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राग तोड़ी : SWARGOSHTHI – 321 : RAG TODI




स्वरगोष्ठी – 321 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 7 : राग तोड़ी

राग तोड़ी में विदुषी मालिनी राजुरकर से खयाल और लता मंगेशकर से गीत सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की सातवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘ताजमहल’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग तोड़ी के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता  मंगेशकर
सातवें दशक के पूर्वार्द्ध में रोशन की कई सफल फिल्में आईं। रोशन की यह सफलता व्यावसायिक दृष्टि से भी थी और लोकप्रियता की दृष्टि से भी। 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में श्रेष्ठतम कव्वाली स्वरबद्ध कर रोशन अपनी प्रतिभा का परिचय दे ही चुके थे। दशक के पूर्वार्द्ध की कई फिल्मों में उन्होने अनेक गज़लें स्वरबद्ध कर इस क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा को रेखांकित किया। रोशन की स्वरबद्ध कुछ श्रेष्ठ गज़लों के उदाहरण पर्याप्त होंगे। 1962 में एक फिल्म ‘वल्लाह क्या बात है’ प्रदर्शित हुई थी। यह फिल्म टिकट खिड़की पर तो असफल रही, किन्तु फिल्म में मुहम्मद रफी के स्वर में प्रस्तुत गजल –“गम-ए-हस्ती से बेगाना होता...” को खूब लोकप्रियता मिली। इस गजल से यह सिद्ध हुआ कि रोशन गज़लों के मामले में भी उत्कृष्ठ थे। सातवें दशक में रोशन ने अनेक यादगार गज़लें श्रीताओं को दी। इस दशक की कुछ लोकप्रिय गजले हैं; 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘नूरजहाँ’ में सुमन कल्याणपुर की गायी गजल –“शराबी शराबी ये सावन का मौसम...”, 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘ममता’ में लता मंगेशकर के स्वर में –“रहते थे कभी जिनके दिल में...”, 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘भीगी रात’ में मुहम्मद रफी के स्वर में –“दिल जो न कह सका वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई...”, 1962 की फिल्म ‘ज़िन्दगी और हम’ की गजल –“यूँ हमको देख और हमारी नज़र से देख...” और 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘ताजमहल’ में तो उत्कृष्ट गज़लों की भरमार थी। इस फिल्म के संगीत ने रोशन के लिए लोकप्रियता के नए आयाम गढ़ दिये। अच्छे संगीत के बावजूद वर्षों तक लोकप्रियता के लिए तरसते रोशन के लिए फिल्म ‘ताजमहल’ का संगीत उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार लेकर आया। फिल्म में राग अल्हैया बिलावल पर आधारित, लता मंगेशकर की आवाज़ में गजल –“जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं...”, लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी की आवाज़ में युगलगीत -“पाँव छू लेने दो फूलों की इनायत होगी...” और लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी के स्वरों में राग पहाड़ी पर आधारित गीत –“जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा...” तो गली-गली में गूँज उठा था। इस तीसरे गीत में रोशन ने भारतीय और पाश्चात्य ताल शैलियों का प्रभावी और अद्भुत मिश्रण किया था। इसी फिल्म का एक और गीत हमने आज की ‘स्वरगोष्ठी’ के लिए चुना है। लता मंगेशकर के स्वर में राग तोड़ी पर आधारित इस गीत के बोल हैं –“खुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीं पर ज़मीं की खातिर ये ज़ंग क्यों है...”। इस फिल्म में एक बार फिर रोशन को गीतकार साहिर लुधियानवी का साथ मिला और इस जोड़ी ने संगीत प्रेमियों को एक से बढ़ कर एक आकर्षक गीत दिये। लीजिए, अब आप साहिर लुधियानवी का लिखा, लता मंगेशकर का गाया और रोशन का स्वरबद्ध किया, राग तोड़ी पर आधारित यही गीत सुनिए।


राग तोड़ी : “खुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीं पर...” : लता मंगेशकर : फिल्म – ताजमहल



मालिनी राजुरकर
राग तोड़ी अपने थाट का आश्रय राग है, अर्थात इसके थाट का नामकरण इसी राग के आधार पर हुआ है। राग ‘तोड़ी’ एक सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह में- सा, रे॒(कोमल) ग॒(कोमल) म॑ प, ध॒(कोमल) नि सां स्वरों का तथा अवरोह में- सां नि ध॒(कोमल) प, म॑ ग॒(कोमल) रे॒(कोमल) सा स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है तथा राग के गायन-वादन का समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। यह मान्यता है की इस राग की रचना संगीत सम्राट तानसेन ने की थी। इसीलिए इस राग को मियाँ की तोड़ी भी कहते हैं। इस राग के आरोह में प्रायः पंचम का प्रयोग नहीं किया जाता और अवरोह में पंचम का अल्प प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह, दोनों में पंचम स्वर का प्रयोग न करने पर यह राग गुर्जरी तोड़ी का स्वरूप बनाता है। राग तोड़ी उत्तरांगवादी और दिन के उत्तर अंग में प्रयोग किया जाता है। अब हम आपको राग तोड़ी की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। द्रुत तीनताल में प्रस्तुत इस खयाल रचना के बोल हैं - ‘कान्ह करत मोसे रार ऐ री माई...’। इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, मालिनी जी के स्वरों में सुनिए राग तोड़ी की यह बन्दिश। आप यह बन्दिश सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तोड़ी : ‘कान्ह करत मोसे रार...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 321वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1963 में प्रदशित रोशन की एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस मशहूर पार्श्वगायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 17 जून, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 323वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 319वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘सूरत और सीरत’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – पूरियाधनाश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – आशा भोसले

इस अंक की पहेली में हमारे सभी पाँच नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस सातवें अंक में हमने आपके लिए राग तोड़ी पर आधारित फिल्म ‘ताजमहल’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Comments

Unknown said…
Sangeetkar Roshan ji ke kai achchhe geet aap de chuke hei aur hame inke bareme bahut kuchh Janneko bhi mila. Irke saath achche sangeet kalakaroke vishay me bhi aapne bahut jankari di. Iske liye Krishnamohanji, ham aapke bahut aabhari hai.

Hame sangeetkar Madan Mohan ji ke liya bhi sanmaan hai. Unki rachnae classical music ki aur khoob rahi hai. Meri yeh vinanti hei ki aap unka bhi hame rasasvad dilayenge.

Vijaya Rajkotia

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