गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

'एक गीत सौ कहानियाँ' में आज : शमशाद बेगम का पहला गीत


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 36

एक गीत सौ कहानियाँ – 22

शमशाद बेगम की पहली हिन्दी फिल्म ‘खजांची’ का एक गीत : ‘सावन के नज़ारे हैं...’


आपके प्रिय स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर गत वर्ष 'एक गीत सौ कहानियाँ' नामक स्तम्भ आरम्भ किया था, जिसके अन्तर्गत हर अंक में वे किसी फिल्मी या गैर-फिल्मी गीत की विशेषताओं और लोकप्रियता पर चर्चा करते थे। यह स्तम्भ 20 अंकों के बाद मई 2012 में स्थगित कर दिया गया था। गत माह से हमने इस स्तम्भ का प्रकाशन ‘भारतीय सिनेमा के सौ साल’ श्रृंखला के अन्तर्गत पुनः शुरू किया है। आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ की 22वीं कड़ी में सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम की पहली हिन्दी ‘खजांची’ में गाये उनके पहले गीत "सावन के नज़ारे हैं…" की चर्चा। 


दोस्तों, आज ‘एक गीत सौ कहानियाँ’ का अंक समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ.पी. नैयर ने इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मन्दिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'एक गीत सौ कहानियाँ' का आज का यह अंक। शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज 6 दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस अंक में उनके गाये पहले हिन्दी फिल्म ‘खजांची’ में उनके गाये गीत को सुनने के साथ-साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।

विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करती हुई शमशाद बेगम नें बरसों पहले अपनी दास्तान कुछ यूँ शुरु की थीं - "देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ। मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ। आप मेरे गाने अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूँ है कि मेरा जन्म लाहौर में 1919 में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी का भी नहीं था, मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी-कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसंद आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग् कम्पनी (jien-o-phone) के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। चौदह साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ, जो था- ‘हाथ जोड़ा लई पखियन्दा ओए कसम खुदा दी चन्दा... '। उस रेकार्ड कम्पनी ने फिर मेरे 100 रेकार्ड निकाले। 1937 में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। 1939 में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया 1940 की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत- ‘आ सजना...’ काफी हिट हुआ था। मेरी पहली हिन्दी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म 52 हफ़्तों से ज़्यादा चली...”। दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। आइए अब हम आपको सुनवाते है, शमशाद जी की पहली हिंदी फ़िल्म 'ख़ज़ांची' से उनका गाया यह गीत। गीत के बोल हैं- ‘सावन के नज़ारे हैं...’। फिल्म में मास्टर गुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब नें। 1941 में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिडवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे, एम. इस्माइल, रमोला और नारंग। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।

फिल्म खजांची : ‘सावन के नज़ारे हैं...’ : गायिका शमशाद बेगम



आपको 'एक गीत सौ कहानियाँ' का यह अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया, अपने सुझाव और अपनी फरमाइश हमें radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। इस स्तम्भ के अगले अंक में हम किसी अन्य गीत और उससे जुड़ी कहानियों के साथ पुनः उपस्थित होंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र






यादें मूक फिल्मों की

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