Sunday, June 30, 2013

विदुषी मीता पण्डित से सुनिए राम-सिया की होली



स्वरगोष्ठी – 126 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 6

राग काफी पर आधारित गीत- ‘कासे कहूँ मन की बात...’

  
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की इस छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपको राग-आधारित कुछ ऐसे फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं, जो आधी शताब्दी से भी अधिक अवधि बीत जाने के बावजूद सदाबहार गीत के रूप में हमारे बीच प्रतिष्ठित हैं। ये गीत सदाबहार तो हैं, परन्तु इनके संगीतकार हमारी स्मृतियों में धूमिल हो गए हैं। इस श्रृंखला को प्रस्तुत करने का उद्देश्य ही यही है कि इन कालजयी, राग आधारित गीतों के माध्यम से हम कुछ भूले-बिसरे संगीतकारों को स्मरण करें। आज के अंक में हम आपको राग काफी पर आधारित एक मधुर फिल्मी गीत सुनवाएँगे और इस गीत के संगीतकार एन. दत्ता का स्मरण करेंगे। इसके साथ ही सुप्रसिद्ध युवा गायिका विदुषी मीता पण्डित से इसी राग में निबद्ध रस से भरी एक होरी भी सुनेगे।


एन. दत्ता
1959 में बी.आर. चोपड़ा की सफलतम फिल्म ‘धूल का फूल’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीत अपनी सरलता और मधुरता के बल पर बेहद लोकप्रिय हुए थे। एन. दत्ता अर्थात दत्ता नाईक इस फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म जगत के यशस्वी गीतकार साहिर लुधियानवी के अर्थपूर्ण शब्दों को मधुर धुनों में पिरोने वाले संगीतकारों में रोशन, खय्याम और रवि के साथ एन. दत्ता का नाम लिया जाना आवश्यक है। फिल्मों में पदार्पण से पहले एन. दत्ता ने मुम्बई के देवधर संगीत विद्यालय से संगीत की विधिवत शिक्षा भी ग्रहण की थी। इसके उपरान्त कुछ समय तक फिल्म संगीत का व्यावहारिक प्रशिक्षण पाने के उद्देश्य से संगीतकार गुलाम हैदर और सचिनदेव बर्मन के सहायक के रूप में भी कार्य किया था। स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर उन्हें 1955 में प्रदर्शित दो फिल्मों, ‘मिलाप’ और ‘मैरीन ड्राइव’ में मिला। यह एन. दत्ता का सौभाग्य था कि आरम्भ में ही उन्हें बड़े बैनर की अर्थात राज खोसला की ‘मिलाप’ और जी.पी. सिप्पी की ‘मैरीन ड्राइव’ जैसी फिल्में मिली। इसके अलावा आरम्भ से ही उन्हें सुविख्यात शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी का साथ मिला। आगे चल कर साहिर और दत्ता की जोड़ी ने फिल्म संगीत के भण्डार को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया।

सुधा मल्होत्रा
आरम्भिक दो फिल्मों के बाद एन. दत्ता ने 1956 में ‘चन्द्रकान्ता’, 1957 में ‘मोहिनी’, 1958 में ‘मिस्टर एक्स’ जैसी फिल्मों को विविधतापूर्ण संगीत से सँवारा। इस दौर में फिल्में बेशक बहुत सफल न रहीं, किन्तु दत्ता के संगीत का जादू खूब चला। वर्ष 1958 में दत्ता को बी.आर. चोपड़ा ने अपनी फिल्म ‘साधना’ के संगीत निर्देशन का प्रस्ताव दिया। यह फिल्म खूब चली और दत्ता का संगीत भी। इस फिल्म के कई गीतों में उन्होने रागों का स्पर्श भी किया था। फिल्म ‘साधना’ के स्तरीय संगीत से प्रभावित होकर बी.आर. चोपड़ा ने अपनी अगली फिल्म ‘धूल का फूल’ के संगीत का दायित्व भी दत्ता को सौंपा। इस फिल्म का निर्देशन यश चोपड़ा ने किया था। लोकप्रियता की दृष्टि से इस फिल्म के कई गीत सफल थे किन्तु राग के आधार की दृष्टि से इस फिल्म का ही नहीं, बल्कि अपने दौर का सर्वाधिक सफल गीत था- ‘कासे कहूँ मन की बात...’। इस गीत को दत्ता ने राग काफी के स्वरों का स्पष्ट आधार दिया था। गीत में सितार का अनूठा प्रयोग किया गया है। आरम्भ में राग काफी के स्वरों में छोटा सा आलाप और सरगम तथा अन्त में द्रुत तीनताल में मोहक गत के रूप में सितार का प्रयोग गीत का मुख्य आकर्षण है। यह गीत नृत्य पर फिल्माया गया है। नृत्यांगना हैं नाज़ और परदे पर सितार वादिका की भूमिका में अभिनेत्री पूर्णिमा हैं। दत्ता ने इस गीत में ठुमरी अंग का स्पर्श किया है। साहिर लुधियानवी की पारम्परिक ठुमरी जैसी शब्दावली, राग काफी के स्वरों की चाशनी में पगी इसकी धुन और गायिका सुधा मल्होत्रा की उदात्त आवाज़ इस गीत को कालजयी बना देता है। आइए, पहले हम सब इस गीत को सुनते हैं।


राग - काफी : फिल्म - धूल का फूल : ‘कासे कहूँ मन की बात...’ : संगीत – एन. दत्ता



मीता पण्डित
आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है। आइए अब हम आपका साक्षात्कार राग काफी के एक अलग रंग से कराते हैं। विदुषी मीता पण्डित ग्वालियर परम्परा की जानी-मानी युवा गायिका हैं। उन्होने राग काफी के स्वरों में एक होरी प्रस्तुत की है। राधा-कृष्ण की होली तो अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, किन्तु मीता जी ने अपनी इस प्रस्तुति में राम और सीता की होली के दृश्य उपस्थित किया है। आप राग काफी की इस होरी का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 


राग काफी होरी : ‘राम सिया फाग मचावत...’ : विदुषी मीता पण्डित




आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 126वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक बन्दिश का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत रचना के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – इस संगीत रचना के ताल का नाम भी बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 128वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 124वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद सुल्तान खाँ की बजाई सारंगी पर आलाप का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कल्याण अथवा यमन और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य सारंगी। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के आगामी अंक में हम एक और लोकप्रिय राग पर आधारित एक सदाबहार फिल्मी गीत, इसके विस्मृत संगीतकार और इसी राग में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में इस श्रृंखला की अगली कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 

Saturday, June 29, 2013

सिने पहेली में बूझिए आठवें दशक के फिल्म संगीत को



सिने पहेली – 70

सत्तर के दशक की फिल्मों पर केन्द्रित आज की पहेली

  
सिने पहेली के 70वें अंक के प्रश्नों को लेकर मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ। आज की पहेली के प्रश्न सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध अर्थात 1970 से 1975 के बीच में प्रदर्शित फिल्मों से जुड़े हुए हैं। इस अंक से प्रतियोगिता में जुड़ने वाले नये खिलाड़ियों का स्वागत करते हुए हम उन्हें यह भी बताना चाहेंगे कि अभी भी कुछ देर नहीं हुई है। आज से इस प्रतियोगिता में जुड़ कर भी आप महाविजेता बन सकते हैं। यही इस प्रतियोगिता की विशेषता है। इस प्रतियोगिता के नियमों का उल्लेख नीचे किया गया है, ध्यान दीजियेगा। आज की पहेली परम्परागत सवाल-जवाब के रूप में नहीं है। नीचे दो वर्गों- A और B में फिल्म संगीत से जुड़े 5-5 सूत्र दिये गए हैं। पहले वर्ग के सूत्र को दूसरे वर्ग के सूत्र के साथ जोड़ना है। अर्थात पहले वर्ग में फिल्म संगीत से जुड़ा हुआ कोई विवरण या आडियो क्लिप दूसरे वर्ग में दिये विवरण या आडियो क्लिप से सम्बन्धित है। आपको इस परस्पर सम्बन्ध का कारण खोजना है। वर्ग A में दिये गए सभी सूत्र 70 के दशक की फिल्म संगीत के हैं, किन्तु वर्ग B के सूत्र इस दशक के बिलकुल नहीं हैं। हमें विश्वास है कि एक बार इस सम्बन्ध का कारण स्पष्ट होते ही आपको पहेली एकदम आसान प्रतीत होगी। पहेली में कुल पाँच तथ्यों को सम्बद्ध करना है। प्रत्येक सही उत्तर पर आपको 2-2 अंक मिलेंगे। आइए, आरम्भ करते हैं, आज की पहेली का सिलसिला।


आज की पहेली

वर्ग A के  सूत्र

1- हम आपको 70 के दशक के एक फिल्मी गीत के अन्तराल संगीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुनकर आप फिल्म की पहचान करें और इस फिल्म का सम्बन्ध वर्ग B में दिये गए पाँच सूत्रों में से किसी एक के साथ जोड़ें।


2- राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी की मुख्य भूमिकाओं वाली फिल्म।

3- आडियो सुनिए और इसका सूत्र वर्ग B के किसी सूत्र से जोड़िए।


4- यह आडियो 1972 की एक फिल्म का है। वर्ग B का कौन सा सूत्र आपको इस गीत से सम्बन्धित प्रतीत हो रहा है?


5- प्रकाश मेहरा की फिल्म, जिसमें राहुलदेव बर्मन का संगीत था और संजय खान जिसके नायक थे।

वर्ग B के सूत्र 

1- दिलीप कुमार, नरगिस और नूरजहां अभिनीत एक फिल्म। इस फिल्म में नौशाद का संगीत था। फिल्म में शमशाद बेगम के स्वर भी गूँजे थे।

2- अक्षय कुमार, प्रियंका चोपड़ा और लारा दत्ता अभिनीत एक फिल्म, जिसमें नदीम-श्रवण का संगीत है।

3- इस आडियो को सुनिए और वर्ग A के किसी सूत्र से इसे जोड़िए।


4- एक फिल्म, जिसमें अनिल कपूर, श्रीदेवी और शम्मीकपूर ने अभिनय किया था।

5- गीत का अंश सुन कर फैसला कीजिए कि यह वर्ग A के किस सूत्र से मेल करता है?



जवाब भेजने का तरीका


उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 70" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 4 जुलाई, शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल
 
सवाल 1 – गीत - ‘हर करम अपना करेंगे...’ / ‘मेरा धर्मा तू मेरा कर्मा तू... ’, फिल्म – कर्मा।

सवाल 2 – अभिनेत्री – परवीन बाबी, गीतकार – सन्तोष आनन्द।

सवाल 3 - फिल्म – शराबी, गीत – ‘मुझे नौलखा मँगा दे...’ / ‘लोग कहते हैं मैं शराबी...’, संगीतकार – बप्पी लाहिड़ी, नायिका – जया प्रदा।

सवाल 4 – गायिका – चित्रा सिंह (जगजीत सिंह)।

सवाल 5:1 ‘ना माँगूँ सोना चाँदी…’, फिल्म – बाबी।

5:2 ‘चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे…’, फिल्म – दोस्ती।

5:3 ‘सावन का महीना पवन करे…’ फिल्म – मिलन।

5:4 ‘एक प्यार का नगमा है…’ फिल्म – शोर।

5:5 लता मंगेशकर और एस.पी. बालसुब्रह्मण्यम।

5:6 लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी।

5:7 लता मंगेशकर।

5:8 संजीव कुमार और मुमताज़।

5:9 राजेश खन्ना और विन्दु।

5:10 ऋषि कपूर और टीना मुनीम।


पिछली पहेली के विजेता

सिने पहेली – 69 के विजेताओं के नाम और उनके प्राप्तांक निम्नवत हैं। इस बार सर्वप्रथम और सर्वशुद्ध हल भेज कर सरताज प्रतिभागी का सम्मान पंकज मुकेश ने प्राप्त किया है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई।

1- पंकज मुकेश, बैंगलुरु – 10 अंक - (सरताज प्रतिभागी)

2- विजय कुमार व्यास, बीकानेर – 10 अंक

3- इन्दुपुरी गोस्वामी, चित्तौड़गढ़ _ 6.5 अंक

4- प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – 10 अंक

5- चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ – 10 अंक


इस सेगमेण्ट का अब तक का सम्मिलित स्कोरकार्ड


नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।


कैसे बना जाए ‘सिने पहेली महाविजेता'

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा।

4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम।


'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार।
  


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


Friday, June 28, 2013

सुरीला जादू चला कर दिल लूट गया "लुटेरा"

पने पूरे शबाब पर चल रहे संगीतकार अमित त्रिवेदी एक बार फिर हाज़िर हैं, एक के बाद एक अपने स्वाभाविक और विशिष्ट शैली के संगीत की बहार लेकर. पिछले सप्ताह हमने जिक्र किया घनचक्कर  का, आज भी अमित हैं अपनी नई एल्बम लूटेरा  के साथ, इस बार उनके जोडीदार हैं उनके सबसे पुराने साथ अमिताभ भट्टाचार्य. अमिताभ बेशक इन दिनों सभी बड़े संगीतकारों के साथ सफल जुगलबंदी कर रहे हैं पर जब भी उनका साथ अमित के साथ जुड़ता है तो उनमें भी एक नया जोश, एक नई रवानगी आ जाती है. 

लूटेरा  की कहानी ५० के दशक की है, और यहाँ संगीत में भी वही पुराने दिनों की महक आपको मिलेगी. पहले गीत संवार लूँ  को ही लें. गीत के शब्द, धुन और गायिकी सभी सुनहरे पुराने दिनों की तरह श्रोताओं के बहा ले जाते हैं. गीत के संयोजन को भी पुराने दिनों की तरह लाईव ओर्केस्ट्रा के साथ हुआ है. मोनाली की आवाज़ का सुरीलापन भी गीत को और निखार देता है. आपको याद होगा मोनाली इंडियन आईडल में एक जबरदस्त प्रतिभागी बनकर उभरी थी, वो जीत तो नहीं पायी थी मगर प्रीतम के लिए ख्वाब देखे (रेस) गाकर उन्होंने पार्श्वगायन की दुनिया में कदम रखा. अमित ने इससे पहले उन्हें अगा बाई (आइय्या) में मौका दिया था, पर वो एक युगल गीत था. वास्तव में मोनाली का ये पहला गीत है जहाँ उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आई है. संवार लूँ  एक बेहद खूबसूरत गीत है जिसे हर उम्र के श्रोताओं का भरपूर प्यार मिलेगा ऐसी हमें पूरी उम्मीद है. 

एक  अच्छे गीत के बाद एक और अच्छा गीत....और यकीन मानिये एल्बम का ये अगला गीत एक मास्टरपीस है. अनकही  में आवाज़ है स्वयं गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य की और क्या खूब गाया है उन्होंने. शब्द जैसे एक सुन्दर चित्र हो और अमित की ये कम्पोजीशन उनकी सबसे बहतरीन रचनाओं में से एक है. आने वाले एक लंबे अरसे तक श्रोता इस गीत को भूल नहीं पायेंगें. ख्वाबों का झरोखा , सच है या धोखा....

और ऐसे ही सच और धोखे के बीच झूलता है अगला गीत भी. शिकायतें  में आवाजें हैं मोहन कानन और अमिताभ की. एक और सोफ्ट रोक्क् गीत जहाँ शब्द गहरे और दिलचस्प हैं. नाज़ुक से शब्द और मोहन की अलहदा गायिकी इस गीत को भी एक यादगार गीत में बदल देते हैं.....मगर रुकिए, क्योंकि  मोंटा रे  सुनने के बाद आप स्वाभाविक ही बाकी सब भूल जायेंगें. आवाज़ है एक और गीतकार स्वानंद किरकिरे की. गीत बांग्ला और हिंदी में है, दिशाहारा  कोइम्बोका मोंटा रे  के मायने होते हैं कि 'मेरा दिशाहीन दिल कितना पागल है'. बेहद बेहद सुन्दर गीत. ये शायद पहला गीत होगा जहाँ दो गीतकारों ने पार्श्वगायन किया हो. बधाई पूरी टीम को.

खुद  अमित त्रिवेदी की दमदार आवाज़ में दर्द की पराकाष्ठा है जिन्दा  में....एक बार फिर अमिताभ ने सरल मगर कारगर शब्द जड़े हैं. इन सभी गीतों की खासियत ये है कि इनमें पार्श्व में कम से कम वाध्यों का इस्तेमाल हुआ है, बस सब कुछ नापा तुला, उतना ही जितना जरूरी हो.....अंतिम गीत मन मर्जियाँ  में शिल्पा राव के साथ  अमिताभ किसी भी अन्य प्रोफेशनल गायक की तरह ही सुनाई देते हैं. एल्बम का एकमात्र युगल गीत रोमांटिक कम और थीमेटिक अधिक है.

वास्तव में ये हमारी राय में इस साल की पहली एल्बम है जिसमें सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं. अमित और अमिताभ का एक और मास्टरपीस. हमारी सलाह मानिये तो आज ही इन गीतों को अपनी संगीत लाईब्रेरी का हिस्सा बनायें और बार बार सुनें. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
अनकही , संवार लूँ, जिंदा, मोंटा रे, शिकायतें 

हमारी  रेटिंग  - ४.९ / ५ 

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी 

यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:

  


Thursday, June 27, 2013

खरा सोना 01 - आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है...

गीत - आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है...
फिल्म - नीला आकाश
आवाजें - मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले
गीतकार  - रजा मेहदी अली खान
संगीतकार  - मदन मोहन

स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी 
पोडकास्ट - मीनू सिंह 
प्रस्तुति - संज्ञा टंडन


Tuesday, June 25, 2013

अराधना चतुर्वेदी "मुक्ति" की रहस्य-कथा आदत

इस साप्ताहिक स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी के स्वर में मुंशी प्रेमचंद की मर्मस्पर्शी कहानी "कायर" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं आराधना चतुर्वेदी 'मुक्ति' की रहस्य-कथा आदत जिसे स्वर दिया है माधवी चारुदत्ता ने जोकि हिन्दी और मराठी की एक सफल वॉइस ओवर आर्टिस्ट हैं। उनके स्वर में आचार्य विनोबा भावे द्वारा धुले जेल में मराठी भाषा में दिये गए गीता प्रवचन यहाँ सुने जा सकते हैं।

कहानी आदत का गद्य "आराधना का ब्लॉग" पर उपलब्ध है।  "आदत" का कुल प्रसारण समय 8 मिनट 20 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।






डॉ. आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति" जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मैं एक शोधकर्ता हैं। कविताओं के साथ-साथ वे कहानी और आलेख भी लिखती हैं।

लोग, जो बनाते हैं मूरतें भगवानों की
रहा करते हैं वो शहर की तंग गलियों की झोपडियों में
उनके लिए भगवान् सिर्फ एक आइटम है
जिसे पूरा कर लिया जाना है एक निश्चित समय में...
वो पूजते नहीं उसे,
बनाकर एक ओर रख देते हैं।
 ~ आराधना चतुर्वेदी

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

“रात में सोते हुए भी बीच-बीच में नींद खुल जाती और उसे महसूस होता कि कोई उसे देख रहा है।”
 (आराधना चतुर्वेदी कृत "आदत" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
आदत MP3

#23rd Story, Aadat: Aradhana Chaturvedi/Hindi Audio Book/2013/23. Voice: Madhavi Charudatta

Monday, June 24, 2013

रिचा शर्मा के 'लेजी लेड' ताने से बिदके 'घनचक्कर'

मिर  और नो वन किल्ल्ड जस्सिका  के बाद एक बार फिर निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने अपनी नई फिल्म के संगीत का जिम्मा भी जबरदस्त प्रतिभा के धनी अमित त्रिवेदी को सौंपा है. इमरान हाश्मी और विद्या बालन के अभिनय से सजी ये फिल्म है -घनचक्कर . फिल्म तो दिलचस्प लग रही है, आईये आज तफ्तीश करें कि इस फिल्म के संगीत एल्बम में श्रोताओं के लिए क्या कुछ नया है. 

पहला गीत लेजी लेड अपने आरंभिक नोट से ही श्रोताओं को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है. संगीत संयोजन उत्कृष्ट है, खासकर बीच बीच में जो पंजाबी शब्दों के लाजवाब तडके दिए गए हैं वो तो कमाल ही हैं. बीट्स भी परफेक्ट है. अमिताभ के बोलों में नयापन भी है और पर्याप्त चुलबुलापन भी. पर तुरुप का इक्का है रिचा शर्मा की आवाज़. उनकी आवाज़ और गायकी ने गीत को एक अलग ही मुकाम दे दिया है. एक तो उनका ये नटखट अंदाज़ अब तक लगभग अनसुना ही था, उस पर एक लंबे अंतराल से उन्हें न सुनकर अचानक इस रूप में उनकी इस अदा से रूबरू होना श्रोताओं को खूब भाएगा. निश्चित ही ये गीत न सिर्फ चार्ट्स पर तेज़ी से चढेगा वरन एक लंबे समय तक हम सब को याद रहने वाला है. बधाई पूरी टीम को. 

आगे बढ़ने से पहले आईये रिचा के बारे में कुछ बातें आपको बताते चलें. फरीदाबाद, हरियाणा में जन्मी रिचा ने गन्धर्व महाविद्यालय से गायन सीखा. उनकी पहचान कीर्तनों में गाकर बननी शुरू हुई, बॉलीवुड में उन्हें पहला मौका दिया रहमान ने फिल्म ताल  में. नि मैं समझ गयी  गीत बेहद लोकप्रिय हुआ. उनकी प्रतिभा के अलग अलग चेहरे हमें दिखे माहि वे (कांटे), बागबाँ रब है (बागबाँ), और निकल चली रे (सोच)  जैसे गीतों में. पर हमारी राय में उनकी ताज़ा गीत लेजी लेड  उनका अबतक का सबसे बहतरीन गीत बनकर उभरा है. 

वापस लौटते हैं घनचक्कर  पर. अगला गीत है अल्लाह मेहरबान  जहाँ गीत के माध्यम से बढ़िया व्यंग उभरा है अमिताभ ने, कव्वाली नुमा सेट अप में अमित ने धुन में विविधता भरी है. दिव्या कुमार ने अच्छा निभाया है गीत को. एक और कबीले तारीफ गीत. 

घनचक्कर बाबू  जैसा कि नाम से जाहिर है कि शीर्षक गीत है, एक बार फिर अमिताभ ने दिलचस्प अंदाज़ में फिल्म के शीर्षक किरदार का खाका खीचा है और उतने ही मजेदार धुन और संयोजन से अपना जिम्मा संभाला है.अमित ने. गीत सिचुएशनल है और परदे पर इसे देखना और भी चुटीला होगा. 

अंतिम गीत झोलू राम   से अमित बहुत दिनों बाद मायिक के पीछे लेकर आये हैं ९० के दशक में तुम तो ठहरे परदेसी  गाकर लोकप्रिय हुए अल्ताफ राजा को. हालाँकि ये प्रयोग उतना सफल नहीं रहा जितना रिचा वाला है, पर एक लंबे समय के अंतराल के बाद अल्ताफ को सुनना निश्चित ही अच्छा लगा, .पर गीत साधारण ही है जिसके कारण अल्ताफ की इस वापसी में अपेक्षित रंग नहीं उभर पाया. 

एल्बम के बहतरीन गीत - 
लेजी लेड, अल्लाह मेहरबान 

हमारी रेटिंग - ३.७   

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी

आवाज़ - अमित तिवारी

 

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Sunday, June 23, 2013

चर्चा राग कल्याण अथवा यमन की

  
स्वरगोष्ठी – 125 में आज

भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति – 5

‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ राग यमन के सच्चे स्वरों का गीत 

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ की यह पाँचवीं कड़ी है और इस कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हमारी चर्चा का विषय होगा, राग यमन पर आधारित एक सदाबहार गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’। 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ के इस कालजयी गीत के संगीतकार दत्ताराम वाडेकर थे, जिनके बारे में वर्तमान पीढ़ी शायद परिचित हो। इसके साथ ही आज के अंक में हम राग यमन पर चर्चा करेंगे और आपको सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ का बजाया, राग यमन का भावपूर्ण आलाप भी सुनवाएँगे। 


दत्ताराम
संगीतकार दत्ताराम की पहचान एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कम, परन्तु सुप्रसिद्ध संगीतकार शंकर-जयकिशन के सहायक के रूप में अधिक हुई। इसके अलावा लोक-तालवाद्य ढप बजाने में वे सिद्धहस्त थे। फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत ‘मेरा नाम राजू घराना अनाम...’ में उनका बजाया ढप सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था। ढप के अलावा अन्य ताल-वाद्यों, तबला, ढोलक आदि के वादन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फिल्म ‘बेगुनाह’ के गीत ‘गोरी गोरी मैं पारियों की छोरी...’ और फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के बाल गीत ‘चूँ चूँ करती आई चिड़िया...’ में उनका ढोलक वादन श्रोताओं को मचलने पर विवश करता है। दत्ताराम की संगीत-शिक्षा तबला वादन के क्षेत्र में ही हुई थी। पाँचवें दशक में वो मुम्बई आए और शंकर-जयकिशन के सहायक बन गए। उनकी पहली फिल्म ‘नगीना’ थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में दत्ताराम ने 1957 में प्रदर्शित राज कपूर की फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अपने मधुर सम्बन्धों के कारण राज कपूर ने फिल्म ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत के लिए राज कपूर ने शंकर-जयकिशन के इस प्रतिभावान सहायक को चुना। यह फिल्म तो नहीं चली, किन्तु इसके गीत खूब लोकप्रिय हुए। ऊपर जिस बाल गीत की चर्चा हुई है, वह तो आज भी बच्चों का सर्वप्रिय गीत बना हुआ है।

मुकेश
दत्ताराम को संगीत निर्देशन का दूसरा अवसर 1958 में प्रदर्शित फिल्म ‘परिवरिश’ में मिला। राज कपूर इस फिल्म के नायक थे। फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने राज कपूर के आग्रह पर ही दत्ताराम को इस फिल्म के संगीत निर्देशक का दायित्व सौंपा था। इस फिल्म में दत्ताराम ने मुकेश, मन्ना डे और लता मंगेशकर की आवाज़ों में कई मधुर गीत रचे, किन्तु जो लोकप्रियता मुकेश के गाये गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ को मिली वह अपने आप में कीर्तिमान है। मुकेश को दर्द भरे गीतों का महान गायक माना जाता है। आज भी यह गीत दर्द भरे गीतों की सूची में सिरमौर है। इस गीत पर राग यमन की छाया है। फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में इस गीत की रिकार्डिंग से जुड़े एक रोचक तथ्य का उल्लेख किया है। हुआ यह कि जिस दिन इस गीत को रिकार्ड करना था, उस दिन साजिन्दों की हड़ताल थी। उस समय स्टुडियो में सारंगी वादक ज़हूर अहमद, गायक मुकेश और दत्ताराम स्वयं तबला के साथ उपस्थित थे। इन्हीं साधनों के साथ गीत की अनौपचारिक रिकार्डिंग की गई। यूँतो इसे गीत का पूर्वाभ्यास माना गया किन्तु इस रिकार्डिंग को राज कपूर समेत अन्य लोगों ने जब सुना तो सभी अभिभूत हो गए। आज भी यह गीत मुकेश के गाये गीतों में शीर्ष स्थान पर है। लीजिए, पहले आप इस बहुचर्चित गीत को सुनिए।


राग यमन : फिल्म परिवरिश : ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ : संगीत – दत्ताराम




फिल्म ‘परिवरिश’ के इस गीत राग यमन का स्पष्ट आधार है। राग यमन गोधूलि बेला अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर के आरम्भ के समय का राग है। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले सम्पूर्ण जाति का यह राग कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में राग का नाम कल्याण ही बताया गया है। 


उस्ताद सुल्तान खाँ
विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल में भारत से यह राग पर्शिया पहुँचा, जहाँ इसे यमन नाम मिला। मुगलकाल से इसका यमन अथवा इमन नाम प्रचलित हुआ। दक्षिण भारतीय पद्यति में यह राग कल्याणी नाम से जाना जाता है। राग यमन अथवा कल्याण के आरोह में षडज और पंचम का प्रयोग बहुत प्रबल नहीं होता। निषाद स्वर प्रबल होने और ऋषभ स्वर शुद्ध होने से पुकार का भाव और करुण रस की सहज अभिव्यक्ति होती है। जैसा कि उल्लेख किया गया कि इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यदि तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाए तो यह राग बिलावल हो जाता है। अवरोह में यदि दोनों मध्यम का प्रयोग कर दिया जाए तो यह यमन कल्याण राग हो जाता है। यदि राग यमन के शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो राग वाचस्पति की अनुभूति कराता है। राग यमन की स्वर-रचना के कारण ही फिल्म ‘परिवरिश’ के गीत- ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ में करुण रस की गहरी अनुभूति होती है। राग यमन की अधिक स्पष्ट अनुभूति कराने का लिए अब हम आपको सारंगी पर इस राग का आलाप सुनवाते हैं। वादक हैं सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद सुल्तान खाँ। आप फिल्मी गीत के स्वरों को इस सार्थक आलाप में खोजने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : सारंगी पर आलाप : उस्ताद सुल्तान खाँ 




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 125वीं संगीत पहेली में हम आपको छठें दशक की एक फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 127वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 123वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'लड़की' के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारी आगामी कड़ियों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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