Saturday, May 23, 2015

INTERVIEW OF ACTOR RAHUUL CHOWDHARY

बातों बातों में - 08

अभिनेता राहुल चौधरी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत





नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज मई 2015 के चौथे शनिवार के दिन प्रस्तुत है फ़िल्म और टी.वी जगत में नए-नए क़दम रखने वाले नवोदित अभिनेता राहुल चौधरी से की गई हमारी टेलीफ़ोनिक बातचीत के सम्पादित अंश। राहुल CID, Code Red, Savdhaan India Fights Back जैसे टीवी धारावाहिक तथा ’Dunno Y2 - Life is a Moment' फ़िल्म में काम कर चुके हैं।  




राहुल, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर। अपने व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर आपने इस साक्षात्कार का हमें मौक़ा दिया, इसके लिए हम आपके शुक्रगुज़ार हैं।

आपको और आपके सभी पाठकों को मेरा नमस्कार, यह मेरी भी ख़ुशनसीबी है जो आपसे बात करने का मौक़ा मिला।


राहुल, सबसे पहले तो हम आपको बधाई देना चाहते हैं, आपकी पहली फ़िल्म ’Dunno Y 2 - Life is a Moment' बहुत जल्द प्रदर्शित होने जा रही है। 

बहुत बहुत शुक्रिया आपका!


इस फ़िल्म से आपको केवल देश में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि मिलेगी ऐसी हम आशा कर रहे हैं क्योंकि जहाँ तक हमें ज्ञात है यह एक इन्डो-नॉरवेजियन फ़िल्म है।

जी, बिल्कुल सही कहा आपने, यह एक इन्डो-नॉरवेजियन को-प्रोडक्शन की फ़िल्म है और इन दोनों देशों के सिर्फ़ अभिनेता ही नहीं बल्कि निर्देशक, संगीतकर व तमाम विभागों के कलाकारों ने काम किया है। मुझे कितनी प्रसिद्धि मिलती है, वह तो फ़िल्म के प्रदर्शित होने पर ही पता चलेगी, शुभकामनाओं के लिए आपको मैं धन्यवाद देता हूँ।


राहुल, ’Dunno Y 2 - Life is a Moment' फ़िल्म की हम विस्तृत चर्चा आगे चल कर इस साक्षात्कार में करेंगे, लेकिन फ़िल्हाल शुरू हम शुरू से करना चाहते हैं, यानी कि आपके बचपन से। तो बताइये कि किस तरह का बचपन रहा आपका? कहाँ की पैदाइश है आपकी?

मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद ज़िले के महरौली गाँव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। अपने परिवार का मैं सबसे छोटा बेटा हूँ। अपने भाई-बहनों में सबसे छोटा। इसलिए आप समझ सकते हैं कि किस तरह का बचपन रहा होगा मेरा!


लाड-प्यार वाला?

जी हाँ। छोटा होने की वजह से सभी का लाडला था, और इसी कारण मेरी स्कूलिंग् बहुत सारे स्कूलों में हुई। दसवीं कक्षा तक आते-आते मैंने क़रीब छह स्कूल चेंज कर लिए थे...


एक मिनट, एक मिनट... माफ़ी चाहूँगा बीच में टोकने के लिए, पर लाडला होने और स्कूल बदलने का आपस में क्या संबंध है, मैं समझाअ नहीं?

(हँसते हुए) जी, बात ऐसी है कि लाडला होने की वजह से मैं शैतान भी एक नंबर का था। लाड-प्यार ने मुझे बिगाड़ रखा था। इसलिए स्कूल से इतनी शिकायतें आती कि स्कूल बदलने के अलाव और दूसरा कोई चारा नहीं रहता।


अच्छा अच्छा, तो यह बात है!

सब लोग बोलते थे कि यह लड़का पता नहीं आगे चलके क्या करेगा! परिवार में सब मुझे ख़ुद से ज़्यादा प्यार करते और मेरे भाई-बहनें तो कभी मुझे परेशान या रिते हुए देख ही नहीं सकते थे।


बहुत अच्छी बात है, और आप ख़ुशनसीब हैं कि ऐसे परिवार में आपका जन्म हुआ जहाँ आपको ख़ूब सारा प्यार मिला। 

उपरवाले की दुआ है, बस यही कह सकता हूँ।


जी बिल्कुल! अच्छा आपके पिताजी आपको डाँटते नहीं थे? दूसरे लोग चाहे कुछ ना बोले पर पिताजी तो ज़रूर सख़्त होते होंगे?

पापा की अगर बात करूँ तो मुझे याद है कि बचपन से ही मुझे फ़िल्में देखने का बहुत शौक था। इसलिए रात को जब सारे लोग सो जाते थे, मैं जाग-जाग कर फ़िल्में देखा करता था। इसके लिए कभी-कभी पापा से मार भी खाता था। वो अक्सर कहते रहते कि जब देखो टीवी में घुसा रहता है, क्या मिलता है इसे? उस समय मैं शायद 6th या 7th क्लास में हो‍ऊँगा, तो मैं भी उनसे कहा करता कि एक दिन देख लीजिएगा कि इसी टीवी पर मैं आपको दिखूँगा।


वाह! और वह बात आज सच भी साबित हो ही गई!

बचपन से यही मेरा सपना था जो अब जाकर हक़ीक़त का रूप ले रही है। कोशिश करने पर मेहनत ज़रूर रंग लाती है।


अच्छा, उस वक़्त कौन-कौन फ़िल्मी अभिनेता आपके आइडोल हुआ करते थे?

मैं बचपन से सलमान ख़ान का बहुत बड़ा फ़ैन रहा हूँ और आज भी हूँ। आज भी एक दिन उनक्से साथ काम करूँगा यह मेरा एक सपना है, देखें पूरा होता है या नहीं!


सलमान की कौन कौन सी फ़िल्में आप देखते थे उस ज़माने में?

उनकी हर फ़िल्म मैंने देखी है। ’मैंने प्यार किया’ और ’साजन’ से लेकर ’जुड़वा’, ’दुल्हन हम ले जाएँगे’, ’चोरी चोरी चुपके चुपके’, ’कहीं प्यार ना हो जाए’, ’तेरे नाम’, और आज के ज़माने की फ़िल्में भी, जैसे कि”बॉडी-गार्ड’, ’दबंग’, ’किक’ वगेरह!



राहुल, सलमान ख़ान ही की तरह आपका शारीरिक गठन भी बहुत ही अच्छा है, पौरुष-सम्पन्न है। क्या बचपन से ही आप अपने शारीरिक विकास पर ध्यान दिया करते थे?

देखिए मुझे बचपन से ही खेल-कूद में गहरी दिलचस्पी थी। स्कूल में स्पोर्ट्स ईवेन्ट्स में नियमित भाग लिया करता था। स्पोर्ट्स की तरफ़ बहुत ही ज़्यादा झुकाव था मेरा और मैं एक अच्छा स्पोर्ट्स मैन बनना चाहता था। हमेशा अपने स्कूल के वार्षिक खेलों में अव्वल रहता था।


फ़िल्में देखते थे, खेलकूद में भी अच्छे थे, लेकिन पढ़ाई???

जब मैं अपने दसवीं का रेज़ल्ट लेने स्कूल पहुँचा तो मेरे क्लास टीचर को विश्वास ही नहीं था कि मैं पास हो जाऊँगा, लेकिन मेरी मार्क-शीट देख कर वो हँसने लगी और बोली कि तू पास कैसे हो गया, तुझे तो खेलने से कभी टाइम ही नहीं मिलता था! (हँसते हुए)


अच्छा यह मॉडेलिंग् का सिलसिला कब और कैसे शुरू हुआ?

तब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था। ऐसे ही एक बार मैंने मॉडेलिंग् का ऑडिशन दे दिया था नोएडा में आयोजित होने वाले एक रैम्प शो के लिए। और उसमें मैं सीलेक्ट हो गया। वह मैंने ऐसे ही मस्ती में दिया था, पर सिलसिला शुरू हो गया। मुझे एक अभिनेता बनना था और मॉडेलिंग् का रास्ता भी कुछ हद तक अभिनय जगत से जा कर मिलता था, इसलिए मैंने सोचा कि इस लाइन से जुड़ा रहूँगा तो आगे चलकर टीवी या फ़िल्मों में मौका मिल सकता है।


साधारणत: परिवार यह चाहता है कि बेटा बड़ा हो कर डॉक्टर या इन्जिनीयर बने, तो क्या आपके परिवार का भी आपसे ऐसी ही कुछ उमीद थी?

मेरा परिवार उस समय यह चाहता था कि मैं इण्डियन आर्मी जॉइन करूँ, सेना में भर्ती हो जाऊँ। बस, फिर परिवार की ख़ुशी के लिए मैंने कॉलेज छोड़ के आर्मी जॉइन कर लिया। आर्मी में भर्ती तो हो गया पर वहाँ कभी ख़ुश नहीं रह सका। जिस चीज़ की मुझे तलाश थी, वह वहाँ मुझे नहीं मिली, और मुझे एक घुटन सी महसूस होने लगी। मुझे यह अहसास हुआ कि इंसान को वही करना चाहिए या बनना चाहिए जो वह करना चाहता है, बनना चाहता है।


बिल्कुल सच बात है यह!

फिर वापस आकर अपने परिवार को मैंने अपने सपनों के बारे में बताया और उन्हें बड़ी मुश्किल से समझाया। कुछ समय बाद मैंने अर्मी छोड़ दिया। आर्मी छोड़ कर जब मैं घर वापस आया तो लोग तरह तरह की बातें करने लगे थे। गाँव में सब कॉमेन्ट्स मारते थे पर मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे ख़ुद पर और अपने सपनों पर पूरा भरोसा था। परिवार ने मेरा साथ दिया। मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मुझे मेरे परिवार ने समझा, और मैं निकल पड़ा अपने सपनों को सच साबित करने के लिए।



और फिर शुरू हुई ग्लैमर वर्ल्ड में संघर्ष, है ना?


बिल्कुल! आर्मी ड्रॉप करने के बाद मैंने अपने सपनों के तरफ़ क़दम बढ़ाना शुरू कर दिया। तभी मैंने दिल्ली के 'Elite Modelling Management School' में दाखिला ले लिया। बस उसके बाद मैंने दिली के बेस्ट फ़ोटोग्राफ़र से अपना पोर्ट-फ़ोलियो बनवाया और कुछ दिन दिल्ली में काम करने के बाद सीधे मायानगरी मुंबई पहुँच गया।


मुंबई में किसी को जानते थे आप?

जी नहीं! मुंबई शिफ़्ट तो हो गया लेकिन इससे पहले ना मैं कभी मुंबई आया था और ना ही मैं किसी को यहाँ पर जानता था। शुरू शुरू में बहुत मुश्किलें सामने आईं, फिर धीरे-धीरे रास्ता मिलता गया।


आपके परिवार से आर्थिक सहयोग मिला संघर्ष के इन दिनों में?

परिवार से मैंने आर्थिक सहयोग कभी माँगा नहीं। क्योंकि मैं उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाकर इस फ़ील्ड में आया, इसलिए मैं उन्हें परेशान नहीं करना चाहता था।  मैंने अपने बलबूते मुंबई में संघर्ष किया। धीरे धीरे मुझे प्रिण्ट और रैम्प पर काम मिलना शुरू हो गया, और कुछ पैसे आने लगे। जब शुरू शुरू में लोगों से मिलता था तो बहुत सारे लोग यही कहते थे कि कुछ नहीं होगा तेरा तू वापस चला जा। यहाँ आने के बाद मुझे पता चला कि यहाँ पर पहचान बनाना इतना आसन नहीं लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी।



कहते हैं कि यह जो ग्लैमर की दुनिया है, बड़ी नीची राहें हैं ऊँचाइयों की। आपका क्या ख़याल है?

यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस हद को नीचा समझते हैं। अगर आपके किसी काम से किसी और को शारीरिक, मानसिक य्या आर्थिक क्षति नहीं पहुँच रही है तो ऐसा काम करने में कोई बुराई नहीं है। मुंबई जैसी शहर में किसी संघर्षरत कलाकार का बिना परिवार के आर्थिक सहयोग के इतना आसान नहीं है। ऐसे में अगर किसी को हानी पहुँचाए बग़ैर कोई काम कर लिया जाए तो इसमें बुराई क्या है!


और यहाँ होने वाले शोषण के बारे में आपके क्या विचार हैं?

शोषण उसी का होता है जो शोषित होना चाहे। यहाँ कोई किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करता। अगर आपको कुछ पसन्द नहीं है तो आप साफ़ मना कर सकते हैं। यह आप पर ही निर्भर करता है कि आप क्या चाहते हैं और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए आप कितनी कीमत चुका सकते हैं। बिल्कुल सीधा मामला है।


किन किन बड़े फ़ैशन शोज़ में आप रैम्प वाक कर चुके हैं?

मैंने बहुत सारे नामी डिज़ाइनर्स के शोज़ में रैम्प वाक किया है। Raipur Fashion Show 2014, Aqua Fashion Tour 2014, Bhopal Fashion Week, वगेरह।


अब बताइए कि अभिनय की शुरुआत कैसे हुई?

मॉडेलिंग् करते-करते यहाँ कुछ दिनों बाद एक थिएटर ग्रूप मैंने जॉइन कर लिया और अपनी ऐक्टिंग् स्किल्स को और भी बेहतर करना शुरू कर दिया। कई लोगों से मिला और फिर कुछ टीवी सीरिअल्स में छोटे-मोटे रोल करने का मौका मिला। इससे अभिनय का अनुभव होने लगा। बस उसके बाद आगे बढ़ता चला गया।



Scenes from Maharana Pratap
कौन कौन से टीवी धारावाहिकों में आप नज़र आए?

यूं तो छोटे-मोटे रोल कई किए, पर ’महाराणा प्रताप’, ’CID', 'सावधान - India Fights Back' और ’Code Red' कुछ उल्लेखनीय नाम हैं।


ये सभी धारावाहिक काफ़ी लोकप्रिय हैं। Code Red की बात करें तो इस धारावाहिक के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

Code Red मानव मस्तिष्क को समझने का काम करती है, यह जानना चाहती है कि जब कोई आदमी अपने आप को या किसी और को चोट पहुँचाने की कोशिश करता है तो उसके पीछे क्या-क्या कारण होती हैं, उसके दिमाग़ में क्या कुछ चल
Scenes from 'Code Red'
रहा होता है जो उसके behavioural patterns को बदल कर रख देती है। यह शो समाज में जागरूकता लाने का कम भी कर रही है, और हमें यह संदेश दे रही है कि अगर हमारी आसपास कोई ग़लत काम हो रहा है तो उसकी जानकारी सही जगह तक पहुँचाएँ। आत्महत्या, बलात्कार, बाल-शोषण जैसी सभी मानसिक समस्याओं को रोकने संबंधित जानकारी भी मिलती है इस धारावाहिक में।


अब हम बात करेंगे आपकी पहली फ़िल्म ’Dunno Y2 - Life is a Moment’ की। सबसे पहले तो यह बताइए कि आपको इस फ़िल्म में रोल कैसे मिला?

जब इस फ़िल्म की कास्टिंग् चल रही थी तो मुझे इसकी ख़बर मिली किसी सूत्र से और मैं ऑडिशन देने के लिए पहुँच गया। संजय सर (फ़िल्म के निर्देशक) को मेरा ऑडिशन पसन्द आया और मुझे एक किरदार के लिए फ़ाइनल कर लिया गया।


आपके निभाये उस किरदार के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

फ़िल्म के प्रदर्शित होने से पूर्व मेरा ज़्यादा कुछ कहना ठीक नहीं होगा, बस यह समझ लीजिए कि ’दिल तो पागल है’ फ़िल्म में अक्षय कुमार की जो भूमिका थी, वही भूमिका मेरी इस फ़िल्म में है। और यह कहूँगा कि यह एक अच्छा रोल था जो मैंने निभाया और फ़िल्म के लिए एक महत्वपूर्ण किरदार भी है यह। उम्मीद करता हूँ कि दर्शकों को मेरा यह रोल पसन्द आएगा।


कब प्रदर्शित हो रही है यह फ़िल्म?

इसी वर्ष, फ़िल्हाल यह सेन्सर बोर्ड के पास है। इसका ट्रेलर यू-ट्यूब पर रिलीज़ हो चुका है और फ़िल्म रिलीज़ की तारीख़ भी जल्दी ही निर्धारित हो जाएगी।



with the team of 'Dunno Y2'
यह फ़िल्म इन्डो-नॉर्वेजियन कोलाबोरेशन की फ़िल्म है। पहली ही फ़िल्म में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पे काम करने का अनुभव कैसा रहा?

बहुत ही अच्छा अनुभव था। हम सब नॉरवे गए हुए थे, काम के साथ साथ पूरी यूनिट के साथ हम सब ख़ूब मस्ती किया करते थे। संजय सर से बहुत कुछ सीखने को मिला। युवराज पराशर, कपिल शर्मा, और तमाम कलाकारों के साथ बहुत अच्छी ट्युनिंग् हो गई थी। ’Dunno Y - Na Jaane Kyun' की सफलता के बारे में तो आपको पता ही होगा। कुल 11 अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे उस फ़िल्म को। अब हम यही उमीद कर रहे हैं कि ’Dunno Y2 - Life is a Moment' उससे भी आगे जा निकले।


जहाँ तक मुझे ख़बर है ये फ़िल्में समलैंगिक्ता के विषय पर केन्द्रित है। अपनी पहली फ़िल्म में इस तरह के विषय वाली फ़िल्म में काम करने में आपको झिझक महसूस नहीं हुई? डर नहीं लगा कि यह करीअर के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है?

बिल्कुल नहीं। अब समय बदल चुका है, हर कोई नया प्रयोग कर रहा है, फ़ॉरमोला फ़िल्में अब नहीं बनती। आजकल पब्लिक भी हर फ़िल्म में कुछ नया देखना चाहती है। और सबसे बड़ी बात है अभिनय की। कहानी जो भे हो, विषय जो भी हो, अगर आपके अभिनय में दम है तो आप सफलता की चोटी पर पहुँच सकते हैं।


सुना है इस फ़िल्म का शीर्षक गीत लता मंगेशकर ने गाया है?

जी हाँ, यह गीत अभी रिलीज़ नहीं हुई है। यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि मेरी पहली फ़िल्म में लता जी का गाया गीत है।


आपको इस फ़िल्म की कामयाबी के लिए बहुत सारी शुभकामनाएँ।

धन्यवाद!



अच्छा राहुल, अब यह बताइए कि अपने आप को फ़िट रखने के लिए आप दैनिक जीवन में क्या करते हैं?

फ़िटनेस के लिए मैं नियमित रूप से जिम जाता हूँ और स्विमिंग् करता हूँ। जब भे मेरे पास खाली समय होता है, मैं जिम चला जाता हूँ और हर तरह के कसरत करता हूँ। आप चाहें तो जिम को मेरा दूसरा घर भी कह सकते हैं (हँसते हुए)।


और खाने-पीने में किस तरह का ध्यान रखते हैं?

मुझे डायटिंग् करना बिल्कुल पसन्द नहीं। मैं दिल खोल के खाता हूँ और फिर दिल खोल के वर्क आउट करता हूँ।


वाह! क्या बात है! साधारणत: ग्लैमर वर्ल्ड के लोग खान-पान पर विशेष ध्यान रखते हैं पर आपसे यह जानकर हैरानी हुई। अब चलते-चलते उन युवाओं से आप क्या कहना चाहेंगे जो इस क्षेत्र में अपना करीअर बनाना चाहते हैं?

मेरा हमेशा से मानना है कि लाइफ़ में रिस्क नहीं लोगे तो अपने सपनों तक नहीं पहुँच पाओगे। लाइफ़ में जितना रिस्क उतना ही जीने और काम करने में मज़ा आता है। और एक बात, कड़ी मेहनत से किया हुआ काम का फल हमेशा मिलता है, बस फ़र्क इतना होता है कि किसी को जल्दी और किसी को देर से मिलता है, पर मिलता ज़रूर है। मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। इसलिए हमेशा ख़ुश रहा करो और अपने सपनों को जियो। और अपने परिवार को सबसे ज़्यादा प्यार करो।


बहुत ख़ूब! और बहुत बहुत शुक्रिया आपका जो हमें अपनी व्यस्तता में से इतना समय दिया और खुल कर बातचीत की। आपको एक उज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं, ख़ास कर आपकी आने वाली फ़िल्म के लिए। एक बार फिर बहुत बहुत धन्यवाद और नमस्कार!

धन्यवाद! नमस्कार!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





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