Saturday, March 14, 2015

फ़िल्मों में क्रिकेट खिलाड़ी - वर्ल्ड कप स्पेशल


वर्ल्ड कप स्पेशल 
 

फ़िल्मों में क्रिकेट खिलाड़ी




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, आजकल क्रिकेट का बुखार हर छोटे-बड़े पर सवार है। विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेण्ट, जो कि क्रिकेट का सबसे लोकप्रिय टूर्नामेण्ट होता है, इन दिनों खेला जा रहा है। और भारत की पाकिस्तान, दक्षिन अफ़्रीका, वेस्ट इंडीज़, आयरलैण्ड और संयुक्त अरब अमीरात पर शानदार जीत के बाद भारतीयों के लिए यह टूर्नामेण्ट अब और भी ज़्यादा रोचक और रोमांचक हो उठा है। यूं तो ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ साहित्य, संगीत और सिनेमा की पत्रिका है, पर क्रिकेट के इस बुखार से हम भी नहीं बच सके हैं। तो आइए टीम इण्डिया को विजय की शुभकामनाएँ देते हुए आज के इस विशेष प्रस्तुति में जाने कि भारत के किन किन क्रिकेट खिलाड़ियों ने फ़िल्म जगत में अपना हाथ आज़माया है। 



सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिससे हर कोई आकर्षित होता है। सिनेमा जहाँ एक तरफ़ आम दर्शकों को एक मायाबी संसार में ले जाता है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न व्यावसायों के प्रसिद्ध लोग इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आज़ामाने को तत्पर रहते हैं। खेल जगत की अगर बात करें तो क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसकी चमक फ़िल्म-जगत की चमक को काँटे का टक्कर देती आई है। फिर भी अनेक बार यह देखा गया है कि क्रिकेट खिलाड़ी फ़िल्मों की ओर आकृष्ट होकर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आज़माने पहुँचे हैं। शुरुआत करते हैं सुनिल गावस्कर से। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास के सफल बल्लेबाज़ों में शुमार होता है गावस्कर का नाम। हमारे देश का गौरव हैं वो। क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि वो चले आए फ़िल्मों की ओर। मराठी फ़िल्म ’सावली प्रेमाची’ में मुख्य किरदार उन्होंने निभाया, जो बुरी तरह से फ़्लॉप रही। इस फ़िल्म की असफलता से ना घबराते हुए गावस्कर ने एक बार फिर साहस जुटाया और इस बार नज़र आए हिन्दी फ़िल्म ’मालामाल’ में नसीरुद्दीन शाह के साथ। हालाँकि यह फ़िल्म उतनी बुरी तरीके से नहीं पिटी, पर सुनिल गावस्कर को यह अहसास ज़रूर हो गया कि अभिनय उनके बस की बात नहीं।

क्रिकेट खिलाड़ियों के फ़िल्मों में अभिनय करने का सिलसिला शुरू हुआ था आज से चार दशक पहले जब हार्ड-हिटिंग् बैट्समैन सलीम दुर्रानी ने परवीन बाबी के साथ बी. आर. इशारा निर्देशित फ़िल्म ’चरित्र’ में अभिनय किया था। ’अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले पहले क्रिकेटर सलीम दुर्रानी क्रिकेट के मैदान में जितने सफल थे, वही सफलता फ़िल्मों में उन्हें नहीं मिली। ’चरित्र’ के बुरी तरह फ़्लॉप होने पर उन्होंने दोबारा इस तरफ़ अपने क़दम नहीं रखे। स्टाइलिश मिज़ाज के बैट्समैन अजय जडेजा ने अपने क्रिकेट करीअर में बहुत सी कामयाबियाँ देखी, पर अपनी सफलता और शोहरत को वो काबू में ना रख सके और अज़हरुद्दीन और मनोज प्रभाकर के साथ मिल कर मैच-फ़िक्सिंग् में जुड़ कर अपने क्रिकेट करीअर का अन्त बुला लिया। जब पाँच वर्षों के लिए उन्हें क्रिकेट जगत से निष्कासित कर दिया गया, तो उन्होंने फ़िल्म-जगत का द्वार खटखटाया और बन गए अभिनेता फ़िल्म ’खेल’ में। सुनिल शेट्टी, सनी देओल और सेलिना जेटली इस फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म बुरी तरह असफल रही। दुर्भाग्यवश अजय जडेजा ना तो फिर दोबारा किसी फ़िल्म में अभिनय कर पाये और ना ही क्रिकेट जगत में उनकी वापसी हो सकी। अब बस एक क्रिकेट समीक्षक और कमेन्टेटर के रूप में वो नज़र आते हैं। सचिन तेन्दुलकर के समसामयिक खिलाड़ियों में एक नाम है विनोद काम्बली का। उनका क्रिकेट करीअर सफल ज़रूर रहा पर अवधि कम ही रही। टेस्ट मैचों में दो दोहरे-शतक और दो शतक बनाने वाले विनोद काम्बली ने साल 2002 में संजय दत्त और सुनील शेट्टी के साथ फ़िल्म ’अनर्थ’ में नज़र आये, पर फ़िल्म के रिलीज़ होते ही उन्हें यह समझ आ गया कि ’अनर्थ’ करने का कोई अर्थ नहीं था। ऐसा सुना जाता है कि विनोद काम्बली के दोस्तों ने उन्हें यह चेतावनी दी थी कि यह क़दम मत उठाओ काम्बली, वरना अनर्थ हो जाएगा, पर काम्बली के सर पे हीरो बनने का भूत सवार हो चुका था। नतीजा जल्द ही उन्हें मिल गया।

एक क्रिकेटर जो क्रिकेट से ज़्यादा अभिनय जगत में नाम कमाया, वो हैं सलिल अंकोला।सुन्दर कद-काठी और ख़ूबसूरत चेहरे के धनी सलिल क्रिकेट में ज़्यादा कामयाब नहीं हुए। मुम्बई से ताल्लुक रखने वाले सलिल को भारत के लिए खेलने का मौका तो मिला पर केवल एक टेस्ट मैच में और चन्द एक दिवसीय मैचों में। उनका प्रदर्शन उस स्तर का नहीं था कि नैशनल टीम में उनकी जगह पक्की हो जाती। वो उतने फ़ॉर्म में भी नहीं थे और ना ही उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया। इस बात को उन्होंने समझा और बजाय क्रिकेट में अपने आप को घसीटने के उन्होंने अभिनय जगत में क़दम रखने में अपनी भलाई समझी। हिन्दी की तीन फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया, ये फ़िल्में थीं ’कुरुक्षेत्र’, ’पिता’ और ’चुरा लिया है तुमने’। ये तीनों फ़िल्में ठीक-ठाक चली, पर हिन्दी फ़िल्मों में नायक का जो रूप होता है उसमें फ़िट ना बैठने की वजह से उन्होंने फ़िल्मों को भी अलविदा कर दिया, और रुख़ किया छोटे परदे यानि टेलीविज़न की ओर। और इस बार किस्मत ने उनका पूरा-पूरा साथ दिया। उनके अभिनय से सजे ’करम अपना अपना’, ’कोरा कागज़’, ’नफ़रत’ और ’खाकी’ जैसे धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुए और सलिल अंकोला पहुँच गए घर-घर में।

वर्तमान लोकप्रिय क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह जो ख़ुद एक ऑल-राउन्डर थे और जिन्होंने एक टेस्ट और छह एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय मैच खेले हैं, 70 और 80 के दशकों में पंजाबी फ़िल्मों से जुड़े। योगराज सिंह ने 30 से भी ज़्यादा पंजाबी तथा लगभग 10 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है। हाल ही में फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म ’भाग मिलखा भाग’ में उन्होंने मिलखा सिंह के कोच की भूमिका निभाई है। उनके अभिनय से सजी कुछ फ़िल्में हैं - बँटवारा, जट ते ज़मीन, जोर, जट दा, पगरी सम्भाल जट्टा, जिगरा जट दा, इंसाफ़ पंजाब दा, विछोरा, कब्ज़ा, पंचायत, वेस्ट इज़ वेस्ट, माहौल ठीक है, लव यू बॉबी, हीर ऐण्ड हीरो, रोमियो रांझा, बाज़ वगेरह। 80 के दशक में दो क्रिकेटर ऐसे थे जो एक ही फ़िल्म में बाक़ायदा अभिनय करते हुए नज़र आए। ये हैं संदीप पाटिल और सैयद किरमानी। संदीप जहाँ फ़िल्म के मुख्य नायक बनें, वहीं दूसरी ओर विकेट-कीपर किरमानी ने उसी फ़िल्म में खलनायक की भूमिका निभाई। फिल्म में किरमानी और संदीप पाटिल के बीच मारपीट का दृश्य भी था। यह फ़िल्म थी 1985 की ’कभी अजनबी थे’, जिसमें पूनम ढिल्लों और देबश्री रॉय अभिनेत्रियाँ थीं। यह फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई, पर फ़िल्म के गीतों ने कमाल ज़रूर किया। फ़िल्म का शीर्षक गीत "कभी अजनबी थे ज़मीं आसमाँ ये, तेरा हाथ थामा जो हुए मेहरबाँ ये" बहुत लोकप्रिय हुआ था और कई वर्षों तक रेडियो के अनुरोध गीतों के कार्यक्रमों में बजता रहा। अन्य गीतों में "दिल की इस दहलीज़ तक", "गीत मेरे होठों को दे गया कोई" भी लोकप्रिय हुए थे और ये सभी कर्णप्रिय गीत हैं।

हिन्दी फ़िल्मों में बाक़ायदा नायक की भूमिका में अभिनय करने वाले क्रिकेटरों में एक नाम है पाक़िस्तानी क्रिकेटर मोहसिन ख़ान का। मशहूर शुरुआती बल्लेबाज़ मोहसिन ख़ान पाक़िस्तानी क्रिकेट के महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में से एक रहे। पर अपने क्रिकेट करीअर की चोटी पर रहते समय ही मोहसिन आकृष्ट हुए फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक की ओर, और अपने क्रिकेट करीअर को दाँव पर लगा दिया। फ़िल्मों में उनका पदार्पण हुआ जे. पी. दत्ता की 1987 की फ़िल्म ’बँटवारा’ में। आगे चलकर 90 के दशक में उन्होंने कुछ और फ़िल्में की जैसे कि ’साथी’, ’फ़तेह’ और ’मैडम एक्स’। फ़िल्म ’साथी’ के गाने बहुत मशहूर थे जैसे कि "आज हम तुम ओ सनम मिल के यह वादा करे", "हुई आँख नम और यह दिल मुस्कुराया", पर फ़िल्म असफल ही रही। इन तमाम फ़िल्मों के ना चलने से मोहसिन ख़ान को भी कोई बड़ा मौका नसीब नहीं हुआ, और क्रिकेट के साथ साथ फ़िल्मों का सफ़र भी उनका समाप्त हो गया। अभिनेत्री रीना रॉय के साथ मोहसिन ख़ान का प्रेम-संबंध हुआ, दोनों ने विवाह कर लिया, पर दुर्भाग्यवश आगे चलकर दोनों अलग भी हो गए एक दूसरे से।

प्रसिद्ध गेंदबाज़ बिशन सिंह बेदी के पुत्र अंगद बेदी भी क्रिकेट के मैदान में उतरे, पर अपने पिता की तरह वो एक कामयाब क्रिकेटर नहीं बन सके। उन्होंने दिल्ली के लिए कई मैच खेले, पर राष्ट्रीय टीम में उनका सीलेक्शन कभी नहीं हो पाया। जब उन्हें यह लगा कि क्रिकेट में ऊँचे मकाम तक पहुँच पाना उनके लिए अब संभव नहीं, अंगद ने रुख़ किया मॉडेलिंग् की तरफ़। अच्छे कद-काठी और आकर्षक चेहरे के धनी अंगद को मॉडेलिंग् की दुनिया ने अपने पास बुला लिया। रैम्प शोज़ और कई विज्ञापनों में काम करने के बाद उन्हें टेलीविज़न में ब्रेक मिला ’कूक ना कहो’ और ’ईमोशनल अत्याचार’ जैसे लोकप्रिय शोज़ के होस्ट बनने का। फ़िल्मी परदे पर उनका पदार्पण हुआ फ़िल्म ’फ़ालतू’ में, जिसमें उनका अभिनय सराहा गया। हाल की फ़िल्म ’उंगली’ में भी अंगद अभिनय करते दिखे गए। आने वाले समय में अंगद और फ़िल्मों में नज़र आएँगे और अपने अभिनय का जादू चलाएँगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

अंगद बेदी की तरह एक और क्रिकेटर जो रणजी क्रिकेट में उत्तर प्रदेश के लिए कई मैच खेले, पर आगे चलकर मॉडलिंग् और अभिनय की दुनिया से जुड़ गए, वो हैं सजिल खण्डेलवाल। सजिल के पिता चाहते थे कि वो एक बहुत बड़ा क्रिकेटर बने। सजिल उसी राह पर चल भी निकले थे और क्रिकेट में कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते भी जा रहे थे। पर उनके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर सजिल का मन क्रिकेट से भर गया। उनके पिता के चले जाने के बाद जैसे वो सारा प्रोत्साहन ही ख़त्म हो गया, और क्रिकेट के प्रति उनका लगाव भी यकायक ख़त्म हो गया। मॉडेलिंग जगत में सजिल ने बहुत काम किया है और उनके अभिनय से सजी एक फ़िल्म भी बनी है ’Confessions of a Rapist' जो सेन्सर बोर्ड के सर्टिफ़िकेशन की अपेक्षा कर रही है। सजिल खण्डेलवाल से विस्तारित बातचीत ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मासिक स्तम्भ ’बातों बातों में’ में कुछ महीने पहले प्रकाशित हुई थी जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

और अब ज़िक्र कुछ ऐसे क्रिकेटरों और उनकी फ़िल्मों की जिनमें वो किसी अन्य चरित्र को नहीं बल्कि अपने आप के रूप में नज़र आए, यानी कि 'as self'। विश्वकप विजयी कप्तान कपिल देव भी कई बार फ़िल्मों में नज़र आये हैं, पर औरों की तरह वो फ़िल्मी चरित्र के रूप में ना आकर अपनी ख़ुद की भूमिका, अर्थात् कपिल देव की भूमिका में ही रूपहले परदे पर उतरे। ’Stumped', 'इक़बाल’, ’आर्यन’, ’चेन कुली कि मेन कुली’ जैसी फ़िल्मों में कपिल देव दिखे गए। राहुल बोस अभिनीत ’चेन कुली कि मेन कुली’ में तो कहानी का अधिकांश भाग कपिल देव की प्रसिद्ध वर्ल्ड-कप विनिंग् बैट के इर्द-गिर्द घूमती है। साजिद नडियाडवाला की फ़िल्म ’मुझसे शादी करोगी’ के क्लाइमैक्स शॉट में कपिल देव और नवजोत सिंह सिद्धु सहित कई भारतीय क्रिकेटर नज़र आए जैसे कि इरफ़ान पठान, हरभजन सिंह, पार्थिव पटेल, मोहम्मद कैफ़, जवगल श्रीनाथ और आशिष नेहरा। हरमन बवेजा अभिनीत फ़िल्म ’विक्ट्री’ में आर. पी. सिंह, प्रवीण कुमार, दिनेश कार्तिक तो नज़र आए ही, साथ में कई ऑस्ट्रेलियन क्रिकेटर भी दिखे जैसे कि ब्रेट ली, ब्रैड हॉग, स्टुआर्ट क्लार्क, सायमन कैटिच।





खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

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