Saturday, December 31, 2016

अलविदा 2016 - ’वर्षान्त विशेष’ में 2016 के फ़िल्म-संगीत का अन्तिम भाग

वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला

2016 का फ़िल्म-संगीत  
भाग-5




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, देखते ही देखते हम वर्ष 2016 के अन्तिम महीने पर आ गए हैं। कौन कौन सी फ़िल्में बनीं इस साल? उन सभी फ़िल्मों का गीत-संगीत कैसा रहा? ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में अगर आपने इस साल के गीतों को ठीक से सुन नहीं सके या उनके बारे में सोच-विचार करने का समय नहीं निकाल सके, तो कोई बात नहीं। हम इन दिनों हर शनिवार आपके लिए लेकर आ रहे हैं वर्ष 2016 में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। पिछले सप्ताह तक हम इस श्रृंखला में जनवरी से लेकर सितंबर तक का सफ़र तय कर चुके हैं। और आज हम आ पहुँचे हैं अपनी मंज़िल पर। तो आइए आज इसकी पाँचवीं और अन्तिम कड़ी में चर्चा करें उन फ़िल्मों के गीतों की जो प्रदर्शित हुए अक्टुबर, नवंबर और दिसंबर के महीनों में।



गुलज़ार और शंकर-अहसान-लॉय जब किसी फ़िल्म में साथ में काम करते हैं तो जादू तो चल ही
जाता है। 7 अक्टुबर को प्रदर्शित फ़िल्म ’मिर्ज़्या’ में भी वही जादू एक बार फिर से चला। मिर्ज़ा और साहिबाँ की अमर और मार्मिक प्रेम कहानी को समर्पित इस फ़िल्म में गुलज़ार और शंकर-अहसान-लॉय ने इस बात का ध्यान रखा कि फ़िल्म का गीत-संगीत स्थान-काल-पात्र के अनुरूप हो। ऐल्बम शुरु होता है शीर्षक गीत से जिसे गाया है दलेर मेहन्दी, सैन ज़हूर, अख़्तर चनल और नूरन सिस्टर्स ने। सैन ज़हूर पाकिस्तानी सूफ़ी गायक हैं तो अख़्तर चनल बलोची लोक गायिका हैं। और नूरन सिस्टर्स के बारे में तो हम जानते ही हैं कि वो जलन्धर की सूफ़ी गायिका बहने हैं। यह गीत प्यार का उत्सव है बोल और संगीत दोनों के लिहाज़ से। मुखड़े के बोल "सब मिलता है दुनिया भर को, आशिक़ को सब कब मिलता है..." में नयापन है। गीत की धुन आदिवासी तालों पर आधारित है जिसमें ढोलक, बाँसुरी और पुंगी का प्रयोग किया गया है जबकि शुरुआती संगीत में सैन की देहाती आवाज़ इस गीत को एक लोक-शैली प्रदान करती है। "तीन गवाह हैं इश्क़ के" ऐल्बम का दूसरा गीत है जो एक मेलडी-प्रधान कर्णप्रिय गीत है जिसमें गीटार और पार्श्व में कोरस गायन का प्रयोग हुआ है। यह गीत भी सैन की आवाज़ से शुरु होता है पर इसे आप लोक-आधारित गीत समझने की ग़लती ना करें। जल्द ही सिद्धार्थ महादेवन की आवाज़ इस गीत को एक आधुनिक गीत का रूप दे देती है। तेज़ी से सफलता की सीढ़ी चढ़ने वाले युवा सिद्धार्थ, जो कि ऊँची पट्टी के गीतों के लिए जाने जाते हैं, इस गीत में अपनी प्रतिभा का एक और नमूना दिखाते हुए इस रोमान्टिम कथागीत को ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और गुलज़ार साहब के बोलों के तो कहने ही क्या "तीन गवाह हैं इश्क़ के, एक रब, एक तू और एक मैं"। अगला गीत है "चकोरा" जिसे लोक गायक मामे ख़ान, हिन्दुस्तानी गायन शैली की गायिका सुचिस्मिता दास और अख़्तर चनल ने गाया है। गीत ट्रान्स जैसी सुर से शुरु होकर एक रफ़्तार भरे लोक गीत का रूप ले लेता है। लेकिन इसमें ईलेक्ट्रॉनिक बीट्स भी फैला पड़ा है। शंकर महादेवन और मामे ख़ान का गाया "आवे रे हिचकी" की शुरुआत सारंगी की तानों से होती है। इस स्लो ट्रैक में गीटार और बेस का मिश्रण एक सुखद अनुभव है कानों के लिए। नूरन बहनों की आवाज़ों द्वारा शुरु होने वाला "होता है" तो जैसे हमें तुरन्त आकर्षित कर लेता है। आगे सैन, अख़्तर और दलेर इस गीत को गाते हैं पूरे जोश और उत्साह के साथ जिसकी इस गीत को ज़रूरत है। नूरन सिस्टर्स और के. मोहन का गाया "एक नदी थी" भी एक सुन्दर रचना है जिसमें तौफ़िक़ क़ुरेशी का परक्युशन है। मोहन की नर्मोनाज़ुक आवाज़, बेस अंडरटोन्स की तेज़ धार और साथ में नूरन सिस्टर्स की ऊँची पट्टी पर गायन, कुल मिला कर एक अद्भुत वैषम्य की रचना हुई है। उस पर गीटार के इन्टरल्युड्स गीत को एक पाश्चात्य रूप प्रदान करती है। गीत के बोल नदी के दोनों तरफ़ की ज़िन्दगी की बात बताता है जो एक तरह से रूपक है और गुलज़ार साहब तो रूपक के लिए मशहूर हैं। शंकर और मामे की आवाज़ों में "डोली रे डोली" में तो जैज़ जैसी अपील है, और क्यों ना हो जब बेस, मेलोडिका, ट्रम्पेट और ड्रमसेट का ज़बरदस्त ईलेक्ट्रिक मिक्स हो! मशहूर भारतीय शास्त्रीय संगीत गायिका कौशिकी चक्रबर्ती (अजय चक्रबर्ती की पुत्री) का गाया "कागा" उनकी गायन प्रतिभा का उदाहरण है। पार्श्व में बज रहे पाश्चात्य संगीत से यह एक फ़्युज़न गीत बन पड़ा है। अलग अलग शैलियों के संगम से यह ऐल्बम एक नायाब ऐल्बम बन गया है। और अन्त में "मिर्ज़्या थीम - ब्रोकेन ऐरोज़" एक दर्द भरी धुन है जिसमें सारंगी, पियानो और बाँसुरी की ताने हैं जिसमें नायक-नायिका का दर्द छुपा हुआ है। इस थीम के समाप्त हो जाने के बाद भी यह धुन आपके कानों में ही नहीं बल्कि दिल में भी बजती रहती है। ’मिर्ज़्या’ ऐल्बम एक स्तरीय ऐल्बम है और गुलज़ार साहब हर बार की तरह इस बार भी यह सिद्ध करते हैं कि आज के फ़िल्म-संगीत जगत में भी उनसे बेहतर कोई नहीं। शंकर-अहसान-लॉय, जिनका रुझान अधिकतर पाश्चात्य संगीत की तरफ़ रहता है, इस ऐल्बम में उन्होंने अकल्पनीय लोक और पारम्परिक शैलियों के संगीत से अपने गीतों को बांधा है। लोकप्रियता को एक तरफ़ रख कर अगर स्तर की बात करें तो निस्संदेह यह ऐल्बम उनकी श्रेष्ठ कामों में से एक है। अक्टुबर के दूसरे सप्ताह 14 तारीख को रिलीज़ हुई ’बे‍ईमान लव’। रजनीश दुग्गल और सनी लीओन अभिनीत फ़िल्म के गीत-संगीत से बहुत अधिक आशा रखना समझदारी की बात नहीं होगी। कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पहला गीत जो जारी किया गया था, उसके बोल थे "hug me"। गीत कोई कमाल नहीं दिखा पाया। लेकिन आगे चल कर जब बाकी के गीत एक एक कर जारी होने लगे, तब पता चला कि कुछ अच्छा काम भी हुआ है इस ऐल्बम में। आज के प्रचलित धारा के मुताबिक इस फ़िल्म में भी कई गीतकार व संगीतकार हैं। ऐल्बम की शुरुआत होती है "रंग रेज़ा" से जिसे असीस कौर ने गाया है। सनी लीओन पर फ़िल्माये गए गीतों की बात करें तो शायद यह सबसे उम्दा गीत रहा है। संगीतकार असद ख़ान और गीतकार रक़ीब आलम ने इस गीत को एक क्लासी ट्रीटमेन्ट दिया है। भारतीय शास्त्रीय, सूफ़ी और रॉक के फ़्युज़न से सुसज्जित यह गीत इस ऐल्बम का पहला गीत होने का स्तर रखता है। इस गीत का एक पुरुष संस्करण भी है यासिर देसाई की आवाज़ में और यह संस्करण भी उतना ही सुन्दर है। यासिर की आवाज़ एक बार फिर सुनाई देती है "मैं अधूरा" में और इस पॉप ट्रैक को सुनना एक सुखद अनुभव रहा। सुखद क्यों ना हो जब संगीतकार हैं संजीव दर्शन और गीतकार हैं समीर अनजान। इस गीत में क्लास, मेलडी और कामुकता का सही संतुलन है। इस गीत में आकांक्षा शर्मा की भी आवाज़ है यासिर के साथ। अगला गीत है "प्यार दे" जिसे गाया व स्वरबद्ध किया है अंकित तिवारी ने और लिखा है अभ्येन्द्र कुमार उपाध्याय ने। यह भी एक कामुक प्रेमगीत है जो "मैं अधूरा" के ख़त्म हो जाने के बाद भी मूड को बनाए रखता है। अंकित की नर्मोनाज़ुक गायकी ने गीत को सही स्पर्श दिया है। इन तीन रोमान्टिक गीतों के बारे में पढ़ते हुए आप अब तक सोच रहे होंगे कि अब तक सनी लीओन के चाहने वालों के लिए कोई आइटम गीत क्यों नहीं आया! उन वर्ग को ख़ुश करने के लिए फ़िल्म के निर्माता ने एक नहीं दो नहीं बल्कि चार आइटम गीत डलवाए हैं। पहला है "hug me" जिसे यकीनन कनिका कपूर ने गाया है, संगीत है राघव सचर का और गीत है कुमार का। यह एक पंजाबी डान्स नंबर है जिसे श्योर शॉट सक्सेस का आधार कहा जा सकता है। दूसरा गीत है "मर गए" जो अन्य सनी लीओन आइटम नंबर्स से अलग है। मंज म्युज़िक द्वारा स्वरबद्ध और उनके और निन्दी कौर के गाए इस गीत में रफ़्तार रैपिंग् करते हैं और गीत लिखा भी उन्होंने ही है। एक कैची फ़ूट टैपरिंग् नंबर तो है ही, इसका एक अलग पंजाबी संस्करण भी है। कुल मिलाकर अच्छा काम कह सकते हैं। अन्तिम गीत है अमजद-नदीम स्वरबद्ध "मेरे पीछे हिन्दुस्तान" जिसे हम आयाराम-गयाराम कह सकते हैं। समीर अनजान का लिखा यह गीत उन तमाम सनी लीओन वाले गीतों जैसा ही है जो ’एक पहेली लीला’, ’कुछ कुछ लोचा है’, ’वन नाइट स्टैण्ड’ आदि फ़िल्मों में सुनने को मिले हैं। यासिर देसाई और सुकृति कक्कर का गाया यह गीत हम नहीं कहते कि बुरा है, पर यह दिल को छू पाने में असमर्थ हैं। 

28 अक्टुबर को प्रदर्शित हुई ’शिवाय’ जिसे अजय देवगन ने प्रोड्युस किया। अजय ने यह कोशिश की
कि फ़िल्म का गीत-संगीत स्तरीय हो। तभी शायद मिथुन, जसलीन रॉयल, कैलाश खेर, मोहित चौहान, अरिजीत सिंह और सुनिधि चौहान जैसे गायकों को लिया गया। फ़िल्म का शीर्षक गीत "बोलो हर हर" एक हेवी ड्युटी गीत है; संदीप श्रीवास्तव लिखित और मिथुन द्वारा स्वरबद्ध इस गीत की शुरुआत मोहित चौहान के भावपूर्ण आवाज़ से होती है। गीत में श्लोकों का पाठ मेघा श्रीराम करती हैं। एक अरसे के बाद एक कमर्शियल फ़िल्म में भगवान शिव पर कोई गीत सुनने को मिला है जिसमें अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई को दर्शाया गया है। गीत का रैप सेक्शन बादशाह ने सम्भाला है। उस पर गीटार की उठती-गिरती तरंगें गीत को और मनोरम बनाती हैं। इस संजीदे गीत के बाद ऐल्बम में आता है "दरख़्वास्त", जो सईद क़ादरी का लिखा एक नर्म मेलडी-सम्पन्न गीत है। अरिजीत और सुनिधि की आवाज़ें कानों में रस घोलती हैं और हाँ, यह दूसरे रोमान्टिक गीतों से हट कर है। भारी भरकम टेक्नो बीट्स, नर्म गीटार के रिफ़्स और बेस का प्रयोग इस कम्पोज़िशन को ऊँचाई प्रदान करते हैं। तीसरा गीत है "रातें" जो मेलडी-प्रधान है। जसलीन और आदित्य शर्मा की आवाज़ों में यह गीत जसलीन ने ही लिखा है। गीत पिता-पुत्री के रिश्ते पर है जिन्हें परदे पर अजय देवगन और बाल कलाकार एबिगेल ईम्स निभाते हैं। जसलीन की आवाज़ में बच्ची की मासूमीयत इस गीत को ख़ास बनाती है। गीत का एक अन्य संस्करण तुलनात्मक दृष्टि से ज़्यादा गंभीर और संजीदा है। फ़िल्म का अन्तिम गीत है "तेरे नाल इश्क़ा"। यह गीत भी पिता-पुत्री का गीत है जिसे गाया है कैलाश खेर ने। मिथुन और कैलाश ने मिल कर इसकी धुन बनाई है। कैलाश की ऊँची पट्टी पर गाने की अदा ने गीत में जान डाल दी है। सईद क़ादरी के लिखे इस गीत को सुनते हुए आँखें छलक जाती हैं। कुल मिलाकर ’शिवाय’ का ऐल्बम सुननेलायक है। दीवाली रिलीज़ेस में सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म थी ’ऐ दिल है मुश्किल (ADHM)’। यह फ़िल्म भी 28 अक्टुबर को रिलीज़ हुई। चार साल बाद इस फ़िल्म से करण जोहर की निर्देशन में वापसी हुई है। रणबीर कपूर, ऐश्वर्या राय और अनुष्का शर्मा अभिनीत इस बड़े बजट की फ़िल्म पर हर किसी की नज़र टिकी थी। और ख़ास तौर से करण जोहर की फ़िल्मों का गीत-संगीत का पक्ष काफ़ी मज़बूत रहा है, इसलिए लोगों की आशाएँ बहुत अधिक थी। संगीतकार प्रीतम और गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य, जो पहले साथ में कई हिट दे चुके हैं, फिर एक बार एक हिट ऐल्बम देने में कामयाब हुए हैं। ऐल्बम के पहले गीत के रूप में अरिजीत सिंह का गाया शीर्षक गीत है जिसमें पथोस भी है और पैशन भी। अपनी आवाज़ के वेरिएशन का नमूना पेश करते हुए अरिजीत ने एक बार फिर से सिद्ध किया कि आज के दौर के वो अग्रणी गायकों में से एक हैं। अमिताभ ने नायक की भावनाओं को बड़े ही सुन्दर तरीक़े से बाहर निकाला है - "मुझे आज़माती है तेरी कमी, मेरी हर कमी हो है तू लाज़मी... जुनून है मेरा बनूँ मैं तेरे क़ाबिल, तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल"। साज़ों का चयन भी कमाल का है इस गीत में; प्रील्युड में पियानो, उसके बाद क्रम से ट्रम्पेट, चेलो, और वायलिन ने गीत के समूचे मूड को बड़ी ख़ूबसूरती से उभारा है, गीत को निखारा है। ऐल्बम का दूसरा गीत "बुलेया" भी काफ़ी हिट रहा जिसे अमित मिश्रा और शिल्पा राव ने गाया है। सूफ़ी-रॉक शैली के इस गीत के प्रील्युड में गीटार के रिफ़ हमें इस गीत की तरफ़ आकर्षित करता है। मिश्रा, जो कुछ समय पहले "मनमा ईमोशन जागे" और "सौ तरह के" जैसे हिट गीत गाये हैं, इस गीत में भी अपनी देहाती ऊँची पट्टी वाली गायन से एक अनोखा फ़्लेवर डाला है। उनकी आवाज़ ना केवल रणबीर के चरित्र की मान्सिक स्थिति को उजागर किया है बल्कि गीत में एक ऊर्जा भी उत्पन्न किया है। उनकी आवाज़ और शिल्पा की नर्म मीठी आवाज़ ने ग़ज़ब का विरोध उत्पन्न किया है। दिल का टूटना और मन की अस्थिरता ऐल्बम के तीसरे गीत में भी साफ़ झलकती है। अरिजीत की आवाज़ में "चन्ना मेरेया" में भी वही जज़बात, जिसमें नायक अपनी नायिका को किसी और का होते हुए देखता है। इसमें पाश्चात्य साज़ जैसे कि ऐकोस्टिक गीटार, ईलेक्ट्रिक और बेस गीटार को भारतीय साज़ जैसे कि ढोलक, सारंगी और शहनाई के साथ फ़्युज़ किया गया है। अच्छा प्रयोग! अन्तिम गीत है "The Breakup Song" जिसे अरिजीत, बादशाह, जोनिता गांधी और नकश अज़ीज़ ने गाया है। गीत के बोल पर मत जाइए, ब्रेक-अप के बावजूद यह एक मज़ेदार नृत्य-प्रधान गीत है जिसमें बादशाह रैपिंग् करते हैं और अरिजीत अपनी दर्द भरी आवाज़ से बाहर निकल कर ऐसी मस्ती करते हैं कि निस्सन्देह इस गीत को आज के युवा ब्रेक अप होने के बाद अपने दोस्तों के साथ मिल कर गायेंगे। ’ADHM' का गीत-संगीत फ़िल्म की कहानी के अनुरूप है और इस साल के शीर्ष के पायदानों पर रहने वाले गीतों में है। 

नवंबर के दूसरे सप्ताह में दो उल्लेखनीय फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। पहली फ़िल्म है ’इश्क़ जुनून’। इस
फ़िल्म के प्रदर्शित होने के कई महीने पहले से ही इसे लेकर हलचल शुरु हो चुकी थी क्योंकि फ़िल्म के प्रोमो में "थ्रीसम लव" कहा गया था जो कि अपने आप में बहुत बोल्ड जुमला है। उपर से फ़िल्म के पोस्टरों ने भी काफ़ी विवाद खड़ा कर दिया था। भले यह एक बी-ग्रेड फ़िल्म साबित हुई पर फ़िल्म के गाने ठीक-ठाक थे। पहला गीत यू-ट्युब पर रिलीज़ हुआ "कभी यूं भी" जिसे गाया व स्वरबद्ध किया नवोदित गायक-संगीतकार वरदान सिंह ने। गीत लिखा अज़ीम शिराज़ी ने। बेडरूम सॉंग्स की श्रेणी में यह गीत अच्छा बना है पर कोई नई बात नहीं है इसमें। पर इस गीत को काफ़ी सकारात्मक टिप्पणियाँ मिली हैं यू-ट्युब पर। फ़िल्म का दूसरा गीत है "सिर्फ़ तू" मोहित चौहान की आवाज़ में। अंजन भट्टाचार्य के संगीत में इसे लिखा है संजीव चतुर्वेदी ने। गीत के शुरु में गीटार के आकर्षणीय पीस से गीत की तरफ़ आकर्षण बन जाता है। यह गीत भी पहले गीत ही की तरह कमाल दिखाने में असमर्थ है। तीसरे गीत के रूप में रेखा भारद्वाज का गाया "रे नसीबा" हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। संजीव-दर्शन की बनाई धुन पर वायलिन के इन्टरल्युड्स और भारतीय व पाश्चात्य साज़ों के तालमेल से गीत सुन्दर बन पड़ा है। संजीव चतुर्वेदी का ही लिखा फ़िल्म का शीर्षक गीत अरिजीत सिंह की आवाज़ में है जिसे जीत गांगुली ने कम्पोज़ किया है। गीत तुलनात्मक दृष्टि से काफ़ी अच्छा है पर इस गीत को ज़्यादा बढ़ावा नहीं दिया गया। इस फ़िल्म में भी अंकित तिवारी द्वारा स्वरबद्ध एक गीत है "तू मेरा रब है" जिसे अंकित ने स्कृति कक्कर के साथ मिल कर गाया है। सॉफ़्ट रोमान्टिक गीतों की श्रेणी में यह गीत अच्छा कम्पोज़ हुआ है पर बोलों में कोई नहीं बात नज़र नहीं आई। कुल मिलाकर ”इश्क़ जुनून’ एक ऐवरेज ऐल्बम है जिसे ना अच्छा ना बुरा कहा जा सकता है। और 11 नवंबर को रिलीज़ होने वाली दूसरी फ़िल्म थी ’रॉक ऑन 2’। आठ साल पहले जब ’रॉक ऑन’ रिलीज़ हुई थी तब श्रोताओं और समीक्षकों ने इसके गीत-संगीत को ख़ूब सराहा था। और क्यों ना हो जब रॉक म्युज़िक पर बनने वाली यह पहली हिन्दी फ़िल्म थी! शंकर-अहसान-लॉय ने जो कमाल उस फ़िल्म में दिखाया था, उसका 10% भी ’रॉक ऑन 2’ में नहीं दिखा सके। ऐल्बम की शुरुआत "जागो" से होती है जिसे फ़रहान अख़्तर और सिद्धार्थ महादेवन ने गाया है पर यह गीत श्रोताओं को न जगा सका। दूसरे गीत "उड़ जा रे" में श्रद्धा कपूर ने अपनी गायन प्रतिभा का लोहा मनवाया है। पूरे गीत में उन्होंने जो अपनी आवाज़ का वेरिएशन किया है, वह काबिल-ए-तारीफ़ है। पार्श्व में आलाप इस रॉक आधारित गीत में भारतीयता का संचार करता है। तीसरा गीत है "Yoy know what I mean" एक ऐवरेज गीत है। ’रॉक ऑन’ के "पिछले सात दिनों में" गीत के आधार पर बना यह गीत फ़रहान की आवाज़ में कई जगहों पर बेसुरा लगा, और बोल और संगीत के लिहाज़ से भी यह गीत कोई कमाल नहीं दिखा सका। "मंज़र आया" में भी वही फ़रहान की आवाज़; ख़ुद ऐक्टर-प्रोड्युसर होने का यही फ़ायदा है कि आप अपनी आवाज़ में गीत गा सकते हैं भले आपको गाना आता हो या नहीं। श्रद्धा की आवाज़ में "तेरे मेरे दिल" सुरीला है और पार्श्व में सरोद बेहद सुन्दर सुनाई देता है, पर गीत में दम नहीं है। फ़रहान और श्रद्धा का गाया "वो जहाँ" बेहतर है जिसमें एक ऐसे जहाँ की कल्पना की गई है जहाँ कोई ग़म नहीं है। अच्छा ऑरकेस्ट्रेशन है, दर्शन दोषी ड्रम्स पर हैं तो सौमिक दत्त सरोद पर और शेल्डन डी’सिल्वा बेस पर। उषा उथुप की आवाज़ में "चलो चलो" कमाल का गीत है जिसमें उत्तर-पूर्व के खासी जनजाती के बोलों के साथ हिन्दी के बोलों का सुन्दर तालमेल है। उषा उथुप एक बार साबित करती हैं कि उनका कोई जोड़ नहीं। किट शांगप्लियांग् और पिनसुक्लिन सीयेमियोंग् ने उषा उथुप को अच्छा कॉमप्लीमेन्ट किया है खासी बोलों के ज़रिए। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "इश्क़ मस्ताना" जिसमें सूफ़ी रंग है और इस रॉक ऐल्बम के लिए ’odd man out' है। ढोल, ढोलक, तबला, गीटार से कम्पोज़िशन दिलचस्प बना है और दिग्विजय सिंह परियार की आवाज़ शंकर महादेवन की आवाज़ पर पूरी तरह से हावी हो जाती है। कुल मिला कर ’रॉक ऑन 2' का संगीत ’रॉक ऑन’ की तरह कामयाब नहीं। 18 नवंबर को प्रदर्शित ’फ़ोर्स 2’ भी एक सीकुइल फ़िल्म है। गौरव - रोशिन के संगीत में इस फ़िल्म के गाने तेज़ रफ़्तार के हैं। ऐक्शन फ़िल्म होने की वजह से इसमें केवल चार ही गीत हैं। देव नेगी और अदिति सिंह शर्मा के गाये "रंग लाल" से ऐल्बम की शुरुआत होती है जिस पर जॉन एब्रहम का वॉयस ओवर है। एक सीमा के बाद उनकी आवाज़ कानों को खटकती है। अन्तराल संगीत में गीटार का प्रयोग सुन्दर है पर रैप का जो प्रयोग हुआ है उससे गीत को कोई मदद नहीं मिली है। हालाँकि इस गीत का उद्देश्य नेक है, यह हमारे उन सैनिकों को समर्पित है जो शहीद होने के बावजूद चर्चा में नहीं आए, पर यह गीत इस प्रयास में नाकाम रहा है। दूसरा गीत है नेहा कक्कर की आवाज़ में "ओ जानिया" जो दरसल ’मिस्टर इण्डिया’ के हिट गीत "काटे नहीं कटते दिन ये रात" गीत का रीमिक्स वर्ज़न है। गौरव - रोशिन ने इसे एक आधुनिक रंग देने की कोशिश की है जिसमें वो कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। "इशारा" अरमान मलिक की आवाज़ में है जो एक नर्म रोमान्टिक गीत है और इस ऐल्बम का भी एकमात्र रोमान्टिक गीत है। पर ना तो कम्पोज़िशन, ना ही रश्मि विराग के बोल, और ना ही अरमान की गायकी बहुत देर तक हमें इस गीत की तरफ़ खींचे रखता है। अन्तिम गीत है "Catch me if you can" जिसे अमाल मलिक ने गाया है। अत्यधिक टेक्नो बीट्स की वजह से गीत दब कर रह गया है। कुमार के बोल भी जैसे सुनाई ही नहीं देते। कुल मिला कर ’फ़ोर्स 2’ का गीत-संगीत बहुत ही साधारण है।

सीकुइल फ़िल्मों की लड़ी को आगे बढाते हुए 18 नवंबर को प्रदर्शित हुई ’तुम बिन 2’। अनुभव सिन्हा
की 2001 की ’तुम बिन’ की अपार सफलता के बाद इस सीकुइल से भी काफ़ी उम्मीदें थीं। सिर्फ़ फ़िल्म से ही नहीं बल्कि इसके गीतों से भी। निखिल-विनय के संगीत में ’तुम बिन’ के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। लेकिन ’तुम बिन 2’ के संगीतकार अंकित तिवारी कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा सके। ऐल्बम का पहला गीत है "तेरी फ़रियाद" जो मूल फ़िल्म के "कोई फ़रियाद" गीत का ही नया संस्करण है। मूल रचना जगजीत सिंह की आवाज़ में था, नया संस्करण रेखा भारद्वाज की आवाज़ में है। हालाँकि यह गीत भी सुन्दर है, पर मूल गीत के टक्कर का नहीं। अरिजीत सिंह का गाया "इश्क़ मुबारक़" ऐल्बम का दूसरा गीत है जिसे मनोज मुन्तशिर ने लिखा है जो हमें "दीवाना कर रहा है" की याद दिला जाती है। अरिजीत सिंह के साथ तुलसी कुमार आवाज़ मिलाती है "देख लेना" में। इस तरह के गाने ढेर सारे बन चुके हैं, पर व्यावसायिक सफलता की दृष्टि से यह गीत श्योर शॉट है। चित्रा की आवाज़ में मूल फ़िल्म का शीर्षक गीत "तुम बिन जिया जाये कैसे" की क्या बात थी! इस बार अंकित तिवारी ने अपनी आवाज़ से इस गीत को नवाज़ा; भले मूल गीत वाली बात न हो पर अंकित ने भी गीत को अच्छा ही निभाया है। "मस्ता" एक पेप्पी नंबर है जिसे विशाल ददलानी और नीति मोहन ने गाया है। हालांकि ऐल्बम के अन्य गीतों से हट कर है यह गीत, विशाल और नीति ने इस गीत को ऊर्जा से भर दिया है। अर्को, जिनकी हाल में "दरिया" (बार बार देखो) अन्द "साथी रे" (कपूर ऐण्ड सन्स) जैसे हिट गीत आए हैं, एक बार फिर एक ताज़े हवा के झोंके की तरह इस ऐल्बम में लेकर आए हैं "दिल नवाज़ियाँ"। लेकिन अफ़सोस कि यह गीत उनके पहले की रचनाओं जैसी उत्कृष्ट नहीं है। "जिगर बॉम्ब" एक पार्टी नंबर है जिसे डीजे ब्रावो, अंकित तिवारी और हर्शद मद ने गाया है। पार्टी क्लब नंबर के लिहाज़ से सही गीत है और डीजे ब्रावो की हाल की फ़ैन फ़ोलोइंग् को देख कर इस गीत के ख़ूब चलने की संभावना है। कुल मिला कर ’तुम बिन 2’ का ऐल्बम वह कमाल नहीं दिखा सकी जो कमाल ’तुम बिन’ ने दिखाया था। 25 नवंबर को ’इंगलिश-विंगलिश’ से अपनी निर्देशन के पारी की शुरुआत करने वाली गौरी शिन्डे की अगली फ़िल्म ’डिअर ज़िन्दगी’ के गीत-संगीत से भी लोगों की काफ़ी उम्मीदें थीं। लेकिन इस फ़िल्म में संगीतकार अमित त्रिवेदी के होने के बावजूद इसके गीतों की ज़्यादा उम्र नहीं लगती। जसलीन रॉयल के गाए "लव यू ज़िन्दगी" से ऐल्बम शुरु होता है जिसमें वो अपनी परिचित मासूमियत भरी आवाज़ में ज़िन्दगी को गले लगाने की सलाह देती है। गीटार और मैन्डोलिन के प्रयोग के बावजूद अरिजीत सिंह का गाया "तू ही है" अपनी अलग पहचान बना पाने में असमर्थ है। इसके बाद आता है "तारीफ़ों से" जो एक जैज़ नंबर है और जिस पर वाल्ट्ज़ नृत्य के रूप में झूमा जा सकता है। विशाल ददलानी की आवाज़ में "lets break up" आज के दौर के रिश्तों की बात बताता है। यह एक डिस्को नंबर है जिसमें बेस गीटार, की-बोर्ड और ड्रम्स का प्रयोग हुआ है। पर अफ़सोस कि इस गीत पर इससे अधिक कुछ लिखने को नहीं है। "Just go to hell dil" एक टूटे दिल की पुकार है, पर इस तरह के भाव के पहले के गीतों से बिल्कुल अलग हट के है। सुनिधि चौहान की दर्द भरी अंदाज़ में यह गीत सुन्दर बन पड़ा है। वायलिन की तानों ने इसमें छुपे दर्द को और ज़्यादा गहराया है। किसी को ब्रेक-अप के बाद यह गीत उसके दिल को ज़रूर छू जाएगा। "लव यू ज़िन्दगी" का क्लब मिक्स अमित त्रिवेदी और आलिया भट्ट की आवाज़ों में है; आलिया ने इसमें अपनी शरारतें भरी हैं। और अन्त में इस ऐल्बम की ख़ास प्रस्तुति है इलैयाराजा के मशहूर गीत "ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले" का नया संस्करण जिसे अमित त्रिवेदी ने रॉक एन रोल शैली में बाँध कर अरिजीत सिंह की आवाज़ में पेश किया है। इसी का आलिया की आवाज़ में भी एक संस्करण है। अरिजीत वाला संस्करण भले मूल गीत जैसा सुन्दर नहीं है, लेकिन फिर भी सुना जा सकता है; पर आलिया वाला संस्करण तो ना ही सुने तो बेहतर होगा।

और अब हम प्रवेश करते हैं वर्ष 2016 के अन्तिम महीने दिसंबर में। 2 दिसंबर को प्रदर्शित हुई थी एक
और सीकुइल फ़िल्म ’कहानी 2’। फ़िल्म के संगीतकार हैं क्लिन्टन सेरेजो। मूल फ़िल्म की तरह इस में भी ज़्यादा गीत-संगीत की गुंजाइश नहीं थी। अत: इस फ़िल्म में केवल तीन ही गीत हैं। पहला गीत अरिजीत सिंह की आवाज़ में है "मेहरम" जिसे एक ऐकोस्टिक नंबर कहा जा सकता है। भले गीत का संगीत संयोजन आकर्षक है, पर असरदार बोलों के ना होने से गीत अपनी ओर आकर्षित नहीं करता। गीत की सबसे अच्छी बात है इसमें गीटार का प्रयोग। सुनिधि चौहान के गाए "लम्हों के रसगुल्ले" में भी कोई मिठास नहीं है। फ़िल्म के बाहर इसे सुनने का मन भी नहीं होगा कभी। और तीसरा गीत है ऐश किंग् का गाया "और मैं ख़ुश हूँ" जो एक पेप्पी नंबर है। अन्य दो गीतों की तुलना में यह गीत बेहतर है, पर फ़िल्म की कहानी में यह गीत कहाँ स्थान पाएगा यह फ़िल्म देख कर ही पता चलेगी। 9 दिसंबर को प्रदर्शित होने वाली ’बेफ़िकरे’ काफ़ी चर्चा में रही। आदित्य चोपड़ा निर्देशित और रणवीर सिंह व वाणी सिंह अभिनीत इस युवा-केन्द्रित फ़िल्म का गीत-संगीत भी श्रोताओं को यही अहसास कराता है कि यह एक युवा केन्द्रित फ़िल्म है। फ़िल्म के संगीतकार हैं विशाल-शेखर। सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "नशे सी चढ़ गई" एक ऐसा गीत है जिसमें वाक़ई एक नशा है जो गीत के अन्त तक हमें इसके साथ बनाए रखता है। अरिजीत की आवाज़ के साथ विशाल-शेखर ने जो प्रयोग किया है, वह आपको निराश नहीं करेगी। गीत का टेम्पो, मूड और बेस हमें इससे जोड़े रखता है और बार बार सुनने के लिए उत्साहित करता है। अगर आपने इस गीत का अन्तिम हिस्सा सुना हो तो आपको लगेगा कि ऐल्बम का दूसरा गीत "उड़े दिल बेफ़िकरे" वहीं से शुरु होता है जहाँ पहला गीत समाप्त हुआ था। बेनी दयाल की आवाज़ में यह गीत भी आकर्षक है। अपने हेडफ़ोन को ऑन रखिए और आप इस गीत में खो से जायेंगे। जयदीप साहनी के बोल और आकर्षक कोरस गीत को मज़बूत बनाते हैं। गीटार, ड्रम्स, ट्रम्पेट, चेलो और कीबोर्ड्स इस गीत की वज़न को बढ़ाते हैं। "Je t'aime" गीत की शुरुआत गीटार और फिर उसके बाद सैक्सोफ़ोन से होती है। ऐसा लगता है कि जैसे यह गीत किसी ख़ास के साथ डिनर डेट के लिए उप्युक्त गीत है। चेलो और कीबोर्ड्स के सही प्रयोग से इसमें एक साल्सा वाली फ़ील आती है। जयदीप साहनी के बोल भी काव्यात्मक और सौन्दर्यपूर्ण है। यह गीत हमें ’दम मारो दम’ फ़िल्म के "ते आमो" गीत की याद दिलाता है। फ़्रेन्च और हिन्दी के सही तालमेल की वजह से आप इस गीत से प्यार कर बैठेंगे। ऐल्बम का चौथा गीत है "यू ऐण्ड मी" जिसे निखिल डी’सूज़ा और रैशेल वरगीज़ ने गाया है। बेस गीटार और कीबोर्ड्स इस मस्ती भरे गीत में पेप्पी फ़्लेवर मिलाते हैं। पापोन का गाया "लबों का कारोबार" तो युवाओं के बीच बेहद मशहूर हो रहा है क्योंकि इसमें चुम्बन के महत्व और मासूमियत पर प्रकाश डाला गया है। यह गीत हमें किसी फ़्रेन्च ओपेरा हाउस का अहसास कराता है। इसमें भी साल्सा का रंग है। गीटार, वायलिन, ट्रम्पेट्स और पियानो से गीत को ऊँचाई मिली है। इस तरह का मस्ती भरा फ़िल्म कम से कम एक पंजाबी देसी नंबर के बिना अधूरा है। ऐल्बम का अगला गीत है "खुलके दुलके" जो पूर्णत: पंजाबी गीत है जिसमें जिप्पी ग्रेवाल और हर्षदीप कौर की आवाज़ें हैं। लेकिन अफ़सोस कि बाकी गीतों की तरह इस गीत में कोई एक्स-फ़ैक्टर नहीं है और श्रोताओं के दिलों पर छाप नहीं छोड़ता। ऐल्बम का स्माअपन एक इन्स्ट्रुमेन्टल पीस से होता है जिसका शीर्षक है "Love is a dare"। बहुत ही सुन्दर कम्पोज़िशन है विशाल-शेखर का। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि ’बेफ़िकरे’ का ऐल्बम ताज़गी भरा है और विशाल-शेखर ने हमें निराश नहीं किया है।

आपको "मुस्कुराने की वजह तुम हो" गीत को याद ही होगा! गीतों के मुखड़ों से जुमले उठा कर
फ़िल्मों के शीर्षक रखने की परम्परा पुरानी है हमारे फ़िल्म जगत में। ऐसा ही कुछ हुआ है इस गीत के साथ भी। 16 दिसंबर को रिलीज़ हुई ’वजह तुम हो’ के म्युज़िक ऐल्बम की ख़ासियत यह है कि पूरे ऐल्बम में बस एक ही मूल गीत है, बाक़ी सारे गीत बीते समय के हिट गीतों के नए संस्करण मात्र हैं। शीर्षक गीत "वजह तुम हो" मिथुन द्वारा स्वरबद्ध, मनोज मुन्तशिर द्वारा लिखा हुआ और तुल्सी कुमार द्वारा गाया गीत है। गीत सुन्दर है और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कुछ और मूल गीत इस ऐल्बम में क्यों नहीं रखे गए! इस गीत के तीन और अन्य संस्करण भी है जिनमें अल्तमश फ़रिदी की आवाज़ भी शामिल है। मिथुन को ये तीन संस्करण विविधता हेतु अलग-अलग पुरुष गायकों से गवाने चाहिए थे। रीक्रीएटेड गीतों में पहला गीत है "पल पल दिल के पास तुम रहती हो"। इस गीत को संगीतकार अभिजीत वघानी "दिल के पास" शीर्षक से अरिजीत सिंह और तुल्सी कुमार से गवाते हैं। किशोर कुमार वाले मूल गीत को अगर भूल जाएँ कुछ देर के लिए तो इस नए संस्करण का भी अपना अलग अंदाज़ है जो दिल को भाता है। इस गीत में नोमैन पिन्टो के अंग्रेज़ी के बोल भी शामिल हैं। गीत के एक अन्य संस्करण में अरमान मलिक, तुल्सी कुमार और शमिता भाटकर की आवाज़ें है। दूसरा रीक्रीएटेड गीत है "ऐसे ना मुझे तुम देखो सीने से लगा लूँगा" जिसे "दिल में छुपा लूँगा" शीर्षक से अरमान मलिक और तुल्सी कुमार की आवाज़ों में है। मीत ब्रदर्स ने इस गीत में अच्छा काम किया है इस गीत को आज के जेनरेशन में लोकप्रिय बनाने में। 2002 की फ़िल्म ’काँटे’ का गीत "माही वे" बहुत लोकप्रिय हुआ था। आनन्द राज आनन्द के कम्पोज़िशन में रिचा शर्मा के गाए देव कोहली के लिखे इस गीत की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। रीक्रीएटेड वर्ज़न में गीतकार कुमार अपने बोलों के साथ गौरव-रोशिन के संगीत निर्देशन में इसे नेहा कक्कर से गवाते हैं। और अब हम आ पहुँचे हैं 2016 के अन्तिम सप्ताह यानी कि 23 दिसंबर में प्रदर्शित होने वाली आमिर ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’दंगल’ पर। इस बार आमिर ने अपनी इस फ़िल्म के लिए संगीतकार प्रीतम और गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य को चुना है। कहने की ज़रूरत नहीं कि आमिर अपनी फ़िल्मों के गीतों को लेकर बहुत गम्भीर रहे हैं। इस फ़िल्म की कहानी और पार्श्व को ध्यान में रखते हुए प्रीतम ने हरियाणवी लोक धुनों का सहारा लेकर फ़िल्म के गाने कम्पोज़ किए हैं। और अमिताभ के दिलकश बोलों के तो कहने ही क्या! फ़िल्म के शीर्षक गीत में "रे लट्ठ गाड़ दूँ, रे जाड़ा पाड़ दूँ" एक हरियाणवी गबरू जवान के शख़्सियत को उभारता है, तो "हानीकारक बापू" गीत के "टॉफ़ी चूरन खेल खिलौने कुल्चे नान पराठा, कह गए हैं टाटा, जबसे बापू तूने डाँटा..." एक सख़्त पिता के प्यार को उजागर करता है। "हानीकारक बापू" को सरवर ख़ान और सरताज ख़ान बरना ने गाया है जो मांगणियार सम्प्रदाय से ताल्लुख़ रखते हैं। युवा कुश्तीगिरों की समस्या होती है उनके पिताओं द्वारा सख़्त अनुशासन में रखना, और यही बात इस गीत में ज़ाहिर होती है। पर इसके पीछे जो प्यार और शिक्षा छुपी हुई है, उनकी तरफ़ भी इशारा है। एक लम्बेअरसे के बाद इस तरह का बच्चों वाला कोई गीत किसी फ़िल्म में सुनाई दी है। "धाकड़" एक महिला कुश्तीगिर के बारे में है। गीत मूलत: रफ़्तार द्वारा की गई रैपिंग् है और फिर इसका एक आमिर ख़ान संस्करण भी है। जो भी है एक अलग हट के रचना है यह। जोनिता गांधी की आवाज़ में "गिल्हरियाँ" एक युवती के सपनों और आशाओं की गाथा है। सॉफ़्ट पॉप की छाया लिए यह गीत प्रीतम के कम्पोज़िशनों में इस ऐल्बम का सबसे "फ़िल्मी" गीत है। अगला गीत है "नैना" जिसे अरिजीत सिंह ने गाया है; कम से कम साज़ों के इस्तमाल से यह गीत दिल की गहराइयों में जल्दी ही उतर जाता है। "इडियट बन्ना" एक पारम्परिक हरियाणवी विवाह गीत है जिसे नूरान सिस्टर्स ने गाया है। प्रीतम ने हालांकि इसमें रॉक का एक अंग डाल दिया है। कुल मिला कर ’दंगल’ का गीत संगीत उत्तम है। प्रीतम और अमिताभ ने स्तरीय काम किया है। आशा करते हैं कि आने वाले वर्षों में यह जोड़ी इसी तरह के अर्थपूर्ण ऐल्बमों से हमारा दिल बहलाएगी।

तो मित्रों, अब हम आ पहुँचे हैं 2016 के फ़िल्म-संगीत की समीक्षा के मंज़िल पर। पिछले पाँच सप्ताहों से हम इस वर्ष में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीतों की चर्चा कर रहे थे इस वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला में। आज 31 दिसंबर है और कुछ ही घंटों में नया साल शुरु होने वाला है। तो आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए इस विशेष लघु श्रृंखला को यहीं समाप्त करने की अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, और a very happy and prosperous new year 2017!!!

खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

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