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मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने.. दिल पर पत्थर रखकर खुद को तोड़ रहे हैं साहिर और तलत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८९

"सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं?" - मुमकिन है कि आपने यह पंक्ति पढी या सुनी ना हो, लेकिन इस पंक्ति के इर्द-गिर्द जो नज़्म बुनी गई थी, उससे नावाकिफ़ होने का तो कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। यह वही नज़्म है, जिसने लोगों को गुरूदत्त की अदायगी के दर्शन करवाएँ, जिसने बर्मन दा के संगीत को अमर कर दिया, जिसने एक शायर की मजबूरियों का हवाला देकर लोगों की आँखों में आँसू तक उतरवा दिए और जिसने बड़े हीं सीधे-सपाट शब्दों में "चकला-घरों" की हक़ीकत बयान कर मुल्क की सच्चाई पर पड़े लाखों पर्दों को नेस्तनाबूत कर दिया... अभी तक अगर आपको इस नज़्म की याद न आई हो तो जरा इस पंक्ति पर गौर फरमा लें- "जिसे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?" पूरी की पूरी नज़्म वही है, बस एक पंक्ति बदली गई है और वो भी इसलिए क्योंकि फिल्म और साहित्य में थोड़ा फर्क होता है.. फिल्म में हमें अपनी बात खुलकर रखनी होती है। जहाँ तक मतलब का सवाल है तो "सना-ख़्वाने..." में पूरे पूरब का जिक्र है, वहीं "जिसे नाज़ है..." में अपने "हिन्दुस्तान" का बस। लेकिन इससे लफ़्ज़ों में छुपा दर्द घट नहीं जाता.... और इस दर्द को उकेरने वाला शायर तब भी घावों की उतनी हीं गहरी कालकोठरी में जब्त रहता है। इस शायर के बारे में और क्या कहना जबकि इसने खुद कहा है कि "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?" ... जिसे दुनिया का मोह नहीं ,उससे ज़ीस्त और मौत के सवाल-जवाब करने से क्या लाभ! इस शायर को तो अपने होने का भी कोई दंभ, कोई घमंड, कोई अना नहीं है.. वो तो सरे-आम कहता है "मैं पल-दो पल का शायर हूँ..... मुझसे पहले कितने शायर आए और आ कर चले गए....

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले ।
कल कोई मुझ को याद करे, क्यों कोई मुझ को याद करे
मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बरबाद करे ॥


इस शायर से मेरा लगाव क्या है, यह मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मुझे लिखने का शौक़ है और आज-कल थोड़े गाने भी लिख लेता हूँ... गाना लिखने वालों के बारे में लोग यही ख्याल पालते हैं (लोग क्या... खुद गीतकार भी यही मानते हैं) कि गानों में मतलब का कुछ लिखने के लिए ज्यादा स्कोप, ज्यादा मौके नहीं होते.. लेकिन जब भी मैं इन शायर को पढता हूँ तो मुझे ये सारे ख्याल बस बहाने हीं लगते हैं... लगता है कि कोई अपनी लेखनी से बोझ हटाने के लिए दूसरों के सर पर झूठ का पुलिंदा डाल रहा है। अब अगर कोई शायर अपने गाने में यह तक लिख दे कि

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


और लोग उसके कहे हरेक लफ़्ज़ को तहे-दिल से स्वीकार कर लें तो इससे यह साबित हो जाता है कि मतलब का लिखने के लिए मौकों की जरूरत नहीं होती बल्कि यह कहिए कि बेमतलब लिखने के लिए मौके निकालने होते हैं। यह शायर मौके नहीं ढूँढता, बल्कि आपको मौके देता है अपनी अलसाई-सी दुनिया में ताकने का.. उसे निखरने का, उसे निखारने का। आप पशेमान होते हो तो आपसे कहता है

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले


ना मुंह छिपा के जियो और ना सर झुका के जियो
गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो ।


फिर आप संभल जाते हो... लेकिन अगले हीं पल आप इस बात का रोना रोते हो कि आपको वह प्यार नहीं मिला जिसके आप हक़दार थे। यह आपको समझाता है, आप फिर भी नहीं समझते तो ये आपके हीं सुर में सुर मिला लेता है ताकि आपके ग़मों को मलहम मिल सके

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला ?
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला ॥


आपको प्यार हासिल होता है, लेकिन आप "बेवफ़ाईयो" का शिकार हो जाते हैं। आपको उदासियों के गर्त्त में धँसता देख यह आपको ज़िंदगी के पाठ पढा जाता है:

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥


इतना सब करने के बावजूद यह आपसे अपना हक़ नहीं माँगता.. यह नहीं कहता कि मैंने तुम्हें अपनी शायरी के हज़ार शेर दिए, तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी के लाखों लम्हें नसीब कराए... यह तो उल्टे सारा श्रेय आपको हीं दे डालता है:

दुनिया ने तजुर्बातो हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं


यह शायर, जिसके एक-एक हर्फ़ में तसव्वुरात की परछाईयाँ उभरती हैं.. अपने चाहने वालों के बीच "साहिर" के नाम से जाना जाता है। इनके बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए हम "विकिपीडिया" और "प्रकाश पंडित" के दरवाजे खटखटाते हैं।

साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी साहिर है। उनका जन्म ८ मार्च १९२१ में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। माता के अतिरिक्त उनके पिता की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। मगर अभी वे बच्चा हीं थे कि पति की ऐय्याशियों से तंग आकर उनकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उनके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और उन्हें गरीबी में गुजर करना पड़ा। साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् १९३९ में जब वे गव्हर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता उनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।

सन् १९४३ में साहिर लाहौर आ गये और उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली कविता संग्रह ’तल्खियाँ’ छपवायी। सन् १९४५ में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक बने। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक बने और इस पत्रिका में उनकी किसी रचना को सरकार के विरुद्ध समझे जाने के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ वारण्ट जारी कर दिया। १९४९ में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे बंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक बने। फिल्म आजादी की राह पर (१९४९) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान, जिसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे, के लिये लिखे गीतों से मिली।

शायर की हैसियत से ‘साहिर’ ने उस समय आँख खोली जब ‘इक़बाल’ और ‘जोश’ के बाद ‘फ़िराक़’, ‘फ़ैज़’, ‘मज़ाज़’ आदि के नग़्मों से न केवल लोग परिचित हो चुके थे बल्कि शायरी के मैदान में उनकी तूती बोलती थी। कोई भी नया शायर अपने इन सिद्धहस्त समकालीनों से प्रभावित हुए बिना न रह सकता था। अतएव ‘साहिर’ पर भी ‘मजाज़’ और ’फ़ैंज़’ का ख़ासा प्रभाव पड़ा। लेकिन उनका व्यक्तिगत अनुभव जो कि उनके पिता और उनकी प्रेमिका के पिता के प्रति घृणा और विद्रोह की भावनाओं से ओत-प्रोत था, उनके लिए कामगर साबित हुआ। लोगों ने देखा कि फ़ैज़’ या ‘मजाज़’ का अनुकरण करने के बजाय ‘साहिर’ की रचनाओं पर उसके व्यक्तिगत अनुभवों की छाप है और उसका अपना एक अलग रंग भी है।

‘साहिर’ मौलिक रूप से रोमाण्टिक शायर है। प्रेम की असफलता ने उसके दिलो-दिमाग़ पर इतनी कड़ी चोट लगाई कि जीवन की अन्य चिन्ताएँ पीछे जा पड़ी। बस एक प्रेम की बात हो तो कोई सह भी ले, लेकिन उन्हें तो जीवन में दो प्रेम असफलता मिली - पहला कॉलेज के दिनों में अमृता प्रीतम के साथ और दूसरी सुधा मल्होत्रा से। वे आजीवन अविवाहित रहे तथा उनसठ वर्ष की उम्र में २५ अक्टूबर १९८० को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया ।

’साहिर’ की ग़ज़लें बहुत कुछ ऐसा कह जाती हैं, जिसे आप अपनी आँखों में रोककर रखे होते हैं.. न चाहते हुए भी, मन मसोसकर आप उन जज्बातों को पीते रहते हैं। आपको बस एक ऐसे आधार की जरूरत होती है, जहाँ आप अपने मनोभावों को टिका सकें। यकीन मानिए.. बस इसी कारण से, बस यही उद्देश्य लेकर हम आज की गज़ल के साथ हाज़िर हुए हैं। ’साहिर’ के लफ़्ज़ और क्या करने में सक्षम हैं, यह तो आपको गज़ल सुनने के बाद हीं मालूम पड़ेगा.... सोने पे सुहागा यह है कि आपके अंदर घर कर बैठी कड़वाहटों को मिटाने के लिए "तलत महमूद" साहब की आवाज़ की "मिश्री" भी मौजूद है। तो देर किस बात की... पेश-ए-खिदमत है आज की गज़ल:

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ये दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने

तुझे अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ घड़ियाँ तेरे ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैंने

बस अब तो मेरा _____ छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सितम" और शेर कुछ यूँ था-

भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है

पिछली महफ़िल की शान बने "नीरज रोहिल्ला" जी। एक-एक करके महफ़िल में और भी कई सारे मेहमान (मेरे हिसाब से तो आप स्ब घर के हीं है.. मेहमान कहकर मैं महफ़िल की रस्म-अदायगी कर रहा हूँ..बस) शामिल हुए। जहाँ शन्नो जी ने हमारी गलती सुधारी वहीं सुमित जी हर बार की तरह बाद में आऊँगा कहकर निकल लिए। जहाँ सीमा जी ने पहली मर्तबा अपने शेरों के अलावा कुछ शब्द कहे (भले हीं उन शेरों का मतलब बताने के लिए उन्हें अतिरिक्त शब्द महफ़िल पर डालने पड़े, लेकिन उनकी तरफ़ से कुछ अलग पढकर सुखद आश्चर्य हुआ :) ) ,वहीं अवनींद्र जी के शेर अबाध गति से दौड़ते रहें। मंजु जी और नीलम जी ने महफ़िल के अंतिम दो शेर कहे... इन दोनों में एक समानता यह थी कि जहाँ मंजु जी अपनी हीं धुन में मग्न थीं तो वहीं नीलम जी शन्नो जी की धुन में।

इस तरह से एक सप्ताह तक हमारी महफ़िल रंग-बिरंगे लोगों से सजती-संवरती रही। इस दरम्यान ये सारे शेर पेश किए गए:

दुनिया के सितम याद ना अपनी हि वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद । (जिगर मुरादाबादी)

तकदीर के सितम सहते जिन्दगी गुजर जाती है
ना हम उसे रास आते हैं ना वो हमें रास आती है. (शन्नो जी)

तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश, जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़, तो सितम क्या है? (ग़ालिब)

भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ (फ़िराक़ गोरखपुरी)

कितनी शिद्दत से ढाये थे सितम उसने
अब मैं रोया तो ये इश्क मैं रुसवाई है (अवनींद्र जी)

फूल से दिल पे उसका ये सितम देखो
तोड़ के अपनी किताबों मैं सजाया उसने (अवनींद्र जी)

शफा देता है ज़ख्मो को तुम्हारा मरहमी लहजा ,
मगर दिल को सताते हैं वो सितम भी तुम्हारे हैं (अवनींद्र जी)

जिंदगी को याद आ रहे तेरे सितम ,
धड़कने भुलाने की दे रही हैं कसम . (मंजु जी)

सितम ये है कि उनके ग़म नहीं,
ग़म ये है कि उनके हम नहीं (नीलम जी)

और अब एक महत्वपूर्ण सूचना:

हम टिप्पणियों पे नियंत्रण (टिप्पणियों का "मोडरेशन") नहीं करना चाहते, इसलिए हम आपसे अपील करते हैं कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर शायराना माहौल बनाए रखने में हमारी मदद करें। दर-असल कुछ कड़ियों से महफ़िल पे ऐसी भी टिप्पणियाँ आ रही हैं, जिनका इस आलेख से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें पढकर लगता है कि लिखने वाले ने बिना ग़ज़ल सुने, बिना आलेख पढे हीं अपनी बातें कह दी हैं। हमारे कुछ मित्रों ने महफ़िल की इस बिगड़ी स्थिति पर आपत्ति व्यक्त की है। इसलिए हम आप सबसे यह दरख्वास्त करते हैं कि अपनी टिप्पणियों को यथा-संभव इस आलेख/गज़ल/शायर/संगीतकार/गुलूकार/शेर तक हीं सीमित रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप टिप्पणी देना या फिर महफ़िल में आना हीं बंद कर दें.. तब तो दूसरे मित्र आराम से जान जाएँगे कि हम किनकी बात कर रहे थे :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Comments

shanno said…
गजल का गायब वाला शब्द है : दामन
आलेख पढ़ा और पढ़कर अच्छा लगा साथ में ऐसा भी महसूस हुआ की जैसे इन शेरों व गजल को लिखने वाला शायर खुद की हालत को तो बयां करता ही है साथ में उसकी स्थिति को बयां करने वाला भी प्रभावित हो जाता है और कुछ पाठक / पाठकों को भी उसमे लपेट कर हाट और कोल्ड वाटर में डुबो देता है...कहने का तात्पर्य है कि शायर के माध्यम से कुछ लोगों को इमोशनल टार्चर दे रहा हो...क्यों..क्यों..लेकिन फिर सोचना पड़ता है कि हर शायर की जुबां से अधिकतर दर्द ही तो निकलता है और हम सब उसके दर्द को ही तो शायरी के रूप में पीने आते हैं यहाँ...इसी बात पर शेर लिखने को मन किया...तो लीजिये पेश-ए-खिदमत करती हूँ यहाँ दो शेर :

वो शायर क्या जिसके दामन में दर्द न हो
वो आशिक ही क्या जो कभी बेदर्द न हो.

जुल्म सहने की भी कोई इन्तहां होती है
शिकायतों से अपनी कोई दामन भर गया.

( स्वरचित ) -शन्नो
sumit said…
शन्नो जी ऐसा जरूरी नही हर शायर की कलम से दर्द ही निकले लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ ज्यादातर शायरो की पहली रचना दर्द से ही शुरू होती होगी...

अब कुछ महफिल की बात हो जाए, गजल सुनी और गजल अच्छी लगी
गायब शब्द दामन है
आसुओ से ही सही भर गया दामन मेरा,
हाथ तो मैने उठाये थे दुआ किसकी थी

शायर का नाम याद नही
sumit said…
शन्नो जी ऐसा जरूरी नही हर शायर की कलम से दर्द ही निकले लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ ज्यादातर शायरो की पहली रचना दर्द से ही शुरू होती होगी...

अब कुछ महफिल की बात हो जाए, गजल सुनी और गजल अच्छी लगी
गायब शब्द दामन है
आसुओ से ही सही भर गया दामन मेरा,
हाथ तो मैने उठाये थे दुआ किसकी थी

शायर का नाम याद नही
sumit said…
फिर मिलते है, तब तक के लिए

bbye......
अगर नसीब में मेरे तुम्हारा साथ नही
तो कोई बात नही,तो कोई बात नही ।
मेरे दामन तेरे प्यार की सौगात नहीं
तो कोई बात नही,तो कोई बात नही ।
(स्वरचित)
AVADH said…
काँटों में खिले हैं फूल हमारे रंग भरे अरमानों के
नादान हैं जो इन काँटों से दामन को बचाए जाते हैं.
शब्द: शैलेन्द्र
अवध लाल
AVADH said…
तनहा साहेब,
साहिर के दर्द के रिश्ते को आपने बहुत सही पहचाना है.
अपने खुद के बारे में वोह कह गए हैं:
जाने वोह कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला.
हमने तो जब कलियाँ मांगी काँटों का हार मिला.
खुशियों की मंजिल ढूंढी तो गम की गर्द मिली
चाहत के नगमे मांगे तो आहें सर्द मिलीं
दिल के दर्द को दूना कर गया जो गमखार मिला
अवध लाल
shanno said…
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shanno said…
एक नज़्म पेश है :
सितारों के नीचे फैला रात का दामन
चाँद से भी शायद हुई है कुछ अनबन
लम्हा-लम्हा कर आंसुओं में भीगकर
गीला-गीला कहीं खो गया उसका मन .

( स्वरचित ) - शन्नो
avenindra said…
विश्वजी अच्छी सी ग़ज़ल के लिए अच्चा सा धन्यवाद मैंने पहली बार सुनी या पढ़ी है ये ! शंनोजी ये बात सही है की शायर जो दर्द से न गुजरा हो तो वो मुकम्मल शायर नहीं हो सकता जिस तरह किसी इंसान ने हमेशा सुख देखा हो वो पूरी तरह इंसानियत की बातें नहीं कर सकता क्यूंकि दुःख के बिना सुख का धरातल नहीं जब अँधेरा ही नहीं होगा तो रौशनी की परिभाषा ही नहीं हो सकती
ये सब थी आपकी पढ़ी पढाई बातें असल मुद्दे पे आते हैं ! नहीं तो विश्व जी वैसे ही नाराज़ हैं शेर अर्ज़ है
अपने ही दामन मैं लिपटा सोचता हूँ
आसमाँ पे कुछ नए गम खोजता हूँ
हर सुबह उठता हूँ नयी उम्मीद लेकर
हर रात की बांहों में मैं दम तोड़ता हूँ
पास से उठती हुई बदबू के लिए
खुशबुओं की पौध घर मैं रोपता हूँ (स्वरचित )
Manju Gupta said…
This post has been removed by the author.
Manju Gupta said…
जवाब - दामन

तेरे आने से खुशियों का दामन चहक रहा ,
जाने की बात से दिल का आंगन छलक रहा .

(स्वरचित )
avenindra said…
 मेरे जेहन ने सम्हाल रखे हैं मेरी रूह के टुकड़े
वेरना ये साथ रिश्तों के दफ़न हो गए होते
मेरे  ख्वाबों  के दामन पे दाग लग चुके बहुत
वर्ना ये  अजीजों का कफ़न हो गए होते  .....!
अवनींद्र
Ashish said…
सही शब्द है दामन

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला ||

------हरिवंश राय बच्चन

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं

------सुदर्शन फ़ाकिर

अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

------क़तील शिफ़ाई

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह

------क़तील शिफ़ाई


--आशीष श्रीवास्तव
shanno said…
यादों की लगी महफ़िल में दिल है गुमशुदा
उदासी ने तेरा दामन न छोड़ा है अभी तक
यूँ इस तरह जिन्दगी जीने का सबब क्या
तनहाइयों ने चेहरा ना मोड़ा है अभी तक.

( स्वरचित ) - शन्नो
neelam said…
शफ़क़,धनुक ,महताब ,घटाएं ,तारें ,नगमे बिजली फूल
उस दामन में क्या -क्या कुछ है,वो दामन हाथ में आये तो

gabaar ne phir se daaka dala hai ,khud likhne ki koi fursat nahi mil rahi hai
shanno said…
achcha kiya Neelam ji...mast raho ghoomne me...ab main chalti hoon..mehfil mein ab kisi ko jyada nahin bolne ka..ssshhhh..naye rule bane hain..padhiye unhen, please...my lips are sealed now...
bye..bye..
avenindra said…
माँ के दामन का सुख अगली पीढ़ी नहीं ले पायेगी
क्यूंकि जींस पहनने वाली माँ दामन कहाँ से लाएगी

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