Tuesday, September 27, 2011

ए री मैं तो प्रेम दीवानी....भक्ति, प्रेम और समर्पण के भावों से ओत प्रेत ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 753/2011/193

मस्कार! आप सभी संगीत रसिकों का स्वागत है ‘आवाज’ की महफ़िल में. आज मैं हाजिर हूँ ‘ओल्ड इज गोल्ड’ में लता जी के ऊपर आधारित श्रृंखला ‘मेरी आवाज ही पहचान है....’ की तीसरी कड़ी लेकर.

लता जी का बचपन ही शुरू हुआ संगीत के आँचल से. सबसे पहले उन्होंने अपने पिताजी को गाते हुए सुना. के. एल. सहगल की तो भक्त हैं लता जी. छह साल की उम्र में के.एल. सहगल की जो पहली फिल्म देखी थी वो थी ‘चण्डीदास’. फिल्म देख कर घर आयीं तो एलान कर दिया कि मैं तो बड़े होकर सहगल से ही शादी करूंगी. लता जी के गुरु उनके पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर थे. एक बार लता जी से पूछा गया कि पिता से संगीत की शिक्षा के अलावा कोई ऐसी सीख मिली, जो मन में हमेशा के लिए अंकित हो गयी हो?

उन्हें जवाब सोचना नहीं पड़ा और तुरंत उत्तर आया “हाँ, उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘अगर एक बार तुम्हे विश्वास हो जाये कि जो तुम कर रही हो वह सत्य है, सही है, बस...तो फिर कभी किसी से डरना नहीं.’”. पिता अपनी पुत्री से बहुत प्यार करते थे. लता की माई (माँ) ने बताया था, मास्टर दीनानाथ जी, ने जिन्हें माई ‘मालक’ कहा करती थीं, अपनी लाड़ली को केवल एक ही बार सजा दी थी. लता एक गीत ताल में नहीं गा पा रही थीं. घर में एक अलमारी पर गद्दे रखे जाते थे. उसी के ऊपर ‘मालक’ ने उसे बैठा दिया और जब तक उसका गाना ताल में नहीं आया, उसे नहीं उतारा. शायद यही अनुशासन बाद में लता जी के काम आया.

बाप बेटी में बहुत जमती थे. लता दिन भर ‘बाबा बाबा’ करती रहती. इसलिए ‘मालक’ उसे ‘लताबाबा’ कहते. एक बार लता हाथ में सोने की चूडियाँ पहने बाहर घूमने चली गयीं. माई ने डांटा, तो धमकी देने लगी, कि मैं जा कर नदी में कूद कर जाँ दे दूंगी. ‘मालक’ ने यह सुन कर कहा, ‘देख लता, पहले ये चूडियाँ निकाल, बाद में नदी में कूदने के लिए जा!’ इसके बाद दो दिनों तक लता की अपने बाबा से कट्टी रही.

एक बार ‘मालक’ का स्वास्थ्य ठीक नहीं था और वो घर पर थे. पत्नी से बार बार उत्तेजित स्वर में पूछ रहे थे –‘अभी तक लता-मीना नहीं आयी?
इतनी जल्दी कैसे आयेंगी? आपने ही तो उन्हें संस्कृत सीखने भेजा है. आप ही तो कहते हैं कि संस्कृत सीखने से अन्य भाषाओं का ज्ञान अपने आप हो जाता है!" माई ने उत्तर दिया.
बच्चे घर पर आये. पिता ने स्नेह से पूछा,”आओ, मेरे पास आओ. आज मास्टरजी ने क्या सिखाया?
गायत्री मन्त्र”.
अच्छा बोल कर दिखाओ.
सब सामने बैठीं और गायत्री मन्त्र गा कर सुनाया.
ससुरी...सब की सब सुर में हैं,” पिता, शब्दों के उच्चारण से भे ज्यादा, सुरीले स्वरों से प्रभावित हुए. आंके मूँद लीं और “मंगेश, मंगेश” का रटण किया, जैसे पुत्रियों को कोई दैवी आशीर्वाद दे रहे हों.

फिल्म ‘खजांची’ के लिए आयोजित एक संगीत प्रतियोगिता में ग्यारह साल की लता प्रथम आयी थे. दो चंद्रक और एक दिलरुबा पुरस्कार में मिले थे. वही दिलरुबा एक बार पिता बजा रहे थे. कहीं से एक चूहा निकल आया. गुस्से में उन्होंने दिलरुबा का छड फेंका और वह टूट गया. लता गुस्से से रो पड़ी. उन्ही के शब्दों में, “तब बाबा ने जो बात कही, वह मुझे हमेशा के लिए याद रह गयी. उन्होंने कहा था कि ‘तुम्हें रोना और गुस्सा इसलिए आ रहा है न कि यह तुम्हारा जीता हुआ पुरस्कार है?...यानि यह सिद्धि तुम पर असर कर गयी है. यह अच्छी बात नहीं है, क्योंकि तुम्हे भविष्य में बहुत बड़े बड़े पुरस्कार मिलनेवाले हैं. अपनी ख्याति, अपने यश पर अभिमान नहीं होना चाहिए’..... जब भी मुझे कोई पुरस्कार, कोई सम्मान मिला है तभी मैंने खुद को बाबा की यह बात याद दिलायी है." शायद यही सब कारण हैं लता जी की महानता के.

अचल वर्मा जी ने १९५२ की फिल्म ‘नौ बहार’ के गाने ‘ए री मैं तो प्रेम दीवानी’ को सुनना चाहा है. इस गाने को ‘नलिनी जयवंत’ पर फिल्माया गया था. साथ में अशोक कुमार भी थे. इस गाने का संगीत दिया था संगीतकार रोशन ने. गाने के बोल लिखे थे ‘सत्येन्द्र अत्थैया’ ने. यह गाना राग ‘तोड़ी’ पर आधारित है. लीजिए आप सब भी आनंद लीजिए इस गाने का.



इन ३ सूत्रों से पहचानिये अगला गीत -
१. लता जी की ठहरी हुई मदहोश आवाज़ है इस गीत में.
२. इस एतिहासिक गीत को उन्होंने अपना सबसे पसंदीदा गीत माना था गीत के रचियेता के सुपुत्र को दिए गए एक साक्षात्कार में.
३. इतिहास के पन्नों में दर्ज एक प्रेम कहानी पर बनी एक फिल्म है ये.

अब बताएं -
गीतकार बताएं - ३ अंक
संगीतकार कौन हैं - २ अंक
फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक
सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम-
क्या बात है इतनी आसान पहेलियों में भी सब क्नफ्यूस हो रहे हैं ?

खोज व आलेख- अमित तिवारी
विशेष आभार - वाणी प्रकाशन


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

9 comments:

Pratibha Kaushal-Sampat said...

गीतकार बताएं - Jan Nisar Akhtar (Father of Javed Akhtar)

Pratibha
Ottawa, Canada

Kish(ore) said...

संगीतकार कौन हैं - Khayaam

Kishore
Kanata,Ontario,CANADA

Bhavesh Dhabliwala said...

फिल्म के निर्देशक बताएं - Kamal Amrohi

Bhavesh D.
Atlanta, Georgia, USA

indu puri said...

सर्वर डाऊन हो गया.नेट ने जवाब दे दिया ,हाथ ऊंचे उठा लिए मैं क्या करती बताइए.कोई रज़िया सुलतान तो हूँ नही कि घोड़े पर,ऊँट पर या किसी और साधन से यहाँ पहुँचती. बहुत ही बकवास फिल्म लगी थी यह मुझे.प्रथम महिला प्रशासिका इल्तुतमिश के अयोग्य पुत्रों में काबिल बेटी गुलाम वंश की थी.कमल अमरोही साहब न उसे अच्छी शासिका के रूप में ढंग से फिल्म पाए न प्रेमिका के रूप में ही.हेमा मालिनी जी का चयन करना ही शायद गलत था.वैसे इस फिल्म के सभी गाने कर्णप्रिय थे.

indu puri said...

सर्वर डाऊन हो गया.नेट ने जवाब दे दिया ,हाथ ऊंचे उठा लिए मैं क्या करती बताइए.कोई रज़िया सुलतान तो हूँ नही कि घोड़े पर,ऊँट पर या किसी और साधन से यहाँ पहुँचती. बहुत ही बकवास फिल्म लगी थी यह मुझे.प्रथम महिला प्रशासिका इल्तुतमिश के अयोग्य पुत्रों में काबिल बेटी गुलाम वंश की थी.कमल अमरोही साहब न उसे अच्छी शासिका के रूप में ढंग से फिल्म पाए न प्रेमिका के रूप में ही.हेमा मालिनी जी का चयन करना ही शायद गलत था.वैसे इस फिल्म के सभी गाने कर्णप्रिय थे.

अमित तिवारी said...

कोई बात नहीं इंदू जी. अभी तो बहुत से मोती हैं समुन्दर में. चुनने का मौका जरूर मिलेगा.
प्रतिभा जी और किशोर जी लगता है आप लोग काफी व्यस्त हैं इसलिए कभी कभार आते हैं. आप लोगों से संपर्क करने की कोशिश करी थी ओटवा में पर कामयाबी नहीं मिली.भावेश जी स्वागत है आपका.

AVADH said...

अमितजी,
इस फिल्म 'रज़िया सुल्तान' के बारे में इंदु बहिन काफी कुछ कह चुकी हैं. फिल्म न चलने की एक वजह यह भी थी कि फिल्म के डायलॉग (कमाल अमरोही साहेब के) बेहद भारी भरकम उर्दू में थे जो अधिकांश दर्शकों के सर के ऊपर से निकल गए थे. हो सकता है कि हेमा मालिनी जी का चयन नायिका के चरित्र के अनुरूप न रहा हो पर एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हब्शी गुलाम 'याकूत' के किरदार में धर्मेन्द्र खूब जमे थे.
अगर 'ऐ दिल-ए- नादाँ' को लता दीदी अपना पसंदीदा गीत मानती हैं तो यह बात ठीक ही है. मैं भी इंदु बहिन से सहमत हूँ कि इस फिल्म के सभी गाने बेहद कर्णप्रिय थे. और क्यों न हो - आखिर संगीत खय्याम साहेब का था.
मुझे जो एक बात इस फिल्म की बहुत खास लगी थी वह थी ऑल इण्डिया रेडियो उर्दू सर्विस के उद्घोषक जनाब कब्बन मिर्ज़ा की खनकदार आवाज़ में दो गाने - 'आई ज़ंजीर की आवाज़ खुदा खैर करे' और 'तेरा हिज्र मेरा नसीब है'.
आभार सहित
अवध लाल

indu puri said...

इतने दिनों बाद अवध भैया दिखे.कहाँ चले गए थे आप? आपने फिल्म के बारे में जो जानकारियां दी वो बहुत अच्छी है अब तो मैं आपके बताए इन दोनों गानों को स्पेशली सुनूंगी आज ही.मधुर होते हुए भी कुछ गाने जाने क्यों वो मुकाम हासिल नही कर पाते जिनके वो असल में हकदार होते हैं.
आवाज टीम इस फील्ड में बहुत कुछ कर रही है.इनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है.
ईश्वर इन्हें जीवन में खूब सुख समृद्धि दे.

indu puri said...

अब मालूम पड़ गया है कि अमित जी कम्पीटिशन से अलग क्यों हो गए?हम्म्म्म तो आज कल आवाज पर पोस्ट लिखने प्रश्न पूछने की जिम्मेदारी आपको सौंपी हुई है.तो अब गुरु जी जो खुद पेपर बना रहे हैं वो उत्तर दे तो दे कैसे?हा हा हा आलेख और गाने दोनों बहुत पसंद आये.बधाई.

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