शनिवार, 13 मई 2017

चित्रकथा - 18: उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान


अंक - 18

उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान

"मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


6 मई को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के निधन हो जाने से सितार जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। शास्त्रीय संगीत जगत में उनका जितना योगदान रहा है, वैसा ही योगदान उन्होंने सिने संगीत जगत में भी दिया है। उनके सितार के टुकड़ों से सजे हिन्दी फ़िल्मी गीत जैसे खिल उठते थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में उस्ताद रईस ख़ाँ साहब को याद करते हुए उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों की बातें करें जिनमें उन्होंने अपने सितार और उंगलियों के जादू चलाए थे। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब की पुण्य स्मृति को।




उस्ताद रईस ख़ाँ
(25 नवंबर 1939 - 6 मई 2017)

2017 का वर्ष सितार जगत के लिए अब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष रहा है। 4 जनवरी को उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ, 12 अप्रैल को पंडित जयराम आचार्य, और अब 6 मई को उस्ताद रईस ख़ाँ साहब। सितार जगत के तीन तीन उज्वल नक्षत्र अस्त हो गए एक के बाद एक, और पैदा हो गया एक महाशून्य शास्त्रीय संगीत जगत में। हलीम जाफ़र ख़ाँ और जयराम आचार्य ही की तरह रईस ख़ाँ साहब का भी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा। हालाँकि संगीतकार मदन मोहन के साथ ख़ाँ साहब ने सबसे उम्दा काम किया, और क्यों ना करते, दोनों जिगरी दोस्त जो थे, लेकिन अन्य संगीतकारों के लिए भी ख़ाँ साहब ने सितार बजाया और गीतों के अन्तराल संगीत को ऐसा सुरीला अंजाम दिया कि इन तमाम गीतों की इन सितार की ध्वनियों के बग़ैर कल्पना भी नहीं की जा सकती। सितार के इन स्वर्गिक ध्वनियों को अगर इन गीतों से निकाल दिया जाए तो शायद इन गीतों की आत्माएँ ही चली जाएँगी। 1964 की फ़िल्म ’ग़ज़ल’ की ग़ज़ल "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ" में साहिर के बोल, मदन मोहन की तर्ज़, और लता मंगेशकर की आवाज़ के साथ-साथ उस्ताद रईस ख़ान के सितार के टुकड़ों ने इस ग़ज़ल को अमर बना दिया। इसके इन्टरल्युड्स में सारंगी और वायलिन तो थे ही, पर सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेन्स ख़ाँ साहब के सितार को ही मिला। 1966 की फ़िल्म ’मेरा साया’ में तो जैसे ख़ाँ साहब का सितार अपने पूरे शबाब पर था। "नैनों में बदरा छाये" का शुरुआती संगीत से भला कौन अंजान है! राजस्थान के किसी जलमहल का दृश्य है, सुनिल दत्त महल के छत पर धूप में लेटे हैं, छत से चारों तरफ़ झील के नज़ारे हैं। ऐसे में संतूर की ध्वनियाँ बजने लगती हैं और जल्द ही संतूर पर सितार के चमत्कारी तानें हावी हो जाते हैं। और फिर सितार पर शुरुआती धुन बजने के बाद गीत शुरु होता है "नैनों में बदरा छाए, बिजली सी चमके हाए"। इस गीत को सुनते हुए अगर यह शुरुआती संगीत ही न सुन पाए तो जैसे यह सुनना अधूरा ही रह गया। इन्टरल्युड्स में भी क्या ख़ूब संतूर और सितार की जुगलबन्दी है, जैसे कोई स्वर्गिक अनुभूति हो रही हो! जानकारी के लिए बता दें कि इस गीत में संतूर पंडित शिव कुमार शर्मा ने बजाया था। 1967 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ के गीत "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में" में ख़ाँ साहब के सितार का जादू सुनाई देता है। नायिका को प्रेम हो गया है, इस सिचुएशन में यह गीत शुरु होता है सितार के एक पीस से। ख़ाँ साहब ने इस पीस के ज़रिए नायिका के मन के भाव को ऐसे उजागर किया है कि पीस सुनते ही जैसे नायिका का दिल हमें दिखाई देने लगता है। इस गीत के इन्टरल्युड्स और गीत के अन्त में भी सितार के पीसेस हैं, और अन्त में तो गीत के मुखड़े की धुन ही सितार पर बजती है। इसी फ़िल्म का अन्य गीत है "सपनों में अगर तुम मेरे आओ तो सो जाऊँ"। लता जी की आवाज़ में इस लोरी की शुरुआत ख़ाँ साहब के सितार से होती है। अन्तराल संगीत में सितार के साथ-साथ अन्य वाद्यों का भी प्रयोग हुआ है, पर सितार के टुकड़ों को सुनते हुए यकीन हो जाता है कि ज़रूर किसी उस्ताद की उंगलियाँ चली होंगी।

उस्ताद रईस ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है..." की कहानी। गाना रेकॉर्ड हो चुका था और मदन मोहन इस गाने से बहुत ख़ुश भी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करने का फ़ैसला ले लिया? इस गीत में छोटे-छोटे इन्टरल्यूड्स रईस ख़ान ने बजाए। पर मुख्य रूप से पंडित शिव कुमार शर्मा के सन्तूर को बहुत प्रॉमिनेन्टली इस्तमाल किया गया। रेकॉर्डिंग् हो गई, सबकुछ सही हो गया। अब हुआ यूं कि एक दिन मदन मोहन ने यह गाना रईस ख़ान को दोबारा सुनवाया। गाने का टेप बज रहा था, तभी रईस ख़ान ने अपना सितार उठाया, और गाने के साथ सितार छेड़ने लगे। इस बार नए नए इन्टरल्यूड्स बजने लगे। नई सुर, नई तरकीबें। रईस ख़ान के सितार से इस तरह के सुर सुन कर मदन मोहन का दिल हो गया बाग़-बाग़। उन्होंने फ़ौरन AVM Productions को फ़ोन लगाया और कहा कि वो इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करना चाहते हैं। मदन मोहन रईस ख़ान के बजाए सितार के पीसेस से इतना मुतासिर हो गए कि जिस गाने को रेकॉर्ड करके मुतमाइन थे, उस गाने को एक बार फिर से रेकॉर्ड करने की ठान ली।

लता और मदन मोहन की ग़ज़लों को ख़ाँ साहब ने ख़ूबसूरत जामा तो पहनाया ही, कुछ रफ़ी साहब और मदन जी के नग़मों को भी उन्होंने सँवारा। 1967 की फ़िल्म ’नौनिहाल’ की ग़ज़ल "तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम कर लूँगा" के इन्टरल्युड्स में क्रम से वायलीन, सारंगी और सितार के पीसेस सुनाई पड़ते हैं, जिनमें सितार वाला हिस्सा सबसे लम्बा। मदन मोहन का यह सितार से इश्क़ और ख़ाँ साहब के हुनर पे ऐतबार का ही नतीजा था। 1969 की फ़िल्म ’चिराग़’ में "छायी बरखा बहार पड़े अंगना फुहार" एक दीर्घ गीत है जिसकी अवधि 7 मिनट से उपर है। इस गीत के दीर्घ शुरुआती संगीत में सितार नहीं है, पर पहले अन्तराल संगीत में ख़ाँ साहब तशरीफ़ लाते हैं और क्या ख़ूब लाते हैं! इसी तरह से 1970 की फ़िल्म ’हीर रांझा’ के ग़मज़दा नग़मे "दो दिल टूटे दो दिल हारे" में भी ख़ाँ साहब के सुन्दर सितार का प्रयोग हुआ है। 1970 में ’दस्तक’ फ़िल्म की ग़ज़ल "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह" एक और कालजयी रचना है। वीणा और सितार की क्या ख़ूबसूरत समावेश है इस ग़ज़ल में। ख़ाँ साहब के सितार के इन्टरल्युड़्स ऐसे प्रॉमिनेन्टली उभर कर सामने आते हैं कि ग़ज़ल के बोल और गायकी को सीधा सीधा टक्कर देते हैं। इससे पहले जितनी रचनाओं की हमने बात की, उन सब में सारंगी, संतूर और वायलीन भी शामिल थे, पर ’दस्तक’ की यह ग़ज़ल पूर्णत: सितार पर आधारित है, हाँ, पार्श्व में वीणा का आधार ज़रूर है। इसी फ़िल्म की शास्त्रीय रचना "बैयाँ ना धरो हो बलमा" भी एक कालजयी गीत है और फ़िल्म-संगीत के शास्त्रीय आधारित गीतों में इसका शुमार शीर्ष के गीतों में होता है। और इस गीत में भी ख़ाँ साहब का सितार कूट कूट कर भरा हुआ है। सितार और तबला, बस! कितनी सीधी, कितनी सरल रचना है, वाद्यों का कुंभ नहीं, गायकी में कोई दिखावा नहीं, सुन्दर काव्यात्मक बोल, और क्या चाहिए एक सुरीले गीत में। 1973 में ’हँसते ज़ख़्म’ फ़िल्म की ग़ज़ल "आज सोचा तो आँसू भर आए" शुरु होती है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के एक उदासी भरे तान से। ग़मज़दा इस ग़ज़ल के इन्टरल्युड़्स में मूड को बरकरार रखते हुए एक ऐसा दर्द भरा सुर छेड़ा जो बिल्कुल जैसे कलेजा चीर कर रख देता है। एक और ख़ास बात यह कि इस ग़ज़ल के तीन इन्टरल्युड्स में उन्होंने अलग अलग धु्ने बजाई है। एक और उल्लेखनीय लता - मदन मोहन गीत है जो किसी फ़िल्म में तो नहीं जा सका लेकिन 2009 में जारी ’तेरे बग़ैर’ ऐल्बम में इसे शामिल किया गया। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा यह गीत है "खिले कमल सी काया तेरी"। इस गीत में ख़ाँ साहब ने सितार ने उतनी ही शहद घोली जितनी लता जी की आवाज़ ने। सुरीली आवाज़ और सुरीले साज़ का इससे बेहतर जुगलबन्दी कुछ और नहीं हो सकती।

1973 की फ़िल्म ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे में रईस खां साहब का सितार फिर एक बार अपने पूरे शबाब पर है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टीमिंग्‍ कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लत फ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात्‍ 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गई और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। "रस्म-ए-उल्फ़त" के अलग अलग अन्तरों  के इन्टरल्युड्स में सितार के अलग अलग तरह के टुकड़ों ने जैसे इस ग़ज़ल को ज़ेवर पहना दिए हों। जब ये टुकड़े बजते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई कॉनसर्ट सुन रहे हों! इस ग़ज़ल के आख़िर में जिस तेज़ रफ़्तार में ख़ाँ साहब की उंगलियाँ सितार पर चलती हैं, क्या समा बंध जाता है, क्या कलाकारी है, क्या हुनर है, वाह! हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी से पता चला कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमिम अहमद ख़ाँ से सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में अहमद साहब से बजवाया। लेकिन ऐसा क्या हुआ था कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के साथ मदन जी की बरसों की जोड़ी, बरसों की दोस्ती टूट गई? हुआ यूं कि एक मोड़ पर मदन मोहन को यह लगने लगा कि उनकी महफ़िलों में रईस ख़ान का सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर सितार बजाना ठीक नहीं है। रईस ख़ान को वो इस तरह बुला कर, सितर बजवा कर दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने रईस ख़ान को उनका वाजिब मेहनताना देने की सोची। मगर परेशानी यह थी कि अपने दोस्त से पैसों की बात कैसे करे? सो उन्होंने 1973 की एक महफ़िल के बाद अपने मैनेजर से कहा कि वो ख़ान साहब से उनकी फ़ीस के बारे में पूछेंगे। मैनेजर ने रईस ख़ान से पूछा। रईस ख़ान ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, मगर उन्हें यह बात बहुत चुभ गई और उन्होंने इसे अपना अपमान मान लिया। अपने दोस्त मदन मोहन से वो इस तरह की उम्मीद नहीं कर रहे थे। रईस ख़ान जितने बेहतरीन कलाकार थे उतने ही तुनक मिज़ाज भी थे। वो चुपचाप बैठने वाले नहीं थे। बात चुभ गई थी। उन्होंने कुछ दिन बाद मदन मोहन को फ़ोन किया और कहा कि उनके एक दोस्त के घर में एक शादी है और शादी के जलसे में गाने के लिए आपको बुलाया है। "तो मदन भाई, आप कितने पैसे लेंगे?" अब चौंकने की बारी मदन मोहन की थी। बहुत अजीब लगा मदन मोहन को कि रईस ख़ान ने उन जैसे कलाकार को शादी में गाने के लिए कह कर उनकी तौहीन कर रहा है। यह तौहीन अब मदन मोह बर्दाश्त नहीं कर सके। बस यहीं से दोनो के मन में ऐसी खटास पड़ी कि इन दोनों अज़ीम फ़नकारों का साथ सदा के लिए ख़त्म हो गया।

ऐसा नहीं कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने केवल मदन मोहन की रचनाओं में ही सितार का अमूल्य योगदान दिया हो। 1961 की फ़िल्म ’गंगा जमुना’ में नौशाद साहब का संगीत था। लता जी की आवाज़ में "ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे साजना मोरे कान का बाला" बेहद लोकप्रिय रहा। गीत के शुरुआती संगीत में ख़ाँ साहब का सितार गीत का मूड तैयार कर देता है। अन्तराल संगीत में बांसुरी के साथ सितार का संगम भी बेहद दिलकश बन पड़ा है इस गीत में। 1972 में जब ’पाक़ीज़ा’ में ग़ुलाम मोहम्मद साहब के इन्तकाल के बाद नौशाद साहब फ़िल्म का संगीत पूरा कर रहे थे, तब पार्श्व-संगीत और शीर्षक-संगीत के लिए ख़ाँ साहब को ही चुना। क़रीब क़रीब चार मिनट का शीर्षक संगीत घुंघरू और तबले से शुरु ज़रूर होती है, लेकिन जल्दी ही ख़ाँ साहब का सितार हर अन्य वाद्य पर हावी हो जाता है। क्या फिरी हैं उनकी उंगलियाँ सितार पर, वाह! सारंगी, संतूर, घुंघरू और तबले के साथ सितार की यह महफ़िल फ़िल्म के नग़मों और ग़ज़लों से कम दिलकश नहीं है। और फिर सोने पे सुहागा, इस शीर्षक संगीत के मध्य भाग से लता जी की आवाज़ में आलाप और ताल गायन है जो इस पूरे आयोजन पे चार चाँद लगा देती है।

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीत रहे जिनके गीतों में आधुनिक शैली के होते हुए भी आत्मा हिन्दुस्तानी संगीत की ही रही और उन्होंने पाश्चात्य साज़ों के साथ-साथ भारतीय वाद्यों का भी बहुतायत में प्रयोग किया। 1962 की फ़िल्म ’एक मुसाफ़िर एक हसीना’ का गीत "आप यूंही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा" रफ़ी-आशा का एक यादगार डुएट है। इस गीत में सबसे उल्लेखनीय वाद्य हैं सारंगी और सितार, जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था।  "कैसी जादूगरी की अरे जादूगर" इस गीत की एक पंक्ति है; इस पंक्ति को सुनते हुए मन में यह ख़याल आता है कि यह शायद ख़ाँ साहब को ही कहा गया है। गीत के एक अन्तराल संगीत में पंख फैला कर एक मोर को नाचते हुए दिखाया जाता है जिसके पार्श्व में ख़ाँ साहब का सितार बज रहा है। मोर के साथ-साथ जैसे सितार की ध्वनियाँ भी झूम रही हैं। 1964 की फ़िल्म ’कशमीर की कली’ में एक बार फिर नय्यर साहब ने ख़ाँ साहब के सितार से सजाया "इशारों इशारों में दिल लेने वाले" गीत को। अन्तरालों में सितार और घुंघरू का एक साथ प्रयोग हुआ है। ये सभी टुकड़े जैसे इन गीतों की पहचान हैं। और नय्यर साहब के गीतों की यह ख़ासियत भी है कि उनके गीतों में हर साज़ और हर टुकड़ा बहुत ही प्रॉमिनेन्ट सुनाई देता है। इसी तरह से 1965 की फ़िल्म ’मेरे सनम’ का आशा भोसले का गाया सदाबहार गीत "जाइए आप कहाँ जाएंगी" में भी ख़ाँ साहब का सितार है। शुरुआती धुन में संतूर है, लेकिन अन्तराल संगीत में सितार के वो टुकड़े हैं जो इस गीत की पहचान भी हैं। 

1966 के वर्ष में रईस ख़ाँ साहब के सितार से सजे बहुत से गीत बने जिनमें से मदन मोहन की रचनाओं का ज़िक्र हम कर चुके हैं। इस वर्ष संगीतकार ख़य्याम के संगीत से सजी फ़िल्म आई ’आख़िरी ख़त’। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था "बहारों मेरा जीवन भी सँवारो"। पूरे गीत में सितार छाया हुआ है। मुखड़े में "बहारों" और "मेरा" शब्दों के बीच में सितार के छोटे टुकड़े का क्या सुन्दर प्रयोग हुआ है। अन्तराल संगीत में सितार और बांसुरी का सुन्दर संगम है। शंकर-जयकिशन के संगीत में पौराणिक विषय पर बनी फ़िल्म ’आम्रपाली’ को अपने गीत-संगीत के लिए याद किया जाता है। "तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी" गीत की जितनी तारीफ़ें की जाए कम होगी। क्या बोल, क्या धुन, क्या गायकी, क्या जज़्बात, सब लाजवाब; और उस पर उस्ताद ख़ाँ साहब के सितार का नशा जो अन्तरालों को एक अलग ही मुकाम तक लेकर गया है। यह संगीत जैसे स्वर्ग में रचा गया हो! ख़ाँ साहब के सितार ने हर जज़्बात को साकार किया है। कभी झूमते हुए मोर का उत्साह, कभी नए नए प्यार होने की ख़ुशी, और कभी बिरहा का दर्द, हर मौके के गीत में ख़ाँ साहब के सितार ने इतिहास रचा है। इसी वर्ष शंकर-जयकिशन के ही संगीत वाले एक और फ़िल्म ’तीसरी क़सम’ के एक गीत में ख़ाँ साहब का सितार सुनाई पड़ा। "सजनवा बैरी हो गए हमार" में मुकेश की आवाज़ ने जो दर्द पैदा की थी, उससे टक्कर लेकर ख़ाँ साहब के सितार ने भी दर्द भरे ऐसे तान छेड़े कि जिसने गीत के भाव, गीत के बोलों और गायकी को कॉम्प्लिमेण्ट किया।

संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनन्दजी ने भी ख़ाँ साहब के सितार को अपने गीतों में जगह दी। 1968 की कालजयी फ़िल्म ’सरस्वती चन्द्र’ के यादगार गीत "चंदन सा बदन चंचल चितवन" के शुरुआती संगीत में सितार का पीस इस गीत के पहचान और विशेषता है। इस गीत के दो संस्करण हैं और दोनों में उन्होंने दोनो में अलग अलग तरीक़े से सितार के सुरों को पिरोया है। संगीतकार जयदेव के सुरीले संगीत में 1977 की फ़िल्म ’आंदोलन’ में मीराबाई की लिखी एक सुन्दर रचना थी "पिया को मिलन कैसे होए री मैं जानु नाही"। नीतू सिंह पर फ़िल्माया यह ख़ूबसूरत गीत और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत बन पड़ा ख़ाँ साहब के दीर्घ सितार के टुकड़ों से। जयदेव के गीतों में हमें अनर्थक साज़ों की भीड़ नहीं मिलती, एक या दो साज़ों को लेकर उनकी सीधी सरल रचनाएँ सुनने वालों के दिलों में घर कर लेती है। आशा भोसले की आवाज़ में यह रचना भी उन्हीं गीतों में से एक है। मूलत: सितार पर आधारित यह रचना दर्द भरा होते हुए भी बेहद आकर्षक और सुरीला है। 

70 के दशक में धूम मचाने वाले संगीतकारों में एक नाम लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का है। 1971 की फ़िल्म ’महबूब की मेहन्दी’ आज केवल इसके गीतों के लिए याद की जाती है। फ़िल्म के लगभग सभी गीत मक़बूल हुए, जिनमें लता-रफ़ी के डुएट "इतना तो याद है मुझे कि उनसे मुलाक़ात हुई" को एल.पी के श्रेष्ठ लता-रफ़ी डुएट्स में गिना जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस लोकप्रिय गीत में भी उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के टुकड़े थे। ख़ास कर गीत के दूसरे अन्तराल संगीत में लीना चन्दावरकर जब नृत्य कर रही है तब नृत्य-संगीत के रूप में ख़ाँ साहब का सितार ही बज रहा होता है। ख़ाँ साहब का पेशा भले सितार रहा है, लेकिन कई बार उन्होंने अपने सितार वादन के लिए निर्माता से अपनी पारिश्रमिक नहीं ली। ऐसा ही एक क़िस्सा जुड़ा है ’सत्यम शिवम् सुन्दरम्’ फ़िल्म के साथ। बात यह हुई कि एक सीन के लिए लक्ष्मी-प्यारे को उचित पार्श्व-संगीत नहीं सूझ रहा था। सीन शायद आपको याद हो, जब ज़ीनत अमान सुबह सुबह जलप्रपात के नीचे चल कर जाती हैं शशि कपूर से मिलने। उस समय वहाँ ख़ाँ साहब मौजूद थे जिन्होंने सितार पर एक पीस बजा कर सुनाया जिसे सुन कर राज कपूर सहित सभी लोग वाह वाह कर उठे। ’सत्यम शिवम सुन्दरम’ फ़िल्म के तमाम गीतों में भी ख़ाँ साहब के सुमधुर सितार की ध्वनियाँ शहद घोलती हुई सी लगती है। यह 1978 की फ़िल्म थी और इसी वर्ष लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई थी ’बदलते रिश्ते’। इसमें लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर का गाया एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना थी "मेरी साँसों को जो महका रही है"। गीत के पहले अन्तराल संगीत में अगर संतूर है तो दूसरे अन्तराल में मुख्यत: वायलिन है, लेकिन तीसरे अन्तराल में ख़ाँ साहब के सितार की लहरियाँ जैसे गीत का रुख़ ही मोड़ देती हैं। 

70 के दशक में ख़ाँ साहब ने शास्त्रीय संगीत के कॉनसर्ट्स में बजाना कुछ कम कर दिया था। लेकिन 80 के दशक के आते ही वो फिर एक बार उस तरफ़ सक्रीय हो उठे जब उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब ने उन्हें अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में बजाने के लिए आमन्त्रित किया। रईस ख़ाँ साहब हिन्दी फ़िल्मों से धीरे धीरे सन्यास ले लिए। 1979 में उन्होंने चौथी शादी की पाक़िस्तानी गायिका बिलक़ीस ख़ानुम से और 1986 वो उनके साथ पाक़िस्तान जा कर बस गए। आज ख़ाँ साहब हमारे बीच नहीं हैं। उनके बजाए सितार के तमाम कॉन्सर्ट्स की रेकॉर्डिंग्स और स्टुडियो रेकॉर्डिंग्स तो हमारे पास हैं ही, इनके साथ-साथ वो तमाम फ़िल्मी गीत भी हैं जिन्हें उनके सितार ने चार चाँद लगाए। उस्ताद रईस ख़ाँ की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ का नमन!


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले दो अंकों में हमने गीतकार नक़्श ल्यालपुरी के लिखे मुजरों पर लेख प्रकाशित की थी जिस पर हमें हमारे पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई हैं। आदियोग जी ने इस लेख को "शानदार" कह कर टिप्पणी की है तो रमेश शर्मा जी लिखते हैं - "बेहतरीन... नायाब मोतियों का संग्रह... हार्दिक बधाई स्वीकारिए!" संज्ञा टंडन जी लिखती हैं - "ग़ज़ब का शोध सुजॉय जी। धन्यवाद इस शानदार जानकारी के लिए।" और सर्वोपरि नक़्श साहब के सुपुत्रा राजन ल्यालपुरी जी ने इस लेख पर कहा है - "मैंने पहला भाग पढ़ा है, बहुत अच्छा है और सही जानकारी है।"


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

कोई टिप्पणी नहीं:

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ