Sunday, November 27, 2011

‘ए हो जन्मी है बिटिया हमार...’ कन्या-जन्म पर पारम्परिक सोहर का अभाव है

सुर संगम- 46 – संस्कार गीतों में अन्तरंग पारिवारिक सम्बन्धों की सोंधी सुगन्ध

संस्कार गीतों की नयी श्रृंखला - दूसरा भाग

‘सुर संगम’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब लोक-संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछले अंक से हमने संस्कार गीतों की श्रृंखला आरम्भ की है। प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार सम्पूर्ण मानव जीवन को १६ संस्कारों में बाँटा गया है। इन विशेष अवसरों पर विशेष लोक-धुनों में गीतों को गाने की परम्परा है। हमने पिछले अंक में जातकर्म संस्कार, अर्थात पुत्र-जन्म के मांगलिक अवसर पर गाये जाने ‘सोहर’ गीतों की चर्चा की थी। आज के अंक में हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव और रस का महत्त्व होता है। प्रत्येक अवसरों के लिए प्रकृतिक रूप से उपजी धुने शताब्दियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रहीं हैं। लोक-गीतकार इन धुनों में अपने बोली के शब्दों को समायोजित करके गाने लगता है। इन गीतों में सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों की बात होती है, इसी प्रकार सोहर गीतों में सास-बहू, ननद-भाभी और देवर-भाभी के नोक-झोक के रोचक प्रसंग होते हैं। उल्लास और संवेदनशीलता का भाव मुखर होता है। नवजात शिशु की तुलना राम, कृष्ण, लव-कुश आदि से की जाती है और पौराणिक प्रसंगों को लौकिक रूप दे दिया जाता है। मात्र लय पर आधारित, भावप्रधान गीतों में सोहर गीत सम्भवतः सबसे प्राचीन है। पुत्र-जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले सोहर में उल्लास और उत्साह का भाव होता है, किन्तु जन्म से पूर्व के गीतों में माँ और नवागत शिशु के प्रति मंगल-कामनाएँ की जाती हैं। अधिकतर गीतों में देवी-देवताओं की प्रार्थना भी की जाती है। अब हम आपको एक ऐसा सोहर सुनवाते हैं, जिसमे सन्तान-प्राप्ति के लिए माँ गंगा से प्रार्थना की गई है। इसे प्रस्तुत किया है, शास्त्रीय और लोक संगीत की विदुषी प्रो. कमला श्रीवास्तव ने-

सोहर : ‘गंगा जामुनवा के बीच तिवइया एक तप करें...’ स्वर - विदुषी कमला श्रीवास्तव



सोहर गीत चाहे किसी भी क्षेत्र का क्यों न हो, उसका भाव और मन्तव्य एक ही होता है। अन्तर केवल भाषा अथवा बोली में ही होता है। लगभग एक दशक पूर्व जब मैंने संस्कार गीतों का संकलन करना आरम्भ किया था, तब कुछ उल्लेखनीय तथ्य प्रकाश में आए थे। आज उनमें से कुछ तथ्य आपके साथ बाँटना चाहूँगा। ब्रज, कन्नौज, बुन्देलखण्ड, अवध और भोजपुरी क्षेत्रों के २०० से अधिक सोहर गीतों के संकलन में मुझे एक भी ऐसा सोहर नहीं मिला, जिसमें पुत्री के जन्म का उल्लेख हो अथवा पुत्री-जन्म पर प्रसन्नता व्यक्त किया गया हो। जिस देश की प्राचीन संस्कृति में नारी को ‘शक्ति-स्वरूपा’ देवी के रूप में पूजने की परम्परा हो, वहीं पुत्री-जन्म पर प्रसन्नता व्यक्त करने वाले लोकगीत का अभाव हो, यह आश्चर्य का विषय है। उन्ही दिनों लोकगीतों के विद्वान राधाबल्लभ चतुर्वेदी की पुस्तक ‘ऊँची अटरिया रंग भरी’ में एक बुन्देलखण्ड के सोहर की पंक्तियों पर मेरा ध्यान गया। वह पंक्तियाँ हैं- ‘धिया बिन कोख न सोहे, ललन बिन सोहर रे महाराज...’। आगे की पंक्तियों में केवल पुत्र-जन्म के उल्लास का ही वर्णन है। मैं आंशिक रूप से ही सन्तुष्ट हुआ कि कम से कम एक सोहर की मात्र एक पंक्ति में तो ‘धिया’ अर्थात पुत्री-जन्म को रेखांकित तो किया गया। एक बार प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव, लोकगीतों की एक कार्यशाला का निर्देशन कर रहीं थी। मैंने अपनी शंका उनके सम्मुख रखी। कमला दीदी ने मेरी बात को गम्भीरता से सुना और तत्काल पुत्री-जन्म पर एक सोहर रच कर कार्यशाला में शामिल महिलाओं को गायन के लिए प्रशिक्षित भी किया। पिछले एक दशक से अवधी लोकगीतों की प्रायः प्रत्येक मंच प्रस्तुतियों मे यह सोहर चर्चित हुआ है। संस्कार गीतों की प्रस्तुतियों में यदि कभी यह गीत शामिल नहीं होता तो श्रोता अनुरोध करने लगते हैं। आइए आपको अब हम पुत्री-जन्म के लिए प्रो. कमला श्रीवास्तव रचित वह सोहर सुनवाते हैं, जिसे पारम्परिक धुन में पिरोया गया है।

सोहर : ‘ए हो जन्मी है बिटिया हमार, सहेलिया मंगल गाओ...’ : रचना - विदुषी कमला श्रीवास्तव


अनेक फिल्म-संगीतकारों ने लोक संगीत का प्रयोग अपनी फिल्मों में किया है। इन संगीतकारों में एक थे चित्रगुप्त। उन्होने भोजपुरी फिल्म ‘सजनवाँ बैरी भइलें हमार’ में एक सोहर गीत शामिल किया था, जिसे अलका याज्ञिक और उदित नारायण ने स्वर दिया है। बाल्मीकि आश्रम में सीता जी ने दो जुड़वा पुत्रों, लव-कुश को जन्म दिया है। फिल्म में यह सोहर गीत इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया है। आइए सुनते हैं, यह फिल्मी सोहर-

सोहर : फिल्म - सजनवाँ बैरी भइलें हमार : ‘धन धन भाग ललनवाँ..’ : स्वर - अलका याज्ञिक और उदित नारायण


इसी के साथ संस्कार गीतों के अन्तर्गत आने वाले सोहर गीतों को इस अंक से विराम देते हैं। अगले अंक में हम आपसे एक अन्य प्रकार के संस्कार गीत पर चर्चा करेंगे।

और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अन्दर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 46 की पहेली : भारतीय समाज के वे कौन से संस्कार हैं, जिनमें बालक के सिर के बालों का मुंडन कर दिया जाता है? उन संस्कारों का नाम बताइए। नाम की सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे ५ अंक।

पिछ्ली पहेली का परिणाम - सुर संगम के ४५वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर है- अलका याज्ञिक। और इस पहेली का सही उत्तर फिर एक बार क्षिति जी ने दिया है। बहुत-बहुत बधाई!

अब समय आ चला है, आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। परन्तु संस्कार गीतों पर यह चर्चा हम ‘सुर संगम’ के अगले अंक में भी जारी रखेंगे। अगले रविवार को हम पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं। आप अपने विचार और सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६-३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की सूजोय जी द्वारा सजायी गई महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!




आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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