शनिवार, 30 अप्रैल 2016

"नायक नहीं खलनायक हूँ मैं" - जब फ़िल्मी नायक असली ज़िन्दगी में बन गए खलनायक

चित्रशाला - 08
नायक नहीं खलनायक हूँ मैं
जब फ़िल्मी नायक असली ज़िन्दगी में बन गए खलनायक




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। हमारे फ़िल्मी नायक हम पर गहरा छाप छोड़ते हैं। कई बार लोग अपने पसन्दीदा नायकों को असली ज़िन्दगी में भी अपना नायक और कई बार तो अपना भगवान मान बैठते हैं, लगभग उनकी पूजा करते हैं, यह सोचे बग़ैर कि क्या सचमुच वो इस लायक हैं? आज ’चित्रशाला’ में हम चर्चा करेंगे कुछ ऐसे फ़िल्मी नायकों का जो अपनी असली ज़िन्दगी में खलनायक की भूमिका निभा चुके हैं।


"नायक नहीं खलनायक हूँ मैं, ज़ुल्मी बड़ा दुखदायक हूँ मैं...", साल 1993 में फ़िल्म ’खलनायक’ के लिए जब यह गीत बना था और ख़ूब चला भी था, तब शायद किसी को इस बात का अन्दाज़ा नहीं था कि इसी साल ये बोल इस गीत के नायक संजय दत्त की असली ज़िन्दगी पर भी लागू हो जाएगा। 1993 में मुंबई में हुए सीरिअल बम धमाकों, जिनमें 257 लोगों की मौत हो गई, के साथ संजय दत्त के नाते के बारे में जब लोगों को पता चला तो सब हैरान रह गए। उनके घर से ग़ैर-कानूनी रूप से संग्रहित हथियार बरामद हुए जो उन्हें उन लोगों ने दिए थे जिन लोगों ने वो बम धमाके करवाए थे। कई सालों तक उनके ख़िलाफ़ अदालत में मुक़द्दमा चलने के बाद अन्त में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पाँच साल की सज़ा सुनाई और इस वक़्त वो पुणे के जेल में क़ैद हैं और सज़ा काट रहे हैं। संजय दत्त के जीवन में बस यही एक काला अध्याय नहीं है, अपने कॉलेज के दिनों में भी उनसे ग़लतियाँ हुई हैं। कॉलेज में रहते उनका परिचय हुआ ड्रग से और वो बन गए नशाखोर। अगले दस सालों तक वो नशे की इस काली दुनिया में धसते चले गए। हेरोइन, कोकेन से लेकर जितने भी ड्रग उन दिनों उपलब्ध थे, सबका सेवन करते। उन्होंने ख़ुद एक साक्षात्कार में बताया कि ड्रग वो हर तरीके से लेते थे - सूंघ कर, गोली के रूप में, और इन्जेक्शन के ज़रिये भी। दस साल बाद उनका इलाज शुरू हुआ और तब जाकर उन्हें इससे छुटकारा मिला।

सलमान ख़ान कहें या विवाद सम्राट, एक ही बात है। उनके अनगिनत विवादों में से कुछ विवादों का उल्लेख किया जाए! 1999 में फ़िल्म ’हम साथ साथ हैं’ की शूटिंग् के दौरान अपने सह-कलाकारों (सैफ़ अली ख़ान, तब्बु, नीलम, सोनाली बेन्द्रे) के साथ मिल कर राजस्थान के जोधपुर में लुप्त-प्राय प्रजाति के चिंकारा और कृष्णमृग हिरण का शिकार किया। एक सेलिब्रिटि से इस तरह का अपराध क्षमा योग्य नहीं है। 2002 में सलमान ख़ान ने नशे की हालत में गाड़ी चलाते हुए फ़ूटपाथ पर सो रहे एक आदमी को कुचल कर मार डाला और तीन लोगों को ज़ख्मी कर दिया। यह मामला अभी भी चल रहा है मुंबई की अदालत में। उसी साल उन्होंने अपनी प्रेमिका ऐश्वर्या राय के साथ विवाह करने के लिए उग्र रूप धारण कर लिया और ऐश्वर्या को मानसिक रूप से पीड़ा देने लगे। उन दिनों विवेक ओबेरोय के साथ ऐश्वर्या का प्रेम-संबंध पनप रहा था और इसी बात पर सलमान ख़ान ने विवेक के साथ भी झगड़ा मोल लिया। यह 2003 की बात थी। इसके बाद कुछ सालों तक चुप बैठने के बाद 2008 में फिर एक बार सलमान ख़ान विवादों में घिर गए जब उन्होंने ख़ुद गणेश पूजा कर हिन्दू और मुसलमान, दोनों सम्प्रदायों से तिरस्कार प्राप्त की। इसी साल सलमान ख़ान ने शाहरुख़ ख़ान के साथ हाथापाई पर उतर आए, मौक़ा था कटरीना कैफ़ का जन्मदिन। 

जॉन एब्रहम अपनी बाइकिंग् के लिए मशहूर हैं। उन्हें अपने बाइकों से बहुत प्यार है और वो अक्सर सड़कों पर देखे जाते हैं अपने बाइक पर। तेज़ रफ़्तार से बाइक चलाने में जॉन को बड़ा आनन्द आता है। पर साल 2006 में वो कानून के शिकन्जे में आ गए जब तेज़ रफ़्तार से चला रहे बाइक से उन्होंने दो युवाओं को टक्कर मार कर उन्हें ज़ख्मी कर दिया। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और 15 दिन की ग़ैर-ज़मानती वारण्ट जारी किया गया उनके नाम। बाद में उन्हें ज़मानत मिल गई। रैश ड्राइविंग् और हिट-ऐण्ड-रन की श्रेणी में पहल करने वाला बॉलीवूड नायक था मशहूर अभिनेता राजकुमार के सुपुत्र पुरु राजकुमार, जिन्होंने एक रात नशे की हालत में फ़ूटपाथ पर सो रहे आठ मज़दूरों के उपर से अपनी गाड़ी उड़ा ले गए। उन आठ लोगों में से तीन लोगों की मौत हो गई थी। एक मज़दूर से उसका एक हाथ छिन गया। ताज्जुब की बात तो यह है कि इस भयानक अपराध के लिए पुरु राजकुमार को कोई सज़ा नहीं मिली। पर उपरवाले ने उन्हें सज़ा ज़रूर दी। उनकी कोई भी फ़िल्म नहीं चली और जल्दी ही फ़िल्म इंडस्ट्री ने उन्हें अल्विदा कह दिया।

सार्वजनिक स्थलों पर अय्याशी, तमाशा, हुड़दंग और हाथापाई करने में बॉलीवूड अभिनेता पीछे नहीं रहे। शाहरुख़ ख़ान, सैफ़ अली ख़ान, सलमान ख़ान, गोविन्दा जैसे बड़े-बड़े अभिनेता भी इस अपराध श्रेणी के मुख्य नायक रहे। इनमें सैफ़ अली ख़ान वाले हादसे का उल्लेख करना अत्यन्त आवश्यक है। 22 फ़रवरी 2012 की रात थी। मुंबई के ताज होटल में सैफ़ अली ख़ान के साथ पत्नी करीना कपूर, करिश्मा कपूर, मल‍इका अरोड़ा, अम्रीता अरोड़ा आदि मौजूद थे। कुछ देर पार्टी चलने के बाद जब नशा चढ़ने लगा तो सबके एक्स्प्रेशन लाउड होने लगे। और एक समय के बाद वहाँ मौजूद अन्य लोगों के लिए असहनीय हो गया। इक़बाल मीर नामक एक व्यक्ति ने जब सैफ़ अली ख़ान और उनके साथियों द्वारा हंगामा मचाने का विरोध किया तो सैफ़ और उनके दो दोस्त - बिलाल अमरोही और शक़ील लदक ने इक़बाल को पीटना शुरू कर दिया। और एक मुक्का उनके नाक पर ऐसा मारा कि वो लहूलुहान हो गया। और यह हादसा पहुँच गई पुलिस और अदालत तक।

बादशाह शाहरुख़ ख़ान के चाहनेवालों की कोई कमी नहीं है, पर बादशाह का दर्जा पा कर कई बार शाहरुख़ यह भूल गए कि देश के तमाम कानून उन पर भी उसी तरह से लागू होते हैं जैसा एक साधारण आदमी पर। सलमान ख़ान के साथ उनके झड़प का ज़िक्र तो हम उपर कर ही चुके हैं, अन्य विवादों का ज़िक्र करते हैं। अपने तीसरे संतान के जन्म से पहले शाहरुख़ ने उसका लिंग जाँच करवाया था जो ग़ैर कानूनी है। हालाँकि शाहरुख़ ने स्वीकार नहीं किया, महाराष्ट्र सरकार ने छानबीन करने की घोषणा की थी। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करना ग़ैरकानूनी है। इस निर्देश का पालन साधारण लोग तभी करेंगे जब समाज के प्रसिद्ध लोग इसका पालन करेंगे। यह फ़िल्मकलाकारों का दायित्व है कि वो ऐसा कुछ ना करे जिससे समाज और ख़ास तौर से युवा वर्ग को ग़लत संदेश जाए। लेकिन शाहरुख़ को शायद इस बात का इल्म ही नहीं। कई बार वो सार्वजनिक स्थलों पर सिगरेट पीते हुए नज़र आए हैं। जब जयपुर के सवाइ मान सिंह स्टेडिअम में सिगरेट पीते देखे गए तो एक व्यक्ति ने उनकी तसवीर खींच कर उनके ख़िलाफ़ अदालत में मामला ठोक दिया। शाहरुख़ कई बार सामाजिक नेटवर्किंग् स्थलों पर भी अश्लील बातें पोस्ट करने से नहीं कतराते। एक बार एक युवती ने मज़ाक में उनसे ट्वीटर पर पूछा कि क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है? इसके जवाब में शाहरुख़ ने लिखा "मेरे टूथपेस्ट में नमक है या नहीं यह तो मुझे नहीं पता लेकिन तुम्हारे किसी अंग में मिर्च ज़रूर है।" शाहरुख़ को लेकर जो सबसे बड़ा विवाद रहा वह था मुंबई के वांखेडे स्टेडिअम में मई 2012 में KKR और Mumbai Indians के बीच IPL मैच के बाद सिक्युरिटी गार्ड और MCA के कर्मचारियों के साथ उनका झड़प। इस घटना के बाद MCA ने शाहरुख़ पर उस स्टेडिअम में पाँच साल के लिए बैन लगा दिया। हाल ही में यह बैन तीन साल बाद वापस ले लिया गया।

असली ज़िन्दगी के खलनायकों की शृंखला में अगला नाम है फ़रदीन ख़ान का। ड्रग स्कैन्डल में दर्ज होने वाले फ़िल्मी कलाकारों में केवल संजय दत्त का नाम ही नहीं , बल्कि कई और नाम हैं। और उन नामों में एक नाम है फ़रदीन ख़ान का। वो कोकेन ख़रीदते हुए पकड़े गए और Narcotics and Psychotropic Substances (NDPS) Act के Section 27 उन पर लागू हुआ। क्योंकि वो इसे कम मात्रा में व्यक्तिगत सेवन के लिए ख़रीदा था, इसलिए उन पर कानूनी कार्यवाही नहीं हुई पर उनके द्वारा अदालत को यह आश्वस्त करने के बाद कि वो अपना नशा-मुक्ति करवाएँगे। ड्रग-परिवाद में अभियुक्त होने वाले फ़िल्मी कलाकारों में अगला नाम है अभिनेत्री ममता कुलकर्णी और उनके पति विकी गोस्वामी का जो पकड़े गए थे कीनिया में ड्रग तस्करी कर रहे थे। अपूर्व अग्निहोत्री (फ़िल्म ’परदेस’ के सहनायक) और उनकी पत्नी शिल्पा 2013 में एक पार्टी में ड्रग्स लेते हुए पकड़े गए। अभिनेता विजय राज़ संयुक्त को अरब अमीरात के पुलिस ने गिरफ़्तार किया था क्योंकि उनके पास से ड्रग्स बरामद हुए थे। विक्रम भट्ट निर्देशित फ़िल्म ’दीवाने हुए पागल’ की शूटिंग् के दौरान की यह घटना थी। 

Shiney Ahuja & Inder Kumar being taken to custody
समाजिक अपराधों में एक संगीन अपराध है बलात्कार या यौन शोषण, और बॉलीवूड इससे अछूता नहीं है। इस श्रेणी में सबसे बड़ी घटना थी नायक शाइनी आहुजा द्वारा उनके नाबालिग नौकरानी का बलात्कार। शाइनी को पुलिस ने गिरफ़्तार किया और अदालत ने उन्हें सात साल के कारादंड की सज़ा सुनाई। बाद में वो ज़मानत पर बरी हो गए। फ़िल्म जगत से भी संन्यास ले लिया। नौकरानी ने यह आरोप लगाया था कि रविवार दोपहर को उन्होंने उनका बलात्कार किया और दो घंटों तक उसे रोक कर रखा और बार बार यही कहता रहा कि अगर किसी को कुछ बताया तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। यह 2009 की घटना थी। हाल ही में अभिनेता इन्दर कुमार पर भी बलात्कार का आरोप लगाया 23 वर्षीय एक आकांक्षी अभिनेत्री ने। उसके अनुसार फ़िल्म में चान्स दिलाने का वादा कर उसे अपने वरसोवा के फ़्लैट पर उसके साथ रहने पर मजबूर किया और उसके साथ केवल बलात्कार ही नहीं, शारीरिक शोषण भी किया। इन्दर कुमार ने इसे सहमति के साथ किया गया शारीरिक सम्बन्ध बताया, पर मेडिकल जाँच ने यह सिद्ध किया कि लड़की पर अत्याचार हुए हैं। मुक़द्दमा अभी जारी है। बलात्कार के अन्य वारदातों में फ़िल्मकार मधुर भंडारकर और संगीतकार / पार्श्वगायक अंकित तिवारी पर भी कलंक लगाया गया है पर कुछ सिद्ध नहीं हो पाया।

अपराधों में एक अपराध है किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए जाने या अनजाने में उकसाना। और
Aditya & Sooraj - Like Father Like Son
इस अपराध के दायरे में आए अभिनेता आदित्य पंचोली व अभिनेत्री ज़रीना वहाब के सुपुत्र सूरज पंचोली, जिन्होंने अभी हाल ही में सुभाष घई की फ़िल्म ’हीरो’ से फ़िल्म जगत में क़दम रखा है। वैसे पिता आदित्य पंचोली का दामन भी कोई साफ़ सुथरा दामन नहीं था। कुछ समय पहले आदित्य को जुहु बीच के एक पब में एक बाउन्सर के साथ मारपीट करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। ज़मानत पर वो रिहा हुए अगले दिन। बस इतना ही नहीं, आदित्य पंचोली की पूर्व-प्रेमिका थीं पूजा बेदी। पूजा बेदी के साथ सम्बन्ध के दौरान एक बार पूजा के घर पर उसकी नाबालिग नौकरानी से बलात्कार करने की घटना सामने आई थी। इस घटना के बाद पूजा ने आदित्य से किनारा कर लिया था। आदित्य ने संघर्षरत अभिनेत्री कंगना रनौत से भी सम्बन्ध कायम करने की कोशिशें की थी पर नाकामयाब रहे। पिता का यह गुण पुत्र में भी अब दिखाई दे रहा है। सूरज पंचोली ने अभिनेत्री जिया ख़ान से दोस्ती बढ़ाई, नज़दीक़ियाँ बढ़ीं, जिया गर्भवती भी हुईं और मजबूरी में उन्हें गर्भपात भी करवाना पड़ा। पर सूरज ने कभी जिया को गम्भीरता से नहीं लिया जाकि जिया उससे सच्चे दिल से प्यार करने लगी थी। मानसिक पीड़ा इतनी बढ़ गई कि अन्त में जिया ने इस दुनिया से किनारा कर लेने में ही अपनी भलाई समझी। सूरज गिरफ़्तार हुआ, जिया की माँ राबिया ख़ान ने मामला ठोक दिया, मामले का अंजाम अभी जारी है।
शोषण केवल महिलाओं का ही हो यह ज़रूरी नहीं। पुरुषों का भी शोषण होता चला आया है, ख़ास तौर से
Sonu Nigam & Yuvraaj Parashar
समलैंगिक शोषण। इसके दो प्रमुख उदाहरण हैं गायक/अभिनेता सोनू निगम और वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुभाष के. झा वाला क़िस्सा, और दूसरा अभिनेता युवराज पराशर और फ़िल्मकार ओनिर के बीच का क़िस्सा। कुछ साल पहले सोनू निगम ने मीडिया को यह स्कूप दिया कि सुभाष झा उन पर यौन उत्पीड़न कर रहे हैं, उन्हे अश्लील संदेश भेज रहे हैं मोबाइल पर, और उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए अनुनय विनय कर रहे हैं। सोनू के बार बार यह कहने पर भी कि उन्हें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, सुभाष ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और जब कुछ ना हो पाया तो सोनू के बारे में बुरी बातें अपने लेखों में लिखने लगा। इस आरोप के उत्तर में सुभाष झा ने यह सफ़ाई दी कि पहली बात तो यह कि सोनू को अगर मैंने सचमुच कोई पीड़ा पहुँचाई है तो वो पुलिस और अदालत का दरवाज़ा ना खटखटा कर मीडिया में क्यों चले गए? इसी से पता चलता है कि सोनू ने ये सब पब्लिसिटी या मेरे साथ किसी दुश्मनी की वजह से किया। जब मैं उनके बारे में अच्छी बातें लिखता था, तब उन्हें मेरे साथ सम्बन्ध रखने में कोई परेशानी नहीं थी। ऐसा ही क़िस्सा था युवराज पराशर और ओनिर के बीच का। युवराज ने मीडिया को बताया कि ओनिर ने उनका बलात्कार किया अपने घर बुला कर। ओनिर ने साफ़-साफ़ कहा कि युवराज कोई बेबस लाचार बच्चा नहीं है जिसका वो बलात्कार कर सके। युवराज उच्चता और शारीरिक गठन में उनसे बड़े हैं, ताक़तवर हैं। जो कुछ भी हुआ था दोनों की सहमति से हुआ था, युवराज को मेरे फ़िल्म में काम मिलने की उम्मीद थी, इसलिए उन्हें तब कोई परेशानी नहीं थी। किसी वजह से मेरी फ़िल्म में उसे चान्स नहीं मिला तो अब मीडिया को ये सब बातें बता रहा है।

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

अखियाँ नु चैन न आवे....नुसरत बाबा का रूहानी अंदाज़ आज 'कहकशाँ’ में




कहकशाँ - 8
नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें 
"अब तो आजा कि आँखें उदास बैठी हैं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है जुदाई के रंग में सराबोर दो रचनाएँ, पहली नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ की आवाज़ में और दूसरी मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में।




अब तो आजा कि आँखें उदास बैठी हैं,
भूलकर होश-औ-गुमां बदहवास बैठी हैं।

इश्क़ की कशिश ही ऐसी है कि साजन सामने हो तो भी कुछ न सूझे और दूर जाए तब भी कुछ न सूझे। इश्क़ की तड़प ही ऐसी है कि साजन आँखों में हो तो दिल को सुकूं न मिले और दिल में हो तो आँखों में कुछ चुभता-सा लगे। रूह तब तक मोहब्बत के रंग में नहीं रंगता जब तक पोर-पोर में साजन की आमद न हो। लेकिन अगर दिल की रहबर "आँखें" ही साजन के दरश को प्यासी हों तो बिन मौसम सावन न बरसे तो और क्या हो। यकीं मानिए सावन बारहा मज़े नहीं देता :

आँखों से अम्ल बरसे जो दफ़-अतन कभी,
छिल जाए गीली धरती, खुशियाँ जलें सभी।

बाबा नुसरत ने कुछ ऐसे हीअ भावों को अपने मखमली आवाज़ से सराबोर किया है। "बैंडिट क्वीन" से यह पंजाबी गीत आप सबके सामने पेशे खिदमत है। लेकिन उससे पहले नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ साहब के बारे में चन्द अलफ़ाज़ पेश है। ख़ास तौर से क़व्वाली को घर घर पहुँचाने और नए ज़माने के लोगों में इसे दिल-अज़ीज़ बनाने में उनका ख़ास योगदान रहा। उनकी आवाज़ की ख़ास बात यह है कि उनकी रूहानी आवाज़ सुनते हुए एक अलग ही दुनिया में हम पहुँच जाते है, और दिल चाहने लगता है कि गाना बस चलता ही जाए, चलता ही जाए! 13 अक्टुबर 1948 में पाक़िस्तान के फ़ैसलाबाद (जो पहले ल्यालपुर था) में जन्मे नुसरत अपने वालिद फ़तेह अली ख़ाँ के पाँचवीं औलाद थे। छह भाई बहनों में सिर्फ़ उन्होंने मौसिक़ी को आगे बढ़ाया। वैसे शुरुआती दिनों में उनके वालिद नहीं चाहते थे कि वो इस क़व्वाली गायन में आए क्योंकि इसे समाज में ऊँची निगाह से नहीं देखा जाता था। लेकिन नुसरत के जुनून और क़व्वाली के लिए इश्क़ को देख कर वालिद को उनके सामने झुकना पड़ा। तबले से शुरू करने के बाद नुसरत ने रागदारी और बोल बन्दिश की तालिम ली। 1964 में वालिद के इन्तकाल के बाद उनके चाचा मुबारक़ अली ख़ाँ और सलामत अली ख़ाँ ने उनकी तालीम को पूरा होने में उनकी मदद की। यह सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि नुसरत साहब का पहला परफ़ॉरमैन्स था उनके वालिद के मज़ार पर, मौक़ा था वालिद का चेहलुम (चेहलुम यानी कि मुसलमानों में किसी की मौत के बाद चालीसवाँ दिन)। उस दिन वालिद की जुदाई में उनके गले से जो सुर निकले थे, शायद वो ही सुर उनके साथ हमेशा रहा, और शायद यही वजह है कि जुदाई के नगमें उनकी आवाज़ पाकर रूहानी बन जाते हैं। फिर चाहे वह "तेरे बिना नहीं जीना मर जाना" हो या "अखियाँ नु चैन न आवे"।






शायर वो क्या जो न झाँके ख़ुद के अंदर में,
क्या रखा है ख़ल्क-खुल्द, माह-ओ-मेहर में?

साहिर ने प्यासा में कहा है: "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" । इस सुखन के हर एक हर्फ़ से कई मायने निकलते हैं, जो ज़िंदगी को सच्चाई का आईना दिखाते हैं। एक मायना यह भी निकलता है कि "अगर बशर (इंसान) को अपनी ख़ुदी पर यकीं न हो, अपनी हस्ती का दंभ न हो, तो चाहे उसे सारी दुनिया ही क्यों न मिल जाए, इस मुक़ाम को हासिल करने का कोई फायदा नहीं।" जब तक इंसान अपने अंदर न झाँक ले और अपनी ताक़त का ग़ुमां न पाल ले, तवारीख़ गवाह है कि उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। जो इंसान अपने दिल की सुनता है और ख़ुद के बनाए रास्तों पर चलता है, उसे सारी दुनिया एक तमाशे जैसी लगती है और सारी दुनिया को वह कम-अक्ल से ज़्यादा कुछ नहीं। फिर सारी दुनिया उसे नसीहतें देनी शुरू कर देती है। सच ही है:

मेरी ख़ुदी से रश्क़ जो मेरा ख़ुदा करे,
नासेह न बने वो तो और क्या करे।

मिर्जा असदुल्लाह ख़ाँ "ग़ालिब" ने कहा है-

"मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।"

ग़ालिब की इस ग़ज़ल को कई सारे गुलूकारों ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आईये आज हम इस ग़ज़ल को "मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में सुनते हैं और महसूस करते हैं कि इस ग़ज़ल के एक-एक शेर में कितनी कहानियाँ छिपी हुई हैं।









’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’ व सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

"गॉड इस ग्रेट, बस इतना ही कहा रहमान जी ने" - हेमा सरदेसाई

एक मुलाकात ज़रूरी है (8)

"हिन्दुस्तानी गुडिया" और "पिया से मिलके आये नैन" जैसी एलबम्स से करियर की शुरुआत करने वाली बेहद चुलबुली और अनूठी आवाज़ की मालकिन हेमा सरदेसाई हैं आज की हमारी ख़ास मेहमान कार्यक्रम "एक मुलाकात ज़रूरी है" में. रहमान के संगीत निर्देशन में "आवारा भंवरे" गीत गाने के बाद तो हेमा का नाम घर घर में गूंजने लगा था. अपने दौर के लगभग सभी बड़े संगीतकारों के साथ हेमा ने एक के बाद एक हिट गीत गाये. आईये मिलते हैं हेमा सरदेसाई से और रूबरू होते हैं उनके संगीत सफ़र की दिलचस्प दास्ताँ के कुछ और पहलुओं से....

एक मुलाकात ज़रूरी है कार्यक्रम का ये एपिसोड You Tube पर भी उपलब्ध है...

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

माँ सब देखती है - बोलती कहानियाँ

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने स्पेन से पूजा अनिल के स्वर में डॉ अनुराग आर्या की कहानी "शॉर्टकट टु हैपिनैस" का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं पूजा अनिल की कहानी माँ सब देखती है अर्चना चावजी के स्वर में।

प्रस्तुत कथा का गद्य "अभिव्यक्ति" पर उपलब्ध है। "माँ सब देखती है" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 27 सेकंड है। सुनिए और बताइये कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



लेखिका: पूजा अनिल
उदयपुर, राजस्थान में जन्मीं पूजा अनिल सन् १९९९ से स्पेन की राजधानी मेड्रिड में रह रही हैं। साहित्य पढ़ने लिखने में बचपन से ही रुचि रही। ब्लॉग 'एक बूँद' का संचालन तथा हिन्द युग्म तथा पत्रिकाओं में आलेख, साक्षात्कार, निबंध व कवितायें प्रकाशित हुई हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"माँ! तुमने कहा था ना कि तुम्हें सब दिखता है?”
 (पूजा अनिल कृत "माँ सब देखती है" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
माँ सब देखती है MP3

#Eleventh Story, Maa Sub Dekhati Hai; Pooja Anil; Hindi Audio Book/2016/11. Voice: Archana Chaoji

रविवार, 24 अप्रैल 2016

रसभरी चैती : SWARGOSHTHI – 267 : CHAITI SONGS




स्वरगोष्ठी – 267 में आज

होली और चैती के रंग – 5 : कुछ पुरानी चैती

‘यही ठइयाँ मोतिया हेराय गइलें रामा कहवाँ मैं ढूँढू ...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव और चैत्रोत्सव प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में पूरे उत्तर भारत में चैती-गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में, यहाँ तक कि शास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। पिछले अंक में हमने चैती लोक संगीत का उपशास्त्रीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुतीकरण किया था। आज के अंक में हम चैती गीतों की कुछ प्राचीन गायकी का रसास्वादन आपको कराएंगे। आज हम आपको चैती गीत की एक शताब्दी से अधिक प्राचीन गायकी का अनुभव अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका अच्छन बाई के स्वरों से कराएंगे। इसके अलावा लगभग छः दशक पूर्व बुजुर्गों से सुनी चैती, उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी से और 1963-64 में बनी भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ में शामिल एक चैती गीत भी पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। 


शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक और फिल्म संगीत की चर्चाओं पर केन्द्रित हमारी-आपकी इस अन्तरंग साप्ताहिक गोष्ठी में आज हम पुनः चैती गीतों पर चर्चा करेंगे। अपने पिछले अंक से हमने शास्त्रीय और उपशास्त्रीय कलाकारों की स्वरों में चैत्र मास में गायी जाने वाली लोक संगीत की शैली ‘चैती’ प्रस्तुत की थी। यूँ तो चैती लोक संगीत की शैली है, किन्तु ठुमरी अंग में ढल कर यह और भी रसपूर्ण हो जाती है। आज हम आपसे पुराने ग्रामोफोन रिकार्ड और फिल्मों में चैती के प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग पाँच सौ व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक किशोर आयु की गायिका अच्छन बाई भी थीं, जिनके गीत 1908 में ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किये थे। अच्छन बाई के रिकार्ड की उन दिनों धूम मच गई थी। उस दौर में अच्छन बाई के स्वर में बने रिकार्ड में से आज मात्र तीन रिकार्ड उपलब्ध हैं, जिनसे उनकी गायन-प्रतिभा का सहज ही अनुभव हो जाता है। इन तीन रिकार्ड में से एक में अच्छन बाई ने पुराने अंदाज़ की मोहक चैती गायी थी। आज हम आपको एक शताब्दी से अधिक पुरानी शैली की उसी चैती का रसास्वादन कराते हैं। गायिका ने चैती के एक अन्तरे में उर्दू के शे’र भी कहे हैं।


प्राचीन चैती : ‘कौने बनवा रे फूलेला...’ : स्वर – अच्छन बाई



यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।" चैती गीतों के लोकरंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा। आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे फिल्म जगत से जुड़ी अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा गायिका निर्मला देवी और अरुण आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।


चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी



सुमन कल्याणपुर
चैत्र मास के गीतों की तीन अंकों की इस श्रृंखला का समापन हम एक फिल्मी चैती गीत से करेंगे। हमारे कई पाठकों ने इस गीत की फरमाइश की है। वर्ष 1964 में भोजपुरी बोली में फिल्म ‘बिदेशिया’ का प्रदर्शन हुआ था। टिकट खिड़की पर यह फिल्म बेहद सफल हुई थी। दरअसल यह फिल्म पूर्वांचल के तत्कालीन ग्रामीण भारत का यथार्थ चित्रण था। फिल्म में छुआ-छूत की कुप्रथा का जम कर लताड़ लगाई गई थी। इस चैती गीत का प्रयोग इसी भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ में किया गया था, जिसके गीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी और संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी थे। चैती गीत का यह एक नया प्रयोग माना जाएगा। फिल्म में जिस प्रकार इसका प्रयोग हुआ है, वह लोक-नाट्य नौटंकी के रूप में है। आप सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में चैती का यह अनूठा प्रयोग सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – बिदेशिया : 'बनि जईहों बन के जोगिनियाँ हो रामा...' : स्वर – सुमन कल्याणपुर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 267वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 30 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 269वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 265 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से चैती गीत शैली पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न में हमने हमेशा पूछे जाने ‘राग’ के स्थान पर गीत की ‘शैली’ के बारे में सवाल किया था। दो प्रतिभागियों को छोड़ कर सभी ने इस प्रश्न के उत्तर में ‘राग – तिलक कामोद’ लिखा है। वास्तव में राग के सवाल पर यह उत्तर सही है, परन्तु शैली के सवाल पर यह गलत है। पहेली के सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि प्रश्न को खूब ध्यान से पढ़ा करें। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- शैली – चैती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचंदी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायक – मुकेश

इस बार की संगीत पहेली में दो प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का, दो प्रतिभागियों ने तीन में से दो सही उत्तर देकर और एक प्रतिभागी ने एक सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल ने दो-दो अंक अर्जित किए है। हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने इस बार मात्र एक अंक अर्जित किया है। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप पर्व और ऋतु के अनुकूल श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ का रसास्वादन कर रहे थे। श्रृंखला का यह समापन अंक था। अगले अंक से हम अनेक संगीत-प्रेमियों के आग्रह पर फिल्म संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। हमे पूर्ण विश्वास है कि आप सब संगीत-प्रेमी इस नई श्रृंखला का स्वागत करेंगे। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को नई श्रृंखला के एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




शनिवार, 23 अप्रैल 2016

BAATON BAATON MEIN - 18: INTERVIEW OF SHAMSHAD BEGUM (PART-1)

बातों बातों में - 18

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत
भाग-1


"मुझे अपने दम पर काम मिलता गया , कभी किसी लॉबी की ज़रूरत नहीं पड़ी "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत। गजेन्द्र खन्ना के वेबसाइट www.shamshadbegum.com पर यह साक्षात्कार अंग्रेज़ी में पोस्ट हुआ था जनवरी 2012 में। गजेन्द्र जी की अनुमति से इस साक्षात्कार को हिन्दी में अनुवाद कर हम ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है साक्षात्कार का पहला भाग।

    


यह एक आश्चर्यपूर्ण संयोग की ही बात है कि आज 23 अप्रैल है, शमशाद जी की पुण्यतिथि। सच में, इस साक्षात्कार को आज की तारीख़ में प्रस्तुत करने की हमारी मनशा नहीं थी और ना ही हमने इस बात पर ध्यान दिया कि आज उनकी पुण्यतिथि है। यह क़ुदरत का करिश्मा ही है कि आज के दिन के लिए इस साक्षात्कार को हमने चुना।


वह 26 जनवरी 2012 का दिन था जब मेरी उड़ान मायानगरी मुंबई में उतरी। और मैं वहाँ था अपने एक बहुत पुराने सपने को लिए, सपना स्वर्णिम युग की एक स्वर्णिम आवाज़ से मिलने का जिसने लाखों, करोड़ों संगीत रसिकों के दिलों को प्रसन्न किया है, चकित किया है, गुदगुदाया है। अनूठी लय और भावबोधक गुणवत्ता से परिपूर्ण उनकी उत्कृष्ट आवाज़ ने उस दिन मेरे कानों में ऐसे रस घोले कि वह दिन मेरे जीवन का एक अविस्मरणीय दिन बन कर रह गया। कहने की ज़रूरत नहीं, मैं पूरी प्रत्याशा से वहाँ पहुँचा क्योंकि शमशाद बेगम जी मेरी सबसे पसन्दीदा गायिका रही हैं और रात्रा परिवार (उषा रात्रा शमशाद जी की पुत्री हैं जिनके साथ शमशाद जी रहती थीं) प्रेरणा और प्रोत्साहन की वजह से ही मैं शमशाद जी के वेबसाइट पर निरन्तर कार्य कर पा रहा हूँ।

जैसे जैसे पवई स्थित उनका घर क़रीब आता जा रहा था, मेरे मन में ख़ुशी की लहर उमड़ती चली जा रही थी। राष्ट्रीय अवकाश होने की वजह से सड़कों पर ज़्यादा वाहन नहीं चल रहे थे और कुछ ही देर में हम पहुँच गए अपने गनतव्य स्थल के द्वार पर। बिल्डिंग् के कम्पाउण्ड में बच्चे खेल रहे थे। गणतन्त्र दिवस पर छोटे-छोटे तिरंगा लिए बच्चे इधर से उधर भाग रहे थे। सीक्युरिटी गार्ड के निर्देशानुसार लिफ़्ट का इस्तमाल करते हुए हम जा पहुँचे रात्रा परिवार के दरवाज़े पर। करनल रात्रा (उषा जी के पति) ने एक चौड़ी मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया। रात्रा जी के साथ कई बार फ़ोन और ई-मेल पर बातचीत हुई, उनके साक्षात दर्शन पा कर मन प्रसन्न हो गया। जिस गर्मजोशी से उन्होंने हमारा स्वागत किया, वह उनकी आँखों में भी साफ़ दिखाई दे रही थी। तभी मैंने पीछे से उषा जी की मीठी आवाज़ सुनी। उनकी जो छवि मेरे मन में बनी हुई थी, उसके साथ पूरा पूरा न्याय करते हुए मुझसे कहा, "अच्छा तो आप हैं वो जनाब जो सारे उन फ़ोन कॉल्स और वेबसाइट के पीछे हैं!" बैठने का इशारा करती हुईं उषा ने कहा कि मम्मी अभी-अभी नहाकर नमाज़ अदा कर रही हैं, बस आती ही होंगी!

और कुछ ही क्षणों में वो कमरे में प्रवेश हुईं। बिलकुल ठेठ पंजाबी कुलमाता की तरह दिखने वाली, सादे सलवार-कमीज़ पहनी हुईं, बाल सुन्दर तरीके से बंधे हुए, स्पष्ट मुखमंडल वाली मूर्ति मेरे सामने खड़ी थीं। शमशाद बेगम। मैं कुछ पल उन्हें निहारता रहा। वो ऐसी लग रही थीं जैसे वो अपनी ज़िन्दगी से बहुत संतुष्ट हों, बहुत सुकून और शान्ति की छाया थी उनकी आँखों में। वो सावधानी से धीरे धीरे नज़दीक आईं और नमस्ते कह कर हमारा स्वागत किया। मैंने उनका आशीर्वाद लिया और कहा कि वो पद्म पुरस्कार के दिन की तुलना में कुछ ज़्यादा कमज़ोर लग रही हैं। सहमती के साथ उन्होंने बताया कि बुखार इसकी वजह है, पर अब वो बिलकुल ठीक हैं। जैसे ही उन्होंने सुना कि मैं इन्दौर से हूँ, वो मुस्कुराईं और कहा कि जब मेरा दामाद मऊ में था, तब हम लोग वहाँ अक्सर जाया करते थे। मुझे वहाँ के कचौड़ियों और गुलाबजामुनों का स्वाद अब भी याद है! हम लोग डाइनिंग् टेबल पर बैठते हैं साक्षात्कार के लिए और जल्दी ही खो जाते हैं शमशाद जी की यादों के गलियारों में।


शमशाद जी, आपके शुरुआती दिनों के बारे में बताइए। आप का जन्म लाहोर में हुआ था न?
गजेन्द्र खन्ना और पुत्री उषा रात्रा के साथ शमशाद जी

जी हाँ, मैं लाहोर में पैदा हुई थी। कहीं कहीं पर यह लिखा हुआ है कि मेरा जन्म अमृतसर में हुआ है जो कि ग़लत है। मैं लाहोर में 14 अप्रैल 1919 में पैदा हुई थी। हमारा परिवार एक आम रूढ़िवादी मुस्लिम जाट परिवार था। मेरे वालिद मियाँ हुसैन बक्श और मेरी वालिदा ग़ुलाम फ़ातिमा, बहुत अच्छे लोग थे वो जिन्होंने हम सब पर बहुत प्यार बरसाये और बचपन के वो दिन मेरी ज़िन्दगी के सबसे अच्छे दिनों में से थे।


आप कितनी भाई-बहनें हैं?

मेरे पाँच भाई और तीन बहनें हैं।

आज भी आप अपने भाई-बहनों से मिलती हैं कभी-कभार?

जी नहीं! मैं पीचले पन्द्रह साल से वहाँ नहीं गई। बढ़ती उम्र के साथ-साथ अब मुझे दूसरे कमरे तक चल कर जाने से पहले भी सोचना पड़ता है (उनकी उस मशहूर खनक वाली हँसी, जो अब भी उसी तरह से बरकरार है, पूरे कमरे में गूंजने लगती है)


आपका बचपन कैसा था?

हम लाहोर के एक पारम्परिक मुस्लिम जाट परिवार वाले थे, जिसमें ढेर सारा प्यार-दुलार थ। उस वक़्त ज़िन्दगी बहुत सादा हुआ करती थी। लाहोर के वो दिन आज भी मैं बड़े शिद्दत से याद करती हूँ।

आपके पति के बारे में कुछ बताइए।

उनका नाम है गणपत लाल बट्टो, जो एक वकील थे, MA, LLB। हम दोनों एक दूसरे से बिलकुल अलग थे, लेकिन फिर यह बात भी तो है कि विपरीत की आकर्षित करती है। मैंने उनसे कह दिया था कि निकाह के बाद भी मैं गाना नहीं छोड़ूँगी, जिस बात कओ उन्होंने इज़्ज़त और अहमियत दोनों दी। उन्होंने गाने से कभी मुझे नहीं रोका, पर ख़ुद को गीत-संगीत से कोई ख़ास लगाव नहीं था। लेकिन यह बात है कि उन्होंने हमारी बेटी को अच्छी आवाज़ होने के बावजूद एक प्रोफ़ेशनल सिंगर बनने की इजाज़त नहीं दी और चाहते थे कि वो डॉक्टर बने। वो एक सख़्त क़िस्म के वालिद थे। फ़ोटोग्राफ़ी का उन्हें बहुत शौक़ था।

यह सभी को मालूम है कि आपके चाचा जी अमीरुद्दीन ने आपको जिएनोफ़ोन में ले गए थे जहाँ पर मास्टर ग़ुलाम हैदर ने आपका ऑडिशन लिया था और आपको ट्रेनिंग् भी दी। इसके बारे में बताइए, उस ट्रेनिंग् के बारे में बताइए।

जी हाँ, मेरे चाचा अमीरुद्दीन मेरा हमेशा हौसला-अफ़ज़ाई करते थे। जब उन्होंने मोहर्रम के मौक़े पर अच्छा गाने की वजह से दो पैसे इनाम में दिए, उस समय मुझे लगा कि जैसे मेरे पास दो लाख रुपय आ गए हैं। ये वो ही थे जिन्होंने मेरे वालिद से कहा कि जिएनोफ़ोन वाले एक नई आवाज़ ढूंढ़ रहे हैं। उस ज़माने में अच्छे घर की लड़कियों का इस तरह का पैसों के लिए गाना बजाना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन चाचा जी ने उनसे कहा कि मेरी आवाज़ ख़ुदा की देन है और मुझे रोकना अल्लाह की नज़रों में एक गुनाह होगा। उन्होंने कहा कि आप चाहे तो अपने शर्त रख दो पर एक बार कोशिश कर लेने दो इसे। मेरे वालिद ने मजबूरी में हामी भर दी पर कुछ शर्त रख दिए - सिर्फ़ गाना गाओ, किसी को अपनी तसवीर खींचने मत देना, कभी कोई पार्टी अटेण्ड मत करना, और रेकॉर्डिंग् ख़त्म होते ही सीधे घर वापस आना। ये सब उनके दिए हुए उसूलों का मैंने अपनी पूरी करीअर में पालन किया। चाचा जी मुझे ऑडिशन में ले गए जो उस कंपनी के मौसिकार मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब ने लिया। ऑडिशन में मैंने बहादुर शाह ज़फ़र की एक ग़ज़ल पेश की जिसके अलफ़ाज़ थे "मेरा यार गर मिले मुझे जान दिल फ़िदा करूँ" और कुछ मरसिया। मास्टर साहब को मेरी आवाज़ अच्छी लगी और उसी दिन उन्होंने मुझे कॉन्ट्रैक्ट साइन करने को कहा। मुझे 12.50 रुपये प्रति गीत के हिसाब से कुल 12 गीत गाने थे, ये उस कॉन्ट्रैक्ट में लिखा हुआ था। यह रकम उस ज़माने के हिसाब से बहुत ज़्यादा थी। मैंने फिर पूछा, और तालीम? उन्होंने कहा कि मुझे कोई तालीम नहीं चाहिए, बस वो जैसे जैसे कहते हैं मैं वैसे वैसे करती जाऊँ। 

क्या उम्र रही होगी आपकी उस वक़्त?
मास्टर ग़ुलाम हैदर

मैं कुछ 12-13 बरस की थी। मास्टर साहब बहुत बड़े इंसान थे। उन्होंने मेरी आवाज़ में दिलचस्पी ली और इस बात का ख़याल रखा कि हमें संगीत और गायिकी की बारीकियाँ समझ में आए। वो ख़ुद भी बहुत बड़े जानकार थे साज़ों के, और सारे साज़िन्दे उनसे सीखते रहते थे। उनका तालीम देने का अंदाज़ भी अनोखा था। हमें अलग अलग तरह के गीतों को गवाते हुए हमारी आवाज़ को भी इस तरह से तराश देते थे कि फिर हम किसी भी तरह का गीत गा सके। उनकी तालीम का यह तरीक़ा रवायती तरीक़ों से सौ गुना ज़्यादा कारगर था। हीरा तराशने जैसा काम वो किया करते थे। मैं यह कभी नहीं भूल सकती जो उन्होंने मेरे लिए किया है। मेरा उस्ताद जन्नत में झूले! वो मुझे अपना चौमुखिया गायिका कहते थे जो किसी भी तरह के गीत के साथ पूरा न्याय करती हो। उन्होंने मुझे दो ज़रूरी बातें सिखाई। पहला, एक अच्छा इंसान बनो, और दूसरा, जिस तरह से पानी जिस बरतन में रखो उस बरतन का आकार ले लेती है, वैसे ही तुम भी अपने आप को किसी भी हालात में उसके अनुसार ढाल लेना।

आपका सबसे पहला ग़ैर-फ़िल्मी गीत कौन सा था? उसकी रेकॉर्डिंग् के बारे में कुछ याद है?

वह गाना था "जय जगदीश हरे"। मैंने बहुत अच्छा गाया था लेकिन मैं हैरान रह गई जब रेकॉर्ड के उपर ’उमा देवी’ का नाम छपा हुआ देखा। बात यूं थी कि कंपनी ने सोचा कि एक मुस्लिम लड़की की गाई हिन्दू आरती को पब्लिक किस तरह से लेगी, इस नाज़ुक मसले को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया। मुझे इसका बुरा लगा और चाहती थी कि मेरा जो अगला गाना हो उसके साथ मेरा नाम लिखा जाए। मेरा पंजाबी गीत "हथ जोड़िया पंखिया दा कसम ख़ुदा दी" बहुत हिट हुआ और कंपनी ने मेरी फ़ीस के उपर और 6 रुपये इनाम के तौर पर दिए।

उस तालीम के बाद आप फिर रेडियो से जुड़ीं, है ना?

जी हाँ! उस वक़्त संगीत का शौक़ काफ़ी महंगा शौक़ हुआ करता था। एक ग्रामोफ़ोन की कीमत तीन सौ रुपये हुआ करती थी और उसका जो पिन है उसकी कीमत एक रुपय थी। इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा लीजिए कि उस समय एक रुपय में आप 40 मन आटा ख़रीद सकते थे (1 मन = 40 सेर; एक सेर एक किलो से थोड़ा ज़्यादा होता है)। इस वजह से ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स केवल अमीरों के पास ही होता था जबकि आम लोगों के मनोरंजन का ज़रिया रेडियो हुआ करता था।

आप सबसे पहले पेशावर रेडियो पर गई थीं?

दरसल ऑल इण्डिया रेडियो सबसे पहले दिल्ली में शुरु हुई थी। मुझे दिल्ली से ऑफ़र मिला था गाने का, लेकिन मैं वह काम नहीं ले पाई क्योंकि मैं अचानक बीमार पड़ गई थी। इसलिए जब 1934 में पेशावर में भी ऑल इण्डिया रेडियो ने अपना स्टेशन खोल दिया, तब मैं वहाँ पर गाने लगी।

ओह, मेरे लिए यह नई जानकारी है, मुझे इस बात का पता नहीं था कि आपको दिल्ली रेडियो स्टेशन पर सबसे पहले गाने का न्योता मिला था!

जी हाँ, यह सच है। मैंने क़रीब तीन सालों तक पेशावर में काम किया। शुरु शुरु में मैं चन्द प्रोग्रामों के लिए जाया करती थी, पर बाद में मुझसे कहा गया कि लाहौर से पेशावर का जो आना-जाना है उसे ख़त्म करके पेशावर में घर ले लूँ।

पेशावर के दिनों के बारे में बताइए। यह पहली बार आप अपने घर से दूर जा रही थीं, मुश्किल रहा होगा आपके लिए?

जी हाँ, वह एक अलग ही अनुभव था। मेरे वालिद ने मेरे बड़े भाई फ़ज़लदीन को मेरे साथ भेजे दिया ताकि कोई तो हो मेरी देखरेख के लिए। भाई साहब मुझे बहुत प्यार करते थे। ज़िन्दगी में पहली बार मुझे बुरक़ा पहनने पर मजबूर होना पड़ा।

मतलब आप लाहौर में बुरक़ा नहीं पहनती थीं?

नहीं, यह ज़रूरी नहीं था। पेशावर में अपनी महफ़ूसी के लिए पहनना ज़रूरी था। लोग मेरे वालिद साहब को कहते थे कि पठान चुक लई जासाँ (पठान इसे ले जायेंगे)। इसलिए मैं बुरक़ा पहनने लगी। आम लोग पठानों से डरते थे। यहाँ तक कि पेशावर रेडियो स्टेशन वाले लोग भी मुझसे बुरक़ा पहन कर बाहर निकलने को कहते थे।

पेशावर की और कौन सी यादें हैं आपके दिल में?

मुझे पेशावर के खाने की बहुत याद आती है। वहाँ की नान, तीतर, बटर, चपली कबाब का ज़ायका अभी तक मेरी ज़ुबान पर लगी है। मैं अपना खाना ख़ुद ही बनाती थी लेकिन मुझे फुल्के (रोटी) बनाना नहीं आता था उस ज़माने में, इसलिए रोज़ बाहर से नान मंगवा लेती थी। मेरी सेहत काफ़ी अच्छी हो गई वहाँ का खाना खा कर (हँसते हुए)। यहाँ तक कि जब मैं लाहौर के लिए निकल रही थी और बैंक गई पैसे निकालने, तो कैशियर साहब बोले, "पैसे किस गल दे? आई सी ते पतली सी, हुण ते लाल सुइ हो गई ऐ" (पैसे किस बात के? जब आप यहाँ आई थीं तब पतली थीं, और अब अपने आप को देखिए, आप यहाँ से अच्छी सेहत लेकर जा तो रही हैं!)

पेशावर के उन दिनों आप के द्वारा गाए गीतों में से कोई भी गीत उपलब्ध है?

अफ़सोस, नहीं! हालाँकि मैंने कई सौ गीत गाए होंहे, वो सारे डायरेक्ट ब्रॉडकास्ट हुआ करते थे, उनकी रेकॉर्डिंग् नहीं होती थी। वो लाइव प्रोग्राम्स होते थे जिसमें ग़ज़लें, नगमें, और ग़ैर फ़िल्मी गाने शामिल होते थे। हर दिन मैं अलग क़िस्म का गीत गाती थी और कुछ गाने इतने पॉपुलर हुए कि उनकी बार बार फ़रमाइशें आती थीं। मसलन, मेरा गीत "इक बार फिर कहो ज़रा" बहुत हिट हुआ था, जिसका बाद में रेकॉर्ड भी बना। मैं यह गीत रेडियो पर गाते गाते थक चुकी थी। और हर बार इसे कम से कम दो बार गाना पड़ता था।

जब लहौर में रेडियो स्टेशन बना, तब आप वहाँ काम करने लगीं, है ना? वहाँ के बारे में कुछ बताइए।

अपने घर-परिवार में वापस आकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई। वहाँ दिन में काम होता था और शाम को स्टेशन बन्द होने के बाद हम वापस घर आ जाते थे। मुझे याद है वहाँ के Flatty's Hotel हुआ करती थी जहाँ लोग जा कर खाना खाते थे। हम सब आर्टिस्ट्स तांगे में घर जाते थे।

उस ज़माने में आपने ढेर सारी ग़ैर फ़िल्मी रेकॉर्डिंग्स की हैं, और अफ़सोस की उनमें से ज़्यादातर ही आज मौजूद नहीं है।

जी हाँ, यह अफ़सोस की बात है। सिर्फ़ वो रेकॉर्डिंग्स ही क्यों, मेरे दूसरे भी बहुत से गीत अलग अलग वजहों से खो गए हैं। मैंने 1945 की फ़िल्म ’फूल’ में गीत गाए थे, पर वो अब कहीं पे नहीं मिलते। ’जिएन-ओ-फ़ोन’ के साथ कॉन्ट्रैक्ट होने की वजह से बहुत सी फ़िल्मों में मैंने सिर्फ़ फ़िल्म वर्ज़न के लिए गाए जो उन फ़िल्मों के साथ खो गए हैं। मेरे बहुत से गीत ऐसे हैं जो कई वजहों से रिलीज़ ही नहीं हो पाए।

उस ज़माने में गाने किस तरह से बनने थे, इस बारे में बताइए।

आम तौर पर हम सुबह सुबह पहुँच जाते थे और रिहर्सल शुरु कर देते। रेकॉर्डिंग्स होती थी शाम छह बजे के बाद जब ज़्यादा शोर नहीं होता। उस ज़माने में अच्छी रेकॉर्डिंग रूम नहीं हुआ करती थी, साउण्ड प्रूफ़ रूम नहीं थे। इसलिए हम स्टेज पर रेकॉर्डिंग् करते थे; दिन में उन स्टेजों पर नाटक होते थे और शाम को रेकॉर्डिंग्। हर तरफ़ लकड़ी के बोर्ड होते और उस पर सरेश की बू चारों तरफ़ से आती थी। हमें पहले वह जगह साफ़ करना पड़ता और तब जाकर रेकॉर्डिंग् शुरु होती। इतनी बदबूदार कि मुंह खोलना भी मुश्किल वहाँ; ऐसे में हमें मूड बना कर "सावन के नज़ारे हैं" गाना पड़ता (हँसते हुए)! उस ज़माने में माइक्रोफ़ोन की कीमत 500 रुपये होती थी और उसमें दो उंगलियों जितनी चौड़ी लाइन होती थी। हमें उस लाइन में गाना पड़ता था। सीम्गर को मुशियनों के साथ तालमेल बना कर रेकॉर्डिंग् करनी पड़ती। तकनीक उस ज़माने में कमज़ोर थी, इसलिए आर्टिस्ट को ही पूरे पर्फ़ेक्शन के साथ गाना पड़ता था। अगर एक भी ग़लती हो गई तो दुबारा पूरा फिर से गाना पड़ता था। इसलिए रेकॉर्डिंग् से पहले बहुत बार रिहर्सल करना पड़ता था। शुरु में कम्पोज़र के साथ चार-पाँच बार रिहर्सल करते, उसके बाद पूरे म्युज़िक और साज़िन्दों के साथ रिहर्सल करते। हर एक शख्स अपनी तरफ़ से कोशिश करता कि गाना अच्छे से अच्छा बने। हम अपने फ़न के लिए जीते थे और यही हमारा अहम मक़सद होता था। बाक़ी सब कुछ उसके बाद। रिहर्सलों के बाद जब हमें लगता कि अब हम पूरी तरह से तैयार हैं, तब हम एक स्पेशल स्टुडियो में जाते फ़ीते (टेप) पर रेकॉर्ड करने के लिए जो फ़िल्म वर्ज़न के लिए इस्तमाल होता। क्योंकि फ़ीते पर रेकॉर्डिंग की क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं होती, इसलिए रेकॉर्डिंग् कंपनियाँ हमें फिर से बुलाते ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के लिए वही गाना दुबारा रेकॉर्ड करने के लिए। यानी कि एक गाना हम दो बार गाते, एक बार फ़िल्म के फ़ीते पर और एक बाद ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के लिए। यह सिलसिला बाद में भी कई सालों तक चलता रहा। कई बार तो ऐसा भी होता था कि फ़िल्म के परदे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर अलग अलग गायकों की आवाज़ होती थी एक ही गीत के लिए। ’जिएन-ओ-फ़ोन’ के कॉन्ट्रैक्ट की वजह से मैं बहुत से रेकॉर्डिंग् कंपनियों के लिए गा न सकी। ऐसे में मेरी आवाज़ फ़िल्म के लिए ली जाती पर रेकॉर्ड पर उन्हें किसी और गायिका से गवा लिया जाता। बाद में जब HMV ने ’जिएन-ओ-फ़ोन’ को ख़रीद लिया, तब जा कर यह मसला सुलझा। तब मेरी जो पाबन्दी थी, वह ख़त्म हुई। 

फ़िल्मों में आपका कैसे आना हुआ?

जब मैं बाहर थी, तब नूरजहाँ मास्टर साहब के लिए गा रही थीं। उनका गाया "शाला जवानियाँ माने" बहुत हिट
हुआ था। उनका ’हीर स्याल’ का गीत "सोनेया देसाँ विचों देस पंजाब नई सी ओ, जिवें फूलाँ विचों फूल गुलाब नई सी" भी ख़ूब चला था। वो उस वक़्त ऐसी उम्र में थीं कि उनकी आवाज़ ना तो एक छोटी लड़की की थी और ना ही किसी औरत की। इसलिए प्रोड्युसरों ने उनकी आवाज़ को मच्योर होने तक इन्तज़ार करने का फ़ैसला लिया। प्रोड्युसर दलसुख पंचोली जी मेरी आवाज़ के शौक़ीन थे, और उन्होंने मुझे बुलाया उनकी फ़िल्म में गाने के लिए।

ओह, इसका मतलब यह कि मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब ने आपको नहीं बुलाया सबसे पहले फ़िल्मी गीत गाने के लिए?

नहीं, मास्टर साहब ने नहीं बुलाया था मुझे। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें डर था कि अगर वो मुझे बुलायेंगे तो लोग यह कहेंगे कि वो वहाँ पर अपना कैम्प बना रहे हैं अपने जान-पहचान वाले लोगों के साथ। वो इतने शरीफ़ इंसान थे। वो चाहते थे कि मैं अपने बलबूते, अपनी काबलियत से वहाँ पहुँचूँ, ना कि किसी की सिफ़ारिश से। उनका और अल्लाह का करम था कि मुझे अपने दम पर काम मिलता गया और हमेशा मिला; कभी किसी लॉबी की ज़रूरत नहीं पड़ी, या किसी का पीठ थपथपाना नहीं पड़ा।

और उसके बाद आपका करीयर निरन्तर आगे बढ़ता चला गया?

जी हाँ! मैं जिन फ़िल्मों में गा रही थीं, वो सारी फ़िल्में हिट हो रही थीं। एक के बाद एक चार सिल्वर जुबिली हमारी फ़िल्मों ने मनाई - ’यमला जट’, ’गवान्डी’ - ’गवान्डी’ भी उसी साल रिलीज़ हुई जिसमें संगीत श्याम सुन्दर का था। एक दूसरी ’गवान्डी’ भी थी जो 1941-42 में बनी थी जिसमें संगीत था पंडित अमरनाथ। ये पंजाबी फ़िल्में थीं जो बहुत हिट हुई थीं। और उसके बाद ’ख़ज़ांची’ आई जिसने गोल्डन जुबिली मनाई और एक बहुत बड़ी कामयाब फ़िल्म साबित हुई। मैं शायद हिन्दी फ़िल्मों की अकेली गायिका हूँ जिसे अपनी पहली फ़िल्मे के सभी गीत गाने के मौक़े मिले। उस फ़िल्म के गाने भी बहुत हिट हुए थे। मास्टर जी ने मुझे बताया था कि लोग थिएटरों में स्क्रीन के उपर सिक्कों की बारिश करते जब भी मेरा गीत "लौट गई पापाँ" शुरु होता। और फिर "सावन के नज़ारे हैं" गीत पर भी तालियाँ बजतीं। हम सब बहुत ख़ुश थे इस फ़िल्म की कामयाबी पर। लाहौर फ़िल्म इंडस्ट्री में उस वक़्त तक की यह सबसे कामयाब फ़िल्म थी। मेरे शुरुआती सारे डुएट गीत मास्टर ग़ुलाम हैदर के साथ ही होते थे।


तो दोस्तों, यह था सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की लम्बी बातचीत का पहला भाग, जिसमें शमशाद जी ने अपने जीवन के शुरुआती दिनों का हाल विस्तृत तरीके से बताया। और बातचीत का सिलसिला आकर रुका उनकी पहली सुपरहिट हिन्दी फ़िल्म ’ख़ज़ांची’ पर। यहाँ से बातचीत का सिलसिला हम आगे बढ़ायेंगे अगले महीने।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



साक्षात्कार : गजेन्द्र खन्ना
अनुवाद एवं प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

बम बम बम भोला..! रसन पिया अपनी रचना में गा कर सुनाते हैं शिव पार्वती विवाह वृत्तान्त के समय किस तरह नाग को देख पंडित तक काँप जाते हैं।

महफिले कहकशां (३)


उस्ताद अब्दुल रशीद साहब 
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, महफिले कहकशां के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए उस्ताद अब्दुल रशीद खान उर्फ़ रसन पिया को श्रद्धांजलि उन्ही की गाई एक बंदिश से।  


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

"मैं आसाम के एक छोटे शहर से मुंबई आया संगीतकार बनने का सपना लेकर" - बिस्वजीत भट्टाचार्जी

एक मुलाकात ज़रूरी है (7)

भरते हुए युवा संगीतकार बिस्वजीत भट्टाचार्जी उर्फ़ बिबो हैं आज के हमारे ख़ास मेहमान कार्यक्रम "एक मुलाकात ज़रूरी है" में. अभी हाल ही में आपके संगीत से सजी फिल्म "मुरारी -द मैड जेंटलमैन" प्रदर्शित हुई है. आईये मिलते हैं इस बेहद प्रतिभावान गायक संगीतकार से आज सजीव सारथी के साथ,


रविवार, 17 अप्रैल 2016

उपशास्त्रीय मंच की चैती : SWARGOSHTHI – 266 : CHAITI SONGS




स्वरगोष्ठी – 266 में आज

होली और चैती के रंग – 4 : चैती गीतों के वर्ण्य-विषय

‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर लइहें...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव और चैत्रोत्सव प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में पूरे उत्तर भारत में चैती-गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में, यहाँ तक कि शास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। पिछले अंक में हमने आपको विविध शैलियों में पिरोये कुछ फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कराया था, आज के अंक से चैती गीतों के विविध रूपों का रसास्वादन आपको कराएंगे। आज हम आपको चैती गीत उपशास्त्रीय कलासाधकों, विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित छन्नूलाल मिश्र से उपशास्त्रीय चैती के उदाहरण और पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में एक फिल्मी चैती सुनवाएँगे।



ज हम आपसे संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा कर रहे हैं जो मूलतः ऋतु प्रधान लोक संगीत की शैली है, किन्तु अपनी सांगीतिक गुणबत्ता के कारण इस शैली को उपशास्त्रीय मंचों पर भी अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत के रूप में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र मास से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में चैती गीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में, यहाँ तक कि विविध शास्त्रीय मंचों पर भी चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। उत्तर भारत में इस गीत के प्रकारों को चैती, चैता और घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है। आज के अंक में हम सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप और फिर फिल्मों में इसके प्रयोग के कुछ उदाहरण सुनेंगे।

चैती गीतों का मूल स्रोत लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में रामजन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत् के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। कभी-कभी गायकों को दो दलों में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘चैता दंगल' कहा जाता है। आइए, सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप पर एक दृष्टिपात करते है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी एक चर्चित चैती से हम आज की इस संगीत सभा का शुभारम्भ करते हैं। यह श्रृंगार रस प्रधान चैती है जिसमें नायिका परदेश गए नायक के वापस घर लौटने की प्रतीक्षा करती है। इस चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है।


चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : विदुषी गिरिजा देवी



भारतीय संगीत के अक्षय भण्डार में ऋतु-प्रधान गीत-संगीत का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बसन्त ऋतु से आरम्भ होकर पावस ऋतु की समाप्ति तक देश के हर क्षेत्र और हर आंचलिक बोलियों में, प्रकृति के हर बदलाव को रेखांकित करते ग्राम्य-गीतों का खजाना है। होलिका-दहन के अगले दिन से ही भारतीय पंचांग का चैत्र मास आरम्भ हो जाता है। प्रकृति में ग्रीष्म का प्रभाव बढ़ने लगता है और खेतों में कृषक का श्रम सार्थक नज़र आने लगता है। ऐसे परिवेश में जनजीवन उल्लास से परिपूर्ण होकर गा उठता है। उत्तर भारत में इस गीत को चैती, चैता या घाटो के नाम से जाना जाता है। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित छन्नूलाल मिश्र चैती और चैता गीतों का भेद स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि चैती गीत स्त्री गुण प्रधान होते हैं, जबकि चैता और घाटो गीत पुरुष गुण प्रधान होते हैं। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक-गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच भी समान रूप लोकप्रिय है। चैती गीतों में श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। कभी-कभी इन गीतों में वैराग्य भाव और निर्गुण भाव भी मिलता है। आइए, सबसे पहले आपको सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र के स्वरों में एक ऐसी ही चैती सुनवाते है, जिसकी रचना कबीर ने की है। इस चैती में जीवन की नश्वरता का अनुभव कराया गया है।


चैती : ‘कइसे सजन घर जइबे हो रामा...’ : स्वर – पण्डित छन्नूलाल मिश्र



चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती की धुन और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती का गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनीचुनी फिल्मी गीतों में मिलता है। 1963 में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में प्रस्तुत किया गया था। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’। इस गीत में आपको चैती गीतों के समस्त लक्षण परिलक्षित होंगे। इस गीत में राग तिलक कामोद का आधार और दीपचन्दी ताल का स्पन्दन भी मिलेगा। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में भी हम चैती गीतों पर चर्चा जारी रखेंगे।


चैती गीत : ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’ : फिल्म गोदान : मुकेश




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 266वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भोजपुरी भाषा की एक पुरानी फिल्म से लिये गए गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में कौन सी दो तालों का प्रयोग हुआ है? तालों के नाम बताइए।

2 – उपरोक्त तालों में मात्राओं की संख्या बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं? इस गायिका ने हिन्दी फिल्मों में अनेक सफल गीत गाये हैं।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 268वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 264 की संगीत पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- मुख्य गायक – मोहम्मद रफी

इस बार की पहेली में कुल पाँच प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे चैती गीतों पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





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