Saturday, April 16, 2016

"कई सदियों से, कई जनमों से...", केवल 24 घण्टे के अन्दर लिख, स्वरबद्ध और रेकॉर्ड होकर पहुँचा था सेट पर यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 80
 

'कई सदियों से, कई जनमों से...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 80-वीं कड़ी में आज जानिए 1972 की फ़िल्म ’मिलाप’ के मशहूर गीत "कई सदियों से कई जनमों से..." के बारे में जिसे मुकेश ने गाया था। बोल नक्श ल्यायलपुरी के और संगीत बृजभूषण का। 
  

लेखक, निर्देशक बी. आर. इशारा और गीतकार/शायर नक्श ल्यायलपुरी की कहानी। दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।
B R Ishara
दोनों ने पहली बार साथ काम किया 1970 की फ़िल्म ’चेतना’ में। इस फ़िल्म में नक्श साहब के लिखे दोनों गीत बहुत ही पसन्द किए गए। "जीवन है एक भूल सजनवा बिन तेरे..." और "मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा..."। इन गीतों का बी. आर. इशारा पर ऐसा असर पड़ा कि नक्श ल्यायलपुरी हमेशा के लिए उनके पसन्दीदा गीतकार बन गए। इशारा साहब को नक्श साहब के लिखे गीतों पर इतना भरोसा था कि वो उनके लिखे गीतों को अनुमोदित करना भी ज़रूरी नहीं समझते थे, एक बार देखना भी ज़रूरी नहीं समझते थे। नक्श ल्यायलपुरी ने गीत लिख दिया, रेकॉर्ड कर लो, ऐसा रवैया होता था उनका। ऐसे ही एक क़िस्से का उल्लेख इस अंक में हम कर रहे हैं आज, जिसे नक्श साहब ने अपनी एक साक्षात्कार में बताया था। बात 1972 की है, बी. आर. इशारा फ़िल्म ’मिलाप’ की शूटिंग् के लिए आउटडोर पे थे। इस फ़िल्म में शत्रुघन सिन्हा और डैनी डेंगज़ोंगपा मुख्य भूमिकाओं में थे। इस फ़िल्म के लिए कुल चार गीत रेकॉर्ड होने थे। उन दिनों फ़िल्म का चौथा गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड हो रहा था और बी. आर. इशारा बैंगलोर में शूटिंग् कर रहे थे। हुआ यूं कि एक दिन अचानक बी. आर. इशारा ने नक्श साहब को फ़ोन किया और एक गाने की सिचुएशन समझाते हुए बोले कि मैं यह गाना शत्रुघन सिन्हा पर दो बार फ़िल्माना चाहता हूँ - एक बार मुकेश की आवाज़ में और एक बार मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। फ़िल्म में शत्रुघन सिन्हा के दो रोल हैं, एक रोल के लिए रफ़ी साहब तो गा ही रहे हैं, दूसरे रोल के लिए मुकेश जी का गाया एक गाना चाहिए और यही गाना रफ़ी साहब की आवाज़ में भी चाहिए क्योंकि दोनों रोल पर फ़िल्माना चाहता हूँ इसे। मगर मुश्किल यह है कि शत्रुघन मेरे पास अगले चार दिन तक ही है। अगर तुम यह गाना कल रात तक लिख कर, कम्पोज़ करवा कर और रेकॉर्डिंग् करवा कर भेज सको तो कमाल हो जाएगा! नक्श साहब ने यह ज़िम्मेदारी चुनौती के रूप में स्वीकार कर ली।

गीत के संगीतकार बृजभूषण जी ने नक्श साहब को यह सुझाव दिया कि क्योंकि मुकेश जी हाल ही में दिल के
Naqsh Lyallpuri
दौरे से गुज़रे हैं, इसलिए कोई ऐसा गीत हम न बनाएँ जिसे गाते हुए उन्हें तकलीफ़ हो, उनके दिल पर ज़ोर पड़े। नक्श साह्ब को यह बात बहुत अच्छी लगी और उन्होंने बहुत छोटे छोटे शब्दों का प्रयोग इस गीत में किया। गीत तो फ़टाफ़ट लिख दिया, मगर असली दिक्कत थी उसका संगीत तैयार करना, और मुकेश और रफ़ी से रेकॉर्डिंग् करवाना। नक्श ने सबसे पहले रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में बात की, अगले दिन शाम की डेट मिल गई। उसके बाद रफ़ी और मुकेश जी से भी संयोग से समय मिल गया। अब उन्होंने फ़टाफ़ट संगीतकार बृजभूशण के साथ बैठ कर गाने का संगीत तैयार किया, और अगले दिन सही समय पर दोनों गायकों की आवाज़ों में गाने को रेकॉर्ड करवा कर बी. आर. इशारा को भेज दिया। हालाँकि बाद में मुकेश द्वारा गाया गीत ही फ़िल्म में रखा गया। तो इस तरह से 24 घण्टे के अन्दर एक गीत लिखा गया, म्युज़िक कम्पोज़ किया गया, रेकॉर्ड किया गया और फ़िल्म के निर्देशक बी. आर. इशारा को भेज दिया गया अगले दिन फ़िल्मांकन के लिए। इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद इस 24 घण्टे के अन्दर तैयार हुआ गीत लोगों को बहुत पसन्द आया और हिट हो गया। यह गीत था "कई सदियों से, कई जनमों से, तेरे प्यार को तरसे मेरा मन, आजा, आजा कि अधुरा है अपना मिलन..."। यह एक हौन्टिंग् गीत है और मुकेश की आवाज़ में यह गीत जैसे रोंगटे खड़े कर देता है। मुकेश जी की नैज़ल अन्दाज़ की वजह से "सदियों", "जनमों", "मन", "मिलन" जैसे शब्दों को जिस तरह का अंजाम मिला है, उससे गीत में और ज़्यादा निखार आ गया है। इससे पहले भी एक गीत मुकेश और रफ़ी साहब, दोनों की आवाज़ों में रेकॉर्ड हुआ था। वह गीत था  पर सरदार मलिक के संगीत निर्देशन में चर्चित फ़िल्म ’सारंगा’ का शीर्षक गीत "सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन..."। दोनों ही संस्करण इतने अच्छे हैं कि बताना मुश्किल कि कौन किससे बेहतर हैं।

और अब इसी गीत के संदर्भ में एक और क़िस्सा। नक्श साहब के ही शब्दों में (सूत्र: उजाले उनकी यादों के, बस इतनी सी थी इस गीत की कहानी।
Mukesh
"मुझे एक क़िस्सा याद है। मैं उन दिनों मुलुंड में रहता था। वहाँ मुकेश का एक प्रोग्राम आयोजित हुआ। मुझे वहाँ लोग नहीं जानते थे। तो जैसे ही प्रोग्राम शुरू हुआ, मुकेश ने आयोजक से पूछा कि क्या आप जानते हैं कि आपके इस इलाके में भी एक शायर रहता है? आपने उन्हें निमंत्रित किया है प्रोग्राम में? आयोजक ने कहा ’नही”। जब मुकेश ने उनसे कहा कि क्या वो मुझे आमन्त्रित कर सकते हैं, तब आयोजक ने कुछ लोगों को तुरन्त मेरे घर भेज दिया। मैं उस समय रात का खाना खा रहा था। मैं तो डर गया रात को इतने सारे लोगों को देख कर। लेकिन जब उन्होंने पूरी बात बताई तो मेरी जान में जान आई और मैं उनके साथ गया। उस रात मुकेश जी ने पहले तीन गाने राज कपूर के गाए। और चौथा गीत शुरू करने से पहले यह कहा कि इस गीत को लिखने वाला शायर आप ही की बस्ती में रहता है। फिर उन्होंने मेरे दो गीत गाए, एक ’चेतना’ का और दूसरा ’मिलाप’ का।"
(विविध भारती) -



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आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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