शनिवार, 17 दिसंबर 2016

वर्षान्त विशेष: 2016 का फ़िल्म-संगीत (भाग-3)

वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला

2016 का फ़िल्म-संगीत  
भाग-3




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, देखते ही देखते हम वर्ष 2016 के अन्तिम महीने पर आ गए हैं। कौन कौन सी फ़िल्में बनीं इस साल?उन सभी फ़िल्मों का गीत-संगीत कैसा रहा? ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में अगर आपने इस साल के गीतों को ठीक से सुन नहीं सके या उनके बारे में सोच-विचार करने का समय नहीं निकाल सके, तो कोई बात नहीं। हम इन दिनों हर शनिवार आपके लिए लेकर आ रहे हैं वर्ष 2016 में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। अब तक आपने इस श्रृंखला में प्रथम चार महीनों में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत के बारे में जाना। आइए आज तीसरी कड़ी में चर्चा करें उन फ़िल्मों के गीतों की जो प्रदर्शित हुए मई और जून के महीनों में।


ई का महीना शुरु हुआ फ़िल्म ’वन नाइट स्टैण्ड’ से जो अपनी शीर्षक और सनी लीओन की
वजह से काफ़ी चर्चा में रही। रति अग्निहोत्री के पुत्र तनुज विरवानी को ऐसी फ़िल्म में अभिनय करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी थी यह तो वो ही जाने, पर कुल मिला कर फ़िल्म पारिवारिक दर्शकों को सम्मोहित नहीं कर सकी। इसके गाने ऐवरेज रहे। फ़िल्म ’मर्डर’ से बेडरूम सॉंग्स की जो परम्परा कुणाल गांजावाला ने शुरु की थी, आज के दौर में यह ज़िम्मेदारी आन पड़ी है अरिजीत सिंह के कंधों पर। इस फ़िल्म में अरिजीत ने शब्बीर अहमद का लिखा गीत “एक बात कहूँ क्या इजाज़त है” गा कर इस परम्परा को आगे बढ़ाया। वही भीगे होंठ तेरे की तरह इस गीत की शुरुआत भी “कैसे बतायें कैसे जतायें सुबह तक तुझमें जीना चाहें, भीगे लबों की गीली हँसी को पीने का मौसम है पीना चाहें” जैसे शब्दों से होती है। मीत ब्रदर्स स्वरबद्ध यह गीत वैसे मेलडी-प्रधान है। इसी तरह से जीत गांगुली के संगीत में जुबिन नौटियाल के गाए मनोज मुनतशिर का लिखा गीत “ले चला दिल कहाँ” शब्दों, संगीत और गायकी की दृष्टि से एक अच्छी रचना है। गीतकार कुमार का लिखा, विवेक कर का संगीतबद्ध किया और देव नेगी का गाया “तुम मेरे कहती है ये मेरी तक़दीरें” भी एक ही अंदाज़ का था। ये तीनों गीत तीन अलग संगीतकारों के होते हुए भी ऐसा लगता है कि जैसे एक ही डोर से बंधे हुए हैं। कुमार-विवेक कर की जोड़ी का एक और गीत है “की करा” जिसे शिप्रा गोयल ने गाया है, लेकिन इस गीत की शैली भी बाक़ी गीतों की ही तरह। विविधता की बड़ी कमी रह गई इस ऐल्बम में। हाँ, सनी लीओन की फ़िल्म हो और कोई आइटम गीत न हो यह भला कैसे हो सकता है? टोनी कक्कड़ द्वारा स्वरबद्ध और नेहा कक्कड़ का गाया “दो पेग मार और भूल जा” और जस्मीन और मीत ब्रदर्स का गाया “इश्क़ दा सुट्टा” इस कमी को पूरा करते हैं। मई के पहले सप्ताह ही प्रदर्शित हुई ’ट्रैफ़िक’। मिथुन का संगीत हमेशा कर्णप्रिय रहा है, इस फ़िल्म के गीतों में भी उनकी मिठास बरकरार है, हालाँकि दिल को भीतर तक छू लेने वाली कोई बात नहीं है। ऐल्बम का पहला गीत पलक मुछाल और बेनी दयाल की आवाज़ों में है – “कह भी दे...”, जो गीतकार ए. एम. तुरज़ के सुन्दर बोलों की वजह से ही कर्णप्रिय बन पड़ा है। दूसरा गीत है “नेकी की राह पे तू चल...” अरिजीत सिंह और मिथुन की आवाज़ों में जिसे मिथुन ने ही लिखा भी है, कुल मिला कर एक अच्छा गीत है पर गीत के बोल गीत के रीदम के अनुकूल नहीं हैं। तीसरा गीत, जो शायद इस ऐल्बम का बेहतरीन गीत है, वह है पलक मुछाल का गाया “कुछ देर सही, ठहर जा तू यहाँ...”। इस नर्मोनाज़ुक गीत में परक्युशन और बाँसुरी का प्रयोग बेहद सुन्दर बन पड़ा है। मिथुन और आकांक्षा शर्मा के गाये सईद क़ादरी का लिखा गीत “तू अलविदा हो गया, तेरा निशां रह गया...” भी उसी नर्मोनाज़ुक जौनर में शामिल है। एक ही तरह के गीत होने की वजह से इस ऐल्बम में विविधता की कमी हो गई है। फ़िल्म का अन्तिम गीत शैलेन्द्र बरवे का स्वरबद्ध और जीतेन्द्र जोशी का लिखा गीत है जिसे प्रसेनजीत कोशाम्बी ने गाया है – “विट्ठल नाम...” जिसे सम्भवत: पार्श्व गीत के रूप में फ़िल्म में इस्तमाल किया गया है। कुल मिला कर महाराष्ट्रीयन शैली का एक जोशीला भक्ति गीत। गीत का अपने आप में कोई महत्व ना सही, पर फ़िल्म की कहानी में इसका महत्वपूर्ण स्थान ज़रूर होगा! 6 मई को ही एक तीसरी फ़िल्म भी रिलीज़ हुई थी – ‘1920 लंदन’। कुछ वर्ष पहले ‘1920’ फ़िल्म आई थी जो बेहद कामयाब सिद्ध हुई थी और उसके गाने भी ख़ूब चले थे। पर इस सीकुईल फ़िल्म ने ख़ास कमाल नहीं दिखाया। फ़िल्म में दो संगीतकार जोड़ियों ने काम किया – कौशिक-आकाश और तोशी-शारिब। हॉरर फ़िल्मों से तोशी-शारिब का नाता नया नहीं है। ’राज़ – दि मिस्ट्री कन्टिन्युज़’ में इस जोड़ी ने “माही” गीत दिया था जो एक चार्टबस्टर सिद्ध हुआ था। ’1920 लंदन’ में शारिब अपनी आवाज़ में ले आए “आज रो लेन दे...” जो लगभग उसी शैली में रचा गीत है। तोशी साबरी और सह-गीतकार कलीम शेख़ के साथ मिल कर शारिब ने अपने आप को हॉन्टिंग्‍जौनर के गीतों के गीतकार-संगीतकार-गायक के रूप में साबित किया है। मोहित चौहान और पायल देव का गाया “रूठा क्यों मुझसे ख़फ़ा न होना...” ऐल्बम का दूसरा गीत है जिसे अज़ीम शिराज़ी ने लिखा है। गीत काअ शुरुआती संगीत विक्रम भट्ट की फ़िल्मों के टिपिकल संगीत की तरह है। इस गीत में शारिब और तोशी के आवाज़ों की झलक भी मिलती है अन्तराल संगीत में। “आज रो लेन दे” से बेहतर रचना है यह। तीसरा गीत एक बार फिर शारिब-तोशी और अज़ीम शिराज़ी का गीत है जिसे शान ने गाया है। “तुझको मैं आँखों में छुपा लूँ...” में कोई ख़ास बात नहीं है और ना ही यह दिल में जगह बनाता है। और अन्तिम गीत है कौशिक-आकाश के संगीत में और प्रशान्त इंगोले का लिखा हुआ – “आफ़रीन”। के.के और अन्तरा मित्र के गाए इस गीत से ऐल्बम का सुखद अन्त होता है। वैसे इस गीत का एक दूसरा संस्करण भी है जिसमें अन्तरा मित्र के साथ हैं श्रीराम। कुल मिला कर ’1920 लंदन’ का ऐल्बम सुनने लायक है और निराश नहीं करती।

मई के दूसरे हफ़्ते प्रदर्शित हुई दो फ़िल्में। पहली फ़िल्म ’अज़हर’। क्रिकेट पर समय समय पर फ़िल्में
बनती चली आई है। अज़हरुद्दीन पर बनी इस फ़िल्म में शुरु शुरु में प्रीतम को संगीत देना था। पर स्वास्थ्य घटित कारणों से उनके लिए समय-सीमा के अन्दर सभी गाने तैयार करना संभव नहीं था। इसलिए अमाल मलिक को लाया गया। अमाल ने तीन गीत कम्पोज़ किए, पहला गीत अपने भाई अरमान मलिक से गवाया "बोल दो ना ज़रा" जो इस ऐल्बम का सबसे ज़्यादा कर्णप्रिय गीत रहा। रश्मी विराग का लिखा यह गीत बोलों की दृष्टि से भी उत्तर है। अमाल के संगीत में दूसरा गीत है सोनू निगम और प्रकृति कक्कर का गाया "तू ही ना जाने"। जब अमाल की मेलडी और सोनू की आवाज़ घुल-मिल जाए तो जादू तो चलना ही है। तीसरा गीत के.के की आवाज़ में है जो रॉक शैली में निबद्ध है; "जीतने के लिए..." सही में जीतने का जोश पैदा कर देता है।  ये दोनों गीत कुमार के लिखे हुए हैं। प्रीतम ने केवल गीत को रचा जो अरिजीत सिंह और अन्तरा मित्र का गाया सुरीला डुएट है "इतनी सी बात है मुझे तुमसे प्यार है..."। प्रीतम का सिगनेचर मेलडी इस गीत में साफ़ सुनाई देती है जो दिल पर असर करती है। ऐल्बम का पाँचवा और अन्तिम गीत एक रीमिक्स गीत है। डीजे चेतस ने फ़िल्म ’त्रिदेव’ का गीत "ओये ओये, गजर ने किया है इशारा..." जो संगीता बिजलानी पर फ़िल्माया गया था जिनकी भूमिका इस फ़िल्म में नरगिस फ़ाखरी ने निभाया है। इस गीत को गाया अदिति सिंह शर्मा और अरमान मलिक ने। मई के दूसरे सप्ताह रिलीज़ होने वाली दूसरी फ़िल्म थी ’बुड्ढा इन ए ट्रैफ़िक जैम’। इस फ़िल्म का गीत-संगीत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी है। "बेकार कुत्ते..." रोहित शर्मा द्वारा स्वरबद्ध 2013 के ऐल्बम ’स्वांग’ की एक रचना है जो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी से प्रेरित है जिसे नए बोलों से संवारा है रविन्दर रंढवा ने। पंकज बदरा और रोहित ने इसे गाया है। एक और फ़ैज़ ऐडप्टेशन "चन्द रोज़..." जिसे पल्लवी जोशी ने गाया है। शास्त्रीय गायन में सारी त्रुटियों के बावजूद पल्लवी की आवाज़ में यह गीत सुनने में अच्छा लगा। जी हाँ, ये वही पल्लवी जोशी हैं जिन्हें आप बरसों पहले दूरदर्शन के धारावाहिकों में देखा करते थे। रोहित शर्मा का गाया लोक शैली में "तोप का मन्तर..." असरदार रहा। रुसलान मुमताज़ अभिनीत फ़िल्म ’खेल तो अब शुरु होगा’ कब आई कब गई किसी को कानोकान ख़बर नहीं हुई, पर एक बार फिर से इस गुमनाम फ़िल्म के गाने तुलनात्मक दृष्टि से अन्य कई हिट फ़िल्मों के गीतों से बेहतर रहा। AARV, दीपक अग्रवाल, अशफ़ाक़, नयन गोस्वामी, अल्तमश फ़रीदी और रिक्की मिश्रा ने फ़िल्म के गीतों का संगीत तैयार किया है। अभेन्द्र कुमार उपाध्याय लिखित अमन त्रिखा का गाया "मुझे तू जो मिला कुछ यूं जो लगा" ऐल्बम का पहला गीत है जिसके बोल हमें समय समय पर बहुत से गीतों में सुनने को मिला है पर संगीत संयोजन और गायकी ने इन जाने पहचाने बोलों को एक नया रूप दिया है। कल्पना पटवारी का गाया "दोनों आँखों का शटर गिरा ले" एक सस्ता आइटम गीत है। अमन त्रिखा का गाया "डंका बजेगा" सकारात्मक गीत है पर एक बार से ज़्यादा सुनने का कोई कारण नज़र नहीं आता। फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया है शाहिद माल्या, पोमिता दत्ता, आर्व और नज़ीम अली ने गाया है जो रॉक शैली का गीत है। फ़िल्म के बाहर इस गीत को सुनने का कोई कारण नहीं है। अल्तमश फ़रीदी के संगीत में अशफ़ाक़ का गाया "तू ग़म पहन के अश्क़ बन के अब गिर रहा है आँखों से मेरे" दर्द भरा गीत है जो कर्णप्रिय है और आज के दौर के ग़मज़दा गीतों के अंदाज़ में है। 20 मई को दो फ़िल्में रिलीज़ हुईं - ’कप्तान’ और ’सर्बजीत’। ’कप्तान्ब’ मूलत: पंजाबी पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म है जिसके गानें भी पंजाबी में हैं। जिप्पी ग्रेवाल अभिनीत इस फ़िल्म के सभी गीत उन्हीं की आवाज़ में है। भंगड़ा और डिस्को के फ़्युज़न वाले सारे गीत हैं जिनमें कोई नई बात नहीं है। 

ऐश्वर्या राय बच्चन, रणदीप हूडा अभिनीत ’सर्बजीत’ फ़िल्म में कुल 9 गीत हैं। एक लम्बे समय बाद
एक अच्छे संगीत वाला फ़िल्म आया। पहला गीत "सलामत" अरिजीत सिंह और तुल्सी कुमार की आवाज़ों में है। अमाल मलिक के संगीत में एक कर्णप्रिय रोमान्टिक गीत है। दूसरा गीत "दर्द" सोनू निगम की आवाज़ में है और हर बार की तरह इस बार भी वो हमें निराश नहीं करते। जीत गांगुली का मेलडी इस गीत को थम्प्स-अप देता है। सुखविन्दर सिंह, सुनिधि चौहान, शैल हाडा और कल्पना गंधर्व की आवाज़ों में भंगड़ा गीत "टुंग लक" बस इसके गायकों के लिए ही ध्यान आकर्षित करता है और इसलिए भी कि कई बरस बाद शैल हाडा का संगीत और गायन इस गीत में सुनाई पड़ता है। एक लम्बे अरसे के बाद शफ़क़त अमानत अली की आवाज़ भी इस फ़िल्म के "रब्बा" गीत में सुनाई देती है जिसके संगीतकार हैं तनिष्क बागची। "टुंग लक" के बाद संगीतकार जोड़ी शैल-प्रीतेश लेकर आते हैं "मेहरबान" शीर्षक से एक क़व्वाली। सुखविन्दर सिंह, शैल हाडा और मुनव्वर मासूम की गाई यह क़व्वाली हमारा ध्यान आकर्षित ज़रूर करती है। शैल हाडा की आवाज़ में "बरसन लागी" को पहली बार सुनते ही आपको इससे प्यार हो जाएगा और इसमें कोई शक़ नहीं कि इस ऐल्बम के श्रेष्ठ गीतों में से एक है है यह। शैल की ही आवाज़ में "मेरा जुनून" एक और दर्दभरा गीत है पर इस बार उतना असरदार नहीं। अरिजीत की आवाज़ में "निन्दिया" भले शुरु में लोरी समझ कर आप सुनने लगे पर यह कोई लोरी नहीं, पर हाँ, "सलामत" से बेहतर पर्फ़ॉर्म किया है अरिजीत ने इस गीत में। मई के आख़िरी सप्ताह में कुल चार फ़िल्में प्रदर्शित हुईं - ’फ़ोबिया’, ’वीरप्पन’, ’फ़्रेडरिक’ और ’वेटिंग्’। अफ़सोस कि इनमें से किसी भी फ़िल्म का गीत-संगीत लोगों के दिलों को छू सका और ना ही ये फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर कोई कमाल दिखा सकीं। इसलिए और समय ना गंवाते हुए सीधे जून के महीने में चल पड़ते हैं। जून शुरु हुआ ’हौसफ़ूल 3’ से। इस मस्ती भरे फ़िल्म के गाने भी मस्ती भरे हैं। शारिब-तोशी, सोहैल सेन, मिका सिंह औत तनिष्क बागची के संगीत में कुल चार गीत हैं जिनमें उल्लेखनीय बस एक गीत है। बागची के संगीत में कैलाश खेर, नकाश अज़ीज़ और अल्तमश फ़रीदी का गाया "फ़ेक इश्क़" एक हास्य गीत है जिसमें लोक रंग के साथ क़व्वाली का अंग भी है। दूसरे हफ़्ते में रिलीज़ हुई दो फ़िल्में ’दो लफ़्ज़ों की कहानी’ और ’धनक’। ’दो लफ़्ज़ो...’ में कुल पाँच गीत हैं। संदीप नाथ का लिखा और बबली हक़ का स्वरबद्ध "तूने जीना सिखा दिया" के दो संस्करण हैं, पहला अल्तमश फ़रीदी का गाया और दूसरा पलक मुछाल का गाया। फ़रीदी के संस्करण में अरबाज़ ख़ान का गीटार और फ़ीरोज़ ख़ान व नयीन सय्यद का ढोलक ख़ास आकर्षण है। फ़रीदी का संस्करण अगर रॉ फ़ील देता है तो पलक मुछाल का संस्करण एक मीठी-मधुर सॉफ़्ट रोमान्टिक रचना जान पड़ती है। अमाल मलिक के संगीत में भाई अरमान मलिक का गाया "कुछ तो है" सुन कर यह कहना ज़रूरी है कि इन भाइयों ने इस दौर के श्रोताओं के नब्ज़ को भली-भाँती पकड़ लिया है और एक लम्बा रेस ये खेलने वाले हैं इस इन्डस्ट्री में। अंकित तिवारी का स्वरबद्ध किया और उन्हीं का गाया "सेहरा" एक बार फिर से "गलियाँ" गीत की याद दिला ही जाती है। शायद उन्हें अब नया कुछ करने की ज़रूरत है! कनिका कपूर की आवाज़ में ऐल्बम का अन्तिम गीत "अखियाँ" में ना तो "बेबी डॉल" है ना ही "चिटियाँ कलाइयाँ" है, पर कनिका ने इस गीत में यह सिद्ध किया है कि उनकी आवाज़ केवल आइटम गीतों के लिए नहीं बल्कि मेन-स्ट्रीम गीत में भी उतना ही उभरकर आ सकती है। इस गीत के बाद उन्हें फ़िल्मी गीतों की मुख्य धारा में ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए। ’धनक’ नागेश कुकुनूर की फ़िल्म है। तापस रेलिया के संगीत में फ़िल्म के गाने लिखे हैं मनोज यादव, मीर अली हुसैन और तापस रेलिया ने। शिवम पाठक की आवाज़ में "जीने से भी ज़्यादा जीयें" हौसला अफ़ज़ाई वाला गीत है जिसे कुकुनूर की "आशाएँ खिले दिल की" गीत की याद दिला जाती है। फ़िल्म का शीर्षक गीत "धनक" मोनाली ठाकुर की आवाज़ में है। ऐसा लगता है कि मोनाली की गाई "सँवार लूँ" को ध्यान में रखते हुए उनसे यह लोक शैली आधारित गीत गवाया गया है। सुरीली रचना है। अनवर ख़ान मांगणियार, स्वरूप ख़ान और नियाज़ ख़ान की आवाज़ में "मेहन्दी" मांगणियार शैली आधारित रचना है, पर कम्पोज़िशन में आधुनिक ऑरकेस्ट्रेशन का प्रयोग किया गया है। इस तरह का फ़्युज़न पहली बार सुनने को मिला है किसी फ़िल्म में।

जून की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म रही ’उड़ता पंजाब’ जो रिलीज़ से पहले ही विवादों से घिर गई थी।
अमित त्रिवेदी का संगीत एक बार फिर सर चढ़ कर बोला। फ़िल्म संगीत के इतिहास में इस फ़िल्म को सर्वाधिक ड्रग्स के उल्लेख वाले गीतों की फ़िल्म के रूप में याद रखा जाएगा। कुल चार गीतों में एक ड्रग ऐडिक्ट के मनोभाव को व्यक्त किया गया है। इस फ़िल्म में ऐसा पहला फ़िल्मी गीत है जिसमें "वीड" शब्द का प्रयोग हुआ है। पर हाँ, अमित त्रिवेदी हमें निराश नहीं करते। बाबू हाबी के गाए "चिट्टा वे" से ऐल्बम की शुरुआत होती है जिसमें पंजाबी मर्दों का ऐग्रेशन सर चढ़ कर बोलता है। गीत एक तरफ़ अपरिष्कृत है तो दूसरी तरफ़ मिठास भी है। कनिका कपूर का गाया "दा दा दस्से" उनके गाए पिछ्ले दो हिट गीतों वाले जौनर का ही है पर उन दोनों से बेहतर है। ’उड़ता पंजाब’ के साउन्ड ट्रैक में शिव कुमार बटालवी की लिखी कविता "इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत" को गीत के रूप में पेश किया गया है। शाहिद मालिया का गाया संस्करण ग्राम्य, लोक-आधारित और भावपूर्ण है, जबकि दिलजीत दोसंझ का गाया संस्करण समकालीन (आधुनिक) और मेलोडी-सम्पन्ना है। दोनों की अपनी-अपनी ख़ासियत है, सुनने वाले पर निर्भर करता है कि उसे कौन सा संस्करण पसन्द है! इस गीत की विस्तृत चर्चा ’एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तंभ में हो चुकी है। "उड़दा पंजाब" शीर्षक गीत विशाल दादलानी और अमित त्रिवेदी की आवाज़ों में है। गीतकार वरुण ग्रोवर के बोलों को समझ पाना मुश्किल है, पर एक बार समझ में आ जाए तो मज़ा भी आता है और इन बोलों में छुपे पावर का भी पता चलता है। ऐल्बम का सबसे अच्छा गीत शायद "हस नच ले" है जो सीधे पंजाब की सरज़मीं से निकल कर आया है। शाहिद माल्या की आवाज़ में यह गीत बहुत सुन्दर तरीके से लिखा और संगीत संयोजित किया गया है। हारमोनियम की तानें जैसे दवाई का काम करता है इस गीत में। अन्तिम गीत "वदिया" अमित त्रिवेदी की आवाज़ में है, इस बार उनकी आवाज़ में नर्मी है। यह गीत ऐसा अनुभव कराता है जैसे कि हमें उड़ा लिए जा रहा हो, इस फ़िल्म के शीर्षक ही की तरह। जून में प्रदर्शित एक और फ़िल्म ’तीन’ का संगीत भी चर्चायोग्य है। अमिताभ बच्चन, विद्या बालन और नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी जैसे नायाब सितारों वाली इस फ़िल्म का संगीत पूर्णत: क्लिन्टन सेरेजो ने तैयार किया और सभी गीत लिखे अमिताभ भट्टाचार्य ने। "हक़ है" में क्लिन्टन ने ऐसी पुकार लगाई है कि जो हमें कभी ना हारने की प्रेरणा देता है; गीत में अपने उपर भरोसा रखने का एक अंडर करेण्ट जैसा है और गीत के बोल भी मूड को बरकरार रखता है। एकान्त में क्लिन्टन की आवाज़ में यह गीत बहुत सुकून देता है। स्वरूप के हिसाब से "रूठा" गीत एक बेहतरीन गीत है जिसमें बेनी दयाल और दिव्य कुमार की आवाज़ों का क्या ख़ूब इस्तमाल किया है क्लिन्टन ने। साथ ही बियांका गोम्स की लोक-शैली का गायन जैसे रोंगटे खड़े कर देता है। "क्यों रे" में फिर से क्लिन्टन की आवाज़ है जिसे हम एक सुन्दरता से स्वरबद्ध किया हुआ सशक्त शब्दों वाला नरम बैले (ballad) भी कह सकते हैं। इसी गीत का एक और संस्करण अमिताभ बच्चन की आवाज़ में भी है जो अपने आप में एक मास्टरपीस है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "ग्रहण" जिसमें आशा-अनुरूप विशाल दादलानी की उर्जा और पैशन है, और साथ में है गीटार का बेहतरीन संयोजन। गीत सुन्दर है पर शायद बार बार सुनने की लालसा ना हो!

जून की अन्य फ़िल्में जैसे कि ’लव यू आलिया’, ’रमण राघव 2.0', '7 Hours to go' और ’रफ़ बूक’
जैसी फ़िल्मों का गीत-संगीत ठण्डा ही रहा। हिन्दी फ़िल्म जगत में मेन स्ट्रीम फ़िल्मों के अलावा भी बी और सी ग्रेड फ़िल्मों की परम्परा पुरानी है। भले हम इन्हें अश्लील और घटिया स्तर का कह कर अपन से दूर कर दें, पर यह बात भी सच है कि कई बार इस तरह की बी और सी ग्रेड फ़िल्मों में कुछ अच्छे गीत भी आ जाते हैं। ऐसे गीतों से जुड़े कलाकारों की यह बदनसीबी है और सुनने वालों की भी कि ऐसे गीत घरों तक नहीं पहुँच पाते। वर्ष 2016 में भी इस तरह की कुछ फ़िल्में बनी हैं। एक है फ़िल्म ’आख़िरी सौदा’ जिसमें ज़ुबैर ख़ान, तनवी अरोड़ा और आर्यन चोपड़ा नज़र आए। फ़िल्म कब आई कब गई पता तक नहीं चला, पर इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में दो गीत ऐसे हैं जो बहुत सी कामयाब फ़िल्मों के गीतों से कहीं अधिक बेहतर है। मुनव्वर अली और श्रद्धा की आवाज़ों में "आँखों में आके" तथा मुनव्वर और विनती की आवाज़ों में "तेरी अदा तेरी नज़र" दो ऐसे गीत हैं जिन्हें मेन-स्ट्रीम रोमान्टिक गीतों में शामिल किया जा सकता है। नर्मोनाज़ुक रूमानियत से भरे ये गीत हमें 1990 के दशक की याद दिला जाते हैं। इन गीतों के फ़िल्मांकन में भले ही नायक और नायिका का अंग प्रदर्शन भरपूर है पर आंखें बन्द करके अगर इन्हें सुना जाए तो अच्छा ही लगेगा। फ़िल्म के बाकी तीन गीत आइटम गीत हैं जिनके बोल और अदायगी निम्नस्तरीय हैं। जून के ही महीने में एक ऐडल्ट फ़िल्म आई ’A Scandall'। शीर्षक के अनुसार हमें पता है कि इससे हम क्या उम्मीद लगा सकते हैं। पर जब वरिष्ठ गीतकार समीर अनजान निम्नस्तरीय और घटिया बोलों वाला गीत लिखे तो आप क्या कहेंगे? इस फ़िल्म का "देखा है तुझको जबसे" गीत में समीर जैसे गीतकार ने जो बोल लिखे हैं उन्हें सुन कर यकीन करना मुश्किल है कि ये वही समीर हैं जिन्होंने ’आशिक़ी’ और ’दिल है कि मानता नहीं’ जैसे फ़िल्मों के गीत थे कभी। "लबों से लगा, मैं प्यार बन जाऊँ तेरी, होठों से लगा ले, मैं जाम बन जाऊँ तेरी, फ़ुरसतें कह रही तुझे फ़ील करूँ, तेरी ख़ुशबू चूम लूँ" जैसे फ़ाल्तु के बोल भरे हैं इस गीत में। समीर को क्या ज़रूरत पड़ गई होगी ऐसी फ़िल्म और इस तरह के गीत लिखने की, यह तो वो ही बता सकते हैं, हम अब आज का यह अंक समाप्त करने की आप सब से अनुमति चाहते हैं। अब तक हमने जनवरी से जून तक का सफ़र तय किया है। अगले अंक में वर्ष 2016 के फ़िल्म संगीत की चर्चा हम आगे जारी रखेंगे। नमस्कार!




खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

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