रविवार, 14 जुलाई 2013

स्वरगोष्ठी में आज : राग भूपाली के दो रंग

  
स्वरगोष्ठी – 128 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 8

राग भूपाली पर आधारित एक मनभावन गीत- ‘पंख होते तो उड़ आती रे...’


इन दिनों ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक मंच ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’। इस श्रृंखला की आठवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस संगोष्ठी में उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो छः दशक से भी पूर्व के हैं। रागों के आधार के कारण ये गीत आज भी सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का हमारा उद्देश्य यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम उन भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको भारतीय संगीत के एक अत्यन्त मधुर राग ‘भूपाली’ पर आधारित, फिल्म ‘सेहरा’ का एक गीत सुनवाएँगे और इस गीत के विस्मृत संगीतकार रामलाल का स्मरण करेंगे। इसके साथ ही हम सुविख्यात सितार वादक उस्ताद शाहिद परवेज़ द्वारा प्रस्तुत राग ‘भूपाली’ की एक रचना का आनन्द भी लेंगे।


लता मंगेशकर
वाराणसी के शहनाई और बाँसुरी वादकों के परिवार में जन्मे रामलाल चौधरी संगीतकार बनने की लालसा लेकर 1944 में बम्बई (अब मुम्बई) आए और विख्यात अभिनेता पृथ्वीराज कपूर द्वारा संचालित ‘पृथ्वी थियेटर’ के तत्कालीन संगीतकार राम गांगुली के सहायक बन गए। राज कपूर की पहली फिल्म ‘आग’ के संगीतकार राम गांगुली ही थे। इस फिल्म के गीतों में रामलाल ने बाँसुरी का रंग भर कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। फिल्म के एक बेहद लोकप्रिय गीत- ‘ज़िन्दा हूँ इस तरह कि गम-ए-ज़िन्दगी नहीं...’ की संवेदनशीलता को बढ़ाने में बाँसुरी संगति की भूमिका अविस्मरणीय थी। पृथ्वी थियेटर और राम गांगुली के साथ किये गए काम से प्रभावित होकर वी. शान्ताराम ने अपनी फिल्म कम्पनी में नियुक्त कर लिया। ‘प्रभात’ की लगभग सभी फिल्मों में रामलाल की बाँसुरी और शहनाई के स्वर गूँजे। 1950 तक उन्होने उस समय के लगभग सभी बड़े संगीतकारों, आर.सी. बोराल, बसन्त देसाई, नौशाद, सी. रामचन्द्र, गुलाम मोहम्मद आदि के साथ काम किया। 1950 में राज कपूर और वैजयन्तीमाला अभिनीत फिल्म ‘तांगेवाला’ में उन्हें संगीतकार बनने का सुअवसर मिला, परन्तु यह फिल्म पूरी ही न हो सकी। 1956 में एक बार फिर संगीतकार बनने का सुअवसर मिला, फिल्म ‘नकाबपोश’ के माध्यम से। यह फिल्म प्रदर्शित हुई और इसके गीत सराहे भी गए। इसी वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘हुस्नबानों’ में भी रामलाल का संगीत था। रामलाल के संगीत से सजी उस दौर की कुछ अन्य फिल्में हैं- नागलोक (1957), माया मछेन्द्र (1960), और राजमहल (1961)। इसी बीच एक शहनाई वादक के जीवनवृत्त पर निर्मित और 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ में उन्होने विख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के साथ शहनाई बजाई थी। फिल्म अत्यन्त सफल हुई, किन्तु रामलाल को समुचित श्रेय न मिल सका। वी. शान्ताराम उनकी प्रतिभा से परिचित थे ही, उन्होने रामलाल को अपनी फिल्म ‘सेहरा’ का संगीत निर्देशन सौंप दिया। 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ का संगीत कालजयी सिद्ध हुआ। इस फिल्म के गीतों में रागों का स्पर्श इतना लुभावना था कि सभी गीत हिट हुए, किन्तु फिल्म के एक गीत- ‘पंख होते तो उड़ आती रे...’ में राग भूपाली के सुरों का स्पर्श देकर उन्होने इसे सदाबहार बना दिया। इस गीत की जितनी मधुर धुन है, लता मंगेशकर ने उतने ही कौशल से इसे गाया भी है। आज हमारी चर्चा में यही गीत है। इस गीत की विशेषताओं पर हमारी यह चर्चा जारी रहेगी, उससे पहले आप इस गीत का आनन्द लीजिए।


राग भूपाली : फिल्म सेहरा : ‘पंख होते तो उड़ आती रे...’ : संगीतकार रामलाल



उस्ताद शाहिद परवेज़
फिल्म ‘सेहरा’ के गीतों की उत्कृष्ठता से प्रभावित होकर वी. शान्ताराम ने अपनी अगली फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ के संगीत का दायित्व भी रामलाल को सौंपा। संगीत की दृष्टि से यह फिल्म भी हिट हुई। इस फिल्म के शीर्षक गीत को सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर ने स्वर दिया था। इसी के साथ फिल्म में पण्डित शिवकुमार शर्मा ने भी अपने सन्तूर का योगदान किया था। बस, इन्हीं कुछ गिनी-चुनी फिल्मों में ही इस प्रतिभावान संगीतकार का संगीत हम सुन पाए। आज हम आपसे फिल्म ‘सेहरा’ के जिस गीत की चर्चा कर रहे हैं, वह राग भूपाली के आधार वाला एक उत्कृष्ट गीत है। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग भूपाली के बारे में करते हैं। कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। अर्थात, इसके आरोह-अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। इसका गायन-वादन रात्रि के प्रथम प्रहर में उपयुक्त माना जाता है। कुछ विद्वान इसे भूप कल्याण के नाम से भी पुकारते हैं। इसे गाते-बजाते समय राग देशकार से बचाना पड़ता है। आइए अब हम आपको राग भूपाली में निबद्ध सितार पर एक मोहक रचना सुनवाते हैं। उस्ताद शाहिद परवेज़ खाँ देश के जाने-माने सितार वादक हैं। प्रस्तुत रचना में उन्होने मध्य और द्रुत लय की तीनताल में अनूठा वादन किया है। आप इस सितार वादन का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भूपाली : सितार पर मध्य व द्रुत तीनताल की गत और झाला : उस्ताद शाहिद परवेज 




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक खयाल रचना के आलाप का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – आलाप के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह खयाल किस राग में निबद्ध है?

2 – इस आलाप के गायक कलाकारों की आवाज़ पहचान कर उनके नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 126वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री अथवा बागेश्वरी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आगामी अंक में हम एक और लोकप्रिय राग पर आधारित एक सदाबहार फिल्मी गीत, इसके विस्मृत संगीतकार और इसी राग में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

संगीतकार रामलाल ने इतना बहतरीन काम किया पर कभी उन्हें वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे , मुझे तो ये भी नहीं पता कि क्या वो जीवित हैं या नहीं...कृष्णमोहन जी क्या आपको कुछ खबर है ?

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