मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

मुंशी प्रेमचंद की अमर रचना दो बैलों की कथा

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा के स्वर में पुरुषोत्तम पाण्डेय की कहानी "लातों का देव" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी दो बैलों की कथा जिसे स्वर दिया है अर्चना चावजी ने।

कहानी "दो बैलों की कथा" का गद्य भारत डिस्कवरी पर उपलब्ध है। इस कथा का कुल प्रसारण समय 26 मिनट 50 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।




मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं ~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

“गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता।”
 (मुंशी प्रेमचंद रचित "दो बैलों की कथा" से एक अंश)


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दो बैलों की कथा MP3

#15th Story, Do Bailon Ki Katha: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2013/15. Voice: Archana Chaoji

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

सिनेमा के शानदार 100 बरस को अमित, स्वानंद और अमिताभ का संगीतमय सलाम

प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - बॉम्बे टा'कीस


सिनेमा के १०० साल पूरे हुए, सभी सिने प्रेमियों के लिए ये हर्ष का समय है. फिल्म इंडस्ट्री भी इस बड़े मौके को अपने ही अंदाज़ में मना या भुना रही है. १०० सालों के इस अद्भुत सफर को एक अनूठी फिल्म के माध्यम से भी दर्शाया जा रहा है. बोम्बे  टा'कीस  नाम की इस फिल्म को एक नहीं दो नहीं, पूरे चार निर्देशक मिलकर संभाल रहे हैं, जाहिर है चारों निर्देशकों की चार मुक्तलिफ़ कहानियों का संकलन होगी ये फिल्म. ये चार निर्देशक हैं ज़ोया अख्तर, करण जोहर, अनुराग कश्यप और दिबाकर बैनर्जी. अमित त्रिवेदी का है संगीत तथा गीतकार हैं स्वानंद किरकिरे और अमिताभ भट्टाचार्य. चलिए देखते हैं फिल्म की एल्बम में बॉलीवुड के कितने रंग समाये हैं. 

पहला  गीत बच्चन  हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को समर्पित है...जी हाँ सही पहचाना वही जो रिश्ते में सबके बाप  हैं. शब्दों में अमिताभ भट्टाचार्य ने सरल सीधे मगर असरदार शब्दों में हिंदी फिल्मों पर बच्चन साहब के जबरदस्त प्रभाव को बखूबी बयाँ किया है. अमित की तो बात ही निराली है, गीत का संगीत संयोजन कमाल का है. एकतारा का जबरदस्त प्रयोग गीत को वाकई इस दशक में पहुंचा देता है जब हिंदी सिनेमा का पर्याय ही अमिताभ बच्चन हुआ करते थे. बीच बीच में उनके मशहूर संवादों से गीत का मज़ा दुगुना हो जाता है. सुखविंदर की आवाज़ में बहुत दिनों बाद ऐसा दमदार गीत निकला है. खैर हम भी इस गीत के साथ अपनी इडस्ट्री और बच्चन साहब की ऊंची शख्सियत को सलाम करते हैं, और आगे बढते हैं अगले गीत की तरफ.

अक्कड बक्कड बोम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ बरस का हुआ, ये खिलाड़ी न बूढा हुआ.....वाह स्वानंद साहब ने खूब बयाँ किया है सिनेमा के सौ बरसों का किस्सा. हालाँकि अमित की धुन इंग्लिश विन्गलिश  के कैसे जाऊं मैं पराये देश  से कुछ मिलती जुलती लगती है शुरुआत में, पर धीरे धीरे गीत अपनी लय पकड़ लेता है, सबसे बढ़िया बात ये है कि गीत अपनी रवानी में कहीं भी कमजोर नहीं पड़ता, और श्रोताओं को झूमने की वजह देता रहता है. मोहित की आवाज़ भी खूब जमी है गीत में....

मुर्रब्बा  गीत के दो संस्करण हैं, आमतौर पर अमित के इन ट्रेडमार्क गीतों में शिल्प राव की आवाज़ जरूरी सी होती है, पर इस गीत में महिला स्वर है कविता सेठ की जिनका साथ दिया है खुद अमित ने. छोटा सा मगर बेहद प्रभावी गीत है ये भी. एक बार फिर संगीत संयोजन गीत की जान है. गीत ऐसा नहीं है जो जुबाँ पर चढ जाए पर अच्छा सुनने के शौक़ीन इसे अवश्य पसंद करेंगें .गीत का एक संस्करण जावेद बशीर की आवाज़ में भी है. 

शीर्षक गीत बोम्बे टा'कीस  एक बार फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी को समर्पित है.कैलाश खेर और रिचा शर्मा की आवाजों में ये एक रेट्रो गीत है. स्वानंद के शब्द दिलचस्प हैं. पर मुझे इसका दूसरा संस्करण जिसमें ढेरों गायकों की आवाज़ समाहित है. शान और उदित की आवाजों के साथ कुछ अन्य गीतों की झलक में मिला जुला ये संस्करण अधिक फ़िल्मी लगता है. 

वाकई इन सौ बरसों में फिल्मों के कितने चेहरे बदले पर सौ बरसों के बाद आज भी लगता है जैसे बस अभी तो शुरुआत ही है. फिल्मों का ये कारवाँ यूहीं चलता चले और मनोरंजन के इस अद्भुत लोक में दर्शकों को भरपूर आनंद मिलता रहे यही हम सब की कामना है. एल्बम को रेडियो प्लेबैक दे रहा है ४ की रेटिंग ५ में से. 

एक सवाल श्रोताओं के लिए -
प्रस्तुत एल्बम में एक गीत एक फ़िल्मी नायक को समर्पित है, क्या आपको कोई अन्य गीत याद आता है जो किसी फ़िल्मी व्यक्तित्व पर केंदित है ?


संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
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रविवार, 28 अप्रैल 2013

आधी शताब्दी का हुआ भोजपुरी सिनेमा



स्वरगोष्ठी – 118 में आज

यूँ बनी पहली भोजपुरी फिल्म- ‘गंगा मैया तोहें पियरी चढ़इबो’



संगीत-प्रेमियों की साप्ताहिक महफिल ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र पुनः उपस्थित हूँ। भारतीय सिनेमा के इतिहास में 4 अप्रैल, 1963 की तिथि इसलिए बेहद महत्त्वपूर्ण है कि इस दिन पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहें पियरी चढ़इबो’ का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन वाराणसी के प्रकाश सिनेमाघर में हुआ था। इस तिथि के अनुसार भोजपुरी सिनेमा प्रदर्शन की आधी शताब्दी पूर्ण कर चुका है। इस अवसर पर हम इस फिल्म के निर्माण से जुड़े कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और रोचक प्रसंगों की चर्चा इस विशेष अंक में कर रहे हैं। आज का यह अंक प्रस्तुत कर रहे हैं, युवा फ़िल्म पत्रकार, शोधार्थी, स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री व लघु फिल्मकार तथा पटना स्थित सिने सोसाइटी के मीडिया प्रबन्धक, रविराज पटेल। 
 


रविराज पटेल
ह प्रबल एवं प्रमाणित अवधारणा है कि सिनेमा समाज का आईना होता है। इस आईने में और भी स्पष्ट प्रतिछाया बने, इसके लिए एक सहज सम्प्रेषणशील भाषा की आवश्यकता समझी जाती है। एक ऐसी भाषा जिसमें हर दर्शक अपनी सोंधी माटी की महक आसानी से महसूस कर उस चित्र में मिश्रित हो सके। भारतीय सिनेमा पाँच दशक का स्वर्णिम सफर तय चुका था। इस अवधि तक उत्तर-पूर्व की लोकप्रिय भाषा भोजपुरी, सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम तक अपनी पहुँच नहीं बना पाई थी। लेकिन इसकी कल्पना उस समय से होती रही, जब हिन्दी सिनेमा किशोरावस्था से निकल कर युवावस्था में प्रवेश ही कर रहा था। ऐतिहासिक तथ्यों को माने तो भोजपुरी सिनेमा का खयाल सबसे पहले जद्दनबाई (मशहूर अदाकारा नरगिस की माँ) के जहन में आया था। इस कड़ी में प्रख्यात अभिनेता कन्हैयालाल का भी नाम आता है। कन्हैयालाल बनारस से थे तथा बम्बई फिल्म उद्योग में प्रतिष्ठित एवं विलक्षण कलाकार के रूप में उनकी पहचान थी। लेकिन दोनों की कसक अधूरी रह गई। कारण थी, इनकी निजी सीमाएँ और उम्रगत विवशताएँ। सन् 1950 के उत्तरार्द्ध में बम्बई में एक फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित हुआ था। इस समारोह में बतौर मुख्यअतिथि गणतंत्र भारत के तत्कालीन प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद उपस्थित हुए थे। इसी कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था- ‘मेरी मातृभाषा भोजपुरी है। हालाँकि साहित्यिक दृष्टि से उतनी समृद्ध तो नहीं लेकिन सांस्कृतिक विविधता से परिपूर्ण बहुत ही प्यारी भाषा है। अगर आप फिल्मकारों की पहल इस ओर भी हो, तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होगी’। उनका यह विचार सुन कर उपस्थित कई फिल्मकारों में सुगबुगाहट तो हुई, किन्तु सबसे अधिक उद्वेलित जो हुए, वे थे भोजपुरी माटी के खाँटी लाल, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर निवासी एवं चरित्र अभिनेता नज़ीर हुसैन। नज़ीर साहब उन्हें सुन कर बेहद उत्प्रेरित हुए थे। नतीजतन, उसी सभा में राजेन्द्र बाबू से मिल कर उन्होंने यह आश्वस्त किया कि समझिए हम इस दिशा में प्रयत्नशील हो गए हैं। नजीर साहब के मन में पहले से ही भोजपुरी को लेकर कुछ बातें चल रही थी। वे इसी बात को ध्यान में रख कर एक कहानी पर काम भी कर रहे थे। खैर, समारोह में उन्हें सुन कर राजेंद्र बाबू ने नजीर साहब को अपनी शुभकामनाएँ दी।

नजीर हुसैन
नजीर हुसैन एक चरित्र अभिनेता के साथ-साथ ख्यातिलब्ध निर्देशक विमल रॉय के मुख्य सहायक एवं ए.आर. कारदार के साथ फिल्मिस्तान में बतौर लेखक भी सम्बद्ध थे। ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले-बढे होने के कारण ग्राम्यबोध की कूट उनके रगों में थी। अपने इसी बोध से सुन्दर, सोंधी साँचे में एक ऐसी कहानी को आकार दिया, जिसे सुनते ही भोजपुरी परिवेश में युक्त विवश परिस्थितियों, समस्याओं, वेदनाओं एवं तपिश की जीती-जागती तस्वीर मालूम पड़ती थी। इस पर पटकथा एवं संवाद लिख कर कमर कसा और निकल पड़े निर्माता के तलाश में। लेकिन भोजपुरी भाषा में फिल्म बनाने के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। इस खोज में अभिनेता असीम कुमार का भी सम्मिलित प्रयास जारी था। विमल रॉय की फिल्मों में एक साथ काम करने एवं बनारस का होने के नाते दोनों में गहन दोस्ती थी। यही वजह थी कि फिल्म में मुख्य अभिनेता असीम कुमार ही होंगे, दोनों में यह अटल वादा उसी समय हो गया था। वर्षों बीत गए लेकिन कोई भी निर्माता भोजपुरी में नई लीक गढ़ने की हिम्मत न जुटा सका। निर्देशक विमल रॉय को यह कहानी बेहद पसन्द थी। लेकिन उन्होंने भी इसे भोजपुरी में न बना कर हिन्दी में बनाने की पेशकश की, परन्तु धैर्यवान और अपने भाषा-प्रेम में विवश नजीर हुसैन इस सम्मानजनक प्रस्ताव की क़द्र करते हुए उनके प्रस्ताव पर असहमति जता दी। लगातार भाषा से समझौता कर लेने एवं नकारात्मक सुझाव के वावजूद अपना हौसला बुलन्द रखा। कभी-कभी नजीर साहब कहते थे- ‘इ फिलिमिया चाहे जहिया बनी, बाकि बनी त भोजपुरिये में...’

फिल्म की नायिका कुमकुम
एक दिन अचानक नजीर हुसैन से मिलने एक ऐसे सज्जन पुरुष आते हैं, जो जद्दनबाई से प्रेरित होकर खुद ही भोजपुरी फिल्म के सूत्रधार बनने के कल्पनालोक में पूरी तरह खोए हुए थे। वे थे मुंगेर, बिहार निवासी बच्चालाल पटेल। यूँतो पटेल ने ‘लंकादहन’ जैसी कुछ पौराणिक फिल्मों में अभिनय भी किया था, लेकिन मूलतः वे फिल्मों के निर्माण, प्रबन्धन, नियंत्रण और वितरण कार्यों से सम्बन्धित थे। इसलिए बिहार और बंगाल के कई फिल्म वितरकों से उनकी अच्छी जान-पहचान थी। बम्बई में नजीर हुसैन की भोजपुरी कहानी की चर्चा ही उन्हें उन तक खींच लाई थी। उन्होने कहानी सुनी और पसन्द भी कर लिया। बावजूद इसके, बात आगे नहीं बढ़ पाई, क्योँकि पूरी फिल्म बनाने लायक पूँजी बच्चालाल पटेल के पास नहीं थी। इसी दरम्यान 1 जनवरी, 1961 को एक फिल्म आयी ‘गंगा जमुना’। इस फिल्म में अवधी संवादों का प्रयोग था। हिन्दी सिनेमा के इतिहास में यह पहली बार हुआ था। यह फिल्म व्यापक सफल हुई थी। इसके निर्माता दिलीप कुमार के भाई नासिर खाँ एवं निर्देशक नितिन बोस थे। दिलीप कुमार एवं वैजयन्ती माला के साथ नज़ीर हुसैन ने भी इस फिल्म में अभिनय किया था। ‘गंगा जमुना’ ने यह विश्वास कायम कर दिया था कि अगर कोई उत्तर भारतीय बोलियों-भाषाओँ में भी फ़िल्में बनाए, तो वह घाटे का सौदा नहीं होगा। इतने सफल उदाहरण के बावजूद नजीर हुसैन के साथ कोई भी खड़ा होने को तैयार नहीं हुआ। यह हिम्मत और हिमाकत जिस व्यक्ति ने दिखाई वह गिरिडीह (तत्कालीन बिहार) के कोयला व्यवसायी विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी थे। शाहाबादी जी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के करीबी, समर्थक और मित्रों में से एक थे। दोनों के बीच हुई एक मुलाक़ात में अनायास फ़िल्मी बातचीत शुरू हो गई। बातचीत के क्रम में राजेन्द्र बाबू ने वर्षों पहले बम्बई में नजीर हुसैन से हुई भेंट और भोजपुरी फिल्म के निर्माण के संकल्प की चर्चा भी की। शाहाबादी जी पक्के एवं सच्चे भोजपुरिया इंसान थे, ऊपर से राजेन्द्र बाबू के व्यक्तित्व के मुरीद और आर्थिक रूप से भी सम्पन्न व्यक्ति थे। शाहाबादी जी ने उसी वक़्त यह फैसला कर लिया कि बहुत जल्द ही बम्बई जाकर नजीर हुसैन से मिलेंगे। उन्हें नजीर हुसैन का बम्बई का पता-ठिकाना मालूम नहीं था, फिर भी सन 1961 के वर्षांत में एक दिन अपने एक मित्र के साथ बम्बई के लिए रवाना हुए। दादर स्थित फिल्मी कलाकारों के मेल-मिलाप के लिए चर्चित प्रीतम होटल में ठहरे। यहाँ पहुँच कर नजीर साहब को ढूँढना शुरू किया। अन्ततः होटल के पास स्थित एक फिल्म स्टूडियो में दोनों की भेंट हुई। शाहाबादी जी का प्रयोजन सुन नजीर साहब की खुशी का ठिकाना न रहा। मुलाक़ात के अगले ही दिन उसी प्रीतम होटल के एक कमरे में दोनों की बैठक हुई। नजीर साहब ने उन्हें कहानी सुनाई। सुनते ही शाहाबादी जी ने नजीर साहब को हरी झंडी दे दी। उसी होटल में नज़ीर साहब ने एक नवयुवक कुन्दन कुमार का परिचय कराया, जिन्हें फिल्म के निर्देशन का दायित्व दिया गया।

हफ्ता-दस दिनों का समय लगा होगा, जिसमें लगभग कलाकारों का चयन एवं शूटिंग स्थल तय करने के बाद इस पर कुल बजट एक लाख पचास हज़ार रूपये तय किया गया। किन्तु फिल्म पूरी होने तक यह बजट पूर्वनिर्धारित से तीन गुना से भी अधिक यानि पाँच लाख रूपये तक पहुँच गया था। मुकम्मल तैयारी के पश्चात 16 फरवरी, 1962 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा एवं उनकी धर्मपत्नी किशोरी सिन्हा जी की उपस्थिति में इस फिल्म का मुहूर्त पटना स्थित शहीद स्मारक परिसर में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर फिल्म की नायिका अभिनेत्री कुमकुम के साथ चरित्र अभिनेता नजीर हुसैन और नायक असीम कुमार के एक छोटे से दृश्य का फिल्मांकन हुआ। इसके बाद फिल्म की कुछेक आउटडोर शूटिंग मनेर (पटना) में हुई, जिसमें पंचायत, ताड़ीखाना (निरालय) तथा पालकी आदि दृश्यों को फिल्माया गया। वहीँ वाराणसी में गंगाघाट, कबीरचौरा, चौक आदि के अलावा गाजीपुर में भी फिल्म के कुछ महत्त्वपूर्ण दृश्यों को कैमरे में समेटा गया। आधिकांश शूटिंग बम्बई के प्रकाश तथा श्रीकान्त स्टूडियो में की गई।

भोजपुरी की इस पहली फिल्म को बनने में कुल अवधि लगभग एक वर्ष लगी थी। पूरी तरह से तैयार फिल्म को निर्माता विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी ने 21 फरवरी, 1963 को तत्कालीन राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद को पटना के सदाकत आश्रम में समर्पित किया। यानि 21 फरवरी, 1963 को इस फ़िल्म का उद्घाटन समारोह समझा गया। इसके एक दिन बाद अर्थात 22 फरवरी, 1963 को फिल्म का एक प्रीमियर शो पटना के वीणा सिनेमा में रखा गया। लेकिन इसके व्यावसायिक प्रदर्शन की शुरुआत 4 अप्रैल, 1963 को वाराणसी के प्रकाश टॉकीज (अब बन्द हो चुका है) से हुई। 21 फरवरी से 4 अप्रैल के बीच एकतालीस दिनों की अवधि का अन्तर इसलिए आया कि उन्हीं दिनों डॉ. राजेन्द्र बाबू अस्वस्थ हो गए थे। अस्वस्थता की स्थिति में ही उन्होने 25 फरवरी, 1963 को इस फिल्म के निर्माण पर पूरे दल को बधाई-पत्र भेजा था। इसी दौरान उन्होने बीमार रहते हुए भी 1 मार्च, 1963 को फिल्म के तमाम कलाकारों से मिलने का कार्यक्रम तय किया था। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, इस निर्धारित तिथि के ठीक एक दिन पूर्व यानि 28 फरवरी, 1963 को ही उनकी ह्रदयगति रुक गई और वे अमरत्व को प्राप्त कर गए।

पहली भोजपुरी फिल्म की व्यावसायिक शुरुआत देवभूमि वाराणसी से हुई और इसकी गूँज विश्व भर में गुंजायमान हुई। कुमकुम की करुणा, असीम का अभिनय, नजीर के मुरीद कौन नहीं हुए? वहीँ, इस फिल्म में शैलेंद्र के गीत और चित्रगुप्त के संगीत ने भी लोगों को कभी भावविह्वल किया तो कभी खूब खिलखिलाया। प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि वाराणसी के प्रकाश टॉकीज में तो रात-दिन मेले जैसा दृश्य बना रहता था। लोग दूर-दराज से खाना, बिछावन के साथ एक दिन पूर्व ही टॉकीज परिसर में डेरा जमा देते थे। उस समय एक नई कहावत भी चल पड़ी थी- “गंगा नहा, बाबा बिसनाथ दरसन करा, गंगा मैया... देखा, तब घरे जा...”। इसकी सन्देशात्मक लोकप्रियता एवं आकर्षण का ही प्रतिफल कहें कि तत्कालीन केन्द्रीय विदेश एवं गृहमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी (बाद में देश के द्वितीय प्रधानमंत्री बने), केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्यमंत्री सत्यनारायण सिन्हा जी एवं परिवहनमंत्री जगजीवन राम जी जैसी विभूति ने भी इसे देखने की इच्छा जाहिर की थी। फलतः 11 अक्टूबर, 1963 को दिल्ली के गोलचा सिनेमा में फिल्म के विशेष प्रदर्शन का आयोजन किया गया। फिल्म की कहानी इतनी प्रभावकारी और ह्रदय विदारक थी कि प्रदर्शन के दौरान शास्त्री जी की आँखे नम हो गईं थी। भोजपुरी भाषा में बनी यह पहली फिल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो” ने किसी भी अन्य भाषाओँ के मुकाबले में कम सफलता एवं लोकप्रियता हासिल नहीं की थी, बल्कि समाज में दहेज, बेमेल विवाह, विधवा विवाह, सामन्ती विचारों, सूदखोरी, अशिक्षा, सामाजिक जिम्मेदारी तथा अन्धविश्वास परम्पराओं से उत्पन्न सामाजिक समस्याओं का एक सही और संवेदनशील चित्र उपस्थित हुआ।

अब हम आपको इस फिल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय शीर्षक गीत सुनवाते हैं। इसके गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार चित्रगुप्त थे।


फिल्म गंगा मैया तोहें पियरी चढ़इबो : ‘हे गंगा मैया तोहें...’ : लता और उषा मंगेशकर




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 118वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक रागमाला गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। प्रतिभागियों से अनुरोध है कि पहेली में गीत/संगीत का जो अंश आपको सुनवाया जा रहा है, राग की पहचान केवल उतने ही अंश से करें। रागमाला के अन्य रागों का अपने उत्तर में उल्लेख न करें। पहेली के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह अंश किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीतांश किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 116वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिये गए रागमाला गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ अगले अंक से पुनः जारी होगा। अगले अंक का रागमाला गीत तीन अलग-अलग राग पर आधारित अन्तरॉ वाला गीत है। अगले अंक में हम इसी रागमाला गीत पर चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


शोध एवं आलेख : रविराज पटेल
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’ भाग 2


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘ना बोल पी पी मोरे अँगना पंछी जा रे जा...'


फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश का दूसरा भाग प्रस्तुत कर रहे हैं।

मशाद बेगम के गाये गीतों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाव रे' की तीसरी कड़ी में सुजॉय चटर्जी का नमस्कार। कुछ वर्ष पहले वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के नेतृत्व में विविध भारती की टीम पहुँची थी शमशाद जी के पवई के घर में, और उनसे लम्बी बातचीत की थी। उसी बातचीत का पहला अंश पिछली कड़ी में हमनें पेश किया था, आइए आज उसी से आगे की बातचीत के कुछ और अंश पढ़ें।

शमशाद जी : मैंने मास्टर जी (गुलाम हैदर) से पूछा कि क्या दूसरा गाना गाउँ? इस पर उन्होने कहा कि नहीं, इतना ठीक है। फिर १२ गानों का ऐग्रीमेण्ट हो गया, हर गाने के लिए 12 रुपये। मास्टरजी नें उन लोगों से कहा कि इस लड़की को वो सब फ़ैसिलिटीज़ दो जो सब बड़े आर्टिस्टों को देते हो। उस ज़माने में 6 महीनों का कांट्रैक्ट हुआ करता था। 6 महीने बाद फिर रेकॉर्डिंग् वाले आ जाते थे। सुबह 10 से शाम 5 बजे तक हम रिहर्सल किया करते, म्युज़िशियन्स के साथ। मास्टरजी भी रहते थे। आप हैरान होंगे कि उन्हीं के गाने गा-गा कर मैं आर्टिस्ट बनी हूँ।

कमलजी : आप में भी लगन रही होगी?

शमशाद जी : मास्टर गुलाम हैदर साहब कहा करते थे कि इस लड़की में गट्स है, आवाज़ भी प्यारी है। शुरु में हर गीत के लिए 12 रूपए देते थे। पूरा सेशन ख़त्म होने पर मुझे पाँच हजार रूपए मिले। जब रब मेहरबान तो सब मेहरबान... (यहाँ शमशाद जी भावुक हो जाती हैं और रो पड़ती हैं) ...जब अच्छा काम करने के बाद रिजल्ट निकलता है तो फिर क्या कहने।

कमल जी : आप फिर रेडियो से भी जुड़ गईं, इस बारे में कुछ बताएँ।

शमशाद जी : जब मैंने गाना शुरू किया था रेडियो नहीं था, सिर्फ ग्रामोफोन कम्पनियाँ थीं, और बहुत मंहगा भी था। 100 रूपए कीमत थी ग्रामोफ़ोन की और एक रेकॉर्ड की कीमत ढाई रुपए होती थी। दो साल बाद जब हम तैयार हो गए, तब रब ने रेडियो खोल दिया और मैं पेशावर रेडियो में शामिल हो गई।

कमल जी : रेडियो में किसी प्रोड्यूसर को आप जानती थीं, आपको मौका कैसे मिला?

शमशाद जी : उस वक्त प्रोड्यूसर नहीं, स्टेशन डिरेक्टर होते थे, उनके लिए गाने वाले कहाँ से आयेंगे? तो इसके लिए वो ग्रामोफ़ोन कम्पनी वालों से पूछते थे, गायकों के बारे में। जिएनोफ़ोन कम्पनी से भी उन्होंने पूछा और इस तरह से मेरा नाम उन्हें मिल गया। मैंने पेशावर रेडियो से शुरुआत की, पश्तो, परशियन, हिन्दी, उर्दू और पंजाबी प्रोग्राम करने लगी। फिर लाहौर और दिल्ली रेडियो से भी जुड़ी।

दोस्तों, जुड़े हुए तो हम हैं पिछले 6 दशकों से शमशाद बेगम के गाये हुए गीतों के साथ। उनकी आवाज़ में जो आकर्षण है, रौनक है, जो चंचलता है, जो शोख़ी है, उसके जादू से कोई भी नहीं बच सकता। तीन दशकों में उनकी खनकती आवाज़ ने सुनने वालों पर जो असर किया था, वह असर आज भी बरकरार है। आइए आज की कड़ी में भी एक और असरदार गीत सुनते हैं 1949 की फ़िल्म 'दुलारी' से। ग़ुलाम हैदर और राम गांगुली के बाद, आज बारी है संगीतकार नौशाद साहब की। जैसा कि पहली कड़ी में हमनें ज़िक्र किया था कि नौशाद साहब के मुताबिक़ शमशाद जी की आवाज़ में पंजाब के पाँच दरियाओं की रवानी है। आइए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को सुनते हुए नौशाद साहब के इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं। नौशाद साहब को याद करते हुए शमशाद जी नें अपनी 'जयमाला' में कहा था, "संगीतकार नौशाद साहब के साथ मैंने कुछ 16-17 फिल्मों में गाये है, जैसे- 'शाहजहाँ', 'दर्द', 'दुलारी', 'मदर इण्डिया', 'मुग़ल-ए-आज़म', 'दीदार', 'अनमोल घड़ी', 'आन', 'बैजू बावरा', वगैरह। मेरे पास उनके ख़ूबसूरत गीतों का ख़ज़ाना है। लोग आज भी उनके संगीत के शैदाई हैं। मेरे स्टेज शोज़ में भी लोग ज़्यादातर उनके गीतों की ही फ़रमाइश करते हैं"। लीजिए, नौशाद साहब और शमशाद जी, इन दोनों को समर्पित, फिल्म ‘दुलारी’ का यह गीत सुनते हैं।


फिल्म दुलारी : ‘ना बोल पी पी मोरे अँगना पंछी जा रे जा...' : संगीत – नौशाद


‘शरमाए काहे, घबराए काहे, सुन मेरे राजा...’

दोस्तों, आजकल फ़िल्मों में आइटम नम्बर का बड़ा चलन हो गया है। शायद ही कोई ऐसी फ़िल्म बनती हो जिसमें इस तरह का गीत न हो। लेकिन यह परम्परा आज की नहीं है, बल्कि पचास के दशक से ही चली आ रही है। आज जिस तरह से कुछ विशेष गायिकाओं से आइटम साँग गवाये जाते हैं, उस ज़माने में भी वही हाल था। उन दिनों इस जौनर में शीर्ष स्थान शमशाद बेग़म का था। बहुत सी फ़िल्में ऐसी बनीं, जिनमें मुख्य नायिका का पार्श्वगायन किसी और गायिका नें किया, जबकि शमशाद बेगम से कोई ख़ास आइटम गीत गवाया गया। आज की कड़ी में आप सुनेंगे दादा सचिनदेव बर्मन की धुन पर शमशाद जी की मज़ाहिया आवाज़ और अंदाज़। ऐसा अनुभव होता है कि उस जमाने में किशोर कुमार जिस तरह की कॉमेडी अपने गीतों में करते थे, गायिकाओं में, और इस शैली में उन्हें टक्कर देने के लिए केवल एक ही नाम था, और वह था शमशाद बेगम का। 1951 में 'नवकेतन' की फ़िल्म आई थी 'बाज़ी', जिसमें मुख्य गायिका के रूप में गीता रॉय नें अपनी आवाज़ दीं और एक से एक लाजवाब गीत फ़िल्म को मिले, जिनमें शामिल हैं- “सुनो गजर क्या गाये...”, "तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले...”, "देख के अकेली मोहे बरखा सताये", "ये कौन आया" और "आज की रात पिया दिल ना तोड़ो...”। इन कामयाब और चर्चित गीतों के साथ फिल्म में एक गीत शमशाद बेगम का भी था, जिसनें भी ख़ूब मकबूलियत हासिल की उस ज़माने में। वह गीत है, "शरमाये काहे, घबराये काहे, सुन मेरे राजा, ओ राजा, आजा आजा...”। इस गीत में उन्होंने न केवल अपनी गायकी का लोहा मनवाया, बल्कि अजीब-ओ-गरीब हरकतों और तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर कॉमेडी का वह नमूना पेश किया जो उससे पहले किसी गायिका नें शायद ही की होगी। और इसी वजह से आज की कड़ी के लिए हमने इस गीत को चुना है। साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत है।

दोस्तों, आज के प्रस्तुत गीत में शमशाद जी भले ही हमे ना घबराने और ना शरमाने की सीख दे रही हैं, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि वो ख़ुद मीडिया से दूर भागती रहीं, पब्लिक फ़ंक्शन्स में वो नहीं जातीं, और यहाँ तक कि अपना पहला स्टेज शो भी पचास वर्ष की आयु होने के बाद ही उन्होंने दिया था। शमशाद जी तो सामने नहीं आतीं, लेकिन उनके गाये गीतों के रीमिक्स आज भी बाज़ार में छाये हैं। कैसा लगता है उनको? इस सवाल पर वो कहती हैं- "मुझे रीमिक्स से कोई शिकायत नहीं है। आज शोर-शराबे का ज़माना है, रिदम का ज़माना है, बच्चे लोग ऐसे गाने सुन कर ख़ुश होते हैं, झूमते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है, पर कोई इन गीतों में हमारा नाम भी तो ले। लोग जब तक मुझे याद करते हैं, जब तक मेरे गाने बजाए जाते हैं, मैं ज़िन्दा हूँ”। शमशाद जी के गाये गीत हमेशा ज़िन्दा रहेंगे इसमें कोई शक़ नहीं है। तीन दशकों तक उन्होंने फिल्म संगीत जगत पर राज किया है। उनकी आवाज़ की खासियत ही यह है कि उनकी आवाज़ की ख़ुद की अलग पहचान है, खनक है, जो किसी अन्य गायिका से नहीं मिलती, और इसलिए उनकी प्रतियोगिता भी अपने आप से ही रही है। शमशाद जी के गाये ज़्यदातर गानें चर्चित हुए। मास्टर ग़ुलाम हैदर, नौशाद, ओ.पी. नैयर, सी. रामचन्द्र जैसे संगीतकारों ने उनकी आवाज़ को नई दिशा दी, और साज़ और आवाज़ के इस सुरीले संगम से उत्पन्न हुआ एक से एक कामयाब, सदाबहार गीत। आइए आज का सदाबहार गीत सुना जाये, लेकिन संगीतकार हैं, दादा बर्मन और फिल्म है, ‘बाज़ी’।


फिल्म बाज़ी : ‘शरमाए काहे, घबराए काहे, सुन मेरे राजा...’ : संगीत – सचिनदेव बर्मन


अगले अंक में जारी...

आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। इस श्रृंखला का अगला अंक हम गुरुवार, 2 मई को प्रकाशित करेंगे। हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

शमशाद बेगम को श्रद्धांजलि : भाग 1


पार्श्वगायिका शमशाद बेगम को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की श्रद्धांजलि

‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’

फिल्म संगीत के सुनहरे दौर की गायिकाओं में शमशाद बेगम का 23 अप्रैल को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। खनकती आवाज़ की धनी इस गायिका ने 1941 की फिल्म खजांची से हिन्दी फिल्मों के पार्श्वगायन क्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई थी। आत्मप्रचार से कोसों दूर रहने वाली इस गायिका को श्रद्धांजलि-स्वरूप हम अपने अभिलेखागार से अगस्त 2011 में अपने साथी सुजॉय चटर्जी द्वारा प्रस्तुत दस कड़ियों की लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…' के सम्पादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं।

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है आप सभी का इस सुरीले सफ़र में। आज से एक नई श्रृंखला के साथ, मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ हाज़िर हो गया हूँ। आज से शुरु होने वाली लघु श्रृंखला ‘बूझ मेरा क्या नाम रे...’, समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों, जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ. पी. नय्यर साहब नें इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मन्दिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु श्रृंखला 'बूझ मेरा क्या नाम रे…'

शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज 6 दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस श्रृंखला में उनके गाये गीतों को सुनने के साथ-साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।

विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करते हुए शमशाद बेगम नें बरसों पहले अपनी दास्तान कुछ यूँ बयान की थीं- "देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ। मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ। आप मेरे गाने अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूँ है कि मेरा जन्म लाहौर में 1919 में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी को भी नहीं था, मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी-कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसन्द आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग कम्पनी ‘jien-o-phone’ के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। 14 साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ, जो था- "हाथ जोड़ा लई पखियंदा ओये क़सम ख़ुदा दी चन्दा..."। उस रेकॉर्ड कम्पनी नें फिर मेरे 100 रेकॉर्ड्स निकाले। 1937 में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिन्दी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। 1939 में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया 1940 की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत- "आ सजना…" काफ़ी हिट हुआ था। मेरी पहली हिन्दी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म 52 हफ़्तों से ज़्यादा चली।" दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। लेकिन इतनी आसानी से हम भला सन्तुष्ट क्यों हों? इसलिये श्रृंखला के अगले अंक में हम उनसे इन्ही दिनों के बारे में विस्तार से जानेंगे। लेकिन फिलहाल सुना जाये, शमशाद जी की पहली हिन्दी फ़िल्म 'ख़ज़ांची' से उनका गाया यह गीत "सावन के नज़ारे हैं…"। मास्टर ग़ुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब ने। 1941 में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिडवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे एम. इस्माइल, रमोला और नारंग।

फिल्म खजांची : "सावन के नज़ारे हैं…" : संगीत – गुलाम हैदर




‘काहे कोयल शोर मचाए रे...’ :

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। जैसा कि पिछली कड़ी में हमने वादा किया था कि शमशाद जी के बचपन और शुरुआती दौर के बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे, तो आइए आज प्रस्तुत है विविध भारती द्वारा शमशाद जी से किये गए एक साक्षात्कार के अंश। उनसे बातचीत कर रहे हैं वरिष्ठ उद्‍घोषक श्री कमल शर्मा।

शमशाद जी : मेरे को गाना नहीं सिखाया किसी ने, ग्रामोफ़ोन पर सुन-सुन कर मैंने सीखा। मेरे घरवालों ने एक पैसा नहीं खर्च किया। लड़कों का ही फ़िल्मों में गाना-बजाना अच्छा नहीं माना जाता था, फिर लड़कियों की क्या बात थी। मैं गाने लगती तो घर में तो सब चुप करा देते थे कि क्या हर वक़्त ‘चैं चैं’ करती रहती है।

कमल जी : शमशाद जी, आपने किस उम्र से गाना शुरु किया था?

शमशाद जी : आठ साल की उम्र से गाना शुरु किया, यूँ समझिए, जब से होश आया तभी से गाती थी।

कमल जी : आप जिस स्कूल में पढ़ती थीं, वहाँ आपके म्युज़िक टीचर ने आपका हौसला बढ़ाया होगा?

शमशाद जी : उन्होंने कहा कि आवाज़ अच्छी है, पर घरवालों ने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वह एक ब्रिटिश ने बनाया था। उर्दू ज़बान में, मैंने पाँचवी स्टैण्डर्ड तक पढ़ाई की। हम चार बहनें और तीन भाई थे। एक मेरा चाचा थे, उनको गाने का शौक था। वो कहते थे कि हमारे घर में यह लड़की आगे चलकर अच्छा गायेगी। वो मेरे बाबा के सगे भाई थे। वो उर्दू इतना अच्छा बोलते थे कि तबीयत ख़ुश हो जाती थी। लगता ही नहीं कि वो पंजाब के रहने वाले हैं। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौकीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी-कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। लेकिन वो मेरे गाने से डरते थे। वो कहते कि चार-चार लड़कियाँ हैं घर में, तू गायेगी तो इन सबकी शादी करवानी मुश्किल हो जायेगी।

कमल जी : शमशाद जी, आपकी गायकी की फिर शुरुआत कैसे और कब हुई?

शमशाद जी : मेरे उस चाचा ने मुझे जिएनोफ़ोन (Jien-o-Phone) कम्पनी में ले गए, वो एक नई ग्रामोफ़ोन कम्पनी थी। उस समय मैं बारह साल की थी। वहाँ पहुँचकर पता चला कि ऑडिशन होगा। उन लोगों ने तख़्तपोश बिछाया, हम चढ़ गए, उस पर बैठ गए (हँसते हुए)। वहीं पर मौजूद थे संगीतकार मास्टर ग़ुलाम हैदर साहब। इतने कमाल के आदमी मैंने देखा ही नहीं था। वो मेरे वालिद साहब को पहचानते थे। वो कमाल का पखावज बजाते थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि आपके साथ कौन बजायेगा? मैंने कहा मैं ख़ुद ही गाती हूँ, मेरे साथ कोई बजानेवाला नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि थोड़ा गा के सुनाओ। मैंने ज़फ़र की ग़ज़ल शुरु की, "मेरे यार मुझसे मिले तो...", एक अस्थाई, एक अन्तरा, बस, उन्होंने मुझे रोक दिया। मैंने सोचा कि गये काम से, ये तो गाने ही नहीं देते। ये मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि मैं प्लेबैक आर्टिस्ट बन जाऊँगी, मेरा इतना नाम होगा। मैं सिर्फ़ चाहती थी कि मैं खुलकर गाऊँ।

दोस्तों, शमशाद जी का कितना नाम हुआ, और कितना खुल कर वो गाईं, ये सब तो अब इतिहास बन चुका है। आइए अब बात करते हैं आज के गाने की। श्रृंखला की शुरुआत हमने कल मास्टर ग़ुलाम हैदर के कम्पोज़िशन से की थी। आइए आज सुनें संगीतकार राम गांगुली के संगीत निर्देशन में 1948 की राज कपूर की पहली निर्मित फ़िल्म 'आग' से, शमशाद जी का गाया फ़िल्म का एक बेहद लोकप्रिय गीत "काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे..."। गीतकार हैं बहज़ाद लखनवी और गीत फ़िल्माया गया है नरगिस पर। इस गीत में कुछ ऐसा जादू है कि गीत को सुनने वाला हर कोई अपनी यादों में खो जाता है, उसे भी कोई अपना सा याद आने लगता है। इस गीत के बारे में शमशाद जी नें कहा था- "राज कपूर अपनी पहली फ़िल्म 'आग' बना रहे थे। वे मेरे पास आए और कहा कि मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा हूँ। मैं कहा, बहुत ख़ुशी की बात है। फिर उन्होंने कहा कि आपको मेरी फ़िल्म में गाना पड़ेगा। मैंने कहा, गा दूँगी।" इस फ़िल्म के सारे गानें बहुत ही मक़बूल हुए, संगीतकार थे राम गांगुली। इस फ़िल्म का एक गीत सुनिये।

फिल्म आग : "काहे कोयल शोर मचाये रे..." : संगीत - राम गांगुली


अगले अंक में जारी...

आपको हमारा यह विशेष श्रद्धांजलि अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिए। इस श्रृंखला का अगला अंक हम कल प्रकाशित करेंगे। हमें आपके सुझावों और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

कारवाँ सिने-संगीत का : 1933 की दो उल्लेखनीय फिल्में



भारतीय सिनेमा के सौ साल – 42

कारवाँ सिने-संगीत का

वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ और हिमांशु राय की ‘कर्म’



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1933 में ‘वाडिया मूवीटोन’ के गठन और इसी संस्था द्वारा निर्मित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत पहली ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म ‘कर्म’ की चर्चा भी कर रहे हैं।

1933 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन। वाडिया भाइयों, जे. बी. एच. वाडिया और होमी वाडिया, ने इस कंपनी के ज़रिए स्टण्ट और ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु किया। दरअसल वाडिया भाइयों ने मूक फ़िल्मों के जौनर में ‘तूफ़ान मेल’ शीर्षक से एक लो-बजट थ्रिलर फ़िल्म बनाई थी, जिसे ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। इसी सफलता से प्रेरित होकर इन दो भाइयों ने ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन किया और इस बैनर तले पहली सवाक फ़िल्म ‘लाल-ए-यमन’ 1933 में प्रदर्शित की। ऐक्शन फ़िल्मों में ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है और इसी वजह से ‘वाडिया’ की फ़िल्मों में गीत-संगीत का पक्ष अन्य फ़िल्मों के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ करता था। ज़बरदस्ती गीत डालने से थ्रिलर फ़िल्मों की रोचकता में कमी आती है, इस बात का वाडिया भाइयों को पूरा अहसास था, इसीलिए इस कंपनी ने बाद के वर्षों में संगीत-प्रधान लघु फ़िल्मों का अलग से निर्माण किया।
फिरोज दस्तूर 

इन लघु फ़िल्मों के ज़रिए कई संगीतज्ञों ने लोकप्रियता भी हासिल की, जिनमें शामिल थे अहमद जान थिरकवा, सखावत हुसैन ख़ान, हबीब ख़ान, मलिका पुखराज, बाल गंधर्व, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और फ़िरोज़ दस्तूर। दस्तूर ने पहली बार ‘लाल-ए-यमन’ में संगीतकार जोसेफ़ डेविड के निर्देशन में गीत गाये जिनमें शामिल थे “अब नहीं धरत धीर”, “जाओ सिधारो फ़तेह पाओ”, “खालिक तोरी नजरिया”, “मशहूर थे जहाँ में जो”, “तसवीर-ए-ग़म बना हूँ” और “तोरी हरदम परवर आस” आदि। फ़िल्म के संगीतकार मास्टर मोहम्मद ने इस फ़िल्म में एक सूफ़ी फ़कीर की भूमिका निभाने के अतिरिक्त “गाफ़िल बंदे कुछ सोच ज़रा” गीत भी गाया। अब हम आपको फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ से फिरोज दस्तूर का गाया गीत- ‘मशहूर थे जहाँ में...’ सुनवाते हैं।


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



अभिनेत्री सरदार अख़्तर अभिनीत पहली फ़िल्म 1933 में बनी, ‘ईद का चांद’ शीर्षक से ‘सरोज मूवीटोन’ के बैनर तले। पिछले वर्ष की तरह सुंदर दास भाटिया का संगीत ‘सरोज’ की फ़िल्मों में सुनने को मिला। संवाद व गीतकार के रूप में अब्बास अली और एम. एस. शम्स ने इस फ़िल्म में काम किया था। हरिश्चन्द्र बाली, जो ख़ुद एक संगीतकार थे, सरदार अख़्तर के साथ फ़िल्म ‘नक्श-ए-सुलेमानी’ में अभिनय किया। सुंदर दास के ही संगीत में ‘सरोज’ की एक और उल्लेखनीय फ़िल्में रही ‘रूप बसंत’ जिसके गीतकार थे मुन्शी ‘शम्स’। इन सभी फ़िल्मों में गुजराती नाट्य जगत से आये गायक अशरफ़ ख़ान ने कई गीत गाये जो लोगों को ख़ूब भाये।

देविका रानी और हिमांशु रॉय 
‘कर्म’ पहली भारतीय बोलती फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन इंग्लैण्ड में हुआ था। इसके अंग्रेज़ी संस्करण का शीर्षक था ‘फ़ेट’। देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत यह फ़िल्म एक ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी जिसका प्रीमियर लंदन में 1933 के मई के महीने में हुआ था। इसका हिन्दी संस्करण 27 जनवरी, 1934 को बम्बई में रिलीज़ हुआ था। ‘कर्म’ के संगीतकार थे अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट, जिन्होंने देविका रानी से एक अंग्रेज़ी गीत “now the moon her light has shed” भी गवाया था। टैगोर ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी, जिन्हें ‘फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इण्डियन स्क्रीन’ की उपाधि दी जाती है, लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ़ आर्ट ऐण्ड म्युज़िक’ गई थीं पढ़ाई के सिलसिले में। वहाँ उनकी मुलाक़ात हिमांशु राय से हुई और उनसे शादी कर ली। 1929 की मूक फ़िल्म ‘प्रपांच पाश’ में देविका रानी एक ‘फ़ैशन डिज़ाइनर’ के रूप में काम किया, जिसके लिए दुनिया भर में उनके काम को सराहा गया। ‘प्रपांच पाश’ और ‘कर्म’ के बाद देविका और हिमांशु भारत चले आये और 1934 में गठन किया ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का। इस बैनर तले बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, बहुत से कलाकारों (जिनमें अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार शामिल हैं) को ब्रेक दिया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के स्तंभ कलाकार बने। फ़िल्म-संगीत को भी एक नया आयाम देने का श्रेय ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को दिया जा सकता है। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को पहली भारतीय ‘पब्लिक लिमिटेड “फ़िल्म” कंपनी’ होने का गौरव प्राप्त है। लीजिए, अब आप फिल्म ‘कर्म’ का एक दुर्लभ गीत सुनिए।


फिल्म कर्म : ‘मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे...’ : संगीतकार - अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


शोध व आलेख सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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