Sunday, January 18, 2009

मधुशाला ' का प्रथम सस्वर पाठ दिसम्बर १९३३ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शिवाजी हाल में हुआ था ! तब श्री अक्षय कुमार जैन ,सम्पादक ,नवभारत टाईम्स ,वहां उपस्थित थे !वे २३ जनवरी १९५९ के लाल किले के कवी सम्मलेन में भी मौजूद थे जिसकी परिसमाप्ति `मधुशाला ,के पाठ से हुई थी ! उन्हीं के द्वारा लिखा ये संस्मरण आपके सम्मुख है !



कितनी शक्लों को रखेगा

याद भला भोला साकी ,

कितनी पीनेवालों में है

एक अकेली मधुशाला !



इस कविता ने जो लोक स्वीकृति और जनप्रियता प्राप्त की है ,उसे देखते हुए आज कोई भी व्यक्ति इस बात को याद कर कि वह `मधुशाला'के सर्वप्रथम काव्यपाठ में मौजूद था ,थोडा गर्व किये बगैर नहीं रह सकता !यह अवसर मेरे जीवन की मधुर स्मृतियों में है

वह शाम मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं कशी हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र था और छात्रावास के मेरे कमरे के साथ वाले कमरे में एक युवक धीमे स्वर में कोई कविता गुनगुना रहा था !मैं उन्हें छिप कर सुन रहा था और दूसरे दिन विशाल शिवाजी हाल में उसने उन्मुक्त कंठ से कविता पाठ किया !वह युवक कवी थे भाई बच्चन और उन्होने जिस कविता का पाठ किया था ,वह थी `मधुशाला' जिसकी पुन्क्तियों को वहां पर मौजूद हजारों सुनने वालों ने उनके साथ दोहराया था !

उस वक़्त की भावना को कुछ शब्दों में बता पाना कठिन है !बस यही लग रहा था कि वे जो कुछ कह रहे हैं वह हम सब कहना चाहते थे ,पर न हमारे पास शब्द थे ,और न हममें साहस !उनके शब्दों से जैसे हमारे मन के बंधन खुल रहे थे !

नवयुवक तो पागल थे ,पर बड़ों में एक दूसरे प्रकार की प्रतिक्रिया भी हो रही थी !प्रो.मनोरंजन्प्रसाद सिंह ने उस कवी सम्मलेन का सभापतित्व किया था और उन्होने वहीँ बैठे बैठे मधुशाला की कई रुबाइयों की पैरोडी लिख डाली और सुनाई भी ! तब तक मधुशाला पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं हुई थी !पहले दिन तृप्ति नहीं हुई तो दूसरे दिन फिर `मधुशाला ' का काव्य पाठ कराया गया और लोग लिखने का सामान लेकर आये और सुन सुन कर बहुतसी रुबाइयाँ लिख ले गए !

`मधुशाला 'के प्रति जो दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं पहले दिन दिखलाई पड़ी थीं वे पुस्तक प्रकाशित होने के बाद भी बहुत दिन चलीं !कुछ उसे पढ़ सुन कर झूमते रहे ,तो कुछ उसको और उसके लेखक को बुरा भला कहते रहे !आलोचकों का स्वर तो अब प्राय: मंद पद चूका था ,पर उस पर झूमने वाले आज भी मौजूद हैं !



कितने साकी अपना अपना

काम ख़त्म कर दूर हुए

कितने पीनेवाले आये

किन्तु वही है मधुशाला !



और एक और द्रश्य अभी हाल में 23 जनवरी 1959 का मेरे सामने है जब बच्चन जी ने लाल किले के सम्मलेन में मधुशाला का पाठ किया! उसमें मेरा तरुण पुत्र कुछ उसी मुद्रा में बैठा जिसमें 25 साल पहले मैं बैठा था ,तन्मयता से उनका काव्य पाठ सुन रहा था और उन्ही के साथ उनकी पंक्तियाँ गुनगुना रहा था ! तभी मैंने बच्चन से कहा कि आपकी मधुशाला और उनके साकी दोनों पर समय के थपेडों का प्रभाव नहीं पढ़ा ! जितने आकर्षक और मनमोहक आप पिताओं को लगते थे उतने ही पुत्रों को भी लगते हैं !

किसी कवि सम्मलेन में जब बच्चन जी अपनी कविता सुना रहे थे ,मेरे पास बैठे एक वृद्ध से सज्जन कह रहे थे ,"क्या ये बच्चन जी हैं ! इनकी कविता सुनते सुनते हम बूढे हो गए और इनके स्वर में वही जवानी है !"

मधुशाला की लोकप्रियता का रहस्य किसमें है ,बच्चन जी की कविता में या उनके कविता पाठ में ? मैं समझता हूँ दोनों में ;एक ने उन्हे कवि सम्मेलनों में आकर्षण का केंद्र बनाया है तो दूसरी ने उनकी कृति की पचास हज़ार से अधिक प्रतियाँ जनता के बीच पहुंचाई हैं ! जिस दिन इसका विश्लेषण वैज्ञानिक ढंग से किया जायेगा उस दिन इस युग , इस समाज , इस युग समाज के काव्य प्रतियों की मनोवृति - सब पर नया प्रकाश पड़ेगा !



इस बात को ले कर एक समय गर्म बहस होती थी कि बच्चन जी ने मधुशाला पी कर लिखी है या बगैर पिए ! आज शायद ही कोई यह मानता हो कि बच्चन जी ने मदिरा का प्रचार करने के लिए ` मधुशाला ' लिखी है ! इस सम्बन्ध में जब उनसे सीधे प्रश्न किये जाते थे तो वे कहते थे ,"मैंने तुम्हें मदिरा की कविता नहीं दी , मैंने तुम्हे कविता की मदिरा दी है !"



`कवि साकी बनकर आया है

भर कर कविता का प्याला !'



अपनी भावों , विचारों को प्रकट करने के लिए उन्होने मधुशाला का रूपक अपनाया है ! मेरी शुभकामना है कि ` मधुशाला ' जैसे जैसे पुरानी हो वैसे वैसे उसका नशा बढ़ता जाए और समय कवि की इस उक्ति को सत्य सिध्ध करे —



है बढती तासीर सुरा की

साथ समय के इससे ही ,

और पुरानी हो कर मेरी

और नशीली मधुशाला !







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