सोमवार, 28 अप्रैल 2014

रविवार, 27 अप्रैल 2014

तंत्रवाद्य मयूर वीणा की विकास यात्रा




स्वरगोष्ठी – 165 में आज


संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 3

तत और वितत जाति के वाद्यों का अनोखा गुण है तंत्रवाद्य मयूर वीणा में





मयूर वीणा
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की तीसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य की चर्चा कर रहे हैं, जो वर्तमान में लुप्तप्राय है। आज हमारी चर्चा में लुप्तप्राय तंत्रवाद्य मयूर वीणा अर्थात ताऊस है। इस तंत्रवाद्य में दो जातियों के वाद्यों का मेल होता है, अर्थात मयूर वीणा में सितार की भाँति पर्दे भी होते हैं और यह सारंगी की भाँति गज (Bow) से बजाया जाता है। वर्तमान में इस वाद्य के कुछ गिने-चुने वादक हैं, जिनमें लखनऊ के पण्डित श्रीकुमार मिश्र एक ऐसे कलासाधक हैं जो न केवल इस अनूठे वाद्य का वादन कर रहे हैं, बल्कि इस लुप्तप्राय वाद्य में निरन्तर परिमार्जन भी कर रहे हैं। आज के अंक में हम आपको इस वाद्य पर उनके बजाये दो राग-रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। 
 


इसराज
वैदिक काल से ही तंत्रवाद्य के अनेक प्रकार प्रचलन में रहे हैं। प्राचीन काल में गज (Bow) से बजने वाले तंत्रवाद्यों में ‘पिनाकी वीणा’, ‘निःशंक वीणा’, ‘रावणहस्त वीणा’ आदि प्रमुख रूप से प्रचलित थे। आधुनिक समय में इन्हीं वाद्यों का विकसित और परिमार्जित रूप ‘सारंगी’ और ‘वायलिन’ सर्वाधिक लोकप्रिय है। तंत्रवाद्य का एक दूसरा प्रकार है, जिसे गज (Bow) के बजाय तारों पर आघात (Stroke) कर स्वरों की उत्पत्ति की जाती है। प्राचीन काल में इस श्रेणी में ‘रुद्र वीणा’, ‘सरस्वती वीणा’, ‘शततंत्री वीणा’ आदि प्रचलित थे, तो आधुनिक काल में ‘सितार’, ‘सरोद’, ‘संतूर’ आदि आज लोकप्रिय हैं। इन दोनों प्रकार के वाद्यों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं। प्राचीन गजवाद्यों में नाद पक्ष का गाम्भीर्य उपस्थित रहता है, जबकि आघात से बजने वाले तंत्रवाद्यों में संगीत के चंचल प्रवृत्ति की अधिकता होती है। मध्यकाल में खयाल शैली के विकास के साथ ही कुछ ऐसे वाद्यों का आविष्कार भी हुआ, जिसमें यह दोनों गुण उपस्थित हों। ताऊस (मयूरी वीणा), इसराज अथवा दिलरुबा आदि ऐसे ही वाद्य हैं। इस श्रेणी के वाद्यों की बनावट में सितार और सारंगी का मिश्रित रूप होता है। डाँड (दण्ड) का भाग सितार की तरह होता है जिसमें पर्दे लगे होते हैं, जिस पर उँगलियाँ फिरा कर स्वर-निकास किया जाता है। इस वाद्य का निचला सिरा अर्थात कुंडी, सारंगी की भाँति होती है, जिस पर खाल मढ़ी होती है। सारंगी अथवा वायलिन की तरह इसे गज से बजाया जाता है। ताऊस अथवा मयूरी वीणा का प्रचलन मुगल काल में मिलता है, किन्तु इसकी उत्पत्ति के विषय कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पंजाब के कपूरथला घराने के उस्ताद मीर रहमत अली खाँ सुप्रसिद्ध ताऊस वादक थे, जिनके शिष्य महन्त गज़्ज़ा सिंह थे। महन्त जी पंजाब के भटिण्डा ज़िले के पास स्थित गुरुसर ग्राम के निवासी थे और कपूरथला रियासत के दरबारी कलाकार थे। महन्त गज़्ज़ा सिंह प्रख्यात ताऊस वादक थे। उन दिनों ताऊस अथवा मयूरी वीणा का आकार काफी बड़ा हुआ करता था। महन्त जी ने इसका आकार थोड़ा छोटा इस प्रकार से किया कि वाद्य की ध्वनि में विशेष अन्तर न हो। इस प्रयास में उन्होने ताऊस की कुंडी से मयूर की आकृति को अलग कर दिया और वाद्य के इस नये रूप का नाम ‘दिलरुबा’ रख दिया। इसके अलावा पटियाला दरबार के भाई काहन सिंह भी कुशल ताऊस वादक थे। महन्त गज़्ज़ा सिंह द्वारा ताऊस के परिवर्तित रूप ‘दिलरुबा’ का प्रचलन आज भी है। पंजाब के कई संगीतकार इस वाद्य का सफलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं। पंजाब के कलासाधक रणवीर सिंह, राज एकेडमी में नई पीढ़ी को दिलरुबा वादन की शिक्षा देते हैं। मयूर वीणा के प्राचीन स्वरूप का शोध और अध्ययन कर लखनऊ के इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने वाद्य निर्माता बारीक अली उर्फ बादशाह भाई के सहयोग से इस वाद्य का पुनरोद्धार किया है। आगे बढ़ने से पहले आइए श्रीकुमार जी का मयूर वीणा पर बजाया राग मारू बिहाग की एक रचना सुनवाते हैं।


मयूर वीणा वादन : राग मारू बिहाग : वादक - पण्डित श्रीकुमार मिश्र‘





पण्डित श्रीकुमार मिश्र 
मयूर वीणा का सरलीकृत रूप इसराज, दिलरुबा और तार शहनाई वाद्य है। इन सभी वाद्यों के स्वरों में अधिक अन्तर नहीं होता। इन वाद्यों का प्रचलन पंजाब के अलावा बंगाल में भी रहा है। बंगाल के विष्णुपुर घराने के रामकेशव भट्टाचार्य सुप्रसिद्ध ताऊस अर्थात मयूरी वीणा वादक थे। उन्होने भी इस वाद्य को संक्षिप्त रूप देने के लिए इसकी कुण्डी से मोर की आकृति को हटा दिया और इस नए स्वरूप का नाम 'इसराज' रखा। पंजाब का 'दिलरुबा' और बंगाल का 'इसराज' दरअसल एक ही वाद्य के दो नाम हैं। दोनों की उत्पत्ति 'मयूरी वीणा' से हुई है। इस श्रेणी के वाद्य वर्तमान सितार और सारंगी के मिश्रित रूप है। इसराज या दिलरुबा वाद्यों की उत्पत्ति के बाद ताऊस या मयूरी वीणा का चलन प्रायः बन्द हो गया था। लगभग दो शताब्दी पूर्व इसराज की उत्पत्ति के बाद अनेक ख्यातिप्राप्त इसराज-वादक हुए हैं। रामपुर के सेनिया घराने के सुप्रसिद्ध वादक उस्ताद वज़ीर खाँ कोलकाता में 1892 से 1899 तक रहे। इस दौरान उन्होने अमृतलाल दत्त को सुरबहार और इसराज-वादन की शिक्षा दी। उस्ताद अलाउद्दीन खाँ, जो उस्ताद वज़ीर खाँ के शिष्य थे, ने भी कोलकाता में इसराज-वादन की शिक्षा ग्रहण की थी। बंगाल के वादकों में स्वतंत्र वादन की परम्परा भी अत्यन्त लोकप्रिय थी। इसराज पर चमत्कारिक गतकारी शैली का विकास भी बंगाल में ही हुआ। गया घराने के सूत्रधार हनुमान दास (1838-1936) कोलकाता में निवास करते थे और स्वतंत्र इसराज-वादन करते थे। हनुमान दास जी के शिष्य थे- कन्हाईलाल ठेडी, हाबू दत्त, कालिदास पाल, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, सुरेन्द्रनाथ, दिनेन्द्रनाथ, ब्रजेन्द्रकिशोर रायचौधरी, प्रकाशचन्द्र सेन, शीतल चन्द्र मुखर्जी आदि। ब्रजेन्द्रकिशोर रायचौधरी और प्रकाशचन्द्र सेन से सेनिया घराने के सितार-वादक इमदाद खाँ ने इसराज-वादन की शिक्षा ग्रहण की थी। कोलकाता में ही मुंशी भृगुनाथ लाल और इनके शिष्य शिवप्रसाद त्रिपाठी ‘गायनाचार्य’ इसराज वादन करते थे। शिवप्रसाद जी के शिष्य थे रामजी मिश्र व्यास। वर्तमान में सक्रिय इसराज-वादक और ‘मयूरी वीणा’ के वर्तमान स्वरूप के अन्वेषक पण्डित श्रीकुमार मिश्र, पं॰ रामजी मिश्र व्यास के पुत्र और शिष्य हैं। अपने पिता से दीक्षा लेने के अलावा इन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर शिक्षा भी ग्रहण की है। ताऊस अर्थात मयूरी वीणा से उत्पन्न ‘दिलरुबा’ तथा ‘इसराज’ वाद्य का प्रचलन पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र में अधिक रहा है। सिख समाज और रागी कीर्तन के साथ इस वाद्य का प्रचलन आज भी है। पंजाब के भाई वतन सिंह (निधन-1966) प्रसिद्ध दिलरुबा-वादक थे। फिल्म-संगीतकारों में रोशन और एस.डी. बातिश इस वाद्य के कुशल वादक रहे हैं। गुजरात के नागर दास और उनके शिष्य मास्टर वाडीलाल प्रख्यात दिलरुबा-वादक थे। इनके शिष्य कनकराय त्रिवेदी ने दो उँगलियों की वादन तकनीक का प्रयोग विकसित किया था। त्रिवेदी जी ने इसी तकनीक की शिक्षा श्रीकुमार जी को भी प्रदान की है। वर्तमान में ओमप्रकाश मोहन, चतुर सिंह, और भगत सिंह दिलरुबा के और अलाउद्दीन खाँ तथा विजय चटर्जी इसराज के गुणी कलाकार हैं। श्रीकुमार मिश्र एकमात्र ऐसे कलाकार हैं, जो परम्परागत इसराज के साथ-साथ स्वविकसित ‘मयूरी वीणा’ का भी वादन करते हैं। श्री कुमार जी ने संगीत के प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मयूरी वीणा का अध्ययन कर वर्तमान मयूरी वीणा का निर्माण कराया। मूलतः इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने इस कार्य को अपनी देख-रेख में लगभग डेढ़ दशक पूर्व कराया था, जिसका परिमार्जन समय-समय आज भी जारी है। आज के ताऊस अथवा मयूरी वीणा के निर्माण में लखनऊ के संगीत-वाद्यों के निर्माता बारिक अली उर्फ बादशाह भाई का योगदान रहा। वाद्य को नया जन्म देने के बाद श्रीकुमार जी अपने इस मयूरी वीणा का अनेक बार विभिन्न संगीत समारोहों और गोष्ठियों में वादन कर चुके हैं। आइए अब हम आपको सुनवाते हैं, पण्डित श्रीकुमार मिश्र का बजाया इसराज पर राग रागेश्वरी। आप इस सुरीले वाद्य पर मोहक राग का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिये।


मयूर वीणा वादन : राग रागेश्वरी: वादक - पण्डित श्रीकुमार मिश्र






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 165वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको एक प्राचीन ताल वाद्य वादन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस ताल वाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कितनी मात्रा का ताल है? संख्या लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 167वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 163वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा मोहन वीणा पर प्रस्तुत राग हंसध्वनि, तीनताल की गत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य मोहन वीणा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने केवल दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर हमारी नई श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय गज-तंत्र वाद्य मयूर वीणा से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे लोक-ताल-वाद्य की चर्चा करेंगे जो आज प्रायः लुप्तप्राय है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों के हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र    

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

"गोरी हैं कलाइयाँ" -- यही था उस साल का सर्वश्रेष्ठ गीत; जानिये कुछ बातें इस गीत से जुड़े...


एक गीत सौ कहानियाँ - 29
 

गोरी हैं कलाइयाँ, तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 29-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आज का अर्जुन' के गीत "गोरी हैं कलाइयाँ" के बारे में ... 



बप्पी दा और लता जी
प्पी लाहिड़ी को भले ही डिस्को किंग्‍ की उपाधि दी जाती है, पर उनकी ऐसी अनेक रचनायें हैं जिनमें शास्त्रीय संगीत, तथा बंगाल व अन्य प्रदेशों के लोक संगीत की झलक मिलती है। ऐसा ही एक गीत है 1990 की फ़िल्म 'आज का अर्जुन' का। राजस्थानी रंग में रंगा "गोरी हैं कलाइयाँ, तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ" गीत उस दौर के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक था। 80 के दशक में बप्पी दा स्वरबद्ध फ़िल्मों में अधिकतर पाश्चात्य अंदाज़ के या फिर चल्ताऊ क़िस्म के गीत हुआ करते थे जिनमें महिला स्वर आशा भोसले, एस. जानकी, अलिशा चिनॉय आदि गायिकाओं के होते थे। लेकिन उनका हमेशा यह प्रयास होता था कि हर फ़िल्म में कम से कम एक गीत ऐसा बनायें जिसे वो लता मंगेशकर से गवा सके। अत: लता जी को राज़ी करने के लिए वो उन्हीं की शैली में गीत कम्पोज़ किया करते। फ़िल्म 'हिम्मतवाला' में "नैनों में सपना, सपनों में सजना", फ़िल्म 'तोहफ़ा' में "अल्बेला मौसम, कहता है स्वागतम", फ़िल्म 'पाप की दुनिया' में "बंधन टूटे ना सारी ज़िन्दगी", फ़िल्म 'थानेदार' में "और भला क्या माँगू मैं रब से मुझे तेरा प्यार मिला", फ़िल्म 'गुरु' में "ज‍इयो ना ज‍इयो ना हमसे दूर कभी ज‍इयो ना" की तरह फ़िल्म 'आज का अर्जुन' में भी उन्होंने लता जी को ध्यान में रखते हुए "गोरी हैं कलाइयाँ" की रचना की। शब्बीर कुमार और साथियों के साथ गाया लता जी का यह गीत उस वर्ष का चोटी का गीत सिद्ध हुआ।

1990 में एक से एक कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में आईं, और अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'वार्षिक गीतमाला' में नामांकित होने वाले गीतों में 'किशन कन्हैया', 'चालबाज़', 'बहार आने तक', 'सौतन की बेटी', 'आशिक़ी', 'थानेदार', 'जीना तेरी गली में', 'तुम मेरे हो', 'चाँदनी', 'घर का चिराग', 'दिल', 'आयी मिलन की रात', 'मैंने प्यार किया', और 'हम' जैसी फ़िल्में शामिल थे, जिनके गानें सुपर-डुपर हिट हुए थे। ख़ुद बप्पी लाहिड़ी के तीन गीत चोटी का पायदान प्राप्त करने की लड़ाई में शामिल थे - "तम्मा तम्मा लोगे" (थानेदार), "तूतक तूतक तूतियाँ आइ लव यू" (घर का चिराग), और "गोरी हैं कलाइयाँ"। तमाम गीतों को पछाड़ता हुआ 'आज का अर्जुन' का यह गीत जा पहुँचा चोटी के पायदान पर और बन गया 'सॉंग्‍स ऑफ़ दि ईअर'। दूसरे पायदान पर "कबूतर जा जा" (मैंने प्यार किया) और तीसरे पायदान पर "मुझे नींद न आये" (दिल) गीत रहे।

'आज का अर्जुन' में अमिताभ बच्चन और जया प्रदा की जोड़ी नज़र आई। अभी हाल ही में फ़ेसबूक पर बिग बी ने इस गीत के बारे में अपना स्टेटस अपडेट करते हुए लिखा, "This was considered to be the piece de resistance of the movie and was filmed with such zest and energy that I had a trying time keeping in step with Jaya Prada. Bappi Lahiri’s music was winner. Gori hain kalaaiyan was such a hit in Rajasthan that I am told it was chanted throughout the streets and gullies of Jaipur, where the film producer KC Bokadia hails from." ("यह गीत इस फ़िल्म का मुख्य आकर्षण सिद्ध हुआ, और इस गीत को इतनी लगन और ऊर्जा के साथ फ़िल्माया गया कि मुझे जया प्रदा के साथ कदम से कदम मिलाने में बड़ी मुश्किल हुई। बप्पी लाहिड़ी का संगीत विजयी रहा। गोरी हैं कलाइयाँ राजस्थान में इतना ज़्यादा मक़बूल हुआ कि मुझे ऐसा बताया गया कि जयपुर की गलियों और मुहल्लों लगातार गाया गया जहाँ से के. सी. बोकाडिया ताल्लुख रखते थे")।

"गोरी हैं कलाइयाँ" गीत की एक बड़ी ख़ासीयत है मटकों का सुंदर प्रयोग। विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम को प्रस्तुत करते हुए बप्पी दा ने इस गीत के बारे में बताया, "इस गाने में मैंने पहली बार मटका, मिट्टी का, एक एक स्केल में यूज़ किया। लता जी जब स्टुडियो में आईं तो इतने सारे मटके देख कर कहा कि इतने मटके क्यों? मैंने कहा कि लता जी, मैं मटके से एक्स्पेरिमेण्ट कर रहा हूँ, तबला तरंग का। लता जी को भी बहुत पसंद आया, और यह गाना 1990 का नंबर वन सॉंग्‍ था। और आप लोगों को भी पसंद आया"। इस गीत में राजस्थानी लोक गीत "बन्ना रे बागा में झूला गाल्या" का प्रयोग किया गया है। कोरस इस पंक्ति को गाती हैं और इस पंक्ति के जवाब में लता जी गाती हैं "आया रे छैल भँवर जी आया"। "बन्ना रे..." गीत के साथ घूमर नृत्य शैली में नृत्य किया जाता है। घूमर नृत्य राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य राजस्थान में प्रचलित अत्यंत लोकप्रिय नृत्य है, जिसमें केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती हैं। इसमें लहँगा पहने हुए स्त्रियाँ गोल घेरे में लोकगीत गाती हुई नृत्य करती हैं। जब ये महिलाएँ विशिष्ट शैली में नाचती हैं तो उनके लहँगे का घेर एवं हाथों का संचालन अत्यंत आकर्षक होता है। इस नृत्य में महिलाएँ लम्बे घाघरे और रंगीन चुनरी पहनकर नृत्य करती हैं। इसी सौन्दर्य को "गोरी हैं कलाइयाँ" गीत में दर्शाया गया है।
शब्बीर कुमार


"गोरी हैं कलाइयाँ" गीत के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जब मैं इस गीत के गायक शब्बीर कुमार से फ़ेसबूक पर सम्पर्क किया तो कुछ और रोचक तथ्य सामने आ गए। शब्बीर कुमार ने बताया, "यह गीत किसी और ने गाया था। लेकिन शायद अमिताभ बच्चन जी ने मेरा नाम सजेस्ट किया कि यह गीत शब्बीर कुमार को लता जी के साथ गवाया जाए! और गीत का अन्तरा एक ही साँस में शब्बीर कुमार से रेकॉर्ड कराया जाए! वैसे मैं किसी भी सिंगर का रेकॉर्डेड गीत डब नहीं करता, यह मेरा उसूल है, लेकिन मुझे बाद में बताया गया कि यह गीत किसी जाने-माने गायक ने गाया था। यही इस गीत के पीछे की संक्षिप्त और सही जानकारी है।" शब्बीर कुमार ने उस गायक का नाम तो नहीं बताना चाहा, पर हम कुछ कुछ अंदाज़ा ज़रूर लगा सकते हैं। इस फ़िल्म में शब्बीर कुमार के अलावा दो गीतों में अमित कुमार की आवाज़ थी - "चली आना तू पान की दुकान में" और "ना जा रे ना जा रे"; तथा एक अन्य गीत में मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ थी। इसलिए हो न हो, इन दो गायकों में से किसी एक की आवाज़ में रेकॉर्ड हुई होगी। ख़ैर, जो भी है, अन्तिम सत्य यही है कि इस गीत ने अपार शोहरत हासिल की। यह गीत न तो लता मंगेशकर का गाया सर्वश्रेष्ठ गीत है, न शब्बीर कुमार का, और न ही इसके गीतकार अंजान या संगीतकार बप्पी लाहिड़ी की श्रेष्ठ रचना। फिर भी कुछ तो बात है इस गीत में जो इसे भीड़ से अलग करती है, और आज भी जब हम इस गीत को सुनते हैं तो जैसे दिल ख़ुश हो जाता है।



फिल्म - आज का अर्जुन : 'गोरी हैं कलाइयाँ तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियाँ...' : लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार : संगीत - बप्पी लाहिड़ी 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

'कम्बल के नीचे' हैं घई साहब के गीतों की झांकी

ताज़ा सुर ताल -2014 -19 

सुभाष घई की नयी फिल्म कांची  प्रदर्शन को तैयार है. फिल्म में कुल 9 गीत हैं, जिनमें बेहद मुक्तलिफ़ रंग भरे हैं फिल्म के संगीतकार इस्माईल दरबार और सलीम सुलेमान ने. दरबार के बेटे ज़ैद दरबार ने भी सुभाष घई साहब के सहायक निर्देशक का जिम्मा उठाया है फिल्म के लिए. जैसे की हम आपको बता चुके हैं, फिल्म का एक गीत खुद घई साहब ने स्वरबद्ध किया है. गीतकार हैं इरशाद कामिल. 

इस फिल्म का आज जो गीत हम सुनवा रहे हैं वो दरअसल एक पैरोडी है जो ट्रिब्यूट है देश के सबसे बड़े शो मैंन सुभाष घई को. कम्बल के नीचे  सुनते ही आपको चोली के पीछे  याद आ जायेगा और याद आ जायेगीं घई की एक के बाद एक बनी हिट फ़िल्में और उनके जबरदस्त गीत. ताल  भी परदेस  भी तो कहीं खलनायक  भी नज़र आ जायेगें. संचिता भट्टाचार्य, नीति मोहन और ईश्वरीय मजूमदार के गाया ये गीत मस्ती से भरपूर है. लीजिये यादों के झरोखों से पायें घई साहब की हिट फिल्मों के दौर की झलक.    

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

टूटे तारे उठा ले...उनसे चंदा बना ले...प्रेरणा के स्वर पोपोन की आवाज़ में

ताज़ा सुर ताल --2014-18

सुन री बावली तू अपने लिए, खुद ही मांग ले दुआ, कोई तेरा न होना... केश में सूरज खोंस के चलना, कभी कोई रात मिले न  .... ये हों वो ऊर्जामयी शब्द जो नागेश कुकनूर की मर्मस्पर्शी फिल्म लक्ष्मी  में नायिका की प्रेरणा बन जाता है. मनोज यादव के लिखे इस बेमिसाल गीत को अपनी आवाज़ और सशक्त अभिव्यक्ति से निखारा है आज के दौर के सबसे जबरदस्त गायकों में से एक अंगराग महंता ने जिसे हम सब पोपोन के नाम से अधिक जानते हैं. हम फिल्म की चर्चा पीछले हफ्ते भी कर चुके हैं, आपको बता दें कि एक सेंसर से चली एक लम्बी जंग के बाद अधिर्कार इस माह ये फिल्म प्रदर्शित हो ही गयी मगर केवल सीमित सिनेमा घरों में ही. फिल्म में नागेश ने खुद भी एक अहम् भूमिका की है, साथ ही सतीश कौशिक, राम कपूर और शेफाली छाया (शाह) भी हैं मगर शीर्षक भूमिका मोनाली ने कमाल का काम किया है, कभी मौका लगे तो देखिएगा इस फिल्म को. 

फिल्म के सभी गीत पार्श्व संगीत का हिस्सा अधिक हैं, और फिल्म का पार्श्व का पूरा जिम्मा तापस ने उठाया है. अहमदाबाद से मुंबई आये तापस रेलिया को सबसे पहले मौका दिया विधु विनोद चोपड़ा ने फिल्म फरारी की सवारी  में. नागेश कुकनूर के साथ भी तापस पहले काम कर चुके थे, यही वो कारण रहा उनके इस गठबंधन की सफलता का भी. सुन री बावली  देश की हर महिला के लिए एक एंथम सरीखा गीत है. लीजिये सुनिए और जोश से भर जाईये. 

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

ठंडी हवा हो काली घटा हो तो मन क्यों न झूमें

खरा सोना गीत - ठंडी हवा काली घटा 
प्रस्तोता - संज्ञा टंडन 
स्क्रिप्ट सुजोय चट्टरज़ी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन  

रविवार, 20 अप्रैल 2014

तंत्रवाद्य मोहन वीणा की विकास यात्रा



स्वरगोष्ठी – 164 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 2


पाश्चात्य और भारतीय संगीतकारों में समान रूप से लोकप्रिय है यह तंत्रवाद्य 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे अत्याधुनिक भारतीय तंत्रवाद्य की चर्चा करेंगे, जो पाश्चात्य हवाइयन गिटार जैसा दिखाई देता है, परन्तु इस पर भारतीय संगीत के रागों को बड़े ही प्रभावी ढंग से बजाया जा सकता है। यह वाद्य है, मोहन वीणा, जिसके प्रवर्तक और वादक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित विश्वमोहन भट्ट हैं। आज के अंक में आपको इस वाद्य और इसके वादक के बारे में चर्चा करेंगे। 
 



ब हम भारतीय संगीत के जड़ों की तलाश करने का प्रयास करते हैं तो हमारी यह यात्रा वैदिक काल तक जा पहुँचती है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक की इस संगीत यात्रा को अनेक कालखण्डों से गुजरना पड़ा। किसी कालखण्ड में भारतीय संगीत को अपार समृद्धि प्राप्त हुई तो किसी कालखण्ड में इसके अस्तित्व का संकट भी रहा। अनेक बार भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर की संगीत शैलियों का अतिक्रमण भी हुआ, परन्तु परिणाम यह हुआ कि वह सब शैलियाँ भारतीय संगीत की अजस्र धारा में विलीन हो गईं और यह संगीत और समृद्ध होकर आज भी मौजूद है। मध्यकाल में भारतीय और विदेशी व्यवसायियों द्वारा संगीत शैलियों और संगीत वाद्यों का परस्पर आदान-प्रदान भी खूब हुआ। इस काल में नई शैलियों का जन्म और परम्परागत शैलियों का क्रमबद्ध विकास भी हुआ। इसी काल में अनेक भारतीय वाद्ययंत्र भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी गए। इनमें से कुछ वाद्य तो ऐसे हैं जिनका अस्तित्व वैदिक काल में था, बाद में इसके स्वरुप में थोडा परिवर्तन कर ये पाश्चात्य संगीत का हिस्सा बने। पश्चिमी संगीत जगत में ऐसे वाद्यों ने सफलता के नए मानक गढ़े। एक ऐसा ही वाद्ययंत्र गिटार है। एक लम्बे समय से गिटार पाश्चात्य संगीत एक अविभाज्य हिस्सा रहा है और पिछली आधी शताब्दी से तो यह वाद्य भारतीय फिल्म और सुगम संगीत में भी प्रयोग किया जाता रहा है।

देश की आज़ादी के बाद गिटार फिल्म संगीत और सुगम संगीत का हिस्सा तो बन चुका था किन्तु अभी भी यह शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित नहीं हुआ था। पश्चिम का हवाइयन गिटार रागों के वादन के लिए पूर्ण नहीं था। कुछ संगीतज्ञों ने गिटार वाद्य को रागदारी संगीत के अनुकूल बनाने का प्रयास किया जिनमें सर्वाधिक सफलता जयपुर के पण्डित विश्वमोहन भट्ट को मिली। आज हम ‘मोहन वीणा’ के नाम से जिस तंत्रवाद्य को पहचानते हैं, वह पश्चिम के हवाइयन गिटार या स्लाइड गिटार का संशोधित रूप है। पण्डित विश्वमोहन भट्ट इस वाद्य के प्रवर्तक और विश्वविख्यात वादक हैं। आगे बढ़ने से पहले आइए सुनते है, मोहन वीणा पर उनका बजाया राग हंसध्वनि। तबला संगति रामकुमार मिश्र ने की है।


मोहन वीणा वादन : राग हंसध्वनि : आलापचारी और तीनताल की गत : पण्डित विश्वमोहन भट्ट




आपने मोहन वीणा पर राग हंसध्वनि की मोहक गत का रसास्वादन किया। यह मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति का राग है, जो उत्तर भारतीय संगीत में भी बेहद लोकप्रिय है। मोहन वीणा के वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट, सर्वोच्च भारतीय सम्मान ‘भारतरत्न’ से विभूषित पण्डित रविशंकर के शिष्य हैं। विश्वमोहन भट्ट का परिवार अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया। एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था- ‘1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ। उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाए’। श्री भट्ट के वर्तमान ‘मोहन वीणा’ में केवल सितार और गिटार का ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्र वाद्य विचित्र वीणा और सरोद के गुण भी हैं।

मोहन वीणा और विचित्र वीणा के बजाने के तरीके पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पाश्चात्य संगीत का हवाइयन गिटार वैदिककालीन वाद्य विचित्र वीणा का सरलीकृत रूप है। वीणा के तुम्बे से ध्वनि में जो गमक उत्पन्न होता है, पाश्चात्य संगीत में उसका बहुत अधिक प्रयोग नहीं होता। यूरोप और अमेरिका के संगीत विद्वानों ने अपनी संगीत पद्यति के अनुकूल इस वाद्य में परिवर्तन किया। विचित्र वीणा में स्वर के तारों पर काँच का एक बट्टा फिरा कर स्वर परिवर्तन किया जाता है। तारों पर एक ही आघात से श्रुतियों के साथ स्वर परिवर्तन होने से यह वाद्य गायकी अंग में वादन के लिए उपयोगी होता है। प्राचीन ग्रन्थों में गायन के साथ वीणा की संगति का उल्लेख मिलता है। हवाइयन गिटार बन जाने के बाद भी यह गुण बरक़रार रहा, इसीलिए पश्चिमी संगीत के गायक कलाकारों का यह प्रिय वाद्य रहा। विश्वमोहन जी ने गिटार के इस स्वरूप में परिवर्तन कर रागदारी संगीत के वादन के अनुकूल बनाया। उन्होंने एक सामान्य गिटार में 6 तारों के स्थान पर 19 तारों का प्रयोग किया। यह अतिरिक्त तार 'तरब' और 'चिकारी' के हैं, जिनका उपयोग स्वरों में अनुगूँज के लिए किया जाता है। श्री भट्ट ने इसके बनावट में भी आंशिक परिवर्तन किया है। मोहन वीणा के वर्तमान स्वरूप में भारतीय संगीत के रागों को गायकी और तंत्रकारी दोनों अंगों में बजाया जा सकता है। अपने आकार-प्रकार और वादन शैली के कारण मोहन वीणा पूरे विश्व में चर्चित हो चुका है। अमेरिकी गिटार वादक रे कूडर और पण्डित विश्वमोहन भट्ट ने पाश्चात्य गिटार और मोहन वीणा की 1992 में जुगलबन्दी की थी। इस जुगलबन्दी के अल्बम 'ए मीटिंग बाई दि रीवर’ को वर्ष 1993-94 में विश्व संगीत जगत के सर्वोच्च ‘ग्रेमी अवार्ड’ के लिए नामित किया गया और इस अनूठी जुगलबन्दी के लिए दोनों कलाकारों को इस सम्मान से अलंकृत किया गया था। आइए इस पुरस्कृत अल्बम की एक जुगलबन्दी रचना सुनते हैं। आप इस जुगलबन्दी का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


मोहन वीणा और गिटार जुगलबन्दी : वादक – पण्डित विश्वमोहन भट्ट और रे कूडर






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 164वें अंक की पहेली में आज हम आपको कम प्रचलित वाद्य पर एक रचना की प्रस्तुति का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत रचना इस अंश को सुन कर वाद्य को पहचानिए और बताइए कि यह कौन सा वाद्य है?

2 – इस रचना में आपको किस राग का आभास हो रहा है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 166वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 162वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक कम प्रचलित वाद्य जलतरंग वादन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य जलतरंग और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग किरवानी। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के दूसरे अंक में एक विकसित तंत्रवाद्य मोहन वीणा पर चर्चा की। अगले अंक में हम एक लुप्तप्राय और संशोध्त किये वितत वाद्य पर चर्चा करेंगे। इस प्राचीन किन्तु कम प्रचलित वाद्य की बनावट और वादन शैली हमारी चर्चा के केन्द्र में होगा। आप भी अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

कभी आपने सुना है फ़िल्म 'संगम' के इस कमचर्चित गीत को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 28
 

आई लव यू...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 28-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'संगम' के एक कमचर्चित गीत के बारे में ... 

 'संगम', 1964 की राज कपूर की महत्वाकांक्षी फ़िल्म। बेहद कामयाब। यह राज कपूर की पहली रंगीन फ़िल्म भी थी। फ़िल्म की कामयाबी में इसके गीत-संगीत का महत्वपूर्ण योगदान था। फ़िल्म के सात गीत थे - "बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं", "ओ महबूबा, तेरे दिल के पास", "दोस्त दोस्त न रहा", "हर दिल जो प्यार करेगा", "ओ मेरे सनम", "मैं का करूँ राम मुझे बुढ्ढा मिल गया", "यह मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर" - एक से बढ़ कर एक, सुपर-डुपर हिट, यह बताना मुश्किल कि कौन सा गीत किससे उपर है लोकप्रियता में। लेकिन बहुत कम लोगों को यह पता है कि इन सात गीतों के अलावा भी एक और गीत इस फ़िल्म में मौजूद है, जिसे पार्श्व-संगीत के रूप में फ़िल्म में प्रयोग किया गया है। विविअन लोबो की आवाज़ में यह गीत है "आइ लव यू"। यह गीत 'संगम' के मूल 'Long Play' और '78 RPM' पर उपलब्ध है। यह गीत अपने आप में अनूठा है, कारण, इस गीत का स्वरूप किसी आम हिन्दी फ़िल्मी गीत जैसा नहीं है; बल्कि एक ही बात और एक ही पंक्ति को कई विदेशी भाषाओं में दोहराया गया है। ऐसी कौन सी सिचुएशन थी 'संगम' में कि राज कपूर को इस तरह के एक गीत की ज़रूरत महसूस हुई? दरसल 'संगम' में एक सिचुएशन था कि जब राज कपूर और वैजयन्तीमाला अपने हनीमून के लिए यूरोप के टूर पर जाते हैं, वहाँ अलग अलग देशों की सैर कर रहे होते हैं, और क्योंकि यह हनीमून ट्रिप है, तो प्यार तो है ही। तो यूरोप में फ़िल्माये जाने वाले इन दृश्यों के लिए एक पार्श्व-संगीत की आवश्यकता थी।

पर राज कपूर हमेशा एक क़दम आगे रहते थे। उन्होंने यह सोचा कि पार्श्व-संगीत के स्थान पर क्यों न एक पार्श्व-गीत रखा जाये, जो बिल्कुल इस सिचुएशन को मैच करता हो! उन्होंने अपने दिल की यह बात शंकर- जयकिशन को बतायी। साथ ही कुछ सुझाव भी रख दिये। राज कपूर नहीं चाहते थे कि यह किसी आम गीत के स्वरूप में बने और न ही इसके गायक कलाकार लता, मुकेश या रफ़ी हों। शंकर और जयकिशन सोच में पड़ गये कि क्या किया जाये! उन दिनों जयकिशन चर्चगेट स्टेशन के पास गेलॉर्ड होटल के बोम्बिलि रेस्तोराँ में रोज़ाना शाम को जाया करते थे। उनकी मित्र-मंडली वहाँ जमा होती और चाय-कॉफ़ी की टेबल पर गीत-संगीत की चर्चा भी होती। शम्मी कपूर उनमें से एक होते थे। उसी रेस्तोराँ में जो गायक-वृन्द ग्राहकों के मनोरंजन के लिए गाया करते थे, उनमें गोवा के कुछ गायक भी थे। उन्हीं में से एक थे विविअन लोबो। ऐसे ही किसी एक दिन जब जयकिशन 'संगम' के इस गीत के बारे में सोच रहे थे, विविअन लोबो वहाँ कोई गीत सुना रहे थे। जयकिशन को एक दम से ख़याल आया कि क्यों न लोबो से इस पार्श्व गीत को गवाया जाये! लोबो की आवाज़ में एक विदेशी रंग था, जो इस गीत के लिए बिल्कुल सटीक था। बस फिर क्या था, विविअन लोबो की आवाज़ इस गीत के लिए चुन ली गई। विविअन लोबो की आवाज़ में यह एकमात्र हिन्दी फ़िल्मी गीत है। इसके बाद उनकी आवाज़ किसी भी फ़िल्मी गीत में सुनाई नहीं दी। पर कहा जाता है कि उन्होंने कोंकणी गायिका लोरना के साथ कुछ कोंकणी गीत रेकॉर्ड किये हैं।

अब अगला सवाल यह था कि गीत के बोल क्या होंगे! पार्श्व में बजने वाले 3 मिनट के सीक्वेन्स के लिए एक ऐसे गीत की आवश्यकता थी जिसमें कम से कम बोल हों पर संदेश ऐसा हो कि जो सिचुएशन को न्याय दिला सके। तब राज कपूर ने यह सुझाव दिया कि हनीमून के दृश्य के लिए सबसे सटीक और सबसे छोटा मुखड़ा है "आइ लव यू"। तो क्यों न अलग अलग यूरोपियन भाषाओं में इसी पंक्ति का दोहराव करके 3 मिनट के इस दृश्य को पूरा कर दिया जाये! सभी को यह सुझाव ठीक लगा, और पूरी टीम जुट गई "आइ लव यू" के विभिन्न भाषाओं के संस्करण ढूंढने में। अंग्रेज़ी के अलावा जर्मन ("ich liebe dich"), फ़्रेन्च ("j’ vous t’aime") और रूसी ("ya lyublyu vas"/ "Я люблю вас") भाषाओं का प्रयोग इस गीत में हुआ है, और साथ ही "इश्क़ है इश्क़" को भी शामिल किया गया है। इस तरह से गीत का मुखड़ा कुछ इस तरह का बना:

वैयनतीमाला के साथ राज कपूर और शंकर जयकिशन
ich liebe dich, 
I love you.
j’ vous t’aime,
I love you.
ya lyublyu vas (Я люблю вас),
I love you.
ishq hai ishq,
I love you.

यह मुखड़ा बनने के बाद इसका एक अन्तरा भी बना। 

come shake my hand
and love each other
let’s bring happiness
in this world together
this is the only truth
remember my brother
this is the only truth
remember my brother

गीत के संगीतकार के रूप में शंकर जयकिशन का नाम दिया गया है। संगीत संयोजन को सुन कर इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह शंकर जयकिशन का ही कम्पोज़िशन है। पर इसके गीतकार के लिए किसे क्रेडिट मिलना चाहिये? शैलेन्द्र? हसरत? राज कपूर? शंकर-जयकिशन? या फिर विविअन लोबो? जी हाँ, कुछ लोगों का कहना है कि इस गीत को दरसल विविअन लोबो ने ही लिखा था, पर इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। और ना ही विविअन लोबो के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध है। कुछ लोगों का कहना है कि शंकर जयकिशन के ऑरकेस्ट्रा में वायलिन और बास प्लेअर के लिए एक नाम V.V.N. Lobo का आता रहा है, शायद ये वही हो! यह अफ़सोस की ही बात है कि विविअन लोबो 'संगम' जैसी सफल और यादगार फ़िल्म के संगीत से जुड़े होने के बावजूद गुमनामी के अन्धेरे में ही रह गये। आज अगर वो जीवित हैं, तो कहाँ रहते होंगे? शायद गोवा में? या फिर क्या पता मुंबई में ही। अपने इस एक गीत से यह गायक ख़ुद गुमनामी में रह कर पूरी दुनिया को प्यार करना सिखा गया।

'संगम' के अन्य लोकप्रिय गीतों की तरह यह गीत लोकप्रिय तो नहीं हुआ, क्योंकि रेडियो पर इसे बजता हुआ कभी सुनाई नहीं दिया। पर राज कपूर सालों बाद भी इस गीत के असर से बाहर नहीं निकल सके। इस गीत के बनने के ठीक 20 साल बाद, जब उन्होंने फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली' की योजना बनाई, तो उन्होंने इस फ़िल्म के संगीतकार रवीन्द्र जैन को कुछ-कुछ ऐसी ही धुन पर एक गीत कम्पोज़ करने का अनुरोध किया। उनके इस अनुरोध को सर-माथे रख रवीन्द्र जैन बना लाये "सुन साहिबा सुन, प्यार की धुन"। इन दोनों गीतों को ध्यान से सुनने पर दोनों की धुनों में समानता साफ़ सुनाई पड़ती है। बस इतनी सी है फ़िल्म 'संगम' के इस अनूठे अनसुने गीत की दास्तान!

फिल्म संगम : 'आई लव यू...' : विवियन लोवो : संगीत - शंकर जयकिशन 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

दुल्हन को मैचिंग दूल्हा लाये हैं शंकर एहसान लॉय 'हुलारे' में

ताज़ा सुर ताल  -2014-17

करन जौहर और साजिद नाडियाडवाला लाये हैं चेतन भगत की कहानी पर आधारित 2 States. अलिया भट्ट और अर्जुन कपूर अभिनीत ये फिल्म आज यानी १८ अप्रैल को प्रदर्शन आरंभ कर रही है. फिल्म कैसी है ये आप लोग देख कर हमें बताएगें. फिलहाल हम इस फिल्म का एक और गीत आज सुनने जा रहे है, जो है पूरी तरह मस्ती से भरा और कदम थिरकाने वाला. 

फिल्म की संगीत जोड़ी है अमिताभ भट्टाचार्य और शंकर एहसान लोय की तिकड़ी का. शादी के माहौल का ये गीत एक बार फिर 'सेल' तिकड़ी की मशहूर छाप लिए हुए है. ढोल का सुन्दर प्रयोग है. पार्श्व गायन है खुद शंकर के साथ सिद्धार्थ महादेवन और रसिका शेखर का. तो लीजिये झूमने को कमर कस लें इस गीत के साथ. 

  

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

सुन सुगना रे...तापस रेलिया का रचा एक मधुर गीत

ताज़ा सुर ताल -2014 -16

दोस्तों कुछ फिल्मों ऐसी होती हैं जो ह्रदय को चीर जाती है, आपकी संवेदनाओं को इस कदर कुरेद जाती है कि फिल्म खत्म होने के बाद देर तक आपका मन रोता रहता है. नागेश कुकनूर एक ऐसे निर्देशक हैं जो फ़िल्में बनाते हैं ताकि समाज मनोरजन की खुमारी को छोड़ कभी कभी सच का आईना भी देखें सिनेमा के अन्धकार भरे हॉल में बैठकर. उनकी ताज़ा फिल्म "लक्ष्मी" मानव तस्करी पर एक विवेचनात्मक अभिव्यक्ति है. एक 13 साल की मासूम बच्ची को वैश्यावृति के दलदल में धकेल दिया जाता है और कैसे वो नन्हीं जान हिम्मत के साथ उन परिस्तिथियों का सामना करती है यही इस पौने दो घंटे की फिल्म बेहद सच्चाई के साथ दर्शाया गया है. 

जब मैंने ये फिल्म देखी तो मुझे अंदाजा नहीं था कि फिल्म में एक संगीत पक्ष भी होगा, हालाँकि फिल्म की नायिका के रूप में चयन किया गया है मोनाली ठाकुर (संवार लूं - लूटेरा) का. इन्डियन आइडल के गलियारों से निकल मोनाली ने पार्श्वगायन के साथ साथ अभिनय में भी अपनी सशक्त उपस्तिथि दर्ज कराई है. फिल्म की एल्बम में कुल ४ गीत हैं जिसमें से सिर्फ एक ही मोनाली के हिस्से आया है. फिल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं, फिल्म के बारे में कुछ और बातें आपसे बांटूंगा पर आज सुनवाता हूँ ये गीत जिसमें सुगना (तोता) का प्रयोग हुआ है एक अरसे बाद (एक पुराना गीत याद आता है जा जा रे सुगना जा रे...). गीत को स्वरबद्ध किया है तापस रेलिया ने, और गाया है सूचि और अंकिता यादव ने, शब्द हैं मनोज यादव के.


सोमवार, 14 अप्रैल 2014

जीवन के अंतिम सच से जुडी एक जरूरी सीख मुकेश के इस गीत में

खरा सोना गीत - जो चला गया उसे भूल जा 
प्रस्तोता - अंतरा चक्रवर्ती 
स्क्रिप्ट - सुजोय चट्टरजी
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन

रविवार, 13 अप्रैल 2014

अनूठा घन-वाद्य जलतरंग




स्वरगोष्ठी – 163 में आज

संगीत वाद्य श्रृंखला - 1

जल भरे प्यालों से उपजे स्वर-तरंग अर्थात मनोहर संगीत वाद्य जलतरंग



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज एक नवीन श्रृंखला के प्रथम अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ अनूठे वाद्यों की चर्चा करेंगे। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे एक प्राचीन वाद्य ‘जलतरंग’ की चर्चा करेंगे। जल से भरे विभिन्न स्वरों के छोटे-बड़े प्यालों पर आघात कर संगीत उत्पन्न करने वाले इस वाद्य के आज देश में कुछ गिने-चुने वादक ही हैं। आज के अंक में आपको इस वाद्य के दो प्रतिभाशाली साधकों की प्रस्तुतियाँ भी सुनवाएँगे। 



‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ में यह उल्लेख है कि “गीत, वाद्य और नृत्य का समन्वित रूप ही संगीत है”। प्राचीन ग्रन्थकारों ने कण्ठ संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना है। गायन के बाद वाद्य संगीत का स्थान माना गया है। भारतीय संगीत के जो वाद्य आज प्रचलित हैं उन्हें उपयोगिता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। भारतीय संगीत में ताल एक अनिवार्य तत्त्व होता है। कण्ठ अथवा वाद्य संगीत के साथ ताल पक्ष को प्रदर्शित करने के लिए तबला, पखावज, ढोलक, मृदंगम् आदि वाद्यों का प्रयोग होता है। तानपूरा, स्वरपेटी, स्वरमण्डल आदि ऐसे वाद्य हैं जो संगीत के आधारभूत या रागानुकूल स्वरों का प्रदर्शन मात्र करते हैं। इन वाद्यों से राग या रागांश का वादन नहीं किया जा सकता। कुछ स्वर वाद्य ऐसे हैं जो गायन के साथ सहयोगी होते हैं और इनका स्वतंत्र रूप से वादन भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, सारंगी, हारमोनियम, वायलिन, बाँसुरी आदि। संगीत के अधिकतर स्वरवाद्य कण्ठ संगीत की अनुकृति करने का प्रयास करते हैं। संगीत वाद्यों की बनावट और वादन शैली की दृष्टि से समस्त वाद्यों को चार वर्गों- तंत्र, अवनद्ध, सुषिर और घन के रूप में बाँटा गया है। तंत्र अर्थात तार वाले वाद्य तत और वितत वाद्य के रूप में वर्गीकृत किए जाते हैं। इस श्रेणी के कुछ वाद्य तारों पर आघात कर बजाए जाते हैं, जैसे सितार, सरोद आदि। तंत्र वाद्यों के अन्तर्गत ही कुछ वाद्य तारों पर धनुषाकार गज से घर्षण कर बजाए जाते हैं। सारंगी, वायलिन आदि तंत्र वाद्य की श्रेणी में होते है और इन्हें वितत वाद्य कहा जाता है। दूसरी श्रेणी अवनद्ध वाद्यों की है, जिसके अन्तर्गत तबला, पखावज, ढोलक आदि वाद्य आते है। ये वाद्य संगीत के ताल पक्ष को प्रदर्शित करते हैं। तीसरी श्रेणी सुषिर वाद्यों अर्थात हवा के दबाव से या फूँक से बजने वाले वाद्यों की है। बाँसुरी, शहनाई, क्लेरेनेट आदि इसी श्रेणी के वाद्य हैं। वाद्यों की चौथी श्रेणी घन वाद्यों की है। इस श्रेणी में उन वाद्यों को रखा जाता है, जिनमें दो ठोस वस्तुओं को परस्पर टकराने से नाद की उत्पत्ति की जाती है, जैसे- मँजीरा, घण्टी, झाँझ आदि। इस श्रेणी के वाद्य अधिकतर गायन और वादन में लय के लिए प्रयोग किया जाता है।

जलतरंग एक ऐसा संगीत वाद्य है जो घन वाद्य की श्रेणी में माना जाता है, परन्तु यह स्वर वाद्य के रूप में प्रयोग किया जाता है अर्थात इस वाद्य पर धुन या राग बजाए जा सकते हैं। उच्चकोटि के चीनी मिट्टी से बने, पानी भरे, छोटे-बड़े प्यालों पर बाँस की पतली कमचियों से प्रहार कर जलतरंग बजाया जाता है। पानी भरे प्याले विभिन्न स्वरों में मिले होते हैं। जलतरंग वाद्य पर यह चर्चा जारी रहेगी, इससे पूर्व हम इस वाद्य के वादन का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। हम यह उल्लेख पहले ही कर चुके हैं कि वर्तमान में लुप्तप्राय वाद्य जलतरंग के कुछ गिने-चुने वादक हैं। इन्हीं में एक प्रतिभावान जलतरंग वादक मिलिन्द तुलनकर हैं। सांगीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में जन्में मिलिन्द की संगीत शिक्षा जलतरंग के अलावा गायन, सितार और सन्तूर वादन के क्षेत्र में भी हुई। परन्तु उन्होने लुप्तप्राय जलतरंग वादन में दक्षता प्राप्त की। आइए, मिलिन्द तुलनकर का जलतरंग पर बजाया राग किरवानी सुनवाते हैं। यह रचना तीनताल में निबद्ध है।



जलतरंग वादन : राग किरवानी : तीनताल : प्रस्तुति – मिलिन्द तुलनकर




संगीत के प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि जलतरंग का विकास चौथी से छठीं शताब्दी के बीच हुआ था। ‘संगीत पारिजात’ नामक ग्रन्थ में इस वाद्य का उल्लेख है। अष्टछाप कवियों के साहित्य में भी जलतरंग एक मधुर स्वर वाद्य के रूप में वर्णित किया गया है। ‘संगीत सार’ नामक ग्रन्थ में 22 और 15 प्यालों के जलतरंग का विस्तृत वर्णन किया गया है। जलतरंग वादन के लिए अच्छे किस्म के अलग-अलग स्वरों के प्यालों का चुनाव कर उसमें पानी की मात्रा को घाटा-बढ़ा कर एक सप्तक के 12 स्वरों में मिलाना पड़ता है। एक सप्तक में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र स्वर प्रयोग होते हैं। रागों के अनुसार प्यालों की संख्या कम भी हो सकती है। जैसे- राग भूपाली बजाने के लिए शुद्ध व तीव्र मध्यम और शुद्ध व कोमल निषाद के प्याले एक सप्तक में कम किये जा सकते हैं। मध्य सप्तक के आवश्यक स्वरों के अलावा मन्द्र और तार सप्तक के कुछ स्वरों को भी शामिल करना होता है। उदाहरण के तौर पर राग दरबारी बजाने में मन्द्र सप्तक के स्वरों का और राग कामोद के लिए तार सप्तक के स्वरों का प्रयोग आवश्यक होता है। आम तौर पर 24 प्यालों का जलतरंग सभी रागों के लिए पर्याप्त होता है। जलतरंग के प्यालों को चन्द्राकार आकृति में सजाकर रखना चाहिए बड़ा प्याला बाईं ओर और फिर स्वरों के उतरते क्रम से दाहिनी ओर सजाना चाहिए। प्यालों को सही स्वर में मिलाने के लिए पानी की मात्रा को घटाना-बढ़ाना पड़ता है। प्यालों में अधिक पानी डालने पर स्वर नीचा और कम कर देने पर स्वर ऊँचा हो जाता है। जब सभी प्यालों के स्वर ठीक-ठीक मिल जाते हैं तब बाँस की दो दंडियों से इन पर प्रहार करने से वांछित राग अथवा धुन का वादन किया जा सकता है। जलतरंग पर सितार की भाँति गत बजाई जाती है। अब हम आपको वरिष्ठ कलासाधिका रंजना प्रधान द्वारा जलतरंग पर बजाया राग कलावती कल्याण सुनवाते हैं। इस राग में झपताल और तीनताल में दो रचनाएँ आप सुनेंगे। आप इस अनुपम वाद्य के वादन का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



जलतरंग वादन : राग कलावती कल्याण : झपताल और तीनताल : प्रस्तुति - रंजना प्रधान





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 163वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको वाद्य संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस संगीत वाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग की झलक मिलती है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 165वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 161वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित चैती लोकगीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका शारदा सिन्हा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक से हमने कुछ कम प्रचलित और लुप्तप्राय वाद्यों पर नई लघु श्रृंखला की शुरुआत की है। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे वैदिक संगीत वाद्य की चर्चा करेंगे जो आज परिवर्तित रूप में हमारे सामने उपस्थित है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों के हमें प्रतीक्षा रहेगी।  


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

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