शनिवार, 21 मार्च 2015

"देखने में भोला है दिल का सलोना" - चुरा लिया है तुमने जो 'धुन' को


एक गीत सौ कहानियाँ - 55
 

देखने में भोला है दिल का सलोना...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ, 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 55वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' के मशहूर गीत "देखने में भोला है दिल का सलोना..." से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें। 


HMV कंपनी का पहला रिटेल स्टोर लंदन के ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट में जुलाई 1921 को खोला गया था। इसके पीछे सर एडवार्ड एल्गर का महत्वपूर्ण हाथ था, जो ग्रामोफ़ोन को गम्भीरता से लेने वाले पहले कम्पोज़र थे। इस स्टोर के खुलते ही ग्रामोफ़ोन और म्युज़िक इंडस्ट्री में जैसे एक क्रान्ति की लहर दौड़ गई। HMV दुनिया के विभिन्न देशों में घूम कर वहाँ के संगीत को रेकॉर्ड करते और फिर ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के माध्यम से सुधी श्रोताओं तक पहुँचाते। HMV और तमाम कंपनियाँ तवायफ़ों के कोठों पर जाकर या किसी शास्त्रीय या लोक गायक से गीत-संगीत रेकॉर्ड कर लाते। ऐसे ही एक संगीत साधक थे आन्ध्र प्रदेश के वल्लुरि जगन्नाद राव जिनके कुछ कम्पोज़िशन्स 1920 के दशक में HMV ने रेकॉर्ड किए थे। जगन्नाद राव एक संगीत शिक्षक भी थे जिनकी दो शिष्या सीता और अनसूया हुआ करती थीं। ये दो शिष्यायें आगे चलकर लोक गायिकाओं के रूप में प्रसिद्ध हुईं। 1950 की तेलुगू फ़िल्म 'श्री लक्ष्मम्मा कथा' में संगीतकार सी. आर. सुब्बुरमण ने एक कम्पोज़िशन का इस्तेमाल किया जिनके रचयिता के रूप में सीता और अनसूया को क्रेडिट दिया गया। दरअसल यह कम्पोज़िशन वल्लुरि जगन्नाद राव का कम्पोज़िशन था जो 1920 के दशक के एक ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर जारी भी हुआ था। ख़ैर, इस पर किसी का ध्यान उस समय नहीं गया। क्योंकि बहुत कम लोगों ने 1920 के दशक की वह रेकॉर्डिंग सुन रखी थी, इसलिए किसी को पता भी नहीं चल पाया कि सीता और अनसूया ने अपने शिक्षक की कम्पोज़िशन का इस्तेमाल अपने गीत में किया है। बात वहीं ख़तम हो गई।

पाँव वर्ष बाद, अर्थात् 1955 में टी. चाणक्य निर्मित एक तेलुगू फ़िल्म आई 'रोजुलु मरायी' जिसमें संगीतकार मास्टर वेणु ने अभिनेत्री वहीदा रहमान पर फ़िल्माये जाने के लिए एक नृत्य प्रधान गीत की रचना की। इस गीत के लिए उन्होंने सीता-अनसूया वाले उसी धुन का इस्तेमाल किया और इस बार गाना ज़बरदस्त हिट हुआ। कोसराजु राघवैया के लिखे और जिक्कि कृष्णावेणी के गाये "एरुवाका सगरोरन्नो चिन्नन्ना..." शीर्षक वाले इस गीत ने वहीदा रहमान के करीयर को गति प्रदान किया। आइए पहले यह गीत सुनते हैं।

तेलुगू फिल्म रोजुलु मरायी :  "एरुवाका सगरोरन्नो चिन्नन्ना..." : संगीत - मास्टर वेणु


फिल्म का यह गीत काफी हिट हुआ परन्तु संगीतकार मास्टर वेणु विवाद में घिर गए, धुन चुराने का इलज़ाम उन पर लगा। लोगों ने और संगीत समीक्षकों ने भले ही उनकी आलोचना की हो, पर वेणु कानूनी कार्यवाइयों से बच गए, उन पर कोई केस नहीं किया किसी ने। कुछ दिनों में मामला ठंडा पड़ गया। बात आई गई हो गई।

इस घटना को अभी एक साल भी नहीं बीता था कि अचानक एक ज्वालामुखी जाग उठा, जैसे किसी ने बुझती हुई अग्नि में घी डाल दिया हो। 1956 में इसी तेलुगू फ़िल्म का तमिल रीमेक बना 'कालम मारिपोचु' के शीर्षक से जिअमें जेमिनी गणेशन और अंजलि देवी मुख्य किरदारों में थे। फ़िल्म के सभी गीतों की धुनें तेलुगु वर्ज़न फ़िल्म की ही रखी गईं। इस तरह से "एरुवाका चिन्नन्ना" का तमिल वर्ज़न बना "येरु पुट्टि पोवाये"। तमिल फ़िल्म में भी इस गीत को वहीदा रहमान पर ही फ़िल्माया गया और ये दोनों गीत जिक्कि ने ही गाये।

तमिल फिल्म कालम मारिपोचु : "येरु पुट्टि पोवाये..." : गायक - जिक्कि


तमिल फ़िल्म में इस गीत के आते ही निर्माता लेच्चुमनन चेट्टियार ने अपनी 1956 की ही महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'मदुरई वीरन' के लिए इस धुन को उठा लिया और संगीतकार जी. रामनाथन ने इस धुन पर गीत कम्पोज़ कर डाला जिसके बोल थे "सुम्मा इरुंधाल सोथुक्कु नश्टम... थाणे थन्नन्ना"। डी. योगानन्द निर्देशित इस फ़िल्म में MGR यानी एम. जी. रामचन्द्रन, पी. भानुमती और पद्मिनी मुख्य भुमिकाओं में थे। यह एक बड़े बजट की फ़िल्म थी और फ़िल्म ज़बरदस्त हिट सिद्ध हुई और सभी सिनेमाघरों में इसने 100 दिन पूरे कर लिए। और यह प्रेरित गीत भी ख़ूब कामयाब रहा। पर अब कि बार धुन चुराने का यह मसला पहुँच गया अदालत की चौखट पर। 'श्री लक्ष्मम्मा कथा', 'रोजोलु मरायी' और 'कालम मारिपोचु' तो बच निकले थे पर 'मदुरई वीरन' के ख़िलाफ़ HMV ने कर दी केस कॉपीराइट ऐक्ट के तहत।

तमिल फिल्म मदुरई वीरन :  "सुम्मा इरुंधाल सोथुक्कु नश्टम..." : संगीत - जी. रामनाथन्


आन्ध्र की धुन पर पंजाबी वेशभूषा
हालाँकि HMV ने यह लॉसूट (lawsuit) तीनों के ख़िलाफ़ दर्ज करवाई, पर पत्रकार व फ़िल्म समीक्षक रंगा राव के अनुसार 'मदुरई वीरन' को ही टारगेट बनाया गया। अब इसके पीछे क्या कारण था बताना मुश्किल है। और इस मामले का फ़ैसला किसके हक़ में हुआ इसकी भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। पर ऐसा प्रतीत होता है कि फ़ैसला 'मदुरई वीरन' के पक्ष में ही हुआ होगा, वरना 1960 की राज खोसला की हिन्दी फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' में सचिनदेव बर्मन हू-ब-हू इसी धुन का इस्तेमाल नहीं करते। इसी धुन पर मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत "देखने में भोला है दिल का सलोना, बम्बई से आया है बाबू चिन्नन्ना" जब आशा भोसले की आवाज़ में ढल कर बाज़ार में आई तो इसे भी लोगों ने हाथों हाथ ग्रहण किया, और समीक्षकों के कलम एक बार फिर से चल पड़े। तेलुगु गीत को क्रेडिट देते हुए मजरूह ने "चिन्नन्ना" शब्द को इस गीत में रखने का फ़ैसला लिया जिसका अर्थ है "छोटे बाबू"। गीत के निर्माण में सचिन दादा के सहायक के रूप में काम किया बेटे राहुल देव बर्मन ने। यह वह समय था जब लता सचिन दादा के लिए नहीं गा रही थीं। इसलिए दादा बर्मन उन दिनों अपने कम्प्ज़िशन्स आशा भोसले को ध्यान में रख कर बनाया करते थे। इस गीत में भी उन्होंने वही किया। एक और ख़ास बात इस गीत की कि धुन भले ही दक्षिण भारत का लिया गया हो, पर गीत का ऑरकेस्ट्रेशन पंजाबी ढंग का बनाया। दूसरे शब्दों में इसे हम फ़्युज़न कह सकते हैं। साज़ों का इस्तमाल भी इसी तरफ़ इशारा करते हैं। गीत में नायिका और सहेलियों के पोशाक भी पंजाबी स्टाइल के ही हैं। इस तरह से पंजाब और आन्ध्र प्रदेश की दूरी को दादा और बेटे बर्मन ने मिटाया। लीजिए अब आप एक ही धुन पर बना चौथा गीत भी सुन लीजिए।

हिन्दी फिल्म बम्बई का बाबू :  "देखने में भोला है दिल का सलोना...' : संगीत - सचिनदेव बर्मन




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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