Thursday, February 28, 2013

इस तरह मोहम्मद रफी का पार्श्वगायन के क्षेत्र में प्रवेश हुआ

 
भारतीय सिनेमा के सौ साल – 37
कारवाँ सिने-संगीत का

 ‘एक बार उन्हें मिला दे, फिर मेरी तौबा मौला...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में हम भारतीय फिल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के प्रारम्भिक दौर का ज़िक्र करेंगे। 

1944 में रफ़ी ने बम्बई का रुख़ किया जहाँ श्यामसुन्दर ने ही उन्हें ‘विलेज गर्ल’ (उर्फ़ ‘गाँव की गोरी’) में गाने का मौका दिया। पर यह फ़िल्म १९४५ में प्रदर्शित हुई। इससे पहले १९४४ में ‘पहले आप’ प्रदर्शित हो गई जिसमें नौशाद ने रफ़ी से कुछ गीत गवाए थे। नौशाद से रफ़ी को मिलवाने का श्रेय हमीद भाई को जाता है। उन्होंने ही लखनऊ जाकर नौशाद के पिता से मिल कर, उनसे एक सिफ़ारिशनामा लेकर रफ़ी को दे दिया कि बम्बई जाकर इसे नौशाद को दिखाए। बम्बई जाकर नौशाद से रफ़ी की पहली मुलाक़ात का वर्णन विविध भारती पर नौशाद के साक्षात्कार में मिलता है– “जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आए, तब वर्ल्डवार ख़त्म हुआ चाहता था। मुझे साल याद नहीं। उस वक़्त फ़िल्म प्रोड्यूसर्स को कम से कम एक वार-प्रोपागण्डा फ़िल्म ज़रूर बनाना पड़ता था। रफ़ी साहब लखनऊ से मेरे पास मेरे वालिद साहब का एक सिफ़ारिशी ख़त लेकर आए। छोटा सा तम्बूरा हाथ में लिए खड़े थे मेरे सामने। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने संगीत सीखा है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ से सीखा है, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के छोटे भाई थे। मैंने उनको कहा कि इस वक़्त मेरे पास कोई गीत नहीं है जो मैं उनसे गवा सकता हूँ, पर एक कोरस ज़रूर है जिसमें अगर वो चाहें तो कुछ लाइनें गा सकते हैं। और वह गाना था “हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा...”। रफ़ी साहब ने दो लाइने गायीं जिसके लिए उन्हें 10 रुपये दिए गए। शाम, दुर्रानी और कुछ अन्य गायकों ने भी कुछ कुछ लाइनें गायीं।” और इस तरह से मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत बाहर आया। पर रेकॉर्ड पर इस गीत को “समूह गीत” लिखा गया है। आइए, अब हम आपको वही गीत सुनवाते हैं। आप गीत सुनिए और इस गीत में रफी साहब की आवाज़ को पहचानिए।


फिल्म पहले आप : ‘हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा...’ : मोहम्मद रफी और साथी


यह गीत न केवल रफ़ी साहब के करियर का एक महत्वपूर्ण गीत बना, बल्कि इसके गीतकार डी.एन. मधोक के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण गीत बना क्योंकि इस गीत में उनके धर्मनिरपेक्षता के शब्दों के प्रयोग के लिए उन्हें “महाकवि” के शीर्षक से सम्मानित किया गया था। ब्रिटिश राज ने इस गीत का मार्च-पास्ट गीत के रूप में विश्वयुद्ध में इस्तेमाल किया। भले ही “हिन्दुस्तान के हम हैं...” गीत के लिए रफ़ी का नाम रेकॉर्ड पर नहीं छपा, पर इसी फ़िल्म में नौशाद ने उनसे दो और गीत भी गवाए, जो शाम के साथ गाए हुए युगल गीत थे– “तुम दिल्ली मैं आगरे, मेरे दिल से निकले हाय...” और “एक बार उन्हें मिला दे, फिर मेरी तौबा मौला...”। एक गीत ज़ोहराबाई के साथ भी उनका गाया हुआ बताया जाता है “मोरे सैंयाजी ने भेजी चुंदरी”, पर रेकॉर्ड पर ‘ज़ोहराबाई और साथी’ बताया गया है। जो भी है, ‘पहले आप’ से नौशाद और रफ़ी की जो जोड़ी बनी थी, वह अन्त तक क़ायम रही। यहाँ थोड़ा रुक कर आइए, रफी के शुरुआती दौर के इन दोनों गीतों को सुनते हैं।


फिल्म पहले आप : “तुम दिल्ली मैं आगरे, मेरे दिल से निकले हाय...” : रफी और शाम



फिल्म पहले आप : “एक बार उन्हें मिला दे, फिर मेरी तौबा मौला...” : रफी और शाम


1980 में रफ़ी साहब की अचानक मृत्यु के बाद नौशाद साहब ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए विविध भारती के एक विशेष प्रसारण में कहा था – “यूँ तो सभी आते हैं दुनिया में मरने के लिए, मौत उसकी होती है जिसका दुनिया करे अफ़सोस। मीर तक़ी ‘मीर’ का यह शे’र मोहम्मद रफ़ी पर हर बहर सटीक बैठता है। वाक़ई मोहम्मद रफ़ी साहब ऐसे इन्सान, ऐसे कलाकार थे, जो फलक की बरसों की इबादत के बाद ही पैदा होते हैं। हिन्दुस्तान तो क्या, दुनिया के करोड़ों इन्सानों के लिए मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गई थी। रफ़ी की आवाज़ से लोगों का दिन शुरु होता था, और उनकी आवाज़ ही पर रात ढलती थी। मेरा उनका साथ बहुत पुराना था। आप सब जानते हैं, मैं यह अर्ज़ करना चाहता हूँ कि ये एक ऐसा हादसा, ऐसा नुकसान मेरे लिए हुआ, आप सब के लिए हुआ, बल्कि मैं समझता हूँ कि संगीत के सात सुरों में से एक सुर कम हो गया है, छह सुर रह गए हैं।

गायकी तेरा हुस्न-ए-फ़न रफ़ी, तेरे फ़न पर हम सभी को नाज़ है,

ये सबक सीखा तेरे नग़मात से, ज़िंदगानी प्यार का एक साज़ है,

मेरी सरगम में भी तेरा ज़िक्र है, मेरे गीतों में तेरी आवाज़ है।

कहता है कोई दिल चला गया, दिलबर चला गया, साहिल पुकारता है समन्दर चला गया,

लेकिन जो बात सच है वो कहता नहीं कोई, दुनिया से मौसिक़ी का पयम्बर चला गया।

तुझे नग़मों की जान अहले नज़र यूंही नहीं कहते, तेरे गीतों को दिल का हमसफ़र यूंही नहीं कहते,

सुनी सब ने मोहब्बत जवान आवाज़ में तेरी, धड़कता है हिन्दुस्तान आवाज़ में तेरी।”

ख़लीक अमरोहवी एक ऐसे शख्स हैं जिन्होंने रफ़ी साहब पर काफ़ी शोध कार्य किया है। विविध भारती के एक कार्यक्रम में उन्होंने रफ़ी साहब से सम्बन्धित कई जानकारियाँ दी थीं जिनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत है। 24 दिसम्बर 1924 को कोटला सुल्तानपुर, पंजाब में जन्मे रफ़ी छह भाइयों में दूसरे नम्बर पर थे। उनके बाक़ी पाँच भाइयों के नाम हैं शफ़ी, इमरान, दीन, इस्माइल और सिद्दिक़। उनके बचपन में उनके मोहल्ले में एक फ़कीर आया करता था, गाता हुआ। रफ़ी उसकी आवाज़ से आकृष्ट होकर उसके पीछे चल पड़ता और बहुत दूर निकल जाया करता। उनके बड़े भाई के दोस्त हमीद ने पहली बार उनकी गायन प्रतिभा को महसूस किया और उन्हें इस तरफ़ प्रोत्साहित किया। रफ़ी उस्ताद बरकत अली ख़ाँ के सम्पर्क में आए और उनसे शास्त्रीय संगीत सीखना शुरु किया। उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी। हमीद के ही सहयोग से उन्हें लाहौर रेडियो में गाने का अवसर मिला। एक बार यूं हुआ कि कुंदनलाल सहगल लाहौर गए किसी शो के लिए। पर बिजली फ़ेल हो जाने की वजह से जब शो बाधित हुआ, तब आयोजकों ने शोर मचाती जनता के सामने रफ़ी को खड़ा कर दिया गाने के लिए। इतनी कम उम्र में शास्त्रीय संगीत की बारीक़ियों को देख सहगल भी चकित रह गए और उनकी तारीफ़ की। यह रफ़ी के करियर की पहली उपलब्धि रही। हमीद ने फिर उन्हें दिल्ली भेजा दिल्ली रेडियो में गाने के लिए। वहाँ फ़िरोज़ निज़ामी थे जिन्होंने रफ़ी को कई ज़रूरी बातें सिखाईं। आइए, अब हम आपको रफी साहब का गाया, फिल्म ‘विलेज गर्ल उर्फ गाँव की गोरी’ का वह पहला गीत, जो संगीतकार श्यामसुन्दर ने गवाया था, किन्तु यह फिल्म 1945 में प्रदर्शित हुई। इससे पहले 1944 में फिल्म ‘पहले आप’ प्रदर्शित हो चुकी थी।


फिल्म विलेज गर्ल उर्फ गाँव की गोरी : “दिल हो काबू में तो दिलदार की...” : रफी और साथी



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Wednesday, February 27, 2013

राग बहार- एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग बसंत बहार 


स्वर एवं प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 


स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, February 26, 2013

तपन शर्मा की लघुकथा शवयात्रा

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने  अनुराग शर्मा की आवाज़ में रमेश बत्तरा की लघुकथा "नौकरी" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं तपन शर्मा की लघुकथा "शवयात्रा", जिसका वाचन किया है अनुराग शर्मा ने।

इस लघुकथा का गद्य कहानी कलश पर उपलब्ध है। इसका कुल प्रसारण समय 3 मिनट 24 सेकंड है। आप भी सुनें और अपने मित्रों और परिचितों को भी सुनाएँ  और हमें यह भी बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

युवा लेखक तपन शर्मा हिन्दी के उभरते हुए हस्ताक्षर हैं। उनकी रचनाएँ उनके ब्लॉग धूप छांव पर भी पढ़ी जा सकती हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"ओह। पर मैंने तो कोई खबर नहीं देखी। ब्रेकिंग न्यूज़ में इसका कोई जिक्र ही नहीं था"
(तपन शर्मा की लघुकथा "शवयात्रा" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.

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#Seventh Story, Shavyatra, Tapan Sharma/Hindi Audio Book/2013/7. Voice: Anurag Sharma

Sunday, February 24, 2013

दोस्ती के तागों में पिरोये नाज़ुक से ज़ज्बात -"काई पो छे"

प्लेबैक वाणी -35 - संगीत समीक्षा - काई पो छे


रूठे ख्वाबों को मना लेंगें,
कटी पतंगों को थामेगें,
सुलझा लेंगें उलझे रिश्तों का मांजा...
गिटार के पेचों से खुलता है ये गीत, सारंगी के मांजे में परवाज़ चढ़ाता है, और अमित के सुरों से जब उन्हीं के स्वर मिलते हैं तो एक सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. स्वानंद के शब्दों में बात है रिश्तों की, दोस्ती की और जिंदगी को जीत की दहलीज तक पहुंचा देने वाले ज़ज्बे के. अमित त्रिवेदी ने दिया है श्रोताओं को एक बेशकीमती तोहफा इस गीत के माध्यम से, मुझे जो सबसे अधिक प्रभावित करती है वो है वाध्यों का उनका चुनाव, हर गीत को किन किन गहनों से सजाना है ये अमित बखूबी जानते हैं. मुझे यकीन है कि मेरी ही तरह बहुत से श्रोताओं को उनकी हर नई पेशकश का बेसब्री से इन्तेज़ार रहता है. 

आज हम जिक्र कर रहे हैं काई पो छे के संगीत की. उलझे रिश्तों को सुलझाते हुए आईये आगे बढते हैं अमित के संगीतबद्ध इस एल्बम में सजे अगले गीत की तरफ.
अगला गीत भी दोस्ती के इर्द गिर्द है, मिली नायर की आवाज़ में गजब की ताजगी है, जैसे शबनम के मोती हों सुनहरी धूप में लिपटे. यहाँ धूप का काम करती है अमित की सुरीली आवाज़. स्वानंद के शब्द खुल कर साँस लेते हैं अमित की धुनों में. गीत सोफ्ट रोक् अंदाज़ का है जहाँ बीच बीच में वाध्यों का भारीपन गीत को जरूरी उतार चढ़ाव देता है, बार बार सुने जाने लायक गीत, खास तौर पर अगर आप एक लंबी ड्राईव पर निकलें हों तो मूड को खुश्गवार बनाये रखेंगीं ये मीठी बोलियाँ.
आपको बताते चलें कि ये फिल्म चेतन भगत के लोकप्रिय उपन्यास द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाईफ पर आधारित है. एल्बम में कुल ३ ही गीत हैं, अंतिम गीत एक गरबा है जिसमें एक बार फिर वही दोस्ती, जिंदगी और सपनों की बातें ही उभर कर आती हैं. शुभारंभ में ढोल और शहनाई का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है. ख्वाबों के बीज कच्ची जमीन पे हमको बोना हैआशा के मोती सांसों की माला में पिरोना है..स्वानंद के शब्द एक बार फिर गीत को गहराई देते हैं. श्रुति पाठक ने गरबे वाला हिस्सा अच्छे से निभाया है. एक दिलचस्प और खूबसूरत गीत.
काई पो छे एक छोटा मगर बेहद सुरीला कैप्सूल है संगीत प्रेमियों के लिए. अमित त्रिवेदी और स्वानंद एक बार फिर उम्मीदों पर खरा उतरे हैं, रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ४.६ की रेटिंग.  

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सातवें प्रहर के कुछ आकर्षक राग


स्वरगोष्ठी – 109 में आज

राग और प्रहर – 7

दरबारी, अड़ाना, शाहाना और बसन्त बहार : ढलती रात के ऊर्जावान राग


आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ संगीत-प्रेमियों की महफिल में उपस्थित हूँ। आपको याद ही होगा कि इन दिनों हम ‘राग और प्रहर’ विषय पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। इस श्रृंखला में अब तक सूर्योदय से लेकर छठें प्रहर तक के रागों की चर्चा हम कर चुके हैं। आज हम आपसे सातवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे। सातवाँ प्रहर अर्थात रात्रि का तीसरा प्रहर मध्यरात्रि से लेकर ढलती हुई रात्रि के लगभग 3 बजे तक के बीच की अवधि को माना जाता है। इस अवधि में गाने-बजाने वाले राग ढलती रात में ऊर्जा का संचार करने में समर्थ होते हैं। प्रायः कान्हड़ा अंग के राग इस प्रहर के लिए अधिक उपयुक्त माने जाते हैं। आज हम आपको कान्हड़ा अंग के रागों- दरबारी, अड़ाना और शाहाना के अतिरिक्त ऋतु-प्रधान राग बसन्त बहार की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और इन रागों में कुछ चुनी हुई रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्यरात्रि के परिवेश को संवेदनशील बनाने और विनयपूर्ण पुकार की अभिव्यक्ति के लिए दरबारी कान्हड़ा एक उपयुक्त राग है। यह मान्यता है कि अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन ने कान्हड़ा के स्वरों में आंशिक परिवर्तन कर दरबार में गुणिजनों के बीच प्रस्तुत किया था, जो बादशाह अकबर को बहुत पसन्द आया और उन्होने ही इसका नाम दरबारी रख दिया था। आसावरी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग मध्यरात्रि और उसके बाद की अवधि में ही गाया-बजाया जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। अति कोमल गान्धार स्वर का आन्दोलन करते हुए प्रयोग इस राग की प्रमुख विशेषता होती है। यह अति कोमल गान्धार अन्य रागों के गान्धार से भिन्न है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। अब हम आपको राग दरबारी में भक्तिभाव से परिपूर्ण एक ध्रुवपद अंग की रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। पटियाला गायकी परम्परा के सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती ने तानसेन की इस रचना को बड़े ही असरदार ढंग से प्रस्तुत किया है। सारंगी संगति भारतभूषण गोस्वामी ने की है।


राग दरबारी : ‘प्रथम समझ आओ रे विद्या धुन...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती


राग दरबारी से ही मिलता-जुलता एक राग है, अड़ाना। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह भी आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। षाडव-षाडव जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में कोमल गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर वक्रगति से प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अति कोमल गान्धार का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इस राग में आज हम आपको एक फिल्मी रचना सुनवाएँगे। वर्ष 1955 में सुविख्यात फिल्म निर्माता-निर्देशक वी. शान्ताराम ने शास्त्रीय नृत्यप्रधान फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत।


राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : उस्ताद अमीर खाँ और साथी


आज का तीसरा राग शाहाना अथवा शाहाना कान्हड़ा है। विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ के अनुसार इस राग का सृजन हज़रत अमीर खुसरो ने किया था। यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है और कान्हड़ा अंग से गाया-बजाया जाता है। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। इस राग के गायन-वादन में शुद्ध निषाद स्वर का अल्प प्रयोग और शुद्ध धैवत स्वर का बार-बार प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग शाहाना कान्हड़ा के उदाहरण के लिए हमने उस्ताद शुजात खाँ के सितार वादन की प्रस्तुति का चयन किया है। शुजात खाँ अपने विश्वविख्यात सितार वादक पिता और गुरु उस्ताद विलायत खाँ की तरह वादन के दौरान गायन भी करते हैं। आज की इस प्रस्तुति में भी वादन के दौरान उस्ताद शुजात खाँ ने गायन भी प्रस्तुत किया है। गायकी अंग में प्रस्तुत राग शाहाना कान्हड़ा की इस रचना के बोल है- ‘उमड़ घुमड़ घन घिर आई कारी बदरिया...’।


राग शाहाना कान्हड़ा : गायकी अंग में सितार वादन : उस्ताद शुजात खाँ


‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की आज की कड़ी का समापन हम एक ऋतु प्रधान राग ‘बसन्त बहार’ से करेंगे। जैसा कि इस राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है, यह दो स्वतंत्र रागों बसन्त और बहार के मेल से बना है। पूर्वी थाट से लेने पर राग बसन्त का प्रभाव अधिक और काफी थाट से लेने पर बहार का प्रभाव प्रमुख हो जाता है। इस राग का वादी स्वर तार सप्तक का षडज तथा संवादी स्वर पंचम होता है। यह ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसका गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है, किन्तु अन्य समय में रात्रि के तीसरे प्रहर में इसका गायन-वादन रुचिकर प्रतीत होता है। इस राग के उदाहरण के लिए आज हमने एक कम प्रचलित वाद्य विचित्र वीणा का चयन किया है। इस वाद्य पर डॉ. लालमणि मिश्र प्रस्तुत कर रहे है, मनमोहक राग बसन्त बहार। आप इस प्रस्तुति का आनन्द लीजिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बसन्त बहार : आलाप, जोड़, मध्य तथा द्रुत तीनताल की रचनाएँ : डॉ. लालमणि मिश्र 



आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ की 109वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 111वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से राग बिहाग पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बिहाग और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, बैंगलुरु के पंकज मुकेश और मिनिसोटा (अमेरिका) से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग तो सही पहचाना किन्तु ताल की गलत पहचान की। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए आठवें प्रहर अर्थात रात्रि के अन्तिम प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। अगला अंक हमारी लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ का समापन अंक होगा। आप हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, February 23, 2013

सिने-पहेली में आज : ऋतु के अनुकूल गीतों को पहचानिए



प्रसारण तिथि – फरवरी 23, 2013
सिने-पहेली – 60 में आज 

ऋतु के अनुकूल गीतों को पहचानिए और सुलझाइये पहेलियाँ


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को आज कृष्णमोहन मिश्र का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, सुजॉय चटर्जी की व्यस्तता के कारण सिने-पहेली का यह अंक प्रस्तुत करने का दायित्व मुझ पर आ गया है। इन दिनों शीत ऋतु अपनी प्रभुता को समेटने लगा है और ग्रीष्म ऋतु आगमन की आहट देने लगा है। ऋतु परिवर्तन का यह काल बहुत सुहाना होता है। इसे ही बसन्त ॠतु कहा जाता है। इसी ऋतु को ऋतुराज के विशेषण से अलंकृत भी किया जाता है। आजकल परिवेश में मन्द-मन्द बयार, चारों ओर फूलों की छटा, पंछियों का कलरव व्याप्त है। आज की 'सिने-पहेली' को हमने ऐसे ही परिवेश को चित्रित करते कुछ गीतों से सुवासित करने का प्रयास किया है।

आज की पहेली : ऋतु प्रधान गीतों को पहचानिए

आज की पहेली में हम आपको निम्नलिखित दस फिल्मी गीतों के अंश सुनवाते हैं। प्रत्येक गीतांश के साथ क्रमशः गीत से सम्बन्धित प्रश्न पूछे गए हैं। आपको क्रमानुसार इन प्रश्नों के उत्तर देने हैं। आइए शुरू करते हैं गीतांश और उनसे सम्बन्धित प्रश्नों का सिलसिला।

प्रश्न 1- इस गीतांश को सुनिए और गीत को पहचान कर बताइए कि यह गीत किस अभिनेता / अभिनेत्री पर फिल्माया गया है?




प्रश्न 2- इसे सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस फिल्म से लिया गया है?




प्रश्न 3- इस गीत के अन्तराल संगीत (इंटरल्यूड) सुन कर गीत पहचानिए और गीतकार का नाम बताइए।




प्रश्न 4- इस गीत के संगीतकार को पहचानिए और उनका नाम बताइए।





प्रश्न 5- गीत का जितना हिस्सा आपको सुनवाया जा रहा है, केवल उतना हिस्सा किस राग पर आधारित है?





प्रश्न 6- इस आरम्भिक संगीत को सुन कर गीत पहचानिए और पूरे गीत में जिन दो तालों का प्रयोग हुआ है, उनके नाम लिखिए।





प्रश्न 7- यह एक फिल्मी गीत का आरम्भिक संगीत है। इसे सुन कर आपको फिल्म का नाम बूझना है।




प्रश्न 8- यह एक श्वेत-श्याम फिल्म के गीत का आरम्भिक संगीत अंश है, इसे सुन कर गीत का अनुमान लगाइए और संगीतकार का नाम बताइए।




प्रश्न 9- यह भी श्वेत-श्याम युग की एक फिल्म के बेहद लोकप्रिय गीत का अंश है, इसे सुन का आपको इस गीत के गायक कलाकारों के नाम बताने हैं।




प्रश्न 10- गीत के अंश को सुन कर आपने गायक कलाकार को तो पहचान लिया होगा। परन्तु हम आपसे गायक का नहीं बल्कि गीतकार का नाम पूछ रहे है। क्या आप वह नाम बताएँगे?




यदि आप इन पहेलियों को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के क्रमानुसार जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 60" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 28 फ़रवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

पिछली पहेली का हल



चित्र में दिये गए दस फूलों के नाम इस प्रकार है :-

गुलाब, रजनीगंधा, केतकी, बनफूल, कमल, गेंदा, जूही, चम्‍पा, सूरजमुखी, चमेली


गीत 1. आ लग जा गले दिलरुबा.....कहां रूठ के चली ओ गुलाब की कलि, तेरे कदमो मे दिल है मेरा......( फिल्‍म - दस लाख)  (शाब्दिक उल्लेख - गुलाब)

गीत 2. रजनीगंधा फूल तुम्‍हारे, महके यूं ही जीवन में......( फिल्‍म - रजनीगंधा )  (शाब्दिक उल्लेख - रजनीगंधा)

गीत 3. केतकी गुलाब जूही, चंपक बनफूले .....( फिल्‍म - बसन्‍त बहार)  (शाब्दिक उल्लेख - केतकी)

गीत 4. मैं जहां चला जाऊँ, बहार चली आऐ......महक जाए राहों की धूल, मैं बनफूल, बन का फूल ( फिल्‍म - बनफूल )  (शाब्दिक उल्लेख - बनफूल)

गीत 5. कमल के फूल जैसा, बदन तेरा चिकना चिकना.....( फिल्‍म - दो आंखें ) (शाब्दिक उल्लेख - कमल)

गीत 6. सैंया छेड देवे, ननद चुटकी लेवे, ससुराल गेंदा फूल......( फिल्‍म - दिल्‍ली-6)   (शाब्दिक उल्लेख - गेंदा)

गीत 7. जूही की कली मेरी लाडली, नाजों की पली मेरी लाडली......( फिल्‍म - दिल एक मंदिर)   (शाब्दिक उल्लेख - जूही)

गीत 8. चम्‍पा खिली डार, पलक झूले प्‍यार, मिलन ऋतु आई सजनियां.....( फिल्‍म - फैसला )  (शाब्दिक उल्लेख - चम्‍पा)
गीत 9. सूरजमुखी मुखडा तेरा, चमका दे तूं जीवन मेरा......( फिल्‍म - कलाकार )  (शाब्दिक उल्लेख - सूरजमुखी)

गीत 10. लेई लो चम्‍पा, चमेली, गुलाब लेई लो......( फिल्‍म - सोने के हाथ )  (शाब्दिक उल्लेख - चमेली)


पिछली पहेली का परिणाम

इस बार 'सिने पहेली' में कुल 6 प्रतियोगियों ने भाग लिया। सबसे पहले १००% सही जवाब भेज कर इस सप्ताह सरताज प्रतियोगी बने हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। बहुत बहुत बधाई आपको। आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के अब तक के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।




नये प्रतियोगियों का आह्वान 
नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता’
1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।


2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।


3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...




4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, February 21, 2013

'एक गीत सौ कहानियाँ' में आज : शमशाद बेगम का पहला गीत


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 36

एक गीत सौ कहानियाँ – 22

शमशाद बेगम की पहली हिन्दी फिल्म ‘खजांची’ का एक गीत : ‘सावन के नज़ारे हैं...’


आपके प्रिय स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर गत वर्ष 'एक गीत सौ कहानियाँ' नामक स्तम्भ आरम्भ किया था, जिसके अन्तर्गत हर अंक में वे किसी फिल्मी या गैर-फिल्मी गीत की विशेषताओं और लोकप्रियता पर चर्चा करते थे। यह स्तम्भ 20 अंकों के बाद मई 2012 में स्थगित कर दिया गया था। गत माह से हमने इस स्तम्भ का प्रकाशन ‘भारतीय सिनेमा के सौ साल’ श्रृंखला के अन्तर्गत पुनः शुरू किया है। आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ की 22वीं कड़ी में सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम की पहली हिन्दी ‘खजांची’ में गाये उनके पहले गीत "सावन के नज़ारे हैं…" की चर्चा। 


दोस्तों, आज ‘एक गीत सौ कहानियाँ’ का अंक समर्पित है फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की एक लाजवाब पार्श्वगायिका को। ये वो गायिका हैं दोस्तों जिनकी आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पाँचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओ.पी. नैयर ने इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मन्दिर में घंटियाँ बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है। प्रस्तुत है फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम पर केन्द्रित 'एक गीत सौ कहानियाँ' का आज का यह अंक। शमशाद बेगम के गाये गीतों की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज 6 दशक बाद भी उनके गाये हुए गीतों के रीमिक्स जारी हो रहे हैं। आइए इस अंक में उनके गाये पहले हिन्दी फिल्म ‘खजांची’ में उनके गाये गीत को सुनने के साथ-साथ उनके जीवन और करीयर से जुड़ी कुछ बातें भी जानें, और शमशाद जी के व्यक्तित्व को ज़रा करीब से जानने की कोशिश करें।

विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करती हुई शमशाद बेगम नें बरसों पहले अपनी दास्तान कुछ यूँ शुरु की थीं - "देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएँ। मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरु करूँ। आप मेरे गाने अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूँ। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूँ है कि मेरा जन्म लाहौर में 1919 में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी का भी नहीं था, मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी-कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे। मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसंद आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग् कम्पनी (jien-o-phone) के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। चौदह साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ, जो था- ‘हाथ जोड़ा लई पखियन्दा ओए कसम खुदा दी चन्दा... '। उस रेकार्ड कम्पनी ने फिर मेरे 100 रेकार्ड निकाले। 1937 में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहाँ मैंने पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। 1939 में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया 1940 की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत- ‘आ सजना...’ काफी हिट हुआ था। मेरी पहली हिन्दी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म 52 हफ़्तों से ज़्यादा चली...”। दोस्तों, शमशाद जी नें बहुत ही कम शब्दों में अपने शुरुआती दिनों का हाल बयान कर दिया। आइए अब हम आपको सुनवाते है, शमशाद जी की पहली हिंदी फ़िल्म 'ख़ज़ांची' से उनका गाया यह गीत। गीत के बोल हैं- ‘सावन के नज़ारे हैं...’। फिल्म में मास्टर गुलाम हैदर का संगीत है, और गीत लिखा है वली साहब नें। 1941 में बनी इस फ़िल्म को निर्देशित किया था मोती गिडवानी नें और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे, एम. इस्माइल, रमोला और नारंग। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।

फिल्म खजांची : ‘सावन के नज़ारे हैं...’ : गायिका शमशाद बेगम



आपको 'एक गीत सौ कहानियाँ' का यह अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया, अपने सुझाव और अपनी फरमाइश हमें radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। इस स्तम्भ के अगले अंक में हम किसी अन्य गीत और उससे जुड़ी कहानियों के साथ पुनः उपस्थित होंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र






यादें मूक फिल्मों की

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