शुक्रवार, 30 जून 2017

गीत अतीत 19 || हर गीत की एक कहानी होती है || ओ रे कहारों || बेगम जान || कल्पना पटोवरी

Geet Ateet 19
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
O Re Kaharo
Begum Jaan
(Kausar Munir, Anu Malik)
Kalpana Patowary- Singer


"यूँ  तो मैंने ३० भाषाओं के गीत गाये हैं, और लगभग हर जोनर में गाया है, फिर भी जो आसाम की कल्पना है,जो भोजपुरी गायिका कल्पना है उसे तलाश रहती है कि बॉलीवुड में कुछ ऐसे गीत मिले गाने को जिसमें हमारी अपनी संस्कृति की महक हो...." -    कल्पना पटोवरी 
जानिए कि कैसे एम् टीवी पर गाये एक खड़ी बिरहा गीत की बदौलत गायिका कल्पना को मिला बेगम जान का ये क्लास्सिक गीत, कौसर मुनीर ने है इसे लिखा और स्वरबद्ध किया है अनु मालिक ने, सुनिए कल्पना पटोवरी से "ओ रे कहारों" गीत की कहानी... प्ले पर क्लिक करे और सुनें ....




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

मंगलवार, 27 जून 2017

भीष्म साहनी की "दो गौरय्या"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई के व्यंग्य "देशभक्ति की पॉलिश" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं भीष्म साहनी की कथा "दो गौरय्या", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 12 मिनट 18 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

भीष्म साहनी (1915-2003)

हर शुक्रवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं।"
(भीष्म साहनी की "दो गौरय्या" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें।
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
दो गौरय्या MP3

#Twelfth Story, Do Gaurayya: Bhisham Sahani/Hindi Audio Book/2017/12. Voice: Archana Chaoji

रविवार, 25 जून 2017

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 323 : RAG KAMOD




स्वरगोष्ठी – 323 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 9 : राग कामोद

रोशन की जन्मशती वर्ष में मिश्र बन्धुओं और लता मंगेशकर से कामोद की बन्दिश सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की नौवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हमने 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘चित्रलेखा’ का एक खयालनुमा गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग कामोद में निबद्ध किया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में एक खयाल पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
रोशन ने अपनी कई फिल्मों में रागों की बन्दिशों को फिल्मी गीत के रूप में शामिल किया था। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश आपके लिए प्रस्तुत कर चुके हैं। आज की कड़ी में भी हम आपको रोशन द्वारा चुनी गई राग कामोद की बन्दिश का रसास्वादन करा रहे हैं। यह राग कामोद की एक परंपरागत बन्दिश है, उसका उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। फिल्म ‘चित्रलेखा’ के गीतों में लोकप्रियता के साथ-साथ रचनात्मकता का गुण भी उपस्थित है। फिल्म में रोशन के स्वरबद्ध किये कई लाजवाब गीत हैं। साहिर लुधियानवी और रोशन की जोड़ी ने -“संसार से भागे फिरते हो, भगवान को तुम क्या पाओगे...” सुन कर यह कहना कठिन है कि साहिर लुधियानवी के शब्द प्रभावी हैं या रोशन की धुन। मुहम्मद रफी की आवाज़ में राग यमन कल्याण पर आधारित गीत –“मन रे तू काहे न धीर धरे...”, राग कलावती पर आधारित और आशा भोसले व उषा मंगेशकर के स्वरों में –“काहे तरसाए जियरा...”, लता मंगेशकर की आवाज़ में –“सखी री मेरा मन उलझे तन डोले...” रंजकता की दृष्टि से श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। इसी फिल्म में रोशन ने राग कामोद की एक पारम्परिक बन्दिश को थोड़े शाब्दिक परिवर्तन के साथ फिल्मी गीत का रूप दिया था। मूल बन्दिश के अन्तरे की पंक्तियाँ हैं –“चमक बिजुरी मेहा बरसे...” जबकि फिल्म गीत का अन्तरा है –“अलकों में कुण्डल डालो और देह सुगन्ध बसा लों...”। मूल बन्दिश वर्षा ऋतु का गीत है जबकि साहिर लुधियानवी ने इसे श्रृंगार रस प्रधान गीत बना दिया। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा



राजन और साजन मिश्र
आज के अंक में हम आपसे दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग कामोद पर चर्चा कर रहे हैं। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक प्राचीन ग्रन्थकारों के आधार पर बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘ए री जाने न दूँगी...’। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है। अब आप पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में राग कामोद की इस पारम्परिक रचना को सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 323वें अंक की पहेली में आज हम आपको वर्ष 1965 में प्रदशित रोशन की एक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत के इस अंश में आपको किस राग का आधार परिलक्षित हो रहा है?

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

3 – यह किस मशहूर पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 1 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 325वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 321वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मन्ना डे

इस अंक की पहेली में हमारे सभी पाँच नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस नौवें अंक में हमने आपके लिए राग कामोद पर आधारित फिल्म ‘आम्रपाली’ से रोशन के एक गीत और इस राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक परम्परागत उदाहरण पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में प्रस्तुत किया। 'स्वरगोष्ठी' के 322वें  अंक में हमने राग भैरवी की चर्चा की थी। इस अंक में आपको राग भैरवी पर आधारित एक कालजयी गीत का रसास्वादन कराया गया था। हमारी एक नियमित पाठक और श्रोता पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने उसी गीत के सितार वादन का एक वीडियो भेजा है। गीत -"लागा चुनरी में दाग..." को सितार पर चन्द्रशेखर फानसे और उनके शिष्य प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पहले यह संगीत सुनिए। 


रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 24 जून 2017

चित्रकथा - 24: 2017 के मई - जून में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

अंक - 24

2017 के मई - जून में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत


"नाच मेरी जान होके मगन तू..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


देखते ही देखते वर्ष 2017 का आधा पूरा हो गया। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिन्दी फ़िल्म जगत में बहुत सी फ़िल्में बनती चली गईं। और इन फ़िल्मों के लिए गाने भी बनते चले गए। वर्ष के प्रथम चार महीनों के फ़िल्म-संगीत की समीक्षा ’चित्रकथा’ में हम कर चुके हैं। आइए आज के अंक में निगाह डालें मई और जून में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत पर। 




ई का महीना शुरु हुआ एक ताज़े हवा के झोंके से। जी हाँ, फ़िल्म ’मेरी प्यारी बिन्दु’ के ऐल्बम को सुन कर कुछ इसी तरह का अहसास हुआ। आयुष्मान खुराना - परिनीति चोपड़ा अभिनीत इस फ़िल्म में सचिन-जिगर ने संगीत दिया और गीत लिखे कौसर मुनीर और प्रिया सरय्या ने। अन्य कई अभिनेताओं की तरह परिनीति ने भी अपनी गायन क्षमता का पहली बार परिचय दिया इस फ़िल्म में। यह ग़ज़ल है "माना के हम यार नहीं, लो तय है के प्यार नहीं"। कौसर मुनीर ने इस ग़ज़ल से वापसी की है अर्थपूर्ण बोलों वाले गीतों की तरफ़। परिनीति ने आशातीत गायकी का परिवय देते हुए इस शास्त्रीय संगीत की छाया में स्वरबद्ध रचना को बेहद सुन्दर तरीक़े से गाया है। तेज़ रफ़्तार का कोई गीत होता तो बात अलग थी, लेकिन ऐसे ठहराव वाले गीत में सुरों को संभाल कर गाना बेहद मुश्किल काम है। इस ग़ज़ल का एक युगल संस्करण भी है जिसे परिनीति ने सोनू निगम के साथ मिल कर गाया है। भारतीय वाद्यों के प्रयोग से इस ग़ज़ल को चार चाँद लग गया है। ऐल्बम का दूसरा गीत है नकश अज़ीज़ और जोनिता गांधी का गया रेट्रो फ़ील वाला "ये जवानी तेरी, ये जवानी मेरी"। थिरकन भरा हल्के फुल्के बोलों से सजा यह गीत हमें 70 के दशक की याद दिला जाता है। तीसरा गीत है अरिजीत सिंह का गाया "ओ हारेया मैं दिल हारेया"। अतिथि गीतकार प्रिया सरय्या का लिख यह गीत लम्बी रेस का घोड़ा है। यूं तो अरिजीत के इस जौनर के बहुत से गीत हम सुन चुके हैं, पर यह गीत ख़ास है इसके कम्पोज़िशन, बोल और गायकी के लिहाज़ से। गीटार के सुन्दर प्रयोग वाला यह गीत अन्त तक हमारे साथ रहता है। क्लिन्टन सेरेजो और डॉमिनिक़ सेरेजो का गाया "इस तरह" हमें 80 के दशक में ले जाता है। भले यह सचिन-जिगर की रचना है, लेकिन कहीं से एक शंकर-अहसान-लॉय के संगीत की ख़ुशबू सी आती है। इस ऐल्बम की सबसे सुन्दर बात यह है कि सचिन-जिगर ने हर गीत को अलग ट्रीटमेण्ट दे कर विविधता की मिसाल कायम की है। जिगर और सनाह मोइदुत्ती की युगल आवाज़ों में "अफ़ीमी है तेरा मेरा प्यार" एक नर्म रोमांटिक गीत है जिसमें जिगर और सनाह की ताज़ी आवाज़ें दिल को छू जाती है। "अफ़ीमी" शब्द का क्या ख़ूबसूरत अंदाज़ में इस्तमाल हुआ है, शायद पहली बार किसी फ़िल्मी गीत में। और अन्तिम गीत है मोनाली ठाकुर की आवाज़ में "खोल दे बाहें" भी एक ख़ूबसूरत गीत है जिसमें कौसर मुनीर के हिन्दी बोलों के साथ साथ अतिथि गीतकार राना मजुमदार के बांग्ला बोल भी हैं। इसमें भी गीटार का सुन्दर प्रयोग है जो मोनाली की सुरीली आवाज़ के साथ-साथ चलता है। हिन्दी गीत में बांग्ला शब्दों को सही तरीके से ढाला गया है जिस वजह से यह एक अनूठा गीत बन गया है। कुल मिला कर ’मेरी प्यारी बिन्दु’ ऐल्बम एक सफल ऐल्बम है रचनात्मक्ता और विविधता के लिहाज़ से। 12 मई को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ’सरकार 3’। फ़िल्म के निर्माताओं के अनुसार यह फ़िल्म ’सरकार’ और ’सरकार राज’ से भी ज़्यादा ग़ुस्सेवाला है। और यह बात इसके गीतों में भी साफ़ झलकता है। फ़िल्म के सात गीत रोहित तेओतिआ द्वारा लिखा और रवि शंकर द्वारा स्वरबद्ध किया हुआ है। अमिताभ बच्चन की आवाज़ में ’गणेश आरती’ के अलावा बाकी सभी गीत किसी न किसी दृष्टि से पहले की दो फ़िल्मों के "गोविन्दा" के इर्द-गिर्द घूमते हैं। ऐल्बम का पहला गीत "ग़ुस्सा" आज के समाज के आम आदमी के ग़ुस्से को उजागर करता है। सुखविन्दर सिंह की बुलन्द आवाज़, उस पर "गोविन्दा" का मन्त्रोच्चारण और पार्श्व का परक्युशन, सब मिल कर एक सशक्त गीत है यह। इसी गीत का एक अन्य संस्करण है "ऐंग्री मिक्स" जिसमें मिका सिंह की भी आवाज़ शामिल है। फिर एक बार कैलाश खेर की आवाज़ में "साम धाम" का एक अन्य रूप इस ऐल्बम में शामिल है और इस बार उनके साथ आवाज़ मिलाई है साकेत बैरोलिया ने। अमिताभ के संवाद से शुरु होता है निलाद्री कुमार का "सरकार ट्रान्स"। टेक्नो बीट्स की गति तनाव को बढ़ाती हुई लगातार बढ़ती चली जाती है और अन्त में अचानक ख़त्म हो जाती है। रोहन विनायक द्वारा स्वरबद्ध ’गणेश आरती’ में अमिताभ बच्चन फिर एक बार परफ़ेक्शन का परिचय देते हैं। धीमी लय से शुरु हो कर जैसे जैसे आरती आगे बढ़ती है, इसकी गति भी ते होने लगती है। "थाम्बा" भी बिग-बी की पंक्तियों से शुरु होता है, वो ही बोल जो ’सरकार’ के "गोविन्दा" गीत में थे। आगे इस गीत को नवराज हंस आगे बढ़ाते हैं पूरे जोश के साथ। मिका, आदर्श शिन्डे और साकेत की आवाज़ों में "शक्ति" भी कुछ कुछ उसी तरह का गीत है। कुल मिला कर ’सरकार 3’ का ऐल्बम इस सीकुएल के पिछले दो फ़िल्मों के ढांचे में ही ढला हुआ है। फ़िल्म के बाहर इन गीतों का क्या वजूद होगा, कहना मुश्किल है।

मई के दूसरे सप्ताह में प्रदर्शित हुई ’हाफ़ गर्लफ़्रेंड’। अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर अभिनीत इस फ़िल्म में छह संगीतकार हैं - तनिष्क बागची, फ़रहान सईद, राहुल मिश्र, मिथुन, अमि मिश्र और ॠषी रिच। ऐल्बम का पहला गीत है "बारिश"। तनिष्क के इस कम्पोज़िशन ने माधव और रिया के रोमांस के आग में हवा का काम किया है। आराफ़ात महमूद और तनिष्क के लिखे बोल "ये मौसम की बारिश, ये बारिश का पानी, ये पानी की बूंदें, तुझे ही तो ढूंढ़े..." बड़े सुन्दर तरीके से गीत के मूड का बयाँ करते हैं। ऐश किंग् और शाशा तिरुपति की आवाज़ें दोनों अदाकारों पर अच्छी बैठी हैं। दूसरा गीत है "तू थोड़ी देर और ठहर जा"; श्रेया घोषाल की सुमधुर आवाज़ में यह गीत कानों में शहद घोलती है। फ़रहान सईद द्वारा स्वरबद्ध कुमार का लिखा यह गीत एक प्रेमी के इन्तज़ार को बड़े ख़ूबसूरत तरीके से बयाँ करता है। फ़रहान ने श्रेया का अच्छा साथ निभाया है इस युगल गीत में। गीत की एक और ख़ास बात है मुराद अली ख़ाँ का बजाया सारंगी की तानें। कुल मिला कर एक सुकूनदायक नग़मा। तीसरा गीत है राहुल मिश्र का गाया और स्वरबद्ध किया "तू ही है, तू ही तो है मेरा जुनूँ"। लाडो सुवल्का का लिखा यह क़व्वालीनुमा नग़मा थोड़े देर के लिए ’फ़ना’ के "चाँद सिफ़ारिश" की याद दिला जाता है। एक आशिक़ के टूटे हुए दिल की सदा है यह गीत और राहुल की उदासी भरी आवाज़-ओ-अंदाज़ ने गीत को सही मुकाम दिया है। ऐल्बम का अगला गीत है "फिर भी तुमको चाहूंगा"। मिथुन द्वारा स्वरबद्ध और मिथुन, अरिजीत सिंह व शाशा तिरुपति की आवाज़ों में मनोज मुन्तशिर का लिखा यह गीत शायद ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इस दर्द भरे गीत में पियानो, संतूर और बाँसुरी का सुन्दर प्रयोग है और मनोज के असरदार बोल "कल मुझसे मोहब्बत हो ना हो, कल मुझको इजाज़त हो ना हो, टूटे दिल के टुकड़े लेकर, तेरे दर पे ही रह जाऊंगा" दिल को चीर जाते हैं। ’एक विलेन’ फ़िल्म के "गलियाँ" गीत से इसकी थोड़ी बहुत समानता ज़रूर है। इसी गीत का दूसरा भाग है "पल भर" जिसे मिथुन और अरिजीत ने गाया है। कहना मुश्किल है कि दोनों में कौन सा संस्करण बेहतर है। अगला गीत है "lost without you" जिसे पहली बार सुन कर शायद इससे प्यार न हो, लेकिन कुछ और बार सुनने पर इसका असर बनने लगता है। अनुष्का शहाणे और कुणाल वर्मा का लिखा, अमि मिश्र का स्वरबद्ध किया तथा अनुष्का शहाणे व अमि मिश्र का गाया यह गीत हिन्दी-अंग्रेज़ी गीत है जिसमें चीनी वाद्य एर्हु का प्रयोग हुआ है। फ़रहान की "तू थोड़ी देर ठहर जा" का अंग्रेज़ी संस्करण है "stay a little longer" जिसे लिखा व गाया है अनुष्का शहाणे ने, लेकिन हिन्दी संस्करण ही दिल को छूता है। ऐल्बम का अगला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "मेरे दिल में" जिसे ॠषी रिच ने कम्पोज़ किया है। हिन्दी और अंग्रेज़ी बोलों से सजा यह गीत यश आनन्द, यश नर्वेकर, आर. रेखी, इशिता मित्र उधवानी और वेरोनिका मेहता ने लिखा है तथा इसे गाया है वेरिनिका और यश नर्वेकर ने। यह दौर सोशल मीडिया में प्रेम निवेदन का दौर है और यह गीत इसी बात की पुष्टि करता है। रैप के शौकीनों के लिए है यह गीत आकर्षक होगा। इसी गीत का एक संवाद संस्करण भी है जिसमें अर्जुन कपूर ने भोजपुरी में संवाद बोले हैं। कुल मिला कर यह ऐल्बम टूटे हुए दिल वाले आशिकों को ध्यान में रख कर बनाया गया है ऐसा प्रतीत होता है। इसी सप्ताह प्रदर्शित हुई ’जट्टू इंजिनीयर’। कम बजट की यह फ़िल्म नहीं चली। गुरमीत राम रहिम सिंह के संगीत में उन्हीं का लिखा और गाया "होली की पिचकारी" और "जोश में पूरे होश में" गीत सुनने वालों पर कोई असर नहीं कर सके।

19 मई को ’हिन्दी मीडियम’ भी प्रदर्शित हुई जिसमें फिर एक बार सचिन-जिगर का संगीत था। इसके ऐल्बम में 2016 के गुरु रंढवा और अर्जुन के चार्टबस्टर गीत "सूट सूट" को शामिल किया गया है। इसे कम्पोज़ किया था गुरु और रजत नागपाल ने। उत्तर भारत के शादी में बजने वाले गीतों की श्रेणी में यह गीत वहाँ के क्लब्स में ज़रूर ख़ूब बजेंगे। ऐल्बम का मूड बदल जाता है जब सचिन जिगर ले आते हैं आतिफ़ असलम को "हूर" में। प्रिया सरय्या के काव्यात्मक बोलों वाले इस गीत में आतिफ़ असलम का वही अंदाज़ सुनने को मिला एक अरसे के बाद। एक अच्छी रचना है कुल मिला कर। "सूट सूट" के बाद एक और सुपरहिट गीत है "ओ हो हो हो" जो बरसों से उत्तर भारत के क्लबों की शान है। सुखबीर के मूल गीत पर कुमार ने नए बोल लिखे हैं और इक्का ने रैप किया है। इस गीत की और क्या बात करें, यह तो लोकप्रियता के झंडे गाढ़ चुका है बरसों पहले ही। बाल गायिका तनिष्का सांघवी ने "इक जिन्दड़ी" को गा कर चमत्कृत कर दिया है। सचिन-जिगर और कुमार का यह गीत एक सिचुएशनल ट्रैक है जो फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाता है। मई के आख़िरी हफ़्ते चार फ़िल्में रिलीज़ हुईं। इनमें एक है कम बजट फ़िल्म ’चकल्लसपुर’। प्रवेश मल्लिक के लिखे और स्वरबद्ध गीतों में पहला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "चक चक चकल्लसपुर" जो एक हास्य गीत है और जिसे प्रवेश ने ही गाया है। इस गीत के बिल्कुल विपरीत भाव पर प्रवेश का गाया दर्द भरा गीत है "ये सपना किसका जला है"। तीसरा गीत बिहार के लोक शैली पर आधारित गीत है "उड़ जायी सुगनमा हो राम" जिसे सुनिल मल्लिक ने गाया है। इस गीत में एक बाप अपने मरे हुए बेटे को अपने हाथों में लेकर अस्पताल से घर की तरफ़ लौटते हुए दिखाया जाता है। ऐसे करुण दृश्य में अपनी आँसुओं को रोक पाना संभव नहीं, और उस पर ऐसे भावुक गीत ने व्यथा को और भी बढ़ा दिया है। मूड को बदलते हुए फ़िल्म का अन्तिम गीत है प्रवेश की आवाज़ में "मोरा बलमा सहरिया"। सस्ते भोजपुरी गीतों के ऐल्बम का कोई गीत है ऐसा प्रतीत होता है। इस सप्ताह की दूसरी फ़िल्म है ’कुटुम्ब - दि फ़ैमिली’। आर्यन जैन के संगीत में फ़िल्म के गीत आर्यन और राजेन्द्र तिवारी ने लिखे हैं। पहला गीत एक होली गीत है आर्यन जैन, तृप्ति शक्या और राजपाल यादव की आवाज़ों में। "अवध का छोरा मचाए धमाल" में वो सब बातें हैं जो एक होली गीत में होती हैं। दूसरा गीत है "जाने क्यों बेवजह ये मौसम सुहाना सुहाना लगे" जिसे शाहिद माल्या ने गाया है। पहले प्यार के अहसास को दर्शाता यह गीत एक सुन्दर रचना है। मुखड़े के बाद क़व्वाली/ सूफ़ी शैली में अन्तरा कम्पोज़ किया है आर्यन ने। जावेद अली और लीना बोस की आवाज़ों में "इश्क़ में तेरे ऐसा लगी मुझे यार जैसे ठंडी ठंडी पुर्वैया की चली है बयार" मिट्टी की ख़ुशबू लिए एक नर्मोनाज़ुक प्रेम गीत है। अफ़सोस की बात यह है कि कम बजट की फ़िल्म होने की वजह से इन गानो का ज़्यादा प्रोमोशन नहीं हुआ और इसलिए इन्हें ज़्यादा सुना नहीं जा रहा है।

मई के आख़िरी सप्ताह की तीसरी फ़िल्म थी ’थोड़ी थोड़ी सी मनमानियाँ’। फ़िल्म में दो गीतकार-संगीतकार जोड़ियाँ हैं - गीतकार राघव दत्त - संगीतकार ट्रॉय आरिफ़, तथा गीतकार प्रेरणा सहेतिया - संगीतकार अजय वाज़। इस ऐल्बम में गाने ऐसे हैं जो हर उम्र के श्रोताओं को पसंद आएंगे। राघव-ट्रॉय के दो गीत हैं और प्रेरणा-अजय के तीन। राघव-ट्रॉय का पहला गीत है शेखर रावजियानी और शालमली खोलगडे की आवाज़ों में "मेहरबाँ मेहरबाँ" और दूसरा गीत है यासेर देसाई का गाया "बंजारे"। पहला गीत अगर थिरकता डान्स नंबर है तो दूसरा गीत सॉफ़्ट रॉक शैली में कम्पोज़ किया हुआ ऐसा गीत है जो आपको पिछले दशक के इमरान हाश्मी के फ़िल्मों के गीतों की याद दिला जाएगा। प्रेरणा-अजय के तीन गीत हैं "तू बस चल यहाँ" (निखिल डी’सूज़ा, प्रेरणा), "थोड़ी मनमानियाँ" (निखिल) और "तराशता मैं ये रास्ता" (सिद्धार्थ बसरूर)। "तू बस चल यहाँ" में देसी पंजाबी और रॉक म्युज़िक का फ़्युज़न है; उधर "थोड़ी मनमानियाँ" फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में एक केअर-फ़्री क़िस्म का गीत है जिसमें एक युवा अपने मन की सुनने की सीख देख रहा है सभी को। "तराशता मैं" में सिद्धार्थ की आवाज़ में एक यूथ अपील है, एक नयापन है जो उन्हें आगे ले जाने में कारगर सिद्ध होगी। मई के अन्तिम सप्ताह में प्रदर्शित होने वाली चौथी और सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म रही सचिन तेन्दुलकर की बायोपिक ’सचिन- ए बिलियन ड्रीम्स’। इस फ़िल्म में गीतों की ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। ए. आर. रहमान और इरशाद कामिल ने तीन गीत रचे हैं। पहला गीत तो हमें सीधा क्रिकेट स्टेडियम में पहुँचा देता है। "सचिन सचिन" का शोर, और ड्रम्स के बीट्स ने इस गीत को एक पावरफ़ुल ट्रैक बना दिया है। इस गीत की ख़ासियत यह है कि इसके चौदह संस्करण बने हैं अलग अलग भारतीय भाषाओं में। ऐसा पिछली बार शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म ’फ़ैन’ में देखा गया था। ख़ैर, इस गीत में कैली ने रैप किया है और सुखविन्दर सिंह की बुलन्द आवाज़ खुल कर आई है जैसा उन्होंने "चक दे इंडिया" में गाया था। शास्त्रीय संगीत की छोटी-छोटी बारीकियों को क्या ख़ूब उभारा है उन्होंने। और दूसरा गीत है "हिन्द मेरे जिन्द" रहमान की आवाज़ में है। देशभक्ति की छाया लिए यह गीत हारमोनियम, बाँसुरी और ड्रम बीट्स से सुसज्जित एक विजय गीत है। और तीसरा गीत है "मर्द मराठा" जिसे ए. आर. अमीन और अंजली गायकवाड ने गाया है। मराठी लोक शैली में कम्पोज़ यह गीत हमें थिरका जाता है। सचिन के लिए हर भारतीय के दिल में इतनी इज़्ज़त है कि उन पर बनी इस फ़िल्म का हर एक पहलु हमें पसन्द आएगी और इसके गानें कोई व्यतिक्रम नहीं है।

जून का महीना शुरु हुआ ऐनिमेटेड फ़िल्म ’हनुमान दा दमदार’ से। रुचि नारायण की इस बाल फ़िल्म में बॉलीवूड के कई जानेमाने कलाकारों ने अपनी आवाज़ें दीं जैसे कि सलमान ख़ान, जावेद अख़्तर, रवीना टंडन, विनय पाठक, मकरन्द देशपांडे, सौरभ शुक्ला, चंकी पांडे, कुणाल खेमु, स्नेहा खनवलकर और हुसैन दलाल। स्नेहा ने ही फ़िल्म का संगीत तैयार किया है और गीत लिखे हैं अभिषेक दुबे ने। ऐल्बम का पहला गीत है सागर कुन्दुरकर की आवाज़ में "भाई ओ भाई"। बच्चों को यह गीत निस्संदेह पसन्द आएगा इसके रीदम और मज़ेदार बोलों की वजह से। दूसरा गीत है "हनुमान चालीसा" जिसे स्नेहा पंडित, मिलिन्द बोरवनकर, निहार शेम्बेकर, रुचि नारायण और ताहिर शब्बीर ने गाया है। बाल आवाज़ में ’हनुमान चालीसा’ का आधुनिक संस्करण आकर्षक है जिसमें गीटार और ड्रम्स ने फ़्युज़न की सृष्टि की है। स्वानन्द किरकिरे और मीनल जैन की आवाज़ों में "आजा आजा निन्नि वाली परियाँ" एक लोरी गीत है जिसमें ऐसी कहानी है जो बच्चों को रात में सुलाते हुए सुनाई जाती है। और चौथा गीत है वही फ़िल्म ’मासूम’ का इतिहास रचने वाला "लकड़ी की काठी" जिसे रिक्रीएट किया गया है। गुलज़ार और पंचम के मूल गीत को वनिता मिश्र, गौरी बापट और गुरप्रीत कौर ने गाया था। ’हनुमान दा दमदार’ फ़िल्म के लिए इस गीत के लिए अतिरिक्त बोल लिखे हैं फ़िल्म के गीतकार अभिषेक दुबे ने, और इस गीत को गाया है राशी सलिल हरमलकर, विया कुमार, अरहान ख़ान, विक्रम सदानन्द पटकर और अत्रेयी भट्टाचार्य ने। कुल मिला कर इस फ़िल्म के चारों गीत अच्छे बने हैं और इनमें रचनात्मक्ता दिखाई देती है। जून के पहले सप्ताह कुल पाँच फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। एक की चर्चा हमने की, दूसरी फ़िल्म थी ’ए डेथ इन दि गंज’ जिसमें कोई गीत नहीं है। तीसरी फ़िल्म थी ’स्वीटी वेड्स एन आर आइ’। ऐल्बम की शुरुआत होती है अर्को के संगीत में अरमान मलिक और प्रकृति कक्कर के गाए "ओ साथिया" से। एक धीमा प्रेम गीत, कर्णप्रिय कम्पोज़िशन, ऐकोस्टिक गीटार का ताज़ा अहसास, कुल मिला कर एक सुन्दर रचना। अरमान और प्रकृति की असरदार आवाज़ों ने इस नर्मोनाज़ुक रोमान्टिक गीत को सुन्दर जामा पहनाया है। ऐल्बम का दूसरा गीत है 90 के दशक का सुपरहिट पंजाबी गीत "दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी" जिसे जसबीर जस्सी ने गाया था। इस फ़िल्म की कहानी में एक गुजराती पिता अपनी बेटी की शादी एक एन.आर.आइ से करवाना चाहते हैं, शायद इसी से प्रेरित होकर इस गीत को इस फ़िल्म में रखने का विचार आया होगा। ख़ैर, स्व: श्याम भटेजा के मूल गीत पर अतिरिक्त बोल लिखे डॉ. देवेन्द्र काफ़िर ने और संगीत रिक्रीएट किया जयदेव कुमार ने। केडी के रैप पर जसबीर जस्सी के साथ सोनिआ शर्मा और अकासा सिंह की भी आवाज़ें हैं। रैप वाले जगहों पर गुजराती शब्द डाले गए हैं जो सुनने में मज़ेदार हैं। तीसरा गीत एक बार फिर से सॉफ़्ट नंबर है पलाश मुछाल के लिखे और संगीत में। इस गीत के कुल चार संस्करण हैं। पहले संस्करण में आतिफ़ असलम और पलक मुछाल की आवाज़ें हैं; पहली बार सुनते हुए हो सकता है यह गीत ज़्यादा अपील न करे, लेकिन दो एक बार सुनने पर इसकी कर्णप्रियता दिल को भी छूने लगती है। लेकिन पलक की आवाज़ अतिथि गायिका के रूप में ही लिया गया है जो शुरु होने से पहले ही जैसे ख़त्म हो जाती है। अरिजीत के एकल संस्करण में एक हौन्टिंग् टच है और तीसरे संस्करण में आतिफ़ और अरिजीत के संस्करणों को मिक्स किया गया है जो अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है। चौथा संस्करण है पलक मुछाल की एकल आवाज़ में। पलाश का ही लिखा और स्वरबद्ध किया एक शादी गीत है "वेडिंग् होने वाली है" जिसे पलक मुछाल और शाहिद माल्या ने गाया है। एक चुलबुला मज़ेदार गीत जिसमें लड़का शादी के बन्धन को अस्त-व्यस्त कर रहा है और लड़की शादी को लेकर उत्साहित है। राज आशू के संगीत में, शकील आज़मी का लिखा अरमान मलिक की आवाज़ में "शिद्दत से चाहता हूँ" एक तीव्र प्रेम का गीत है जिसमें अरमान की आवाज़ से दीवानगी छलक रही है। इसी गीत का मोहम्मद इरफ़ान का गाया अन्य संस्करण भी है जो अरमान के मुकाबले नर्म है, नाज़ुक है। दोनों संस्करणों का वैषम्य सुन्दर बन पड़ा है। ऐल्बम का आख़िरी नग़मा है "ज़िन्दगी बना लूँ"। पलक मुछाल की आवाज़ में शाहजहाँ अली का स्वरबद्ध किया और बंजारा रफ़ी का लिखा यह गीत कर्णप्रिय है जिस पर संगीत संयोजन इसे और भी ज़्यादा भावुक बनाता है। कुल मिला कर ’स्वीटी वेड्स एन आर आइ’ का ऐल्बम ऐवरेज से उपर है।

2 जून को प्रदर्शित होने वाली पाँच फ़िल्मों में चौथी फ़िल्म थी ’दोबारा: सी यू ईविल’। यूं तो हॉरर फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है, लेकिन ’1920’ फ़िल्म से इस जौनर की फ़िल्मों में भी अच्छे ख़ासे गीतों का चलन शुरु हुआ था और अब तक जारी है। ’दोबारा’ में भी चार गीत हैं। अर्को का लिखा, उन्हीं का स्वरबद्ध और उनकी तथा असीस कौर की आवाज़ों में ऐल्बम का पहला गीत है "कारी कारी"। अकेलापन और यादें रात की तन्हाई में किस तरह डँसती हैं, यह गीत प्रमाण है। उदासी भरा यह गीत दिल को उदास कर देता है। इस गीत के अन्य संस्करण में अर्को के साथ पायल देव की आवाज़ है। नवोदित गायिका ज्योतिका टंग्री की आवाज़ में "हमदर्द" एक बार फिर अर्को की लिखी-स्वरबद्ध रचना है जिसमें विक्रम भट्ट के हॉरर फ़िल्मों के गीतों के जौनर की याद दिलाती है। गीत में वायलिन का संगीत एक अमंगल की अनुभूति कराती है जो शायद फ़िल्म की कहानी के साथ चलती है। इस गीत का भी एक अन्य संस्करण है जिसमें नेहा पांडे की मुख्य आवाज़ है और साथ में है पैरी जी का रैप। दोनों में निस्सन्देह पहला संस्करण बेहतर है। ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत अरिजीत सिंह की आवाज़ में है - "अब रात गुज़रने वाली है"। पुनीत शर्मा का लिखा व समीरा कोपीकर द्वारा स्वरबद्ध यह गीत ऐल्बम के दूसरे गीतों के भाव के इर्द-गिर्द ही घूमता है लेकिन कुल मिला कर इसका स्तर ऊँचा है। गीत का अन्य संस्करण है समीरा की आवाज़ में जिस पर जोनथन रेबेरो का रैप है। समीरा की आवाज़ में भी यह गीत अच्छा सुनाई दिया पर अरिजीत वाले संस्करण की बात ही कुछ और है। ऐल्बम के अन्डरकरण्ट को एक तरफ़ रखते हुए ऐल्बम का अन्तिम गीत कुछ अलग हट कर है। ताशा ताह और राऊल की आवाज़ों में "मलंग" को एक प्रोमोशनल ट्रैक के रूप में इस्तमाल किया गया। इन दोनों ने इस गीत को लिखा और संगीत दिया राऊल और मैक्स वूल्फ़ ने। लगता नहीं कि इस गीत को फ़िल्म की कहानी में कोई जगह मिली होगी। और 2 जून को रिलीज़ होने वाली पाँचवी फ़िल्म रही ’डिअर माया’ जिसमें मनीषा कोइराला ने अभिनय किया। अनुपम रॉय के संगीत में ऐल्बम का पहला गीत है "सात रंगों से दोस्ताना हुआ" जिसे रेखा भारद्वाज ने गाया है। तबला और सितार के सुन्दर समन्वय ने इस सुरीले गीत की शान को बढ़ा दिया है। इसी गीत का एक ऐकोस्टिक वर्ज़न है अनुपम की ही आवाज़ में जिसमें घटम के संयोजन ने चार चाँद लगा दिया है। हर्षदीप कौर की आवाज़ में "सूने साये तूने पाए" भी बहुत ही सुन्दर तरीके से गाया गया है जिसमें फ़्युज़न है भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का। जोनिता गांधी की आवाज़ में "कहने को" एक मधुर तान से शुरु होता है जो जुदाई के दर्द को उजागर करता है। गीत का हूक लाइन है "How do I say goodbye?" और ऐल्बम का अन्तिम गीत है "बुरी बुरी"। राशी मल की आवाज़ में यह गीत स्पाइस गर्ल्स की याद दिला जाता है।

9 जून को भी पाँच फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। पहली फ़िल्म है ’राबता’ जिसमें सुशान्त सिंह राजपूत और कृति सानोन ने अभिनय किया है। प्रीतम और JAM8 के संगीत में फ़िल्म के गीतों को लिखा है अमिताभ भट्टाचार्य, इरशाद कामिल और कुमार ने। पिछले दिनों यह फ़िल्म विवादों से घिर गई। पहले इसे 2009 की तेलुगू फ़िल्म ’मगधीरा’ के निर्माताओं से लीगल नोटिस मिला उनकी फ़िल्म की कहानी चुराने के इलज़ाम में। और तीन सप्ताह पहले संगीतकार प्रीतम ने फ़िल्म के निर्माता से अनुरोध किया कि उनका नाम फ़िल्म की नामावली से हटा दिया जाए क्योंकि वो किसी और के गीतों को रिक्रीएट करना नहीं चाहते। फ़िल्म के निर्माता चाहते थे कि T-Series के एक हिट गीत को प्रोमोशन के मक़सद से इस्तमाल किया जाए। लेकिन इन सब के बावजूद फ़िल्म का ऐल्बम बहुत ही साधारण बना है। ऐल्बम का पहला गीत है अरिजीत सिंह की आवाज़ में "इक वारी"। ऊँची दुकान फीका पकवान, इस गीत के लिए यह मुहावरा सटीक है। ऐकोस्टिक गीटार का सिन्थेसाइज़र कॉर्ड्स के साथ जुगलबन्दी, इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों का क्रेसेन्डो, नए ज़माने के परक्युशन लूप्स, और उस पर अरिजीत की असरदार आवाज़; लेकिन ताज्जुब की बात है कि गीत ख़त्म होने के बाद आपके दिल पर कोई असर नहीं होता। इसका एक जुबिन नौटियाल संस्करण भी है जिसमें गायकी नर्म है और पार्श्व में कोरस है। मेरी व्यक्तिगत पसन्द अरिजीत वाला संस्करण है। आपको याद होगा ’एजेन्ट विनोद’ फ़िल्म में प्रीतम का ही रचा "राबता" गीत था श्रेया घोषाल का गाया। इस फ़िल्म में इसी गीत को शीर्षक गीत के रूप में डाला गया है जिसे अरिजीत सिंह और निकिता गांधी ने गाया है। श्रेया वाला संस्करण निस्संदेह ज़्यादा सुरीला था, इस वाले में बहुत ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों और ऑटोट्युनरों का कुंभ लगा है। आज के कलाकारों को शायद ऐसा लगता है कि "अली", "मौला" जैसे शब्दों के होने से ही वह एक सूफ़ी गीत बन जाता है। इस फ़िल्म के साथ भी यही हुआ। अरिजीत की आवाज़ में "लम्बी सी जुदाइयाँ" एक दर्द भरा गीत है जो वायलिन से शुरु हो कर ऐकोस्टिक गीटार से होते हुए 90 के दशक के ढोलक और सिन्थेसाइज़र के रास्ते चल पड़ता है। लेकिन तभी अचानक "अली मौला" के नारे सुनाई देते हैं जिनका इस्तमाल इस गीत को एक सूफ़ी नंबर करार देने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता। अरिजीत ने वैसे इस गीत को सही मुकाम दिलाया है और कम्पोज़िशन के लिहाज़ से भी इस ऐल्बम का यह एक उम्दा नग़मा है। अरिजीत, नेहा कक्कर और मीत ब्रदर्स की आवाज़ों में "मैं तेरा बॉयफ़्रेन्ड ना ना ना" भी एक रीमेक है 2015 के हिट पंजाबी गीत का। गीत का कैची रीदम इसे लोकप्रिय बनाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है पर इस गीत में कोई ख़ास बात भी नहीं है। आतिफ़ असलम की आवाज़ में "दरसल" का कम्पोज़िशन अच्छा है लेकिन आतिफ़ की हर गीत में अपने ’जल’ बैन्ड जैसी गायकी एकरसता पैदा कर रही है। एक लव बैले में जिस तरह की नाज़ुकी की ज़रूरत होती है, वह कहीं कहीं ही सुनाई दी। कुल मिला कर ’राबता’ का गीत-संगीत ऐवरेज है।

9 जून को प्रदर्शित होने वाली दूसरी फ़िल्म है ’बहन होगी तेरी’ जो एक रोमान्टिक कॉमेडी है और इस थीम का असर इसके सात गीतों पर भी पड़ा है। ऐल्बम का पहला गीत है "जय मा - काला चश्मा" जिसमें भक्ति रस है और ऐसा लगता है कि फ़िल्म में इसे जागरण के दृश्य के लिए प्रयोग में लाया गया होगा। संगीतकार जयदेव कुमार ने मूल "काला चश्मा" की धुन को बरकरार रखा है। साहिल सोलंकी, ज्योतिका टंगरी और पैरी जी के गाए इस गीत में मूल गीत की पंक्तियों पर माँ शेरावाली की शान में पंक्तियाँ डाले हैं गीतकार सोनू सग्गु ने। 80-90 के दशक में लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों की धुनों पर भजन-कीर्तन की याद दिला दी है इस गीत ने। कुल मिला कर सभी ने अच्छा काम किया है इस गीत में। अरिजीत की आवाज़ में "तेरा होके रहूँ" ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इन्टरल्युड में बांसुरी की नर्म ध्वनियाँ और पार्श्व में ऐकोस्टिक गीटार का प्रयोग बहुत सुन्दर है जो इस धीमे रोमान्टिक गीत को और भी असरदार बनाते हैं। कौशिक, आकाश और गुड्डु द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को बिपिन दास ने लिखा है। राहुल देव बर्मन - आनन्द बक्शी के सुपरहिट गीत "जानू मेरी जान मैं तेरे कुर्बान" को ॠषी रिच ने इस फ़िल्म के लिए रीक्रिएट किया है जिसे जग्गी डी, शिवि और रफ़्तार ने गाया है। मूल गीत का फ़्लेवर बरकरार है जिस पर क्लबों में नौजवान ख़ूब थिरक रहे होंगे इन दिनों। यासिर देसाई, पावनी पांडे और यश नरवेकर के गाए "तेरी यादों में" एक रोमान्टिक गीत है जिसकी शुरुआत आशाजनक है लेकिन आगे चल कर गीत कहीं खो जाता है। वैसे यश और सुकृति कक्कर की आवाज़ में इस गीत का रीप्राइज़ वर्ज़न काफ़ी बेहतर है। अमजद नदीम द्वारा स्वरबद्ध "तैनु ना बोल पावाँ" एक और धीमा मेलडी प्रधान गीत है जिसे यासिर और ज्योतिका की सुरीली गायकी सुनने वालों को अपनी ओर खींच कर रखता है। इसका भी रीप्राइज़ वर्ज़न असीस कौर की आवाज़ में मूल गीत से बेहतर है। इस सप्ताह रिलीज़ होने वाली अगली फ़िल्म है ’बच्चे सच्चे कच्चे’। इस फ़िल्म में अन्ना हज़ारे ने अतिथि भूमिका निभाई है। फ़िल्म के संगीतकार हैं रविशंकर एस। बच्चों के फ़िल्म में जिस तरह के गाने होते हैं, इस फ़िल्म में भी उसी तरह के हैं। फ़िल्म का शीर्षक गीत वाइ. स्पूर्ति और साथियों ने गाया है जिसमें बच्चे बड़ों की ग़लतियों को पक्ड़ रहे हैं। गीत लिखा है मीना और यशमिता ने। दूसरा गीत है "तेरे पास ये नहीं वो नहीं" जिसे भरत और वैष्नवि ने गाया है। गीत बहुत ही अर्थपूर्ण है जो आज के बच्चों की मनस्थिति को दर्शाता है। फ़िल्म का एक और गीत है "ऐ ख़ुदा वक़्त की रफ़्तार को बढ़ा दे" जावेद अली की आवाज़ में जिसमें एक सूफ़ियाना अंग है और दर्दीला होते हुए भी मन को सुकून देता है।

जून के दूसरे सप्ताह की अगली फ़िल्म रही ’लव यू फ़ैमिली’। इसमें चार संगीतकारों ने संगीत दिया। ऐल्बम का पहला गीत तनमय पाहवा के संगीत में संजीव चतुर्वेदी का लिखा हुआ है। प्रथमेश ताम्बे की आवाज़ में "सर से पाँव तक तेरा इश्क़ ओढ़ बैठा हूँ" युवा अपील लिए एक रोमान्टिक गीत है जिसे निस्संदेह आज की युवा पीढ़ी पसन्द करेगी। साज़ों की अनर्थक भीड़ नहीं, बोल भी सुन्दर, और प्रथमेश की नई ताज़ी दिलकश आवाज़ में इस गीत को सुन कर अच्छा लगा। दूसरा गीत है नरेश करवाला के संगीत में और उन्हीं का लिखा हुआ। ज़ुबीन गर्ग और मेघना यागनिक की आवाज़ों में "तूने छूआ जाने क्या हुआ के जल उठा है बदन" डिस्को बीट्स वाला आधुनिक प्रेम गीत है जिसमें कामोत्तेजक बोल जैसे कि "होठों पे तपस है, साँसों में सिस्कियाँ, लम्हों की ख़्वाहिशें, अब तू समझ भी जा, बरस जा मुझ पे तू बरस जा" गीत को एक कामुक अंग प्रदान करते हैं। ज़ुबीन की आवाज़ में इस तरह के गीत निखर कर आता है। रॉबी बादल ने ऐल्बम के तीम गीत कम्पोज़ किए हैं जिन्हें तीन अलग अलग गीतकारों ने लिखे हैं। तनवीर ग़ाज़ी का लिखा "इश्क़ ने ऐसा शंख बजाया, गूंज उठी तन्हाई मेरी" मधुश्री और सोनू निगम की आवाज़ों में एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसमें शास्त्रीय संगीत की छाया है। एक अरसे के बाद वरिष्ठ गायकों की आवाज़ में ऐसा स्तरीय गीत सुन कर एक सुखद अनुभूति हुई। मधुश्री की एकल आवाज़ में स्व: हैदर नाज़मी का लिखा "माँ" भी एक भावुक रचना है जिसमें एक बेटी अपनी माँ को ख़त लिख रही है। इसे सुनते हुए आँसुओं को रोक पाना मुश्किल है। फिर एक बार रॉबी बादल ने बेहद ख़ूबसूरत कम्पोज़िशन तैयार की है। "साथ कोई नहीं मेरे, पास कोई नहीं अब मेरे, दुख में उलझी हूँ माँ, ख़ुद से रूठी हूँ माँ, मुझसे रूठा मेरा आसमाँ, ओ माँ..."। मधुश्री की ऊँची पट्टी पर "ओ माँ" की पुकार कलेजा चीर जाता है। शाहिद ख़ान का लिखा फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया है मधुश्री, विक्रान्त सिंह, मृदुल घोष, सौम्या और रॉबी बादल; यह एक अंग्रेज़ी गीत है जिसकी धुन "लास्ट क्रिस्मस" की धुन से प्रेरित है (इसी धुन से अनु मलिक भी प्रेरित हुए थे "दिल मेरा चुराया क्यों" गीत के लिए)। यह एक सिचुएशनल गीत है जिसका अस्तित्व फ़िल्म के अन्दर ही है। संगीतकार विष्णु नारायण ने दो गीत कम्पोज़ किए हैं जिन्हें कनवर जुनेजा ने लिखा है। नरेश अय्यर और विष्णु नारायण की आवाज़ों में "नॉटी नॉटी पार्टी" एक साधारण पार्टी गीत है और इस तरह के गीत थोक के भाव आ रहे हैं आजकल। दलेर मेहन्दी, कल्पना पटवारी और विष्णु नारायण की आवाज़ों में "पेग शेग ला लो" भी एक और पार्टी गीत है, फ़र्क बस इतना है कि यह एक पंजाबी पेग शेग क़िस्म का डान्स नंबर है। इस बेहद आम गीत के लिए दलेर मेहन्दी जैसे वरिष्ठ गायक की क्या ज़रूरत पड़ गई, यह कहना मुश्किल है।

16 जून को दो फ़िल्में प्रदर्शित हुईं - ’गेस्ट इन लंदन’ और ’बैंक चोर’। ’अतिथि तुम कब जाओगे’ का सीकुएल ’गेस्ट इन लंदन’ के संगीत के लिए राघव सचर और अमित मिश्र को चुना गया। ऐल्बम शुरु होता है "फ़्रैंकली तू सोना नचदी" से जो एक डान्स नंबर है लेकिन तेज़ रफ़्तार वाला नहीं। अच्छी बात यह है कि इसमें अनर्थक ईलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों का महाकुंभ नहीं है। कुमार के पंजाबी प्रधान बोलों पर राघव सचर और तरन्नुम मलिक ने देसी धमाल मचाया है। राघव ने सैक्सोफ़ोन का अच्छा प्रयोग किया है इस गीत में। "बारिश" जैसे सुकूनदायक गीत के बाद ऐश किंग् की वापसी हुई है "दिल मेरा" गीत में। प्रकृति कक्कर और शाहिद माल्या की आवाज़ों के होते हुए भी यह गीत कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पायी। तीसरा गीत है "दारु विच प्यार" जो हमें ’रईस’ के "लैला मैं लैला" की याद दिला जाता है। वैसे यह गीत ’तुम बिन’ के ताज़ के गाए "दारु विच प्यार" का ही रीक्रिएशन है जिस पर आर्य आचार्य ने रैपिंग् की है। अमित मिश्र और नवेन्दु त्रिपाठी का गाया फ़िल्म का शीर्षक गीत एक सिचुएशनल गीत है जिसका फ़िल्म की कहानी में ही महत्व होगा। "आएगा आनेवाला" गीत के मुखड़े को ही आधार बना कर इस गीत को डेवेलप किया गया है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "रब्बा मेरे हाल दा मेहरम तू" सूफ़ीयाना अंदाज़ का भक्तिमूलक रचना है जिसमें सुमीत आनन्द और अमित मिश्र की आवाज़ें हैं। इस ऐल्बम की अच्छी बात यह है कि केवल पाँच गाने हैं अलग अलग तरह के और किसी भी गीत का अनर्थक रीमिक्स वर्ज़न नहीं बनाया गया है। ’बैंक चोर’ फ़िल्म का साउन्डट्रैक एक मल्टि-कम्पोज़र ऐल्बम है जिसमें कैलाश खेर, रोचक कोहली, शमिर टंडन, और बाबा सेहगल ने संगीत दिया है। ऐल्बम का पहला गीत शीर्षक गीत है "हम हैं बैंक चोर" जिसे कैलाश खेर और अम्बिलि मेनन ने गाया है। इन दोनों ने ही इसे मिल कर लिखा है। जिस तरह से बीच बीच में "बैंक चोर" बोला गया है, ऐसा लगता है कि जैसे आज के दौर का सर्वाधिक लोकप्रिय गाली को बढ़ावा दिया गया है। कैलाश खेर जैसे गायक को इस तरह के घटिया उद्येश्य वाले गीत को लिखने, स्वरबद्ध करने और गाने की क्या आवश्यक्ता पड़ गई थी यह वो ही बता सकते हैं बेहतर! ऐल्बम का दूसरा गीत है अधीश शर्मा का लिखा और रोचक कोहली का स्वरबद्ध किया "तशरीफ़"। रोचक की ही आवाज़ में यह गीत हाल के समय में आने वाली हास्य प्रधान गीतों में काफ़ी सृजनात्मक है। ’हवाइज़ादा’ के गीतों की तरह इस गीत में भी रोचक ने देसी मिज़ाज को बरकरार रखा है। शमिर टंडन के संगीत में वरुण लिखाटे का लिखा ऐल्बम का तीसरा गीत है "बीसी रैप नॉक-आउट: मुंबई वर्सस दिल्ली" जो मुंबई और दिल्ली के बीच एक रैप बैटल है। बहुत ही नई सोच है और काफ़ी मज़ेदार भी। गायक नेज़ी और प्रधान ने अच्छी गायकी का प्रदर्शन किया है। गौतम गोविंद शर्मा का लिखा, रोचक कोहली का स्वरबद्ध किया नकश अज़ीज़ और साथियों का गाया "जय बाबा बैंक चोर" सुन कर ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई उसी गाली का प्रोमोशन कर रहा है। बाबा सहगल का लिखा, स्वरबद्ध किया और उन्हीं का गाया "बाए बाबा बैंक चोर" तो जैसे एक गाली ही है। वर्ष 2017 के प्रथमार्ध की अन्तिम फ़िल्म है सलमान ख़ान की ’ट्युब लाइट’ जो रिलीज़ हो रही है ईद के पाक़ मौक़े पर। प्रीतम के संगीत से सजे इस फ़िल्म में गीत लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य और कौसर मुनीर ने। फ़िल्म में कुल छह गीत हैं। कमाल ख़ान और अमित मिश्र की आवाज़ में "सजन रेडियो बजने दे ज़रा"। इस गीत में पार्श्व संगीत और गायन को बहुत सुन्दर तरीके से समक्रमिक बनाया गया है। यह ऐल्बम अभी हाल ही में जारी हुआ है, देखना है कि क्या यह गीत धीरे धीरे लोकप्रियता के पायदान चढ़ पाता है या नहीं। "नाच मेरी जान" एक त्योहार गीत है जिसमें प्रीतम ने बड़ी चतुराई से चार अलग अलग आवाज़ों को साथ में लेकर आए हैं और ये आवाज़ें हैं कमाल ख़ान, नकश अज़ीज़, देव नेगी और तुषार जोशी। अमिताभ के शब्द असरदार हैं और "किन्तु परन्तु" जैसे बोल गीत को मज़ेदार बनाते हैं। कुल मिला कर एक अच्छा गीत है पर लगता नहीं कि यह एक लम्बी रेस का घोड़ा बन पाएगा। राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में "तिनका तिनका दिल मेरा" एक अच्छी रचना है और राहत साहब की पुर-असर आवाज़ में कोई भी आम गीत ख़ास बन ही जाता है।

यहाँ आकर पूरी होती है वर्ष 2017 के प्रथमार्ध में प्रदर्शित होने वाली हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत की समीक्षा। ’चित्रकथा’ में आगे चल कर हम फिर से लेकर आएँगे इस वर्ष के द्वितीयार्थ के फ़िल्मी गीतों का लेखा-जोखा। 



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 23 जून 2017

गीत अतीत 18 || हर गीत की एक कहानी होती है || जियो रे बाहुबली || बाहुबली 2 द कन्क्लुशन || संजीव चिम्मल्गी

Geet Ateet 18
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Jiyo Re Bahubali...
Bahubali 2 - The Conclusion
(Also Feat. Daler Mehndi, Ramya Behara, MM Kreem)
Sanjeev Chimmalgi - Singer 

"जब एम् एम् क्रीम जी ने मुझे पहली बार देखा तो कहने लगे कि मैं तो किसी सोच रहा था कि आप कोई पंडित जी टायप के होंगें कुरता धोती में पान चबाने वाले, पर आप तो जींस टी शर्ट वाले निकले " -    संजीव चिम्माल्गी  


जानिये कि क्यों पूरी रिकॉर्डिंग के दौरान बेचैन से रहे संगीतकार एम् एम् क्रीम साहब, हिंदुस्तान की सबसे कामियाब फिल्म बाहुबली २ द कन्क्लुशन के शीर्षक गीत के बनने की कहानी सुनिए, इस गीत के गायक संजीव चिम्मल्गी से आज गीत अतीत पर, गीत में संजीव का साथ दिया है रम्या बेहरा और दिलेर मेहँदी ने, बोल लिखे हैं मनोज मुन्तशिर ने... बिना देर किये प्ले का बट्टन दबाएँ और सुनें ....




डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -

मंगलवार, 20 जून 2017

हरिशंकर परसाई की देशभक्ति की पॉलिश

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार स्वयं प्रकाश की कहानी "अकाल मृत्यु" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं हरिशंकर परसाई का व्यंग्य "देशभक्ति की पॉलिश", जिसको स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 11 मिनट 23 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

मेरी जन्म-तारीख 22 अगस्त 1924 छपती है। यह भूल है। तारीख ठीक है। सन् गलत है। सही सन् 1922 है। ।
 ~ हरिशंकर परसाई (1922-1995)

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"दोस्त, इतना लिखकर भारत माता तो चली गईं ..."
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#Eleventh Story, Deshbhakti Ki Polish: Harishankar Parsai/Hindi Audio Book/2017/11. Voice: Archana Chaoji

रविवार, 18 जून 2017

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 322 : RAG BHAIRAVI





स्वरगोष्ठी – 322 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 8 : राग भैरवी

रोशन की जन्मशती वर्ष में विदुषी प्रभा अत्रे और मन्ना डे से राग भैरवी के गीत सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की आठवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ का एक अनूठा गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग भैरवी के स्वरों में पिरोया है। यह गीत मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में निबद्ध एक भक्तिगीत सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



मन्ना डे
सुरगन्धर्व मन्ना डे से रोशन का साथ 1957 की फिल्म 'आगरा रोड' से हुआ जिसमे मन्ना डे ने गीता दत्त के साथ एक हास्य गीत -"ओ मिस्टर, ओ मिस्टर सुनो एक बात..." गाया था। 1959 में मन्ना डे ने रोशन की तीन फिल्मों -'आँगन', 'जोहरा ज़बीं' और 'मधु' के गीतों को गाया, जिसमें 'मधु' फिल्म का भजन -"बता दो कोई कौन गली गए श्याम..." बहुत लोकप्रिय हुआ। 1960 की फिल्म 'बाबर' की कव्वाली -"हसीनों के जलवे परेशान रहते....." ने भी संगीत प्रेमियों को आकर्षित किया। परन्तु इन दोनों बहुआयामी कलाकारों की श्रेष्ठतम कृति तो अभी आना बाकी था। 1960 में फिल्म 'बरसात की रात' आई, जिसके लिए रोशन ने एक 12 मिनट लम्बी कव्वाली का संगीत रचा। इसे गाने के लिए मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा और एस.डी. बातिश को चुना गया। मन्नाडे को इस जवाबी कव्वाली में उस्ताद के लिए, मोहम्मद रफ़ी को नायक भारत भूषण के लिए और आशा भोसले को नायिका के लिए गाना था। इस कव्वाली के बोल थे -"ना तो कारवाँ की तलाश है...."। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह कव्वाली फिल्म संगीत के क्षेत्र में 'मील का पत्थर' सिद्ध हुआ। रोशन और मन्ना डे, दोनों शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे और लोक संगीत की समझ रखने वाले थे। 1963 में रोशन को एक अवसर मिला, अपना श्रेष्ठतम संगीत देने का। फिल्म थी 'दिल ही तो है', जिसमे राज कपूर और नूतन नायक-नायिका थे। यह गाना राज कपूर पर फिल्माया जाना था। फिल्म के प्रसंग के अनुसार एक संगीत मंच पर एक नृत्यांगना के साथ बहुत बड़े उस्ताद को गायन संगति करनी थी। अचानक उस्ताद के न आ पाने की सूचना मिलती है। आनन-फानन में चाँद (राज कपूर) को दाढ़ी-मूंछ लगा कर मंच पर बैठा दिया जाता है। रोशन ने इस प्रसंग के लिए गीत का जो संगीत रचा, उसमे शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत की इतनी सारी शैलियाँ डाल दीं कि उस समय के किसी फ़िल्मी पार्श्वगायक के लिए बेहद मुश्किल काम था। मन्ना डे ने इस चुनौती को स्वीकार किया और गीत -"लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे...." को अपना स्वर देकर गीत को अमर बना दिया। इस गीत का ढांचा 'ठुमरी' अंग में है, किन्तु इसमें ठुमरी के अलावा 'तराना', 'पखावज के बोल', 'सरगम', नृत्य के बोल', 'कवित्त', 'टुकड़े', यहाँ तक कि तराना के बीच में हल्का सा ध्रुवपद का अंश भी इस गीत में है। संगीत के इतने सारे अंग मात्र सवा पाँच मिनट के गीत में डाले गए हैं। जिस गीत में संगीत के तीन अंग होते हैं, उन्हें 'त्रिवट' और जिनमें चार अंग होते हैं, उन्हें 'चतुरंग' कहा जाता है। मन्ना डे के गाये इस गीत को कोई नया नाम देना चाहिए। यह गीत भारतीय संगीत में 'सदा सुहागिन राग' के विशेषण से पहचाने जाने वाले राग -"भैरवी" पर आधारित है। कुछ विद्वान् इसे राग "सिन्धु भैरवी" पर आधारित मानते हैं किन्तु जाने-माने संगीतज्ञ पं. रामनारायण ने इस गीत को "भैरवी" आधारित माना है। गीत की एक विशेषता यह भी है कि गीतकार साहिर लुधियानवी ने कबीर के एक निर्गुण पद की भावभूमि पर इसे लिखा है। आइए इस कालजयी गीत को सुनते हैं।

राग भैरवी : ‘लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे...’ : मन्ना डे : फिल्म – दिल ही तो है


प्रभा अत्रे
राग भैरवी के स्वर-समूह अनेक रसों का सृजन करने में समर्थ होते हैं। इनमें भक्ति और करुण रस प्रमुख हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने एक बातचीत के दौरान बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक नवदुर्गा की स्तुति। इस गीत में देवी के विविध स्वरूपों का वर्णन भी है। आप इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरवी : "जगज्जननी भवतारिणी मोहिनी तू नवदुर्गा..." : डॉ. प्रभा अत्रे




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 320वें अंक की पहेली में आज हम आपको संगीतकार रोशन द्वारा स्वरबद्ध वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग में निबद्ध है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 24 जून, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 324वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 320वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘ताजमहल’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर रोशन की जन्मशती वर्ष पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग भैरवी में निबद्ध एक कालजयी गीत और राग भैरवी की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शनिवार, 17 जून 2017

चित्रकथा - 23: उत्तर प्रदेश के 12 लोकप्रिय लोक-गीतों पर आधारित 12 फ़िल्मी गाने (भाग - 2)

अंक - 23

उत्तर प्रदेश के 12 लोकप्रिय लोक-गीतों पर आधारित 12 फ़िल्मी गाने


"चले आओ सैयाँ, रंगीले मैं वारी..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



विश्व के हर में लोक-संगीत का अलग ही मुकाम है। संगीत की यह वह धारा है जिसे गाने के लिए किसी कौशल और शिक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो लोक संगीत है जिसे हर कोई गा सकता है अपने तरीके से। भारत में लोक-संगीत की जो विविधता है, ऐसी विविधता विश्व के किसी और देश में नहीं है। हमारे एक राज्य के भीतर भी अलग अलग प्रांतों में अलग अलग तरह के लोक गीत गाए जाते हैं। और हमारे फ़िल्मी संगीतकारों ने भी लोक-संगीत के इस अनमोल धरोहर को अपनी फ़िल्मी रचनाओं में ग्रहण किया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न लोक गीतों की छाया हमें फ़िल्मी गीतों में सुनाई देती आई है। आइए आज ’चित्रकथा’ में उत्तर-प्रदेश के 12 प्रसिद्ध लोक गीतों और उनसे प्रेरित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की बात करें। इस अंक को तैयार करने के लिए ’विविध भारती’ के ’संगीत सरिता’ में अन्तर्गत प्रसारित श्रॄंखला ’एक धुन दो रूप’ से जानकारियाँ ली गई हैं। पिछले सप्ताह आपने इस लेख का पहला भाग पढ़ा, आज प्रस्तुत है इसका दूसरा व अन्तिम भाग।




उत्तर प्रदेश के लोक गीतों पर आधारित फ़िल्मी गीतों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। इन लोक गीतों में एक श्रेणी लोरियों का है। लोरी गीत एक ऐसा गीत है जो बच्चे को सुलाने के लिए गाया जाता है। लोरी गायकी ऐसी सुकूनदायक होती है कि जिसे सुनते हुए नींद आ जाती है। परेशानियों से घिरा इंसान को भी सुकून दे जाती है लोरी। एक प्रचलित लोरी है "गते गते नैन दुआरिया रे, निन्दिया काहे न आवे"। इसका अर्थ यह है कि आँखें दरवाज़े की तरफ़ है, निन्दिया नहीं आ रही है मेरे बाबू को। माँ बच्चे के माथे पे हाथ फिरा रही है, जतन कर रही है, फिर भी नींद काहे नहीं आ रही है! सुलाने के साथ-साथ बच्चे के एक अच्छे भविष्य के लिए माता-पिता कामना करते हुए गाते हैं, गुनगुनाते हैं। उपर्युक्त लोरी में राग मिश्र शिवरंजनी की एक झलक मिलती है। दीपचन्दी और रूपक ताल में निबद्ध है यह गीत। ख़ास तौर से विदाई के गीतों में दीपचन्दी ताल का प्रयोग होता है। रूपक और दीपचन्दी तालों में ठेके का अन्तर होता है। रूपक सात मात्राओं का होता है जबकि दीपचन्दी चौदह मात्राओं का। रूपक और दीपचन्दी तालों पर ढेर सारे फ़िल्मी गीत बजे हैं। और ख़ास तौर से इस लोक गीत की धुन पर जो फ़िल्मी गीत बना है, वह है फ़िल्म ’अलबेला’ का "धीरे से आजा री अखियन में निन्दिया आजा री आजा..."। सी. रामचन्द्र द्वारा स्वरबद्ध यह गीत राजेन्द्र कृष्ण का लिखा हुआ है। इस लोरी के तीन संस्करण हैं। पहला संस्करण ’हैप्पी’ और दूसरा संस्करण ’सैड’, दोनों लता मंगेशकर की आवाज़ में गीता बाली पर फ़िल्माया हुआ, और तीसरा संस्करण है चितलकर की आवाज़ में जो अभिनेता भगवान पर फ़िल्माया गया है। हिन्दी फ़िल्मों में बहुत कम ऐसी लोरियाँ हैं जो पुरुष कंठ में हैं, और फ़िल्म ’अलबेला’ की यह लोरी उन्हीं ख़ास लोरियों में से एक है।


लोरी के बाद अब बातें विदाई गीत की। विदाई गीत आम तौर पर लड़की की शादी के बाद विदाई की रस्म को निभाते वक़्त गायी जाती है और इसमें ससुराल जाती हुई लड़की की जो भी भावनाएँ होती हैं, वो सब प्रकट किए जाते हैं। और साथ ही साथ माँ, पिता, भाई-बहन और सखी-सहेलियों की भावनाओं को भी शामिल किया जाता है। विदाई गीत बड़ा मार्मिक गीत है और उत्तर प्रदेश के लखनऊ अंचल के आसपास सर्वाधिक गाया जाता है। विदाई गीतों में जो गीत सर्वाधिक प्रचलित है, वह है "काहे को ब्याही बिदेस, लखी बाबुल मोरे..."। शब्दों का थोड़ा हेर-फेर भी इस गीत में नज़र आता है, जैसे कि किसी किसी में "ब्याही" की जगह "दीनी" भी गाया जाता है - "काहे को दीनी बिदेस..."। इस गीत में एक बेटी अपने पिता से कह रही है कि "काहे को ब्याही बिदेस अरे लखिया बाबुल, बाबुल लखिया मोरे"। आगे कहती है - भैया को दे दी महला दो महला", अर्थात् भैया को तो दो मंज़िला मकान दे दिया और मुझे भेज रहे हो परदेस! अरे लखिया बाबुल, आपने ऐसा क्यों किया? मैं तो आपकी बेटी हूँ। फिर गाती है "मैं तो हूँ बाबुल तेरी आंगन की गैया", मैं तो बेटी हूँ, आंगन की गाय हूँ, अरे यहान से वहाँ बाँध देते, इतनी दूर क्यों भेज दिया मुझे! बेटी की व्यथा है कि इतनी दूर शादी कर रहे हो मेरी, कभी माँ को देखने का मन हुआ, पिता को देखने का मन हुआ, उस समय आना संभव होगा, नहीं होगा, मैं नहीं जानती हूँ। इस गीत को पारम्परिक लोक रचना कहा जाता है, पर ऐसी भी मान्यता है कि इसे अमीर ख़ुसरो ने लिखा था। इस गीत का कई फ़िल्मों में प्रयोग किया गया है। 1942 की फ़िल्म ’झंकार’ में बशीर दहल्वी के संगीत में राजकुमारी ने इसे गाया था। फिर 1948 में अज़ीज़ ख़ान के संगीत में लता मंगेशकर ने इसे गाया। इसी वर्ष फ़िल्म ’सुहाग रात’ में स्नेहल भाटकर के संगीत में मुकेश ने गाया था "लखी बाबुल मोरे, काहे को दीन्ही बिदेस"। 1954 की फ़िल्म ’सुहागन’ में सी. रामचन्द्र के संगीत में आशा भोसले ने इसे गाया। 1968 में एस. एन. त्रिपाठी के संगीत में फ़िल्म ’नादिर शाह’ में इसे गाया सुमन कल्याणपुर और श्यामा हेमाडी ने। 1977 में आशा भोसले ने फिर एक बार इसे गाया लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत में फ़िल्म ’आधा दिन आधी रात’ के लिए। लक्ष्मी-प्यारे ने 1980 में भी अपनी फ़िल्म ’माँग भरो सजना’ में इस गीत को स्वरबद्ध किया जिसे कविता कृष्णमूर्ति ने गाया। और 1981 में ख़य्याम के संगीत में उनकी अर्धांगिनी व गायिका जगजीत कौर ने कालजयी फ़िल्म ’उमराव जान’ में इसे गाया। जगजीत कौर के गाए संस्करण की शुरुआत में राग तिलक कामोद की झलक मिलती है पर आगे चल कर स्वर बदल जाता है। धीमी लय में दीपचन्दी ताल की वजह से भाव और व्यथा पूरी पूरी निखर के सामने आती है।


"काहे को ब्याही बिदेस" अगर सर्वाधिक प्रचलित विदाई गीत है तो एक और लोकप्रिय विदाई गीत है "मोरे अंगने की सोन चिड़ैया चली"। इस गीत में भी भाव लगभग वही है जो पिछले गीत का था, लेकिन दोनों गीतों में फ़र्क है। "काहे को ब्याही..." में एक बेटी के दिल की पुकार थी, उसकी व्यथा थी, उसकी शिकायत थी अपने पिता से कि लखी बाबुल, आपने क्यों मुझे परदेस में भेज दिया। लेकिन "मोरे अंगने की..." गीत में भाव पिता का है। "सोन चिड़ैया" यानी कि सोने की चिड़िया। पिता कहता है कि मेरी सोने की चिड़िया, मेरे आंगन में जो रहती है, आज जा रही है। इस गीत में सारे भाव पिता का है कि उन्होंने अपनी बेटी को कैसे पाला, कैसे लाड किया, कैसे बड़ा किया उसे। अन्य विदाई गीतों की तरह यह गीत भी दीपचन्दी ताल पर आधारित है। विदाई गीतों की ख़ासियत यह है कि चाहे जब भी हम इन्हें सुनें, आँखें नम हो जाती हैं। गीत के बोल और धुन व ताल, सब एक साथ मिल जुल कर ऐसा समा बाँध देता है कि करुण रस का संचार होने लगता है सुनने वाले के दिल-ओ-दिमाग़ में। दीपचन्दी में जो विदाई गीत होते हैं, उनमें कम बोलों का प्रयोग किया जाता है क्योंकि गाने का जो भाव है, उसमें ज़्यादा बोलों के प्रयोग से भाव कम हो जाने की स्थिति बन सकती है। शब्दों की प्रधानता होने की वजह से बोल कम रखा जाता है, आधुनिक भाषा में यह कह सकते हैं कि शब्दों का "बिज़ी पैटर्ण" नहीं रखते। यह गीत राग गारा पर आधारित है। संगीतकार नौशाद के संगीत में महबूब ख़ान की कालजयी फ़िल्म ’मदर इंडिया’ में शमशाद बेगम ने गाया था "पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली" जो इस पारम्परिक लोक गीत "मोरे अंगने की सोन चिड़ैया चली" पर आधारित है। शमशाद बेगम की खनकती पर उदासी भरी आवाज़ में यह गीत रोंगटे खड़े कर देता है जब कभी भी हम इसे सुनते हैं।

उत्तर प्रदेश के लोक गीतों में ख़ास जगह रखती है चैती। चैती गीत सावन के आसपास के समय में गाया जाता है। समूह गीत के रूप में चैती गाया जाता है जिसमें एक मुख्य गायक होता या होती है, और बाकी लोग आख़िरी लाइन साथ में गाते हैं। एक प्रचलित चैती रचना है "एही थैया मोतिया हेराय ग‍इल रामा", यहीं कहीं मोतिया हेराय ग‍इल रामा, कहाँ कहाँ ढूंढ़ू, यानी कि मेरे पास एक मोती था, खो गया है, अब उसे कहाँ ढूंढ़ू? और मैं ढूंढ़ रही हूँ, पति से पूछ रही हूँ, देवर से पूछ रही हूँ, मैं ढूंढ़ रही हूँ, और किस किस से पूछूँ! इसी समस्या को लेकर पूरा गीत बन जाता है। और इसमें भी फिर से दीपचन्दी ताल का प्रयोग हुआ है। लेकिन अन्त में ताल दीपचन्दी से कहरवा बन जाता है और यही इसकी ख़ूबसूरती है कि बीच में लय दुगुना हो जाता है लेकिन बाद में इसी दीपचन्दी पर वापस आ जाता है। इस गीत में मिश्र तिलक कामोद राग की झलक मिलती है। फ़िल्मों में भी चैती गीतों का प्रयोग समय समय पर होता आया है, एक लोकप्रिय गीत है फ़िल्म ’बन्दिनी’ का "अब के बरस भेजो भैया को बाबुल" जो एक पारम्परिक चैती रचना पर आधारित है। पर उपर्युक्त चैती पर आधारित जो फ़िल्मी गीत है वह है 2007 की फ़िल्म ’लागा चुनरी में दाग’ का। शान्तनु मोइत्र के संगीत में इसे रेखा भारद्वाज ने गाया है और गीत के बोल भी लगभग वही है "एही थैया मोतिया हेराय ग‍इल..."। फ़िल्म संगीत एक शक्तिशाली माध्यम है जिससे दूर दराज़ के प्रान्तों के लोक गीतों को देश भर के जन जन तक पहुँचाया जा सकता है, और ऐसा ही होता आया है फ़िल्म-संगीत के शुरुआती दिनों से लेकर अब तक। 



उत्तर प्रदेश के लोक गीतों में अब एक लाचारी की बातें। "बहारदार बगिया न ज‍इबे राजा" एक लाचारी लोक गीत है जिसका अर्थ यह है कि नायिका कह रही है कि बहारदार बगिया जो है वहाँ, मैं नहीं जाऊँगी, ऐसा लगता है जैसे ससुरों का डेरा है, बार बार ससुर सामने आ जाते हैं तो मैं बार बार उनके पाँव नहीं छूऊँगी। फिर कुछ कहती है कि वहाँ भासुरों (जेठों) का डेरा है, तो मैं बार बार घुंघट नहीं करूँगी। ये सब वो अपने पति को बता रही है, नख़रे दिखा रही है। आगे कहती है कि मेरे देवर जी आ रहे हैं, तो मैं बार बार ठुमका (यहाँ ठुमका का अर्थ है मज़ाक) नहीं, एक बार हो गया, बस! लेकिन अन्त में उसने कहा है कि पिया बुलाएँगे तो मैं बार बार जाऊँगी। पति का भाव है, उनका अंदाज़ है, उनका हक़ है, जो पूरे परिवार को दिखना चाहिए और साथ ही मेरी भी मर्ज़ी चलनी चाहिए। अपने मन के जो भाव हैं, उसे लोक गीत के माध्यम से किस सुन्दर तरीके से व्यक्त किया गया है इस लाचारी में, उसे बस इसे सुनते हुए ही महसूस किया जा सकता है। हमारे लोक गीतों की ख़ासियत ही यह है कि जीवन से जुड़ी जो बातें हैं, उलाहना है, और एक प्यार भरी मीठी बात है, वह दिल को छू लेती है। और इसमें श्रॄंगार रस भी है। ताल के माध्यम से भी श्रॄंगार रस को बढ़ावा मिलता है और ताल में भी इतनी शक्ति है कि वो इन भावों को कितने सुन्दर तरीके से सुननेवालों को समझा सकती है। ताल में एक लग्गी लड़ी है, दादरे में, जो ख़ुशी को ज़ाहिर करने में इस्तमाल होता है। साथ में लग्गी लड़ी भी बजायी है। "बहारदार बगिया..." गीत में राग कल्याण का अंक सुनाई पड़ता है और इस लोक गीत पर आधारित फ़िल्मी रचना है 1982 की फ़िल्म ’बाज़ार’ में। जगजीत कौर और पामेला चोपड़ा की आवाज़ों में यह ख़य्याम साहब की रचना है "चले आओ सैयाँ, रंगीले मैं वारी"। इस गीत के अन्तरों की शुरुआत को सुनने पर जैसे राग पीलू का आभास होता है, मसलन "सजन मोहे तुम बिन भाये ना..." वाले हिस्से में। खमाज, मंज खमाज, तिलक कामोद और पीलू राग जैसे एक चतुर्भुज समानता पैदा करती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रचलित विवाह और विदाई गीत, चैती, कजरी आदि इस चतुर्भुज का हिस्सा बनते हैं। "काहे को ब्याही बिदेस" की चर्चा हम कर चुके हैं, एक और गीत जो इस चतुर्भुज में आता है, वह है "प्यार कुछ और भी भड़का दी झलक दिखला के"। 1958 की फ़िल्म ’लाला रुख़’ का यह नग़मा है।


उत्तर प्रदेश के लोक गीतों में एक महत्वपूर्ण श्रेणी है कजरी की। उपशास्त्रीय संगीत गायन की एक शैली है कजरी जो बिहार में भी परचलित है। अक्सर चैती में सावन के आने पर अपने प्रेमी/ पिया/ पति के इन्तज़ार में नायिका इसे गाती है। वर्षा ॠतु का गीत है कजरी। चैती, होरी और सावनी की तरह कजरी भी ॠतु गीतों की श्रेणी में आता है जो सबसे ज़्यादा बनारस, मिर्ज़ापुर, मथुरा, इलाहाबाद और बिहार के भोजपुर अंचलों में गाया जाता रहा है। एक लोकप्रिय कजरी है "बरसे बदरिया सावन की"। कजरी में इन्तज़ार की वजह से श्रॄंगार के साथ-साथ थोड़ा विरह पक्ष भी होता है। अपने नायक की पतीक्षा कर रही नायिका गाती है "बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की, सावन में उमंग्यो मेरो मनवा झनक सुनी हरि आवन की"। आगे गाती है "उमड़ घुमड़ चहुँ दिसा से आयो, दामिनी धमके झर लावन की"। और फिर अन्त में बारिश शुरु जाने पर वो गाती है "नन्ही नन्ही बून्दन मेघा बरसे, शीतल पवन सुहावन की"। कहरवा ताल में निबद्ध यह लोक रचना राग भैरवी पर आधारित है। वैसे इसे कुछ गायकों ने राग श्याम कल्याण और तीन ताल में भी गाया है। संगीतकार वसन्त देसाई ने इस लोक गीत पर आधारित एक फ़िल्मी गीत की रचना की थी वी. शान्ताराम की सुरीली फ़िल्म ’गूंज उठी शहनाई’ के लिए। लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गाना था "दिल का खिलौना हाय टूट गया"। भरत व्यास का लिखा यह गीत हू-ब-हू उन्हीं स्वरों पर आधारित है जिन स्वरों पर "बरसे बदरिया सावन की" आधारित है।

इस तरह से उत्तर प्रदेश के प्रचलित लोक गीतों पर आधारित बारह फ़िल्मी रचनाओं की बातें हमने की। ऐसे और भी ढेर सारे गीत हैं जो यू.पी के लोक धुनों पर आधारित हैं, हमारी कोशिश यही थी कि अलग अलग शैलियों के कम से कम एक एक गीत के ज़रिए लोक गीत और फ़िल्मी गीत के आपस के रिश्ते को साकार करें। अगले सप्ताह फिर किसी रोचक विषय के साथ हम पुन: उपस्थित होंगे, नमस्कार!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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