Skip to main content

"ससुराल गैन्दाफूल..."- रेखा भारद्वाज का चिर परचित अंदाज़


"नमक इश्क का", फ़िल्म ओमकारा का ये हिट गीत था जिसे गाने के बाद रेखा भरद्वाज ने कमियाबी का असली स्वाद चखा था. इस गीत के संगीतकार हैं विशाल भरद्वाज जो रेखा के पति और एक कामियाब संगीतकार होने के साथ साथ एक उत्कृष्ट निर्देशक भी हैं. नमक इश्क का गीत लिखा था गुलज़ार साहब ने जिन्हें रेखा अपना मेंटर मानती है. १९९६ में बनी गुलज़ार की फ़िल्म "माचिस" से विशाल भरद्वाज बतौर संगीतकार चर्चा में आए थे. इसी फ़िल्म में रेखा ने विशाल को सहयोग दिया था संगीत में. तत्पश्चात चाची ४२०, गोड़ मदर, हु तू तू और मकडी में उन्होंने विशाल के साथ काम किया. कभी कभार कुछ गीतों को अपनी आवाज़ भी दी.

विशाल ने "मकडी" से निर्देशन में कदम रखा, और अगली फ़िल्म "मकबूल" में उन्होंने रेखा से दो बेहद दमदार "रोने दो" और "चिंगारी" गीत गवाए, २००३-०४ में उन्हीं के संगीत निर्देशन में रेखा की पहली चर्चित एल्बम "इश्का इश्का" आई. इससे ठीक दस साल पहले १९९४ में जब रेखा बुल्ले शाह के गीतों पर विशाल के निर्देशन में काम कर रही थी, उन्हीं दिनों माचिस की सिटिंग के लिए उनका गुलज़ार साहब के यहाँ आना जाना हुआ, जहाँ एक दिन गुलज़ार साहब ने उनसे वादा किया कि वो उनकी अल्बम के लिए गीत लिखेंगे. और गुलज़ार साहब ने अपना वादा निभाया भी.

इस एल्बम के बाद उन्हें एक अच्छे सूफी गायिका के रूप में देखा जाने लगा था. विशाल को जब भी किसी गीत में एक अलग लहजे की आवाज़ की दरकार होती वो रेखा को ही चुनते. याद कीजिये "एक वो दिन भी थे..." (चाची ४२०), "मेरी जान (भागमती), और "फूँक दे.." (नो स्मोकिंग). ऐसा नही कि रेखा ने सिर्फ़ विशाल के संगीत निर्देशन में ही गाया हो, जैसा कि कुछ आलोचक उन्हें विशाल की परछाई बता कर दरकिनार कर देते हैं. शांतनु मोइत्रा के निर्देशन में फ़िल्म "लागा चुनरी में दाग" का शीर्षक गीत इस मिथक को तोड़ने के लिए काफ़ी है. इस गीत में नायिका के मन में बदलते भावों को अपनी आवाज़ से उभारना आसान नही था और शुद्ध और क्लिष्ट हिन्दी के शब्दों का इस्तेमाल किया था इस गीत में गीतकार स्वानंद किरकिरे ने भी, पर रेखा ने इस चुनौती भरे गीत को भी उतनी खूबी से निभाया जैसे ठीक उल्टे मिजाज़ के (ठेठ देसी नाच गीत)"नमक इश्क का" गीत को निभाया था.

रेखा आजकल एक बार फ़िर खूब तारीफें बटोर रही है, दिल्ली ६ में पहली बार ऐ आर रहमान के निर्देशन में गाये रंगीले अंदाज़ के अपने गीत "गैन्दाफूल" के लिए. वहीदा रहमान पर फिल्माए गए इस गीत में देसी छेड़ छाड़ तो है ही, एक अलग तरह मस्ती भी है, जो बार बार सुने जाने को मजबूर करती है. रेखा की आवाज़ अपने पूरे शबाब पर है यहाँ और प्रसून के शब्द भी गुदगुदाते हैं. तो सुनिए...क्या क्या होता है नई नवेली दुल्हन के साथ ससुराल में -



Comments

क्या बात है.....शब्द नही है इस दीत को sunne के बाद ....बहुत khoob.....
आज दोपहर में ये गाना सुना तो दिल खुश हो गया था। और इस पोस्ट से तो कई बार सुन चुका हूँ। सच मीठा सा है यह गाना।
Anonymous said…
लोक संगीत की चोरी पर कैसे इतराया जाता है कोई प्रसून और रहमान से पूछे।
ऎसा क्यूँ होता है कि जब किसी को किसी की बुराई करनी होती है तो वह एनोनिमस बन जाता है। हिम्मत है तो भाई खुलकर लिखो। छुपकर तो कुत्ता भी शेर बन जाता है। और हाँ, एनोनिमस बंधु, अगर आपको पता न हो तो यह जान लें कि इस गाने में रहमान के साथ एक और संगीतकार का नाम है। अगर रहमान को गाना चुराना हीं होता तो दूसरे संगीतकार का नाम देने की जरूरत हीं क्या होती।

आसमान की तरह मुँह करके थूकने वाले की क्या हालत होती है, एनोनिमस बंधु शायद नहीं जानते हैं।

-विश्व दीपक

Popular posts from this blog

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71 हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2) "मैं नागन तू सपेरा..."  रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक।

बोलती कहानियाँ - मेले का ऊँट - बालमुकुन्द गुप्त

 'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  रीतेश खरे "सब्र जबलपुरी" की आवाज़ में निर्मल वर्मा की डायरी ' धुंध से उठती धुंध ' का अंश " क्या वे उन्हें भूल सकती हैं का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं बालमुकुन्द गुप्त का व्यंग्य " मेले का ऊँट , जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने। इस प्रसारण का कुल समय 7 मिनट 33 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें। समझ इस बात को नादां जो तुम में कुछ भी गैरत हो, न कर उस काम को हरगिज कि जिसमें तुझको जिल्लत हो।  ~  "बालमुकुन्द गुप्त" (1865 - 1907) हर शुक्रवार को यहीं पर सुनें एक नयी कहानी न जाने आप घर से खाकर गये थे या नहीं ... ( बालमुकुन्द गुप्त की "मेले का ऊँट" से एक

कल्याण थाट के राग : SWARGOSHTHI – 214 : KALYAN THAAT

स्वरगोष्ठी – 214 में आज दस थाट, दस राग और दस गीत – 1 : कल्याण थाट राग यमन की बन्दिश- ‘ऐसो सुघर सुघरवा बालम...’  ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया