रविवार, 29 मई 2016

राग ललित : SWARGOSHTHI – 272 : RAG LALIT





स्वरगोष्ठी – 272 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 5 : मन्ना डे और लता के दिव्य स्वर में ललित

‘प्रीतम दरस दिखाओ...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हम राग ललित के स्वरों में पिरोये गए फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’ गीत का रसास्वादन कराएँगे। राग आधारित गीतों को स्वर देने में दक्ष पार्श्वगायक मन्ना डे और लता मंगेशकर के युगल स्वरो में यह गीत है। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग ललित के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की राग ललित की एक मनभावन रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन के संगीत सफ़र के शुरुआती दिनों के बारे में हमने पिछले अंक में ज़िक्र किया था। आइए कहानी को वहीं से आगे बढ़ाते हैं। 1947 में दिल्ली में आकाशवाणी की नौकरी को छोड़ कर मदन मोहन मायानगरी बम्बई आ पहुँचे। उन्हें गाने का बहुत शौक़ था और वो गाते भी बहुत अच्छा थे। 1947 में ही उन्हें बहज़ाद लखनवी की लिखी दो ग़ज़लें गाने और रेकॉर्ड करवाने का मौक़ा मिल गया। ये ग़ज़लें थीं "आने लगा है कोई नज़र जलवा गर मुझे..." और "इस राज़ को दुनिया जानती है..."। इसके अगले साल, 1948 में उन्हें दो और प्राइवेट ग़ज़ल रेकॉर्ड करने का अवसर मिला जिनके शायर थे दीवान शरार। मदन मोहन की आवाज़ में ये दो ग़ज़लें थीं "वो आए तो महफ़िल में इठलाते हुए आए..." और "दुनिया मुझे कहती है कि मैं तुझको भुला दूँ..."। प्राइवेट रेकॉर्ड से सीधे फ़िल्मी गीत रेकॉर्ड करने के लिए उन्हें ज़्यादा इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। उसी साल लता मंगेशकर के साथ मास्टर ग़ुलाम हैदर के संगीत निर्देशन में 1948 की फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन का गीत गाने का मौक़ा मिला जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले, मेरा छोटा सा दिल डोले..."। लेकिन बदक़िस्मती से ना तो यह गीत फ़िल्म में रखा गया और ना ही इसे ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर जारी किया गया। फ़िल्म संगीत संसार में उनकी एन्ट्री होते होते रह गई। लेकिन जल्दी ही उन्होंने संगीतकार सचिन देव बर्मन के सहायक के रूप में काम करना शुरू कर दिया फ़िल्म ’दो भाई’ में। 1948-49 में उन्होंने संगीतकार श्यामसुन्दर को असिस्ट किया फ़िल्म ’ऐक्ट्रेस’ और ’निर्दोष’ में। मदन मोहन के पिता राय बहादुर चुन्नीलाल के ’बॉम्बे टॉकीज़’ और फिर ’फ़िल्मिस्तान’ के साथ सम्बन्ध होने की वजह से फ़िल्म जगत में दाख़िल होने में उन्हें कुछ हद तक मदद मिली। पर मदन मोहन ने इस रिश्ते के बलबूते कभी कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं की। कारण यह था कि उनके पिता ने दूसरी विवाह कर लिया था, जिससे वो अपने परिवार से दूर हो गए थे। इस पारिवारिक मनमुटाव की वजह से मदन मोहन ने कभी अपने पिता के नाम का सहारा नहीं लिया। बतौर स्वतन्त्र संगीतकार मदन मोहन को उनका पहला ब्रेक कैसे मिला, यह कहानी हम आपको बतायेंगे इस श्रृंखला की अगली कड़ी में।

अब आते हैं आज के गीत पर। आज का राग है ललित। इस राग के लिए मदन मोहन के जिस गीत को हमने चुना है, वह है फ़िल्म ’चाचा ज़िन्दाबाद’ से। लता मंगेशकर और मन्ना डे की युगल आवाज़ों में "प्रीतम दरस दिखाओ..." शास्त्रीय संगीत पर आधारित बनने वाले फ़िल्मी गीतों में विशेष स्थान रखता है। 1959 में निर्मित इस फ़िल्म का गीत-संगीत बिल्कुल असाधारण था। एक तरफ़ "बैरन नींद ना आए..." और "प्रीतम दरस दिखाओ..." जैसी राग आधारित रचनाएँ थीं तो दूसरी तरफ़ Rock 'N' Roll आधारित किशोर कुमार का गाया "ऐ हसीनों, नाज़नीनों..." जैसा गीत था। बदक़िस्मती से फ़िल्म फ़्लॉप हो गई और इसकी कब्र में इसके गानें भी चले गए। पर अच्छी बात यह है कि शास्त्रीय संगीत आधारित फ़िल्म के दोनों गीतों को कम ही सही पर मकबूलियत ज़रूर मिली थी। "प्रीतम आन मिलो..." गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि एक लड़की अपने गुरु से शास्त्रीय संगीत सीख रही है। इस सिचुएशन पर मदन मोहन ने राजेन्द्र कृष्ण से "प्रीतम दरस दिखाओ..." गीत लिखवा कर राग ललित में उसे स्वरबद्ध किया। उनकी दिली ख़्वाहिश थी कि इस गीत को उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब और लता मंगेशकर गाए। लेकिन जब लता जी के कानों में यह ख़बर पहुँची कि मदन जी उनके साथ उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब को गवाने की सोच रहे हैं, वो पीछे हो गईं। उन्होंने निर्माता ओम प्रकाश और मदन मोहन से कहा कि उन्हें इस गीत के लिए माफ़ कर दिया जाए और किसी अन्य गायिका को ख़ाँ साहब के साथ गवाया जाए। मदन मोहन अजीब स्थिति में फँस गए। वो लता जी के सिवाय किसी और से यह गीत गवाने की सोच नहीं सकते थे, और दूसरी तरफ़ ख़ाँ साहब को गवाने की भी उनकी तीव्र इच्छा थी। जब उन्होंने लता जी से कारण पूछा तो लता जी ने उन्हें कहा कि वो इतने बड़े शास्त्रीय गायक के साथ गाने में बहुत नर्वस फ़ील करेंगी जिनकी वो बहुत ज़्यादा इज़्ज़त करती हैं। लता जी ने भले उस समय यह कारण बताया हो, पर कारण कुछ और भी थे। वो नहीं चाहती थीं कि उनके साथ ख़ाँ साहब की तुलनात्मक विश्लेषण लोग करे। दूसरा, एक बार कलकत्ता में बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के साथ स्टेज शो में लता जी बहुत शर्मनाक स्थिति में पड़ गई थीं जब वहाँ मौजूद दर्शकों ने बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब से ज़्यादा लता जी को तवज्जो देते हुए शोर मचाने लगे थे। ख़ाँ साहब की लता जी बहुत इज़्ज़त करती थीं, पर उस घटना ने उन्हें बेहद लज्जित कर दिया था। लता जी ने क़सम खा लिया कि इसके बाद शास्त्रीय गायकों के साथ कभी शोज़ नहीं करेंगी। ख़ैर, "प्रीतम दरस दिखाओ...” को अन्त में मन्ना डे और लता जी ने गाया। लीजिए, अब आप राग ललित के स्वरों में यह प्यारा युगल गीत सुनिए।


राग ललित : ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद



आज के अंक में अब हम आपसे राग ललित की संरचना पर कुछ चर्चा कर रहे हैं। राग ललित, भारतीय संगीत का एक अत्यन्त मधुर राग है। राग ललित पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ, कोमल धैवत तथा दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति षाड़व-षाड़व होती है। अर्थात, राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने राग ललित में शुद्ध धैवत के प्रयोग को माना है। उनके अनुसार यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग ललित की जो स्वर-संरचना है उसके अनुसार यह राग किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। मारवा थाट के स्वरों से राग ललित के स्वर बिलकुल मेल नहीं खाते। राग ललित में शुद्ध मध्यम स्वर बहुत प्रबल है और यह राग का वादी स्वर भी है। इसके विपरीत मारवा में शुद्ध मध्यम सर्वथा वर्जित होता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। आपको राग ललित का उदाहरण सुनवाने के लिए हमने विश्वविख्यात शहनाईनवाज उस्ताद बिस्मिलाह खाँ की शहनाई को चुना है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ अपनी शहनाई पर राग ललित में तीनताल में निबद्ध एक मोहक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए, आप भी इस मधुर शहनाई पर राग ललित का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग ललित : शहनाई पर तीनताल की गत : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 272वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान सकते हैं? गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 4 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 274वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 270 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘संजोग’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – कल्याण अथवा यमन, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मुकेश

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, जिन्होने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी चारो विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला की पहेली (261 से 270वें अंक) में प्राप्तांकों की गणना के बाद सर्वाधिक 20 अंक अर्जित कर दो प्रतिभागियों - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। 18 अंक प्राप्त कर वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया ने दूसरा, 16 अंक पाकर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल ने तीसरा और 15 अंक अर्जित कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने श्रृंखला में चौथा स्थान प्राप्त किया है। श्रृंखला के सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग ललित का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के अगले अंक में हम संगीतकार मदन मोहन के एक अन्य राग आधारित गीत के साथ प्रस्तुत होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  

शनिवार, 28 मई 2016

BAATON BAATON MEIN - 19: INTERVIEW OF SHAMSHAD BEGUM (PART-2)

बातों बातों में - 19

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत
भाग-2

"ज़िआ ने फिर कभी भी मुझे मेक-अप लगाने को नहीं कहा "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत। गजेन्द्र खन्ना के वेबसाइट www.shamshadbegum.com पर यह साक्षात्कार अंग्रेज़ी में पोस्ट हुआ था जनवरी 2012 में। गजेन्द्र जी की अनुमति से इस साक्षात्कार को हिन्दी में अनुवाद कर हम ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले महीने हमने पेश किए थे इस साक्षात्कार का पहला भाग; आज प्रस्तुत है इसका दूसरा भाग।

    


दोस्तों, पिछले सप्ताह सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की लम्बी बातचीत के पहले भाग में शमशाद जी ने अपने जीवन के शुरुआती दिनों का हाल विस्तृत तरीके से बताया। और बातचीत का सिलसिला आकर रुका था उनकी पहली सुपरहिट हिन्दी फ़िल्म ’ख़ज़ांची’ पर। यहाँ से बातचीत का सिलसिला आज हम आगे बढ़ाते हैं...


'ख़ज़ांची’ की कामयाबी के बाद आपकी ज़िन्दगी किस तरह से संवरी, किस तरह से बदली?

मुझे हर किसी से मुबारक़बाद मिली, सबने वाह-वाही की, शाबाशी दी। अब तक मेरी आवाज़ पंजाब और इसके आसपास तक सीमित थी, पर इस फ़िल्म की वजह से पूरे देश भर के लोगों को मेरी आवाज़ सुनने का मौक़ा मिला, लोग मेरी आवाज़ को पहचानने लगे, और इस वजह से मेरे लिए बहुत से नए दरवाज़े खुल गए। पंडित गोबिन्दराम और पंडित अमरनाथ के लिए मैंने लाहौर में गाना शुरु कर दिया। 

1943 में फ़िल्म ’तक़दीर’ का ऑफ़र आपको कैसे मिला?

इसके लिए मैं शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ महबूब ख़ान साहब का जिनकी ज़िद या इसरार की वजह से मुझे
इस फ़िल्म से जुड़ने का मौक़ा मिला। वो अपने ज़माने के मशहूर डिरेक्टर थे। उनकी फ़िल्में जैसे कि ’जागिरदार’ (1937), 'डेक्कन क्वीन’ (1936), और 'औरत’ (1940) बहुत कामयाब हुई थी; ’औरत’ तो मील का पत्थर साबित हुई। तब लोग उन्हें Father of Indian Cinema कहने लगे थे फ़िल्मों में उनकी योगदान के लिए। उन्होंने मेरे गीत ’ख़ज़ांची’ केसुन रखे थे। ’तक़दीर’ वो प्लान कर रहे थे मोतीलाल और नई लड़की नरगिस को लेकर। उन्होंने अपने सेक्रेटरी से कहा कि मेरी बूकिंग् करा ले। सेक्रेटरी ने उनसे कहा कि "साहब, ये आर्टिस्ट बूक नहीं होती"। जब महबूब साहब ने उनसे इसका कारण पूछा तो सेक्रेटरी ने उन्हें बताया कि इनके सख़्त अब्बा कोई जवाब नहीं देते और इन्हें लाहौर से बाहर निकलने भी नहीं देते"। पर यह सुन कर महबूब साहब हार नहीं माने और सीधे लाहौर पहुँच गए मेरे वालिद साहब को मनाने के लिए। यह उस वक़्त बहुत बड़ी बात थी कि इतने बड़े प्रोड्युसर-डिरेक्टर ख़ुद चल कर बम्बई से लाहौर आये हैं एक नई सिंगर को अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म में गवाने के लिए। यह चर्चा का विषय बन गया था। महबूब साहब हमारे घर पर आए और मेरे अब्बा से कहा, "ये अभी छोटी है। बोलोगे बैठ जाओ तो बैठ जाएगी, जो कहोगे मान लेगी। आपने उसे कुएँ का मेंढक बनाया हुआ है। लेकिन वो तो समुद्र की मछली है। समुद्र में डालोगे तो वहाँ भी तैरेगी। आप इसे इजाज़त नहीं देंगे तो जब ये बड़ी होगी तो आपको अपना करीयर ना आगे बढ़ने के लिए ज़िम्मेदार मानेगी।" मेरे वालिद साहब को उनकी बात समझ में आ गई और उन्होंने मुझे बम्बई जाने की इजाज़त दे दी। महबूब साहब ने उनसे यह वादा किया कि वो मुझे एक घर, गाड़ी और नौकर देंगे ताकि मुझे बम्बई में कोई तक़लीफ़ ना हो। और उन्होंने अपनी बात रखी। मुझे इस फ़िल्म के हर गीत के लिए 300 रुपये देने की बात तय हुई। और मैं बम्बई आ गई ’तक़दीर’ फ़िल्म में गीत गाने के लिए। फ़िल्म के सभी गीत मेरे गाये हुए थे। और सारे गीत बहुत हिट हुए। गाने रेकॉर्ड होते ही मैं फ़ौरन लाहौर भाग गई।

ओह, मेरी यह धारणा थी कि आप ’तक़दीर’ के बाद भी बम्बई में ही रहने लगी थीं। फिर आप दुबारा बम्बई वापस कब और कैसे आईं?

मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब के भतीजे आमिर अली को एक फ़िल्म मिली ’नवयुग चित्रपट’ की - ’पन्ना’। इस फ़िल्म में गीत गाने के लिए मैं फिर से लाहौर से बाहर निकली।

फ़िल्म ’पन्ना’ के गीत तो रेकॉर्ड पर राजकुमारी जी की आवाज़ में हैं, है न?

जी हाँ, रेकॉर्ड्स तो HMV के लिए थे, लेकिन जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूँ कि ’जिएन-ओ-फ़ोन’ की कॉन्ट्रैक्ट की वजह से मैं ग्रामोफ़ोन कंपनी के लिए नहीं गा सकी। ’ख़ज़ांची’, ’ज़मीनदार’, ’तक़दीर’ जैसी फ़िल्मों के रेकॉर्ड्स ’जिएन-ओ-फ़ोन’ पर जारी होने की वजह से मेरे गाये गीत ही रेकॉर्ड पर भी आ सके। यह मसला सुलझा जब HMV ने ’जिएन-ओ-फ़ोन’ को ख़रीद लिया।

तो इस दूसरे सफ़र में कैसा रहा सब?

जब सारे गाने पूरे हो गए, मैं उमराओ ज़िआ बेगम और मास्टर जी से मिलने उनके घर गई और वहाँ दो तीन दिन तक रही। और इस वजह से पूरे शहर में यह बात फैल गई कि मैं वहाँ मौजूद हूँ या बम्बई में रहने लगी हूँ। बहुत से संगीतकार जैसे कि सी. रामचन्द्र और अनिल बिस्वास मुझसे दरख़्वास्त की कि मैं उनके गाने गाऊँ। मैंने उनको कहा कि मेरा बहुत सारा काम लाहौर में पड़ा हुआ है जिन्हें मुझे पूरे करने हैं। और मैंने उनसे यह वादा किया कि मैं दो-एक महीने बाद दुबारा आऊँगी। मैं फिर आई एक हफ़्ते के लिए, दोनों के लिए एक एक गीत गाई और फिर वापस चली गई।

मुझे याद नहीं कि आमिर अली ने फिर किसी फ़िल्म में संगीत दिया था या नहीं। लेकिन ’पन्ना’ के गीत तो काफ़ी हिट हुए थे न?

अफ़सोस कि उनका बहुत जल्दी इन्तकाल हो गया। ’पन्ना’ सिल्वर जुबिली हिट थी और फ़िल्म के रिलीज़ होने के कुछ ही दिनों के अन्दर आमिर साहब का इन्तकाल हो गया। उन्हें और भी अभुत सारी फ़िल्में ज़रूर मिलती लेकिन नसीब ने उनका साथ नहीं दिया।

आप ने लगभग सभी दिग्गज संगीतकारों के लिए गाया है उस ज़माने में। लेकिन उनमें से बहुतों के बारे में बहुत कम ही जाना गया है। इनमें से कुछ की चर्चा करते चलें?

ज़रूर! हमारे ज़माने के लोगों में समर्पण बहुत होता था और मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मैं उनमें से बहुत से लोगों के साथ काम किया है।

एक संगीतकार जिनके साथ आप बिल्कुल शुरुआती से काम करती आई हैं, ये हैं पंडित गोबिन्दराम। उनके लिए आपने जिन फ़िल्मों में गाया था उनमें शामिल हैं ’हिम्मत’ (1941), 'सस्से पुन्नु’ (1946), 'रंगीन ज़माना’ (1948), ’दिल की दुनिया’ (1949), 'माँ का प्यार’ (1949), 'निसबत’ (1949), 'सरकार’ (1951), 'जलपरी’ (1952), 'जीवन नौका’ (1952)। 


जी हाँ, मैंने इनके लिए बहुत गाया। वो बड़े नेक इंसान थे और बहुत मेहनती भी। हमारी बहुत सी फ़िल्मों ने
सिल्वर जुबिली मनाई और इन्होंने मुझे बहुत अच्छे अच्छे गीत गाने को दिए। हम एक दूसरे की बहुत इज़्ज़त करते थे और हमारे बीच एक प्रोफ़ेशनल जो रिश्ता कायम हो गया था। सच तो यह है कि हर किसी के साथ ही मेरा रिश्ता अच्छा रहा; मैं बस अपना काम करती और घर वापस आ जाती। मैंने कदि चाचे, मामे, पुत्तर नहीं बनाए। स्टुडियो जाती थी, सबको आदाब अर्ज़ है बोला, सब ठीक ठाक है पूछा। फिर कहा चलो गाना शुरु करते हैं, गाना किया और सीधे घर। मैंने कभी किसी के साथ ज़्याति रिश्ता कायम करने की कभी नहीं सोची। लेकिन मैं सभी के साथ बहुत अच्छे से पेश आती थी। मेरे वालिद साहब कहा करते थे कि इतने मीठे भी मत बनो कि कोई खा जाए और इतने कड़वे भी मत बनो कि थूक दे। मैं इसी बात का पालन किया करती थी। मैं कभी किसी के साथ बैठ कर हँसी-मज़ाक या बेफ़िज़ुल की बकवास नहीं करती थी। मैं थोड़ा सा अन्तर्मुखी किस्म की थी और इस बात का ख़याल रखती थी कि एक औरत होने के नाते मुझे हर वक़्त और हर जगह अपना मर्यादा बनाये रखना है। इस वजह से कई बार लोग समझते थे कि मैं एक घमंडी औरत हूँ, लेकिन यह बात सच नहीं है। मैं हक़ीक़त में एक नेक और अच्छी औरत थी।


इसका मतलब आप कभी लोगों से नहीं मिलती थीं, पार्टियों वगेरह में?

नहीं! जैसा कबीर ने कहा था कि "ना कहु संग दोस्ती ना कहु संग बैर", मेरे साथ भी यही था। मैं कभी किसी के घर नहीं जाती थी। सिर्फ़ उन आर्टिस्ट्स के घर जाती थी जो संघर्ष कर रहे थे, जिनके पास रिहर्सल करवाने की अच्छी जगह नहीं थी, जैसे कि सी. रामचन्द्र। सी. रामचन्द्र एक कमरे के एक घर में रहा करते थे उस वक़्त और मैं कई दफ़ा उस घर में गई हूँ रिहर्सल करने के लिए। इस प्रोफ़ेशन में मेरी बस एक ही सहेली हुआ करती थी, वो थीं ज़ोहराबाई अम्बालेवाली, जो मेरे घर पर भी आती थीं। मैं अगर उसके घर ना भी जाऊँ तो भी वो मेरे घर आती रहती थीं। मेरी बेटी उषा और उनकी बेटी रोशन कुमारी सहेलियाँ थी।


यहाँ उषा जी बताती हैं आगे का हाल...

जी हाँ, हम दोनों सहेलियाँ थे। ज़ोहरा बाई चाहती थीं कि रोशन भी एक प्लेबैक सिंगर बने, लेकिन रोशन एक
कथक डान्सर बनना चाहती थी। मम्मी ने तब ज़ोहरा जी से बात की कि अपनी बेटी को उसी दिशा में आगे बढ़ने में मदद करे जिस दिशा में वो चाहती है। और देखिए आगे चलकर रोशन एक ऐसी कथक डान्सर बनी जिनका कोई सानी नहीं। आशा जी भी कभी कभार हमारे घर आ जाया करतीं। एक मज़ेदार क़िस्सा बताती हूँ आपको। एक रोज़ वो हमारे घर आईं। हमारे नौकर ने उनसे कहा कि मम्मी नहा रही हैं, इसलिए वो बैठक-खाने में इन्तज़ार करें। मैं बगल के कमरे में थीं, अपने बाल बना रही थी और मन ही मन कुछ गुनगुना रही थी। क्योंकि मेरी आवाज़ अच्छी थी, आशा जी को यह लगा कि मम्मी गा रही है। वो हैरान रह गईं जब अन्दर आकर देखा कि मैं गा रही हूँ। "बाई तुम कितना अच्छा गाती हो!" ऐसा उन्होंने कहा, और मुझसे कहा कि मुझे प्रोफ़ेशनल सिंगर बनना चाहिए। पर मेरे पापा कहाँ मानने वाले थे!

शमशाद जी, आपका नूरजहाँ जी के साथ संबंध किस तरह का था? वो भीत ओ मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब की खोज थीं!

वो बहुत अच्छी इंसान थीं और उतनी ही अच्छी फ़नकार। हमारे छुटपन से ही हम दोनों एक ही ग्रूप के हिस्सेदार
थे। हम एक दूसरे के काम की दाद दिया करते थे और दोनों के बीच एक बहुत ही चंगा रिश्ता था और एक दूसरे की बहुत इज़्ज़त किया करते थे। 


जब वो 1981 में बम्बई आई थीं ’Mortal Men Immortal Melodies’ नामक कॉनसर्ट के लिए, तब क्या आप उनसे मिली थीं?

नहीं, किसी ने मुझे वहाँ नहीं बुलाया वरना ज़रूर उनसे मिलती। क्योंकि शायद मैं इंडस्ट्री से दूर जा चुकी थी, इसलिए लोगों को यह पता नहीं था कि मैं कहाँ रहती हूँ। और मैं उन दिनों अपने बेटी-दामाद के साथ एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट होती रहती थी। सच तो यह है कि 1947 के बटवारे के बाद फिर हम कभी नहीं मिले।


आप उमराओ ज़िआ बेगम, जो ग़ुलाम हैदर साहब की पत्नी भी थीं, के बहुत करीब थीं, है ना?

जी हाँ! जब मैंने ’जिएन-ओ-फ़ोन’ जोइन किया था, तभी से हम अच्छे दोस्त बन गए थे। वो एक अदाकारा के रूप में आई थी और बहुत से गाने भी गाईं। दोनों ने एक साथ भी बहुत सारे गाए। एक ’ढोलक के गीत’ नाम का प्रोग्राम रेडियो पर हर शाम को ब्रॉडकास्ट होता था जिसमें मैं ढोलक बजाती और वो भी कोई दूसरा साज़ बजाती। एक गीत "ताली दे थल्ले बाई के आ माहिया वे आ माहिया आ कर लाइयें दिल दियाँ गल्लाँ" को ख़ूब सारी फ़रमाइशें मिलती थीं। मैं उसे ज़िआ कह कर पुकारा करती थी और आज से क़रीब 15-20 साल पहले जब मैं लाहौर गई थी, तब उससे मिली थी। वो बहुत ख़ूबसूरत थीं और उस ज़माने में जब मेक-अप का ज़्यादा रिवाज़ नहीं था, तब भी वो पूरे मेक-अप में होती थीं। सजने सँवरने का उसे बहुत शौक़ था। हमेशा मैचिंग् के कपड़े पहनती थी और किस कपड़े के साथ कौन से गहने ज़ेवर पहनने हैं इसका पूरा पूरा ख़याल रखतीं। इस वजह से वो कई बार रेडियो स्टेशन देर से पहूँचती। उसके बाद से तो आलम यह था कि जब भी वो थोड़ी देर से पहुँचती, हम समझ जाते कि ज़रूर कोई ज़ेवर या कपड़े की दिक्कत आई होगी! मैंने कभी मेक-अप नहीं लगाया और वो मुझे बार बार मेक-अप लगाने के लिए गुज़ारिश करतीं। मुझे याद है एक दिन मैं उसके घर गई थी, वहाँ उसने फिर से ज़िद शुरु कर दी कि वो मुझ पर मेक-अप लगाएंगी। अचानक कुछ मेहमान वहाँ आए और हम सब हॉल में बातचीत कर रहे थे। बीच में मैंने यह नोटिस किया कि ज़िआ मेरी तरफ़ ध्यान से कुछ देख रही हैं और ज़्यादा बातें भी नहीं कर रही हैं। जब मेहमान चले गए तब उसने मुझे आईना दिखाया। उस दिन गरमी बहुत ज़्यादा थी और मैंने अनजाने में अपने दुपट्टे से अपना मुंह पोंछ लिया था जिस वजह से पूरा मेक-अप बिगड़ गया था। मैं बहुत ही बदसूरत दिख रही थी क्योंकि मामला पूरा बिगड़ चुका था। फिर उस दिन के बाद से ज़िआ ने फिर कभी भी मुझे मेक-अप लगाने को नहीं कहा।

वाक़ई मज़ेदार क़िस्सा था! अब वापस मुड़ते हैं संगीतकारों पर। एक और लाहौरी संगीतकार, पंडित अमरनाथ। इनके लिए आपने ’निशानी’ (1942), 'शिरीं फ़रहाद’ (1945) और ’रूपरेखा’ (1948) में गाने गाए। कुछ बताइए इस बारे में।

वो एक बहुत लायक आदमी थे। उनकी पसन्दीदा गायिका थीं ज़ीनत बेगम, लेकिन मुझे भी उनके लिए गाने के कई मौक़े मिले। तीन भाइयों में वो अव्वल थे। उन्होंने अपने भाइयों हुस्नलाल और भगतराम के लिए भी बहुत कुछ किया।

एक संशय है 1947 की फ़िल्म ’मिर्ज़ा साहिबाँ’ को लेकर। हक़ीक़त में कौन थे इस फ़िल्म के संगीतकार? ख़ुद पंडित अमरनाथ या हुस्नलाल-भगतराम?

जैसा कि मैंने कहा कि पंडित अमरनाथ ने अपने भाइयों के लिए बहुत कुछ किया। इस फ़िल्म के गीतों की रेकॉर्डिंग्स के वक़्त उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। वो गीतों के नोटेशन भेज दिया करते थे, जिन्हें हुस्नलाल और भगतराम रेकॉर्ड करते थे।

आपने हुस्नला-भगतराम के लिए भी बहुत से गाने गाईं हैं। उनके बारे में बताइए।

जी हाँ, उनके पूरे करीयर भर में मैंने उनके लिए गाए।

जी, जैसे कि 60 के दशक में फ़िल्म ’सपनी’ का गीत "सुन भेंगेया वे"।

(गीत के बोलों पर हँसते हुए) जी हाँ, मैं इस तरह के मस्ती भरे गीत बहुत गाई हूँ। कई कम्पोज़र्स के लिए इस तरह के गीतों के ज़रिये पंजाबी लोक संगीत को हिन्दी फ़िल्मों में लोकप्रिय बनाने में इनका काफ़ी योगदान था।

संगीतकारों में अगला नाम मैं लेना चाहूँगा उस्ताद झंडे ख़ाँ साहब का।

झंडे ख़ाँ साहब के लिए मैंने 1943 की फ़िल्म ’पगली’ में गाया था। वो एक मौलवी थे और बहुत मज़हबी क़िस्म
के इंसान थे, एक नमाज़ी। फ़िल्मों में आने से पहले वो स्टेज में काम करते थे। जब मैं उनके लिए गीत गाई तब तक वो 80 साल के हो चुके थे। बहुत ही गुणी संगीतकार थे और बहुत मुश्किल मुश्किल गीत बनाया करते थे। उनके लिए गाना कोई मज़ाक की बात नहीं थी। उस ज़माने में संगीतकार गायकों की कोई बात नहीं सुनते थे, बल्कि गायकों को उनकी ज़रूरतों के मुताबिक़ गाना पड़ता था। गायक को तकलीफ़ हो रही है, इस वजह से कभी किसी बोल को बदल देना या सुर को बदल देना, ये सब नहीं चलता था उस ज़माने में, जैसा कि आज हो रहा है।


शमशाद जी, अब ख़ान मस्ताना साहब के बारे में कुछ बताइए।

वो भी बड़े नेक इंसान थे। मेरा गीत "ऐ हिन्द के मीनार", फ़िल्म शायद ’बैरम ख़ान’ थी, बहुत हिट हुआ था यह गाना। मैंने फ़िल्म ’हुमायूं’ में भी उनके लिए गाया है। वो अपने आप में ही रहते थे, ज़्यादा किसी से बातचीत नहीं करते थे। उन्होंने सिर्फ़ संगीत ही नहीं दिया बल्कि एक उम्दा गायक भी थे और बहुत अच्छे अच्छे गीत भी गाए। पर अफ़सोस की बात है कि धीरे धीरे वो धुंद में कहीं खो गए। 


अच्छा ग़ुलाम मोहम्मद साहब कैसे इंसान थे?

वो एक बड़े लायक कम्पोज़र थे। बहुत ही सीधे आदमी थे। वो भी फ़िल्मों में आने से पहले स्टेज में काम किया करते थे। बड़ी पिक्चरें की हमने साथ में।

और फ़िरोज़ निज़ामी?

वो तो क्लासिकल वाला था; बड़ी सारी फ़िल्मों में क्लासिकल कम्पोज़िशन्स दिए उन्होंने। ’जुगनु’ बहुत बड़ी हिट फ़िल्म थी उनकी। वो भी रेडियो में काम करने वालों में से थे और बटवारे के बाद वो पाक़िस्तान चले गए और वहाँ की फ़िल्मों में संगीत देने लगे।


शमशाद जी, हम उन संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं जो आज विस्मृत हो चुके हैं, जिन्हें आज हम लगभग भूल से गए हैं। अगला जो नाम मेरे ज़ेहन में आ रहा है, वह है बुलो सी. रानी का।

वो एक बड़ा सीधा भला आदमी था। हमने बहुत गाने गाए उनके लिए। अच्छे से काम करते थे वो।

और ज्ञान दत्त?

वो उम्रदराज़, काफ़ी समय से काम कर रहे थे और उन्होंने बहुत सी हिट फ़िल्में दीं, ख़ास तौर से ’रणजीत स्टुडियोस’ की फ़िल्मों में।

संगीतकार विनोद की क्या यादें हैं आपने दिल में?

विनोद एक बहुत अच्छे कम्पोज़र थे। मैंने उनकी कई फ़िल्मों में गाए हैं। मुझे अब भी याद है कि उनकी वालिदा हमारे साथ अक्सर बैठी रहती थीं रिहर्सलों के वक़्त। वो एक सादे क़िस्म के इंसान थे।

क्योंकि विनोद भी लाहौर से ताल्लुख़ रखते थे, तो क्या आप उन्हें लाहौर से ही जानती थीं?

जी नहीं, मैंने उनके साथ बम्बई में ही सिर्फ़ काम किया।

आपने जी. एम. दुर्रानी साहब के साथ भी कुछ बहुत अच्छे गीत गाईं, जैसे कि "हेल्लो साईं हेल्लो", फ़िल्म ’बड़े भैया’ में।

(हँसते हुए) जी हाँ, यह वाला गीत तो बड़ा हिट हुआ था उस ज़माने में। हम दोनों ने साथ में बहुत सारे अच्छे गीत गाए।

ख़ुर्शीद अनवर के साथ भी आपने कई बहुत अच्छे गीत गाए हैं।

थोड़े गाने ही गाये उनके साथ। ओ वी बहुत लायक कम्पोज़र आया, माचिस दी डिब्बी ते लय बनांदा रहंदा आया (वो भी बहुत लायक कम्पोज़र थे, माचिस की डिब्बी पर धुनें बनाया करता था)।




तो दोस्तों, यहाँ पर आकर आज हम रुकते हैं। आज शमशाद जी ने अपनी शुरुआती फ़िल्म - ’तक़दीर’ और ’पन्ना’ के बारे में बताया। साथ ही उमराओ ज़िआ बेगम और ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से अपनी दोस्ती की बातें बताईं। और फिर कुछ ऐसे संगीतकारों को याद किया जो आज लगभग भूला दिए गए हैं। बातचीत का यह सिलसिला जारी रहेगा अगले महीने भी। शमशाद बेगम के जीवन से जुड़ी कुछ और दिलचस्प बातें लेकर हम दुबारा हाज़िर होंगे अगले महीने।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 


साक्षात्कार : गजेन्द्र खन्ना
अनुवाद एवं प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





गुरुवार, 26 मई 2016

इसी को प्यार कहते हैं.. प्यार की परिभाषा बता रहे हैं हसरत जयपुरी और हुसैन बंधु



कहकशाँ - 10
हसरत जयपुरी और हुसैन बंधु  
"इसी को प्यार कहते हैं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गीतकार व शायर हसरत जयपुरी की लिखी नज़्म हुसैन बन्धुओं की आवाज़ों में।



ग़ज़लों की दुनिया में ग़ालिब का सानी कौन होगा! कोई नहीं! है ना? फिर आप उसे क्या कहेंगे जिसके एक शेर पर ग़ालिब ने अपना सारा का सारा दीवान लुटाने की बात कह दी थी? "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता।" इस शेर की कीमत आँकी नहीं जा सकती, क्योंकि इसे ख़रीदने वाला ख़ुद बिकने को तैयार था। आपको पता न हो तो बता दूँ कि यह शेर उस्ताद मोमिन खाँ ’मोमिन’ का है। अब बात करते हैं उस शायर की, जिसने इस शेर पर अपना रंग डालकर एक रोमांटिक गाने में तब्दील कर दिया। न सिर्फ़ इसे तब्दील किया, बल्कि इस गाने में ऐसे शब्द डाले, जो उससे पहले उर्दू की किसी भी ग़ज़ल या नज़्म में नज़र नहीं आए थे - "शाह-ए-खुबां" (इस शब्द-युग्म का प्रयोग मैंने भी अपने एक गाने "हुस्न-ए-इलाही" में कर लिया है) एवं "जान-ए-जानाना"। दर-असल ये शायर ऐसे प्रयोगों के लिए "विख्यात"/"कुख्यात" थे। इनके गानों में ऐसे शब्द अमूमन ही दिख जाते थे, जो या तो इनके ही गढ़े होते थे या फिर न के बराबर प्रचलित। फिर भी इनके गानों की प्रसिद्धि कुछ कम न थी। इन्हें यूँ ही "रोमांटिक गानों" का बादशाह नहीं कहा जाता। बस इनसे यही शिकायत रही थी कि ये नामी-गिरामी और किंवदंती बन चुके शायरों के शेरों को तोड़-मरोड़कर अपने गानों में डालते थे (जैसा कि इन्होंने "मोमिन" के शेर के साथ किया), जबकि दूसरे गीतकार उन शेरों को जस-का-तस गानों में रखते थे/हैं और इस तरह से उन शायरों को श्रद्धांजलि देते थे/हैं। मेरे हिसाब से "गुलज़ार" ने सबसे ज्यादा अपने गानों में "ग़ालिब", "मीर", "जिगर" एवं "बुल्ले शाह" की रचनाओं का इस्तेमाल किया है, लेकिन उन शायरों के लिखे एक भी हर्फ़ में हेर-फेर नहीं किया, इसलिए कोई भी सुधि श्रोता/पाठक इनसे नाराज़ नहीं होता। हमारे आज के शायर ने यही एक ग़लती कर दी है, इसलिए मुमकिन है कि जब भी ऐसी कोई बात उठेगी तो ऊँगली इनकी तरफ़ खुद-ब-खुद ही उठ जाएगी। खैर छोड़िये, हम भी कहाँ आ गए! हमें तो अपने इस रोमांटिक शायर से बहुत कुछ सुनना है, बहुत कुछ सीखना है और इनके बारे में बहुत कुछ जानना भी है।

बहुत देर से हम "इस" और "ये" के माया-जाल में फँसे थे, तो इस जाल से बाहर निकलते हुए, हम यह बता दें कि जिनकी बात यहाँ की जा रही है, वे और कोई नहीं राज कपूर साहब के चहेते जनाब "हसरत जयपुरी" हैं। ये क्या थे, चलिए यह जानने के लिए हम कुछ चिट्ठों को खंगाल मारते हैं (साभार: लाईव हिन्दुस्तान, सुरयात्रा, पत्रिका, ड्रीम्स एवं कविताकोश)

१५ अप्रैल, १९१८ को जन्मे हसरत जयपुरी का मूल नाम इक़बाल हुसैन था। उन्होंने जयपुर में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद अपने दादा फिदा हुसैन से उर्दू और फारसी की तालीम हासिल की। बीस वर्ष का होने तक उनका झुकाव शेरो-शायरी की तरफ होने लगा और वह छोटी-छोटी कविताएं लिखने लगे। वर्ष १९४० मे नौकरी की तलाश में हसरत जयपुरी ने मुंबई का रुख़ किया और आजीविका चलाने के लिए वहाँ बस कंडक्टर के रुप में नौकरी करने लगे। इस काम के लिए उन्हे मात्र ११ रुपये प्रति माह वेतन मिला करता था। इस बीच उन्होंने मुशायरा के कार्यक्रम में भाग लेना शुरू किया। ऐसे ही एक मुशायरे मे उन्होंने मजदूरों के बीच अपनी कविता "मजदूर की लाश" पढ़ी, जिसे पृथ्वीराज कपूर ने भी सुना। उनकी काबिलियत से प्रभावित होकर वे उन्हें पृथ्वी थिएटर ले आए और राज कपूर से मिलने की सलाह दी। राज कपूर ने उनकी कविता "मैं बाजारों की नटखट रानी" सुनकर अपनी दूसरी फिल्म "बरसात" के गीत लिखने का ऑफर दे दिया। १५० रूपए माहवार पर उनकी नौकरी पक्की हो गई। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फिल्म बरसात से ही संगीतकार शंकर जयकिशन ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी।

राजकपूर के कहने पर शंकर जयकिशन ने हसरत जयपुरी को एक धुन सुनाई और उसपर उनसे गीत लिखने को कहा। धुन के बोल कुछ इस प्रकार थे- "अंबुआ का पेड़ है वहीं मुंडेर है आजा मेरे बालमा काहे की देर है" शंकर जयकिशन की इस धुन को सुनकर हसरत जयपुरी ने गीत लिखा "जिया बेकरार है छाई बहार है आजा मोरे बालमा तेरा इंतज़ार है"। वर्ष १९४९ में प्रदर्शित फिल्म बरसात में अपने इस गीत की कामयाबी के बाद हसरत जयपुरी रातोंरात बतौर गीतकार अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इस फिल्म की कामयाबी के बाद राजकपूर, हसरत जयपुरी (शैलेन्द्र भी) और शंकर जयकिशन की टीम ने कई फिल्मों मे एक साथ काम किया। इनमें आवारा, श्री 420, चोरी चोरी, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, तीसरी कसम, दीवाना, एराउंड द वर्ल्ड, मेरा नाम जोकर, कल आज और कल जैसी फिल्में शामिल है। यह जोड़ी १९७१ तक अनेक फिल्मो में साथ काम करती रही, "मेरा नाम जोकर " के फेल होने और जयकिशन के निधन होने के बाद राज कपूर ने इस टीम को छोड़ दिया और अपनी नयी टीम आनंद बक्षी - लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ बना ली, लेकिन अपनी फ़िल्म "राम तेरी गंगा मैली" में हसरत को वापस ले आये, जहाँ हसरत ने "सुन साहिबा सुन" लिखा, लेकिन राज कपूर की मौत के बाद हसरत का फिल्मी सफ़र थम सा गया था, फिर भी वे कुछ संगीतकारों के साथ काम करते रहे।

हसरत जयपुरी को दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष १९६६ में फिल्म सूरज के गीत "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है" के लिए दिया गया। वर्ष १९७१ मे फिल्म अंदाज में "जिंदगी एक सफर है सुहाना" गीत के लिए भी वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। हसरत जयपुरी वर्ल्ड यूनिवर्सिटी टेबुल के डाक्ट्रेट अवार्ड और उर्दू कान्फ्रेंस में जोश मलीहाबादी अवार्ड से भी सम्मानित किए गए। फिल्म मेरे हुजूर में हिन्दी और ब्रज भाषा में रचित गीत झनक झनक तोरी बाजे पायलिया के लिए वह अम्बेडकर अवार्ड से सम्मानित किए गए। 

अपने गीतों से कई वर्षों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाला यह शायर और गीतकार १७ सिंतबर, १९९९ को संगीतप्रेमियों को रोता और तनहा छोड़कर चला गया।

इन जानकारियों के बाद आज की नज़्म की ओर रुख करें, उससे पहले बड़ी ही मज़ेदार बात आपसे बाँटने का जी कर रहा है। २८ जुलाई, २००९ को सुजॉय जी ने अपने "ओल्ड इज गोल्ड" पर हमें एक गीत सुनाया था "ये मेरा प्रेम-पत्र पढ़कर" और उस आलेख में लिखा था कि "हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा!" और इतना कहते-कहते सुजॉय जी रूक गए थे। तो दर-असल बात ये है कि "हसरत" साहब ने यह गीत अपने महबूबा के लिए ही लिखा था। यह रही पूरी कहानी: लगभग बीस साल की उम्र में उनका राधा नाम की हिन्दू लड़की से प्रेम हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने प्यार का इज़हार नहीं किया। उन्होंने पत्र के माध्यम से अपने प्यार का इजहार करना चाहा, लेकिन उसे देने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाए। वह लड़की उनकी प्रेरणा बन गई और उसी को कल्पना बनाकर वे जीवनभर शायरी करते रहे। बाद में राजकपूर ने उस पत्र में लिखी कविता 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना...' का इस्तेमाल अपनी फिल्म संगम के लिए किया। नाकाम एकतरफ़ा प्रेम क्या-क्या न करवा देता है.. कोई हम जैसों से पूछे!! चलिए इसी बहाने एक शायर तो मिला हमें!

आज हसरत साहब की जिस नज़्म को लेकर आए हैं, उसे आवाज़ें दी हैं मुहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन, यानि कि "हुसैन बंधुओं" ने।  हुसैन बंधुओं ने इस रोमांटिक"-से नज़्म को किस कशिश से गाया है, इसका अंदाज़ा बिना सुने नहीं लगाया जा सकता। इसलिए आइये हम और आप डूब जाते हैं "प्यार के इस सागर" में और जानते हैं कि "प्यार कहते किसे हैं"। हुसैन बन्धुओं के बारे में विस्तार से हम किसी और अंक में चर्चा करेंगे।

नज़र मुझसे मिलाती हो तो तुम शरमा-सी जाती हो
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

जबाँ ख़ामोश है लेकिन निग़ाहें बात करती हैं
अदाएँ लाख भी रोको अदाएँ बात करती हैं।
नज़र नीची किए दाँतों में उंगली को दबाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

छुपाने से मेरी जानम कहीं क्या प्यार छुपता है
ये ऐसा मुश्क है ख़ुशबू हमेशा देता रहता है।
तुम तो सब जानती हो फिर भी क्यों मुझको सताती हो?
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे प्यार का ऐसे हमें इज़हार मिलता है
हमारा नाम सुनते ही तुम्हारा रंग खिलता है
और फिर साज़-ए-दिल पे तुम हमारे गीत गाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

तुम्हारे घर में जब आऊँ तो छुप जाती हो परदे में
मुझे जब देख ना पाओ तो घबराती हो परदे में
ख़ुद ही चिलमन उठा कर फिर इशारों से बुलाती हो।
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।






’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

बुधवार, 25 मई 2016

"चंद रोज गीत मेरे घर पे ही रिकॉर्ड हुआ था पल्लवी जोशी की आवाज़ में" - संगीतकार रोहित शर्मा

एक मुलाकात ज़रूरी है (12)

शिप ऑफ़ थिसियस और बुद्धा इन ए ट्रेफिक जैम जैसी फिल्मों के संगीतकार, और स्वांग ग्रुप के सदस्य रोहित शर्मा हैं आज के हमारे ख़ास मेहमान, कार्यक्रम एक मुलाकात ज़रूरी है में. फैज़ एहमद फैज़ की कालजयी रचना "चंद रोज़ और मेरी जान फ़कत चंद ही रोज़" और "ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते" जैसे गीतों के रचेता रोहित एक लिविंग लेजेंड हैं हमारे बीच. सुनिए ये ख़ास बातचीत और आनंद लें उनके स्वरबद्ध किये इन गीतों का...



एक मुलाकात ज़रूरी है के इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड भी कर सकते हैं, लिंक पर राईट क्लिक करें और सेव एस का विकल्प चुनें

मंगलवार, 24 मई 2016

नदी जो झील बन गई - सौरभ शर्मा

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने उषा छाबड़ा के स्वर में उन्हीं की मार्मिक कथा "अम्मा" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, सौरभ शर्मा की कथा नदी जो झील बन गई, अनुराग शर्मा के स्वर में। पुनर्जन्म लेते एक नगर की मार्मिक कथा को दो मित्रों के पत्राचार के माध्यम से सौरभ ने बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया है।

रायपुर (छत्तीसगढ) निवासी सौरभ शर्मा साहित्यिक अभिरुचि वाले एक युवा पत्रकार हैं। आज के समय में उनके जैसे सरल और सच्चे लोग आम नहीं होते हैं। आप उनसे उनके ब्लॉग मैं और मेरा परिवेश पर मिल सकते हैं।

इस कहानी नदी जो बन गई झील का गद्य सेतु मासिक पत्रिका पर पढा जा सकता है। कहानी का कुल प्रसारण समय 18 मिनट 34 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



ईश्वर जब बच्चे में गुणों और अवगुणों का बंटवारा करते हैं तो वे खास मेहनत नहीं करते
~ सौरभ शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी


"इधर ऊपर नई टिहरी बसाई गई है, लेकिन यह किसी भद्दी साम्यवादी कॉलोनी की तरह लगती है।”
 (सौरभ शर्मा की कथा "नदी जो झील बन गई" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
नदी जो झील बन गई MP3

#Thirteenth Story, nadee jo jheel ban gai: Saurabh Sharma /Hindi Audio Book/2016/13. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 22 मई 2016

राग कल्याण अथवा यमन : SWARGOSHTHI – 271 : RAG KALYAN OR YAMAN



स्वरगोष्ठी – 271 में आज


मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 4 : मुकेश और राग यमन के स्वर


‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने राग कल्याण अथवा यमन के स्वरों पर आधारित मदन मोहन का स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘संजोग’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायक मुकेश ने स्वर दिया है। मदन मोहन के स्वरबद्ध बहुत कम गीतों को गायक मुकेश ने स्वर दिया है। मदन मोहन और मुकेश के इस योग से राग का स्वरूप और गीत का भाव भरपूर उभरता है। राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इसी राग की एक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


ह सच है कि मदन मोहन की अधिकतर रचनाएँ गायिका प्रधान हुआ करती थीं, पुरुष गायकों को ज़्यादा गीत गाने को नहीं मिलते थे उनकी फ़िल्मों में, और जितने मिलते थे, उनमें से ज़्यादातर रफ़ी साहब की आवाज़ में होते क्योंकि उनके कम्पोज़िशन्स और स्टाइल के मुताबिक रफ़ी साहब की आवाज़ ही उन गीतों के लिए सटीक होती थी। आप शायद यक़ीन न करें कि गायक मुकेश ने अपने पूरे संगीत सफर में मदन मोहन के लिए मात्र नौ गीत ही गाए हैं। कारण क्या है पता नहीं, पर शायद यही वजह रही होगी जो अभी हमने कहा। पर यह बताना अत्यन्त आवश्यक है कि मदन मोहन के करीअर की पहली रचना को स्वर मुकेश ने ही दिया था। यह थी 1950 की फ़िल्म ’आँखें’ का गीत "प्रीत लगा के मैंने यह फल पाया..."। यह मदन मोहन के संगीत में पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत था। आइए आज आपको बतायें कि इस पहली फ़िल्म तक पहुँचने से पहले मदन मोहन ने क्या-क्या किया। अपने लाहौर काल में उन्होंने शास्त्रीय संगीत का क ख ग सीखा श्री करतार सिंह से, लेकिन यह बहुत ही अल्प समय के लिए था। संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा उन्होंने नहीं ली। 11 वर्ष की आयु में बम्बई में वो आकाशवाणी पर बच्चों के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया। लेकिन यहाँ भी संगीत से उनका नाता कुछ ख़ास नहीं बन सका। 1946 में जब वो कार्यक्रम सहायक के रूप में आकाशवाणी लखनऊ में कार्यरत हुए, तभी उन्हें ठीक तरह से संगीत के साथ घुलने का मौक़ा मिला। उन पर पहला प्रभाव पड़ा जद्दनबाई के गाये गीतों का। आगे चलकर बेगम अख़्तर और बरकत अली ख़ाँ की गायकी से वो मुतासिर हुए। आकाशवाणी में रहने की वजह से उन्हें अपने समय के नामचीन शास्त्रीय गायकों और वादकों से मिलने और उनसे संगीत की बारीकियों को सीखने-समझने के बहुत से अवसर मिले जिनका उन्होंने पूरा-पूरा लाभ उठाया। अनजाने में मदन मोहन ने धुनों की रचना भी शुरू कर दी छोटे-मोटे रेडियो कार्यक्रमों के लिए। 1947 में उनका तबादला आकाशवाणी दिल्ली में हो गया, लेकिन उन्हें वहाँ संगीत का वह माहौल नहीं मिला जो लखनऊ में था। तंग आकर उन्होंने आकाशवाणी की सरकारी नौकरी छोड़ दी और पहुँच गए मायानगरी बम्बई।

आगे की दास्तान हम आने वाले अंकों में बतायेंगे, फ़िलहाल बापस मुड़ते हैं मदन मोहन की पहली फ़िल्म ’आँखें’ की ओर। इसी फ़िल्म में मुकेश ने एक और गीत गाया "हमसे नैन मिलाना बी.ए. पास करके..." जो शमशाद बेगम के साथ गाया हुआ एक युगल गीत था। मुकेश और मदन मोहन की जोड़ी के बाक़ी सात गीत इस प्रकार हैं - "क्या साथ मेरा दोगे तुम प्यार की राहों में..." (फ़िल्म- समुन्दर 1957, लता के साथ), "तुम चल रहे हो हम चल रहे हैं..." (फ़िल्म- दुनिया न माने, 1959, लता के साथ), "हम चल रहे थे वो चल रहे थे..." (फ़िल्म- दुनिया न माने, 1959), "एक मंज़िल राही दो फिर प्यार ना कैसे हो..." (फ़िल्म- संजोग, 1961, लता के साथ), "भूली हुईं यादों मुझे इतना ना सताओ..." (फ़िल्म- संजोग, 1961), "चल चल मेरे दिल प्यार तेरी है मंज़िल..." (फ़िल्म- अकेली मत ज‍इयो, 1963, जॉनी विस्की के साथ), और "इंसानों से क्यों झुकते हो..." (फ़िल्म- चौकीदार, 1974, रफ़ी और आशा के साथ)। मुकेश - मदन मोहन जोड़ी के उपर्युक्त गीतों की ओर ध्यान दें तो यह पायेंगे कि फ़िल्म ’संजोग’ के दो गीतों के अलावा कोई भी गीत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ। ख़ास तौर पर "भूली हुईं यादों..." गीत सर्वसाधारण के साथ-साथ स्तरीय संगीत की समझ रखने वाले संगीत विशेषज्ञों को भी बहुत पसन्द आया। राग कल्याण पर आधारित इस गीत की ख़ासियत यह है कि मुकेश की आवाज़ और अदायगी नैज़ल (nasal) होने की वजह से "न" के उच्चरण वाले शब्द सुनने में अच्छा लगता है। "हुईं", "यादों", "इतना ना", "चैन", "रहने", "पास ना" जैसे शब्दों में "न" की ध्वनि होने की वजह से इस गीत में मुकेश की आवाज़ ही श्रेष्ठ हो सकती थी। इस गीत में दादरा ताल का प्रयोग हुआ है। लीजिए, अब आप राग कल्याण अर्थात यमन पर आधारित संगीतकार मदन मोहन का स्वरबद्ध यह गीत सुनिए।


राग कल्याण अथवा यमन : ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ : मुकेश :फिल्म – संजोग



राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का ही आश्रय राग है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग कल्याण अथवा यमन का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला, अर्थात रात्रि के पहले प्रहर का पूर्वार्द्ध काल होता है। इस राग का प्राचीन नाम कल्याण ही मिलता है। मुगल काल में राग का नाम यमन प्रचलित हुआ। वर्तमान में इसका दोनों नाम, कल्याण और यमन, प्रचलित है। यह दोनों नाम एक ही राग के सूचक हैं, किन्तु जब हम ‘यमन कल्याण’ कहते हैं तो यह एक अन्य राग का सूचक हो जाता है। राग यमन कल्याण, राग कल्याण अथवा यमन से भिन्न है। इसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है, जबकि यमन में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। राग कल्याण अथवा यमन के चलन में अधिकतर मन्द्र सप्तक के निषाद से आरम्भ होता है और जब तीव्र मध्यम से तार सप्तक की ओर बढ़ते हैं तब पंचम स्वर को छोड़ देते हैं। राग कल्याण के कुछ प्रचलित प्रकार हैं; पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, जैत कल्याण आदि। राग कल्याण गंभीर प्रकृति का राग है। इसमे ध्रुपद, खयाल तराना तथा वाद्य संगीत पर मसीतखानी और रजाखानी गतें प्रस्तुत की जाती हैं। राग की यथार्थ प्रकृति और स्वरूप का उदाहरण देने के लिए अब हम आपको इस राग की एक श्रृंगारपरक् बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के विश्वविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ हैं।


राग कल्याण अथवा यमन : ‘ऐसों सुगढ़ सुगढ़वा बालमा...’ : उस्ताद राशिद खान




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 271वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस गीतांश के स्वरों में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 28 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 273वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 269 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘आपकी परछाइयाँ’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – दरबारी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायक – मोहम्मद रफी

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किया है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। आज की इस कड़ी में हमने आपसे राग कल्याण अथवा यमन पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र भेजते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय और कड़ियों का निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 


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