ने विपक्ष में मतदान किया है। दूसरे शब्दों में मतदान से भी कोई रास्ता हमें नहीं मिल पाया है। अत: हमने यह फ़ैसला लिया है कि 'सिने पहेली-50' को प्रतियोगिता से पूरी तरह से हटा दिया जाये, तथा 41 से लेकर 49-वीं कड़ियों के परिणामों के आधार पर ही पाँचवें सेगमेण्ट के विजेता घोषित किये जायें। तो ये रहे 'सिने पहेली' के पाँचवें सेगमेण्ट के विजेताओं के नाम...


प्रथम स्थान

गौतम केवलिया, बीकानेर 
क्षिति तिवारी, जबलपुर
विजय कुमार व्यास, बीकानेर

द्वितीय स्थान

पंकज मुकेश, बेंगलुरू
प्रकाश गोविंद, लखनऊ

तृतीय स्थान

महेश बसन्तनी, पिट्सबर्ग


पाँचवें सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोरकार्ड इस प्रकार रहा...



पाँचवे सेगमेण्ट की समाप्ति पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



 सभी विजेताओं और पाँचवें सेगमेण्ट के सभी प्रतिभागियों को बधाई और अगले सेगमेण्ट के लिए शुभकामनायें।


दोस्तों, अब 'सिने पहेली' के सफ़र में आगे बढ़ते हैं। पिछले सप्ताह से हमने कदम रखे हैं 'सिने पहेली' के छठे सेगमेण्ट में। आइए आज इस सेगमेण्ट की दूसरी कड़ी, यानी 'सिने पहेली' की 52-वीं कड़ी में आपसे पूछें साल 2012 की फ़िल्मों से जुड़े सवाल। क्योंकि आज इस साल की अन्तिम 'सिने पहेली' है, इसलिए इससे बेहतर आज की पहेली भला और क्या हो सकती है।


आज की पहेली : 10 चेहरे 2012 के


नीचे हमने 2012 में प्रदर्शित कुछ हिन्दी फ़िल्मों की तस्वीरें दिखा रखे हैं। इनमें से कुछ चेहरों को हमने छुपा दिया है। आपको पहचानने हैं इन छुपे चेहरों को। कुल 10 चेहरे हैं, हर चेहरे के लिए 1 अंक दिये जायेंगे।









जवाब भेजने का तरीका


उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 52" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 3 जनवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।



पिछली पहेली का हल

1. रणवीर सिंह
2. कुणाल कपूर
3. उपेन पटेल
4. दिनो मोरेयो
5. जावेद अली
6. रीतेश देशमुख
7. अर्जुन रामपाल
8. सोनू निगम
9. आतिफ़ असलम
10. कुणाल खेमू


पिछली पहेली का परिणाम

इस बार कुल 6 प्रतियोगियों ने 'सिने पहेली' में भाग लिया। सबसे पहले 100% सही जवाब भेज कर 'सरताज प्रतियोगी' का खिताब जीता है बीकानेर के हमारे नियमित प्रतियोगी विजय कुमार व्यास ने। विजय जी, बहुत बहुत बधाई आपको। और यह रहा विस्तारित परिणाम...



नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। 

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह नए साल में फिर मुलाक़ात होगी,  आप सभी के लिए नया साल शुभ हो, इसी आशा के साथ,  नमस्कार। 

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मैंने देखी पहली फिल्म : सुमन दीक्षित


स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल –29

जुड़वा बहनों की कहानी से माँ ने मुझे प्रेरित करने का प्रयास किया



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। गत जून मास के दूसरे गुरुवार से हमने आपके संस्मरणों पर आधारित प्रतियोगिता ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ का आयोजन किया है। इस स्तम्भ में हमने आपके प्रतियोगी संस्मरण और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक मण्डल के सदस्यों के गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत किये हैं। पिछले अंक में प्रस्तुत किये गए प्रतियोगी संस्मरण को हमने इस श्रृंखला का समापन संस्मरण घोषित किया था। परन्तु हमे विलम्ब से हमारी एक श्रोता/पाठक का एक और संस्मरण प्राप्त हो गया। आज के अंक में उसी संस्मरण को प्रस्तुत कर रहे हैं। अब हम इस प्रतियोगिता का परिणाम जनवरी के दूसरे गुरुवार को घोषित करेंगे। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के आज के समापन अंक में हम प्रस्तुत कर रहे है, लखनऊ निवासी, एक गृहणी श्रीमती सुमन दीक्षित का संस्मरण। सुमन जी ने बचपन में सबसे पहले फिल्म ‘दो कलियाँ’ देखी थी।


मेरा रुपहले पर्दे का साक्षात्कार पहली बार तब हुआ जब मैं 7 या 8 वर्ष की थी। फिल्म थी ‘दो कलियाँ’। मुझे वह अवसर भी अचानक मिला था, एक आकस्मिक घटना के जैसा। पाँच भाई बहनों में मैं सबसे छोटी थी। मुझसे मात्र एक वर्ष चार माह बड़ी बहन हैं। बचपन में हम दोनों के बीच गजब की प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी। हमारे बीच खूब लड़ाई हुआ करती थी। यहाँ तक कि मुहल्ले में हमें ‘गुलाबो-सिताबो’ के खिताब से नवाजा गया था। माता-पिता और घर के और बड़े हमारी इन हरकतों पर कभी डाँटते तो कभी झुँझलाते, किन्तु हम बहनों के बीच का युद्ध बदस्तूर जारी रहता था।

उस समय हमारे ऊपर फिल्में न देखने का कठोर प्रतिबन्ध तो नहीं था, परन्तु हम घर के किसी बड़े सदस्य के साथ केवल चुनी हुई फिल्म ही देख सकते थे। हम दोनों बहनों के बीच प्रायः होने वाले वाद-विवाद से चिन्तित मेरी माँ को एक दिन हमारी एक पड़ोसन ने बताया कि दो जुड़वा बहनों के बिछड़ने और मिलने की कहानी पर बनी एक फिल्म पास के सिनेमाघर में लगी है। इस फिल्म से हमें प्रेरणा मिले और हम दोनों बहनो के बीच के झगड़े दूर हों, इस इरादे से माँ हमें फिल्म ‘दो कलियाँ’ दिखाने ले गई थीं। विश्वजीत और माला सिन्हा अभिनीत यह फिल्म माता-पिता के आपसी मतभेद की कहानी पर आधारित थी। इस अलगाव का बच्चों पर क्या असर पड़ता है, फिल्म की कहानी में इसी बात पर ज़ोर दिया गया था। आगे चलकर दोनॉ जुड़वा बहनें अपने माता-पिता को आपस में मिलाती हैं किन्तु इससे पूर्व अलग-अलग परिवेश में पल रहीं दो हमशक्ल बच्चियाँ इस बात से अनभिज्ञ थीं कि वे आपस में बहनें हैं और ठीक उसी प्रकार आपस में लड़ती रहीं, जिस तरह हम दोनों बहनें बचपन में लड़ती थीं।

फिल्म 'दो कलियाँ' को देखकर हम कुछ शिक्षा लें और आपस में लड़ना बन्द करें इस विचार से हमारी माँ और बड़ी बहन हमें फिल्म दिखाने ले गई थीं। फिल्म के कई भावुक दृश्य भी थे जिन्हें देखकर हमारे भाव तत्काल परिवर्तित भी हुए और सिनेमाघर से बाहर निकलने से पहले ही यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब हम कभी नहीं लड़ेंगे। हम इतने प्यार में डूब गए कि एक दूसरे का हाथ पकड़कर बाहर निकले और घर पहुँचने तक एक दूसरे का हाथ थामे रहे। पूरा एक दिन हम बड़े प्यार से रहे, मिल-बाँट कर खाते। घर वाले बहुत खु्श हुए कि बच्चियाँ सुधर गई हैं। अब आपस में नहीं लड़ेंगी। परन्तु घरवालो की ये खु्शी ज्यादा समय तक नही रह पाई। कुछ ही समय में हम अपने असली रुप में आ गए और फिर उसी तरह लड़ने-झगड़ने लगे।

कुछ भी हो, बहाना कोई भी हो, पर पहली बार फिल्म देखने का रोमांच अलग ही था जो आज तक चेतना-पटल पर ताज़ा बना हुआ है। पिक्चर हाल में पहली बार जाने का अनुभव, गीत-संगीत सुनना, और हीरो-हीरोइन को देखना हमारे जीवन की एक बड़ी उपलब्धि से कम न थी। फिल्म का एक गाना- 'बच्चे मन के सच्चे...' हम काफी समय तक गुनगुनाते रहे। नीतू सिंह का बचपन उन बच्चियों के रुप में बहुत अच्छी तरह याद है। आज भी नीतू सिंह का नाम याद आते ही या उन्हें टेलीविज़न के परदे पर देखते ही ‘दो कलियाँ’ वाली नीतू सिंह याद आ जाती है और याद आ जाता है, हम बहनों के बचपन का युद्ध।

इतेफाक सें मैं भी दो जुड़वा बेटों का माँ बनी। अब तो दोनों वयस्क हो गए हैं, लेकिन उनके बचपन के दौर में मैं हमेशा सतर्क रहती थी कि हमारे बच्चे वह गलती न दुहराएँ, जो हमने अपने बचपन में की थी।

सुमन जी की देखी पहली और प्रेरक फिल्म ‘दो कलियाँ’ के बारे में अभी आपने उनका संस्मरण पढ़ा। अब हम आपको इस फिल्म के दो गीत सुनवाते हैं, जो सुमन जी को ही नहीं आपको भी पसन्द आएगा। 1968 में प्रदर्शित फिल्म ‘दो कलियाँ’ के संगीतकार हैं रवि और गीत लिखे साहिर लुधियानवी ने।

प्लेयर का पहला गीत - फिल्म – दो कलियाँ : ‘बच्चे मन के सच्चे...’ : लता मंगेशकर


प्लयेर का दूसरा गीत - फिल्म – दो कलियाँ : ‘चितनन्दन आगे नाचूँगी...’: आशा भोसले 



आपको सुमन जी का यह संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता का यह समापन संस्मरण था। इस प्रतियोगिता का परिणाम और विजेताओं के नाम 10 जनवरी, 2013 के अंक में घोषित करेंगे। नए वर्ष से हम इस स्तम्भ के स्थान पर एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। आप अपने सुझाव, संस्मरण और फरमाइश अवश्य भेजें।  

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


बुधवार, 26 दिसंबर 2012

मिलिए "सिगरेट की तरह" के संगीतकार सुदीप बैनर्जी से


ग़ज़ल गायक और संगीतकार सुदीप बैनर्जी 50 से भी अधिक एलबम्स को स्वरबद्ध कर चुके हैं. आशा भोसले, जगजीत सिंह, उस्ताद राशिद खान, हरिहरण, रूप कुमार राठोड, अनूप जलोटा, सुरेश वाडकर, शान, श्रेया घोषाल, और कैलाश खेर जैसे ढेरों बड़े फनकारों के साथ काम कर चुके हैं. "चौसर", "लव तुम्हारा' और अभी हाल ही में प्रदर्शित "सिगरेट की तरह" के इनके संगीतबद्ध गीतों को हम आप सुन चुके हैं. गायक संगीतकार के रूप में इनकी ताज़ा एल्बम "इरशाद" को वर्ष २०१२ की सर्वश्रेष्ठ गज़ल एल्बम के लिए नामांकित किया गया है. सुदीप आज हमारे साथ हैं अपने संगीत और अपनी ताज़ा फिल्म के बारे कुछ बातें हमारे साथ बांटने के लिए, उनसे हुई हमारी बातचीत का आनंद लें 



सजीव नमस्कार सुदीप, स्वागत है आपका रेडियो प्लेबॅक इंडिया परऔर बधाई आपको आपकी नयी फिल्म सिगरेट की तरहके लिए

सुदीप बहुत बहुत शुक्रिया सजीव जी..


सजीव फिल्म में आपके दो गीत हैं, सबसे पहले तो इस फिल्म के बारे में कुछ विस्तार से बताएँ

सुदीप ये एक मर्डर मिस्टरी फिल्म है जहाँ एक भोला भाला लड़का जो लखनऊ से अपने बचपन की दोस्त के पास गोआ आता है और वहाँ एक क़त्ल के इल्ज़ाम में फँस जाता है… ….फिल्म के क़िरदार बहुत अच्छे और असली ज़िंदगी से मिलते जुलते हैं, और फिल्म की कहानी इतनी अच्छी और पेचीदा थी कि मुझे सुनते ही लगा कि इस फिल्म मैं म्यूज़िक करने का मज़ा अलग ही होगा..फिल्म के आख़िर तक पता नही चलता कौन असली क़ातिल है….


सजीव आप खुद को एक गज़ल सिंगर और कॉंपोज़र के रूप में अधिक देखते हैं, आज के दौर में जब अधिकतर संगीतकार व्यवसायिक कमियाबी को अधिक तरजीह दे रहे हैं, आप म्यूज़िक के सॉफ्ट साइड और पोयट्री को महत्व देकर चल रहे हैं, क्या ये एक सोचा समझा हुआ चुनाव है आपका ?

सुदीप जी बिल्कुल, मेरा मानना है के म्यूज़िक कैसा भी हो, चाहे गज़ल हो या पॉप हो या फिर फिल्म के गाने ही क्यूँ ना हो, शब्दों का चुनाव, पोयट्री का अच्छा होना सबसे ज्यादा जरूरी है…..क्यूँकि मैं गज़लों के साथ कई साल से हूँ तो मुझे बिना अच्छे लफ़्ज़ों के और सॉफ्ट म्यूज़िक के गाना अच्छा नहीं लगता….ऐसा नही कि मैं आइटम नंबर नहीं बनाता ..मगर हाँ….मेलोडी हमेशा ज़िंदा रहती हैइसलिए जो दो गाने आप के सुने, उस में खास तौर से डुयेट में लफ़्ज़ों का मज़ा भी मिलता हैं और सुर का भी……


सजीव मैने आपकी इरशादएल्बम भी सुनी है, और मैने देखा है की आप अपने संगीत में ट्रडिशनल और आधुनिक संगीत को बहुत खूबसूरती के साथ मिक्स करते हैं, क्या कहेंगें अपने इस कॉकटेल के बारे में ?

सुदीप जी मैं वैसे कॉकटेल अच्छा बनता हूँ, …हाहाहा……और मेरी तालीम भी ऐसी है कि मैं ट्रडीशनल और मॉडर्न संगीत दोनो का ग्रामर ईमानदारी से निभाने की कोशिश करता हूँ…..ट्रडीशनल म्यूज़िक तो मुझे विरासत में मिला हैऔर साथ ही साथ मॉडर्न म्यूज़िक चाहे वो वेस्टर्न म्यूज़िक हो या जेज़ हो या ब्लूस हो.मैं सब सुनता हूँ और पसंद करता हूँ….


सजीव इससे पहले कि हम आगे बढ़ें फिल्म सिगरेट की तरहसे एक गीत सुन लेते हैं, जिसमें सुदीप की आवाज़ भी है, इसे सुनकर हमारे श्रोता समझ पाएँगें कि किस तरह सुदीप का संगीत शाब्दिक सुंदरता को कमजोर पड़ने दिए बिना आधुनिक ध्वनि के गीत रच पाते हैं


सुदीप शुक्रिया, ये गाना बहुत बड़ा चैलेंज था मेरे लिए क्यूँकि ये गाना फिल्म के ऐसे मोड पर आता है जब हीरो के पीछे पुलिस भाग रही है और वो समझ जाता है कि उसको उसकी माशूका ने उसे धोखा दिया है…..अजय जिंग्रान साहब ने बखूबी लिखा है इस गीत को….और इस के म्यूज़िक मैं थोडा दर्द थोडा विरह दोनो दिखता है….साथ ही एक शिकायत भी है... 

सुनिए नीचे दिए गए प्लयेर से गीत ०१ - ये बता दो पिया (सुदीप बनर्जी और श्वेता पंडित)


सजीव 50 से भी अधिक एलबम्स और इतने नामी गिरामी कलाकारों के साथ काम करने के बाद कोई भी कलाकार खुद को बेहद संतुष्ठ महसूस करेगा, पर क्या आपको लगता है कि अभी आपके करियर को उस एक गीत या अलबम का इंतेज़ार है जिसके बाद आपकी रचनाओं को उसका वाजिब हक़ मिल सकेगा ?

सुदीप असल में वो एक एल्बम कभी नहीं मिलती जिस को सुनके लगे कि ये मेरा बेस्ट काम है…..हर एल्बम में कुछ नया करता हूँ….और पिछले एल्बम के मुक़ाबले में बेहतर करने की कोशिश करता हूँ…..ये सब मैं जगजीत सिंह साहब और आशा भोसले जैसे फनकारों के साथ काम कर के सीखा है…. the best never comes…..the best is always the next

सजीव – ‘सिगरेट की तरहआपकी तीसरी फिल्म है, यहाँ आपके अलावा और भी दो संगीतकारों के गीत है, फिल्म इंडस्ट्री में दो या दो से अधिक संगीतकारों को एक फिल्म के लिए चुनने के इस नये ट्रेंड को आप किस रूप में देखते हैं ?

सुदीप हर म्यूज़िक डाइरेक्टर का एक स्टाइल होता है….और आज कल फिल्मों में हर प्रकार के गाने चाहिए……आइटम नंबर मैं भी इंडियन, बेल्ली डॅन्सिंग, देसी विदेशी वगैरह वगैरह, हर तरह के गाने बनते हैं…..तो जरूरी नहीं हर डाइरेक्टर सब कुछ एक साथ करे….और मेरी आदत है मैं जिस काम में मज़ा नही देखता वो काम नही करता ….मैं वोही करता हूँ जिस को मैं खुद अप्रूव करूँ……सिर्फ़ फिल्म करनी है इस लिए फिल्म करूँ ये मेरी आदत नही….


सजीव आगे बढ़ेगें मगर इससे पहले सुदीप का स्वरबद्ध किया उनकी इस ताज़ा फिल्म का शीर्षक गीत भी सुनते चलें,  इसे सुजान डीमेलो ने गाया है,  इससे पहले कि गीत बजे ये जानना चाहूँगा कि इस गीत में गायिका वेस्टर्न अंदाज़ में शब्दों को गाया है, जिसमें कभी कभार हिन्दी शब्द बहुत अजीब से सुनाई देते हैं, क्या ये स्क्रिप्ट की ज़रूरत थी या कुछ और ?

सुदीप जी हाँ, यहाँ जो गाना है वो एक रशियन लड़की पर फिल्माया गया है जो एक बार में डांस करती हैऔर फील क्लब म्यूज़िक का चाहिए था, …इस गाने के क़रीब 6 कॉमपोज़िशन्स बने थे सब अलग अलग स्टाइल में, जिनमें से इस को चुना गया….

नीचे दिए गए प्लयेर से सुनिए गीत ०२ - सिगरेट की तरह...(सुजान डी'मेल्लो)

सजीव आज फिल्म संगीत की लोकप्रियता अपने चरम पे है, ऐसे में गैर फ़िल्मी एलबम्स की मार्केट लगभग खत्म सी हो गयी है, क्या ये चिंता का विषय नहीं है ?

सुदीप हाँ और न दोनो……..हाँ क्योंकि लोग फिल्म म्यूज़िक के तरफ ज्यादा झुक रहे  हैं क्यूँकि बड़े बड़े प्रोडक्शन हाउस बहुत पैसे इनवेस्ट करते हैं जिस की वजह से टीवी और रेडियो मैं स्पॉट्स इतने महँगे हो गये हैं कि प्राइवेट एलबम्स कहीं नही दिखते……..
अच्छी बात ये है कि अब जो नॉन फिल्म म्यूज़िक एलबम्स आ रहे है बहुत अच्छे लेवेल का और लिमिटेड ऑडियेन्स के लिए बन रहा है जो इस को अप्रीशियेट तो करता है…..नॉन फिल्म म्यूज़िक आम श्रोता के लिए कभी नही था….ये बहुत सेलेक्टेड लोगों के लिए है जो अच्छा संगीत सुनते हैं….गज़ल, भजन, ठुमरी, दादरा आदि सुनना सब के बस की बात नहीं है….इस को अगर गाने की तमीज होती है तो सुनने की भी होती है…….अगर आप समझते हैं कि हर सड़क चलता आदमी अच्छी शायरी सुनने लगे तो ये एक बहुत बड़ा वहम है जो मुमकिन नही…….
बल्कि अच्छे फिल्म म्यूज़िक की वजह से अच्छा नॉन फिल्म म्यूज़िक भी आगे बढ़ रहा है…..हर फिल्म मैं इसीलिए आप सूफ़ियाना क़लाम सुनते हैंदादरा जैसे गीत भी सुनते हैंइनफॅक्ट मैं कहूँगा की फिल्म म्यूज़िक अब करीब करीब नॉन फिल्म म्यूज़िक की तरह हो रहा है……मुन्नी बदनाम जैसों को छोड़ के…..


सजीव तो क्या आपको यकीन है कि गज़लों का वो दौर जो कभी जगजीत सिंह, पंकज उधास, गुलाम अली, और मेहदी हसन साहब ने रचा था फिर से लौट सकता है ?


सुदीप जरूर आएगा ….पर अलग रूप में……म्यूज़िक चेंज होता है हर 10 साल में…..बेगम अख्तर और जगजीत सिंह में फर्क था…..मेहंदी हसन और जगजीत सिंह में फर्क था ……वैसे ही ग़ज़लें नए सिरे से शुरू होंगीऔर हो गयी है…..लोग सुन रहे हैं ..उस्ताद गाने वालों के अलावा भी….चेंज इस मस्ट फॉर गज़ल…..गज़ल अवाम का आईना है….जो हमेशा बदलना चाहिए.


सजीव चलिए बहुत बहुत आभार सुदीप,  और पूरे रेडियो प्लेबॅक टीम की तरफ से ढेरों शुभकामनाएँ आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए


सुदीप - शुक्रिया सजीव जी आप के माध्यम से लोगों तक मेरी बात पहुंचेंगी….इस का शुक्रगुज़ार हूँ.

सिगरेट की तरह 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

बोलती कहानी - कछुआ और खरगोश - इब्ने इंशा

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में साहित्य वाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ‘मास्टरजी’ की लघुकथा "झलमला" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं इब्ने इंशा की लघुकथा "कछुआ और खरगोश", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

 कहानी "कछुआ और खरगोश" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 22 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


सब माया है, सब चलती फिरती छाया है
तेरे इश्क़ में हमने जो खोया है जो पाया है
जो तुमने कहा और फैज़ ने जो फरमाया है
सब माया है, सब माया है।
~ इब्ने इंशा (1927-1978)

हर सप्ताह को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

काफी जमाना सुस्ता लिए तो फिर मंजिल की तरफ चल पड़े। (
इब्ने इंशा की "कछुआ और खरगोश" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें।
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
#Forty Third Story, Akbar Ke Navaratna: Ibne Insha/Hindi Audio Book/2012/43. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

रेडियो प्लेबैक टॉप २० हिट परेड

रेडियो प्लेबैक इंडिया के इस वार्षिक आयोजन में आप सबका स्वागत है. इस बार वर्ष के टॉप २० गीत चुनने में अहम भूमिका निभाई हमारे श्रोताओं ने भी. हमने आपके सामने रखे थे हमारी टीम द्वारा चुने गए ५० गीत . और आप सबकी वोटिंग के आधार पर हमें मिले उन ५० श्रेष्ठ गीतों में से छन कर आये २० सर्वश्रेष्ठ गीत. वो गीत जो हैं आप यानी हमारे श्रोताओं की राय में वर्ष के सबसे यादगार गीत. याद रहे हमने ५० गीत जो चुने थे वो लोकप्रियता के आधार पर नहीं, वरन वो थे जो हमारी आतंरिक समीक्षा के मापदंडों पर खरे उतरे थे. तो लीजिए आनंद लीजिए साल २०१२ के २० सर्वश्रेष्ठ गीतों का जिन्हें चुना है रेडियो प्लेबैक की टीम और उसके श्रोताओं ने.





रविवार, 23 दिसंबर 2012

संगीतकार नौशाद के 94वें जन्मदिवस पर एक विशेष श्रृंखला


स्वरगोष्ठी-101 में आज 

फिल्म संगीत के गुलदस्ते को रागों की खुशबू दी अप्रतिम साधक नौशाद अली ने 
 



‘स्वरगोष्ठी’ का यह 101वाँ अंक है और इस विशेष अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, दो दिन बाद ही अर्थात 25 दिसम्बर को भारतीय सिनेमा के एक महान संगीतकार नौशाद अली का 94वाँ जन्मदिवस हम मनाने जा रहे हैं। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ की दो कड़ियों के माध्यम से सिनेमा संगीत का एक मानक स्थापित करने वाले संगीतकार नौशाद के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण कर रहे हैं। आज के अंक के लिए हमने 1946 से लेकर 1955 तक, अर्थात एक दशक की अवधि के कुछ राग आधारित गीतों को चुना है जिनमें नौशाद की सांगीतिक प्रतिभा के स्पष्ट दर्शन होते हैं।


25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान मालिक का हुक्का तैयार करते। संगीत के प्रति ऐसी ही दीवानगी में नौशाद का बचपन बीता। साज़ों की झाड़-पोंछ के दौरान ही कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था।
उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



इसके आगे का वृतान्त हम जारी रखेंगे, इस बीच थोड़ा विराम लेकर हम आपको नौशाद का संगीतबद्ध किया एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पिला कर रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वह गीत सुनवाते हैं जो राग बिहाग पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर और भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।

राग- बिहाग : फिल्म ‘शाहजहाँ’ : ‘ऐ दिल-ए-बेकरार झूम...’ : कुन्दनलाल सहगल



घर से भाग कर बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे नौशाद अली कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्रांट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इंटरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इंटरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

आज के अंक के लिए नौशाद के संगीतबद्ध किये कुछ ऐसे राग आधारित गीत लेकर हम उपस्थित हुए हैं, जिनमे स्पष्ट रागानुभूति होती है। ऐसा ही एक गीत 1948 में प्रदर्शित महबूब खाँ की फिल्म ‘अनोखी अदा’ से लिया गया है। इस फिल्म का एक गीत- ‘कभी दिल, दिल से टकराता तो होगा...’ को नौशाद ने मुकेश और शमशाद बेगम दोनों के स्वर में प्रस्तुत किया था। यह गीत राग दरबारी कान्हड़ा की सार्थक अनुभूति कराता है। हम आपको शमशाद बेगम का गाया संस्करण सुनवाते हैं-

राग- दरबारी : फिल्म ‘अनोखी अदा’ : ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’ : शमशाद बेगम



पियानो वादक के रूप में नौशाद को न्यू पिक्चर कम्पनी में एक ठिकाना तो मिल गया, परन्तु मंज़िल तो अभी कोसों दूर थी। अभी तक नौशाद मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे अलीम साहब के नाम लखनऊ से अपने एक मित्र का खत लेकर आए थे और उन्हीं के साथ गुजर कर रहे थे। नौकरी मिलते ही उन्होने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। नौशाद के यह दूसरे आश्रयदाता एक दूकान में सेल्समैन थे और रात में दूकान बन्द होने के बाद दरवाजा बन्द कर अन्दर ही सोते थे। नौशाद को भी ऐसे ही रहना पड़ता था। कभी जब दूकान में गर्मी अधिक होती तो दोनों बाहर फुटपाथ पर रात गुजारते थे।

आइए अब हम वर्ष 1952 की उस फिल्म और उसके एक गीत की चर्चा करते हैं जिसने नौशाद की राग आधारित गीतों की रचना करने की क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था। परन्तु आज हम आपको नौशाद के सर्वप्रिय पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर में राग मालकौंस पर आधारित वह गीत सुनवाते हैं, जिसकी लोकप्रियता आज भी कायम है।

राग- मालकौंस : फिल्म ‘बैजू बावरा’ : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मोहम्मद रफी 





उस्ताद अमीर खाँ जैसे दिग्गज गवैये नौशाद की प्रतिभा के ऐसे कायल हुए कि आगे चल कर जब भी उन्हें नौशाद ने बुलाया, अपनी सहमति और सहयोग प्रदान किया। रागदारी संगीत के प्रति नौशाद की ऐसी अगाध श्रद्धा थी कि इस विषय पर प्रायः फिल्म के निर्माता-निर्देशक के साथ उनकी मीठी नोकझोक भी हो जाती थी। एक साक्षात्कार में नौशाद ने फ़िल्मकार ए.आर. कारदार के हवाले से जिक्र किया भी था कि फिल्म में राग आधारित गीत रखने के सवाल पर कैसे उन्हें चुनौती मिली थी। उस्ताद अमीर खाँ को नौशाद साहब ने दोबारा याद किया, 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ के लिए। इस फिल्म के अन्य गीतों के लिए मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और हेमन्त कुमार थे, किन्तु उस्ताद अमीर खाँ से उन्होने राग मुल्तानी के स्वरों में मीरा का एक पद- ‘दया करो हे गिरिधर...’ गवाया। यह राग दिन के चौथे प्रहर के परिवेश को यथार्थ रूप से अनुभूति कराता है। आइए सुनते हैं यह गीत-


राग- मुल्तानी : फिल्म ‘शबाब’ : ‘दया करो हे गिरिधर...’ : उस्ताद अमीर खाँ


स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए। लोक संगीत के साथ ही उन्होने शास्त्रीय राग आधारित गीतों का प्रचलन भी पाँचवें दशक से आरम्भ कर दिया था। नौशाद के संगीत से सजे अगले जिस गीत की हम चर्चा करने जा रहे हैं, वह 1955 में प्रदर्शित बेहद सफल फिल्म ‘उड़न खटोला’ का गीत है- ‘मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार हो, नदिया धीरे बहो...’। दरअसल यह एक पारम्परिक ठुमरी है, जिसे नौशाद ने फिल्म के लिए लता मंगेशकर से बड़े ही आकर्षक ढंग से गवाया था। फिल्म के अन्य गीतों के साथ यह गीत भी बेहद लोकप्रिय हुआ था। आइए सुनते हैं, राग पीलू की एक पारम्परिक ठुमरी का फिल्मी रूपान्तरण।

राग- पीलू : फिल्म ‘उड़न खटोला’ : ‘मोरे सइयाँ जी उतरेंगे पार...’ : लता मंगेशकर



और अन्त में, जिस प्रकार संगीत के मंच की परम्परा होती है, संगीतकार नौशाद की स्मृतियों को समर्पित ‘स्वरगोष्ठी’ की इस कड़ी को हम राग भैरवी से विराम देंगे। राग भैरवी पर आधारित यह गीत 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘अमर’ से लिया गया है। नौशाद ने इस फिल्म के लिए अत्यन्त सुरीले गीत रचे थे, जिनमें एक गीत है- ‘इंसाफ का मन्दिर है ये भगवान का घर है...’। इस गीत में भैरवी का स्पष्ट स्वरूप उभरता है। फिल्म में इस गीत के अन्तरों का प्रयोग कई बार किया गया है। मोहम्मद रफी के स्वर में आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम नौशाद के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों की एक और श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे।

राग- भैरवी : फिल्म ‘अमर’ : ‘इंसाफ का मन्दिर है ये...’ : मोहम्मद रफी



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 101वें अंक से आज की संगीत पहेली एक नई श्रृंखला में पदार्पण कर रही है। इस अंक की पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस इस गीत की गायिका कौन हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 99वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी सिद्धेश्वरी देवी के स्वरों में भैरवी की एक ठुमरी का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार जयदेव। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम संगीतकार नौशाद अली पर जारी श्रृंखला का दूसरा भाग प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पिछले सौवें अंक तक चली संगीत प्रतियोगिता के महाविजेता और उप-विजेताओ के प्राप्तांकों और उनके नामों की घोषणा भी करेंगे। जनवरी, 2013 से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में कुछ परिवर्तन भी कर रहे हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।

कृष्णमोहन मिश्र

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

'सिने पहेली' में आज क्रिस्मस स्पेशल


22 दिसम्बर, 2012
सिने-पहेली - 51  में आज 

पहचानिये सैण्टा क्लॉस के पीछे छुपे चेहरों को


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, पिछली कड़ी में हमने आपसे जो सवाल पूछा था, उसके जो जवाब आप सब ने भेजे हैं, उसे देख कर हम सचमुच चकित रह गए हैं। हमने तो यही सोचा था कि आप ज़्यादा से ज़्यादा 40-50 गीत चुन कर भेजेंगे, पर आप में से कई प्रतियोगियों ने तो इससे कई गुणा अधिक गीत लिख कर भेजे हैं। पर दोस्तों, कई बार क्या होता है कि क्वान्टिटी के अधिक होने से क्वालिटी पर असर पड़ता है, आप सब के साथ भी वही हुआ। बिना जाँच-पड़ताल किए सीधे इंटरनेट से उपलब्ध जानकारी के अनुसार गीतों की सूची भेजने की वजह से कई गीत आप ने ग़लत भी भेज दिए हैं। तीन गायकों वाले कुछ गीतों में चौथा नाम डाल कर भी कुछ गीत आये हैं (उदाहरण - फ़िल्म 'राम लखन' के गीत "माइ नेम इज़ लखन" को मोहम्मद अज़ीज़, अनुराधा पौडवाल और नितिन मुकेश ने गाया है, जबकि कुछ प्रतियोगियों ने अनुराधा श्रीराम का नाम भी शामिल कर दिया है, जो ग़लत है)। इसी तरह से पाँच गायकों वाले गीत में से एक नाम हटा कर भी कुछ गीत हमें मिले हैं (उदाहरण - "दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता", "मिस्टर लोवा लोवा तेरी आंखों का जादू" आदि)। कुछ प्रतियोगियों ने एक ही गीत को एकाधिक बार अपनी सूची में शामिल किया है। एक प्रतियोगी ने तो एक गीत को तीन बार लिखा है। इन सब के चलते केवल दो दिनों में पिछली पहेली के परिणाम व विजेताओं की घोषणा कर पाना हमारे लिए असंभव हो गया है। हम आपके द्वारा भेजे गये हर गीत की जाँच कर रहे हैं, और यह जाँच पूरी होने पर ही 'सिने पहेली-50' के विजेताओं के नाम घोषित किए जायेंगे। सम्भवत: अगली कड़ी या उसकी अगली कड़ी में यह संभव हो पाएगा।

'सिने पहेली - 50' तथा पाँचवे सेगमेण्ट के परिणामों की घोषणा 29 दिसंबर अथवा 5 जनवरी के अंक में की जाएगी। इस विलम्ब के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।


तो चलिए 'सिने पहेली' के सफ़र में आगे बढ़ते हैं और शुरू करते हैं इस प्रतियोगिता का छ्ठा सेगमेण्ट, अर्थात् 'सिने पहेली - 51'। क्योंकि नये सेगमेण्ट की शुरुआत हो रही है, इसलिए हम नये प्रतियोगियों का एक बार फिर से आह्वान करना चाहेंगे...


नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। अब महाविजेता कैसे बना जाये, आइए इस बारे में आपको बतायें।

आज की पहेली : 'मेरी' क्रिस्मस, तेरी पहेली


'सिने पहेली' के सभी प्रतियोगियों को हमारी तरफ़ से क्रिस्मस की हार्दिक शुभकामनायें। सैण्टा क्लॉस क्रिस्मस का अभिन्न अंग हैं। सैण्टा के बिना बच्चों और बड़ों, सब की क्रिस्मस अधूरी है। इसलिए आज की पहेली को तैयार करने में सैण्टा क्लॉस का ही हमने सहारा लिया है। हमने दस अभिनेता और गायकों को सैण्टा का जामा पहनाया है, अब आपको इस अभिनेताओं व गायकों की शिनाक्त करनी है। तो ये रहे वो दस कलाकार, ध्यान से इन तसवीरों को देखिये और पहचानिये सैण्टा क्लॉस के पीछे छुपे इन चेहरों को....













जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 51" अवश्य लिखें, और अन्त में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें गुरुवार, 27 दिसम्बर, शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।



कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता'

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...


4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।


'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, आप सभी को एक बार फिर से "मेरी क्रिस्मस",  नमस्कार। 



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