गुरुवार, 31 जनवरी 2013

गायक मुकेश फिल्म ‘अनुराग’ में बने संगीतकार


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 34

स्मृतियों का झरोखा : ‘किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ...’



 
भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों का झरोखा’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का पाँचवाँ गुरुवार है और नए वर्ष की नई समय सारिणी के अनुसार माह का पाँचवाँ गुरुवार हमने आमंत्रित अतिथि लेखकों के लिए सुरक्षित कर रखा है। आज ‘स्मृतियों का झरोखा’ का यह अंक आपके लिए पार्श्वगायक मुकेश के परम भक्त और हमारे नियमित पाठक पंकज मुकेश लिखा है। पंकज जी ने गायक मुकेश के व्यक्तित्व और कृतित्व पर गहन शोध किया है। अपने शुरुआती दौर में मुकेश ने फिल्मों में पार्श्वगायन से अधिक प्रयत्न अभिनेता बनने के लिए किये थे, इस तथ्य से अधिकतर सिनेमा-प्रेमी परिचित हैं। परन्तु इस तथ्य से शायद आप परिचित न हों कि मुकेश, 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनुराग’ के निर्माता, अभिनेता और गायक ही नहीं संगीतकार भी थे। आज के ‘स्मृतियों का झरोखा’ में पंकज जी ने मुकेश के कृतित्व के इन्हीं पक्षों, विशेष रूप से उनकी संगीतकार-प्रतिभा को रेखांकित किया है।


भारतीय सिनेमा अपने शताब्दी वर्ष की पूर्णता की ओर अग्रसर है। इस अवसर पर हम सिनेमा से जुड़े कुछ भूले-बिसरे तथ्यों, घटनाओं, कृतियों और लोगों का स्मरण कर रहे हैं। आज हम आपसे सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मुकेश (मुकेशचन्द्र माथुर) के व्यक्तित्व के कुछ अन्य पक्षों पर चर्चा करेंगे। गायक मुकेश को दुनिया "दर्द भरे गीतों के सरताज गायक" की उपाधि से जानती है, मगर सच तो यह है कि वो केवल गायक ही नहीं बल्कि अभिनेता, निर्माता और संगीतकार भी थे। सर्वप्रथम वो परदे पर नज़र आये अपनी पहली फिल्म "निर्दोष"(1941) में नलिनी जयवन्त के साथ एक गायक और अभिनेता के रूप में। यह मुकेश जी का सौभाग्य था की उनको भी अपने आराध्य कुन्दनलाल सहगल की तरह उस दौर में गायक-अभिनेता बनने का मौका मिल गया और साथ ही उनको अपनी ज़िन्दगी का पहला एकल गीत- ‘दिल ही बुझा हुआ हो तो...’ और पहला अप्रदर्शित युगलगीत नलिनी जयवन्त के साथ गाया- ‘तुम्ही ने मुझको प्रेम सिखाया...’ और पहला प्रदर्शित युगल गीत- ‘मैं हूँ परी, बन की परी...’ गाने और अभिनीत करने का अवसर मिला। दरअसल मुकेश जब अक्टूबर 1939 में बम्बई (अब मुम्बई) आए थे तब उनका ध्येय गायक नहीं बल्कि अभिनेता बनना था। सहगल जी को सुन-सुन कर वे अच्छा गाने भी लगे थे। उनकी अभिनीत कुछ फिल्में हैं- ‘निर्दोष’ (1941), ‘दुःख-सुख’ (1942), ‘आदाब अर्ज़’ (1943), ‘माशूका’ (1953), ‘अनुराग’ (1956) और ‘आह’ (1953)। इन फिल्मों में से फिल्म ‘आह’ में उन्होने मेहमान कलाकार के रूप में गाड़ीवान की भूमिका में अभिनय किया था और गीत- "छोटी सी ये ज़िंदगानी...” का गायन भी किया था।

1956 में मुकेश ने ‘मुकेश फिल्म्स’ के बैनर तले अपनी एक फिल्म ‘अनुराग’ का निर्माण किया था। यह निर्माता के रूप में मुकेश की पहली फिल्म नहीं थी। इससे पहले भी वे निर्माता बन चुके थे। यह फिल्म इसलिए उल्लेखनीय मानी जाएगी कि इस फिल्म में मुकेश पहली बार संगीतकार बने। इससे पहले कि हम आपसे इस फिल्म के बारे में विस्तार से चर्चा करें, आपको फिल्म ‘अनुराग’ से मुकेश का संगीतबद्ध किया और गाया गीत- ‘किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ...’ सुनवाते हैं। इस गीत को कैफ इरफानी ने लिखा है।

फिल्म ‘अनुराग’ : ‘किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ...’ : स्वर और संगीत - मुकेश




फिल्म ‘अनुराग’ मुकेश द्वारा निर्मित पहली फिल्म नहीं थी। इससे पहले 1951 में उन्होने ‘डार्लिंग फिल्म’ के बैनर तले फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण किया था। परन्तु इस फिल्म के संगीतकार मुकेश स्वयं नहीं बल्कि उनके अभिन्न मित्र रोशन थे। मुकेश जी की गायन प्रतिभा तो अद्वितीय थी ही, अवसर मिलने पर उन्होने अपनी अभिनय और संगीत संयोजन की क्षमता को भी प्रदर्शित किया। फिल्म ‘अनुराग’ उनकी संगीत रचना की प्रतिभा को रेखांकित करने का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह फिल्म प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी, जिसे निर्देशित किया था मधुसूदन नें। इस फिल्म के अन्य कलाकार थे- मृदुला, उषाकिरण, प्रतिमा, शिवराज, उमादेवी (टुनटुन) आदि। इसके गीत एच.एम.वी. रिकार्ड पर जारी हुए थे। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘अनुराग’ का दूसरा बेहद लोकप्रिय गीत ‘तेरे बिन सूना सूना लागे इस दुनिया का मेला...’ सुनवाते हैं, जिसे मुकेश के संगीत निर्देशन में उनकी मुहबोली बहन लता मंगेशकर ने स्वर दिया था।

फिल्म ‘अनुराग’ : ‘तेरे बिन सूना सूना लागे...’ : स्वर – लता मंगेशकर : संगीत – मुकेश




फिल्म ‘अनुराग’ से पहले मुकेश एक पार्श्वगायक के रूप में सफल हो चुके थे। इसके साथ ही अभिनय के गुरों से भी परिचित हो चुके थे। ‘अनुराग’ से पहले भी वो करीब चार फिल्मों में अभिनय-गायन कर चुके थे, यद्यपि ये फिल्में बहुत ज्यादा कमाल नहीं दिखा सकीं। ये कहना अधिक उपयुक्त होगा कि कुछ मिला-जुला असर रहा, मगर इन सभी फिल्मों में अभिनय तथा उनके अन्य गीतों ने उन्हें खूब शोहरत दी। 1950 तक उनका फ़िल्मी सफ़र अपने शबाब पर था, दुनिया की नज़रों में उन्होंने खुद को एक सफल गायक के रूप स्थापित कर लिया था । गायकी में उनकी कामयाबी फिल्म ‘पहली नज़र’ (1945) से शुरू हुई, फिर ‘चेहरा’, ‘राजपूतानी’ (1946), ‘दो दिल’, ‘नीलकमल’, ‘तोहफा’ (1947), ‘आग’, ‘अनोखा प्यार’, ‘अनोखी अदा’, ‘मेला’, ‘वीणा’, ‘विद्या’ (1948), ‘अंदाज़’, ‘बरसात’, ‘शबनम’, ‘सुनहरे दिन’ (1950), तक रुकी नहीं। इस दौर में महान गायक मोहम्मद रफ़ी के साथ किशोर कुमार का भी आगमन हो चुका था, मगर शीर्ष पर नाम मुकेश का रहता। फिर क्या था, 1950 तक की कामयाबी ने उन्हें हर तरह के नए फैसले और प्रयोग करने की जैसे छूट भी दे दी थी। उस दौर में वो अपने अन्दर छुपी हर तरह की प्रतिभा को सामने लाने की कोशिश करते थे। गायकी की सफलता ने जैसे उनमें एक जुनून सा भर दिया जो उनके आन्तरिक बहुमुखी प्रतिभा को परदे पर लाने के लिए मजबूर कर देता था। अपने ख़ास दोस्त राज कपूर के कला, अभिनय या फिर फिल्म-निर्माण को देख कर शायद उनका भी मन करता होगा कि वो भी राज जैसा कुछ करें। कामयाबी का उत्साह इतना उफान पर था कि जब उन्हें फिल्म ‘माशूका’ (1953) का अनुबन्ध मिला तो फ़ौरन हस्ताक्षर कर दिया, जिसमें लिखे वाक्य "जब तक फिल्म ‘माशूका’ पूरी नहीं हो जाती वो किसी दूसरे निर्माता के फिल्म में गाना भी नहीं गायेंगे" को पढ़ना ही जैसे भूल गए। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर हम आपको फिल्म ‘अनुराग’ का एक और गीत ‘पल भर ही की पहचान में परदेसी सनम से...’ सुनवाते हैं, जिसे लिखा गीतकार इन्दीवर ने।

फिल्म ‘अनुराग’ : ‘पल भर ही की पहचान में...’ : स्वर और संगीत – मुकेश




अति उत्साह में हस्ताक्षरित फिल्म ‘माशूका’ के अनुबन्ध के कारण मुकेश के फ़िल्मी सफ़र में बहुत बड़ा व्यवधान उत्पन्न हुआ। यहाँ तक की राज कपूर के लिए वो फिल्म ‘चोरी-चोरी’ और ‘श्री 420’ के गाने नहीं गा सके। 50 के दशक में ‘बावरे-नैन’, ‘आवारा’, ‘बादल’, ‘मल्हार’, आदि फिल्मों के सफल गीतों के बावजूद मुकेश, रफ़ी साहब से पीछे हो गए, जिनको कि 60 के दशक में किशोर कुमार ने पीछे छोड़ दिया। फिल्म ‘माशूका’ के गाने और अभिनय में कुल 3 साल लग गए। उसी दौरान वो फिल्म-निर्माण का निर्णय लेकर खाली समय में फिल्म ‘अनुराग’ के निर्माण की योजना बनानी शुरू की। चूँकि यह मुकेश की अपनी निर्माण संस्था ‘मुकेश फिल्म्स’ की फिल्म थी इसलिए वो कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक स्वतंत्र थे। अब हम आपको फिल्म ‘अनुराग’ का वह गीत सुनवाते हैं, जिसमें लता जी के स्वर की मधुरिमा है। गीत के बोल हैं- ‘नज़र मिला कर नज़र चुराना...’ और इसके गीतकार हैं कैफ इरफानी।



फिल्म ‘अनुराग’ : ‘नज़र मिला कर नज़र चुराना...’ : स्वर – लता मंगेशकर : संगीत – मुकेश




फिल्म ‘माशूका’ 1953 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में मुकेश को अभिनय के लिहाज़ से कोई खास सफलता भी नहीं मिली, फिर भी गायकी की तुलना में उन्होने अभिनय को अभी तक सीने से लगाये रखा। निर्माता बनने का प्रयास उन्होंने ‘अनुराग’ से 2 साल पहले ही किया था जब वो फिल्म ‘मल्हार’ का निर्माण कर चुके थे। इस फिल्म के गाने बहुत ही लोकप्रिय हुए थे। ‘बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम...’ मुकेश और लता के आवाज़ से सजा ये गाना ‘मल्हार’ को हिट साबित करने में सहायक था। मुकेश हमेशा नए कलाकारों को मौका देने के पक्ष में रहते थे, इसीलिए ‘मल्हार’ में वो केवल गायक और निर्माता बने रहे। अभिनय के लिए चुना गया नए कलाकार अर्जुन और शम्मी को। मल्हार की सफलता ने उन्हें एक बार फिर से आगे फिल्मों में पैसा लगाने का फैसला लेने पर बाध्य कर दिया, और फिल्म ‘अनुराग’ के लगभग हर क्षेत्र का जिम्मा अपने सर ले लिया। फिर चाहे अभिनय हो, गायन हो, निर्माण हो या फिर संगीत का ही दायित्व क्यों न हो? दूसरे शब्दों में ‘अनुराग’ पूरी तरह से मुकेश पर आधारित फिल्म थी। ठीक इसी तरह संगीतकार बनने का फैसला उनका पहला नहीं था, ‘अनुराग’ से पहले भी उन्होंने कुछ गैर-फ़िल्मी गीत, नज़्म, गज़ल आदि स्वरबद्ध कर चुके थे, जैसे- ‘जियेंगे मगर मुस्कुरा न सकेंगे...’ (1952- कैफ इरफानी), ‘दो जुल्मी नैना हम पे जुलम करे...’ (कैफ इरफानी) इत्यादि। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होने कैफ इरफानी को गीतकार के रूप में इन्दीवर के साथ ‘अनुराग’ में लिया। एक बार उन्होंने विविध भारती के अपने एक साक्षात्कार में कहा था- "हर एक गायक अपने में एक संगीतकार होता हैं। मगर एक संगीतकार जब गायक भी होता हैं तो उसके काम का महत्व बढ़ जाता है।" उदाहरण के लिए उन्होंने सचिनदेव बर्मन, सी रामचन्द्र आदि संगीतकारों का नाम लिया। अब आइये आपको सुनवाते हैं, इसी फिल्म का एक और गीत जिसे एक बार फिर आवाज़ दी है लता जी ने। गीत है- ‘जिसने प्यार किया उसका दुश्मन ज़माना...’ और इसे लिखा कैफ इरफानी ने।


फिल्म ‘अनुराग’ : ‘जिसने प्यार किया...’ : स्वर – लता मंगेशकर : संगीत – मुकेश




फिल्म ‘अनुराग’ को सेंसर सर्टिफिकेट 15 जून, 1956 कोमिला था। इस फिल्म में मुकेश ने कुल 9 गीतों को अपनी धुनों में पिरोया था और केवल दो गीतों में अपनी आवाज़ दी। चूँकि फिल्म प्रेम त्रिकोण पर आधारित थी और नायिकाएँ दो थी इसलिए महिला स्वर (लता जी का) का वर्चस्व था। फिल्म के अन्य गीत थे- ‘मन चल मन चंचल...’ (इन्दीवर), शमशाद बेगम और मधुबाला झावेरी का गाया ‘आज हम तुम्हे सुनाने वाले हैं...’ (इन्दीवर), मन्ना डे की आवाज़ में ‘हो सका दो दिलों का ना मेल रे...’ (इन्दीवर) तथा इन्दीवर का ही लिखा गीत ‘ये कैसी उलझन है...’। कुल मिला कर मुकेश का फिल्म ‘अनुराग’ बनाने का अनुभव बड़ा अच्छा रहा। बिना किसी परेशानी के फिल्म पूरी हुई। रिलीज़ भी हुई मगर बॉक्स आफ़िस पर एक असफल फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के बाद मुकेश ने अभिनय, संगीत निर्देशन, निर्माण आदि से तौबा कर लिया और आजीवन केवल गायन पर पूरा ध्यान देने का फैसला कर लिया।


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत आज हमने अपने अतिथि लेखक पंकज मुकेश का खोजपूर्ण आलेख प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों का झरोखा’ के आगामी अंक में आपके लिए फिल्म-इतिहास के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। आप अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर भेजें।


शोध व आलेख : पंकज मुकेश 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   




मंगलवार, 29 जनवरी 2013

बोलती कहानियाँ: अपनों ने लूटा - डा. अमर कुमार

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको प्रसिद्ध कहानियाँ सुनवाते रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने पंडित बदरीनाथ भट्ट "सुदर्शन" की कहानी "परिवर्तन" का पॉडकास्ट अनुराग शर्मा की आवाज़ में सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं डा. अमर कुमार की लघुकथा "अपनों ने लूटा", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। लघु कहानी "अपनों ने लूटा" का गद्य (टेक्स्ट) डा० अमर के पन्नों पर पढ़ा जा सकता है।

कहानी "अपनों ने लूटा" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 55 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


जन्म मिथिला में, बचपन वैशाली में, प्रारंभिक शिक्षा कोसी क्षेत्र से, माध्यमिक शिक्षा एवँ जीवन से मुठभेड़ का प्रारंभ बैसवारा (रायबरेली) से, चिकित्सा स्नातक कानपुर मेडिकल कॉलेज़। सँप्रति निज चिकित्सा व्यवसाय व शौकिया लेखन रायबरेली में ही! चिकित्सक, ब्लॉगर, व्यंग्यकार, देशभक्त, डॉ अमर कुमार एक संवेदनशील व्यक्ति थे जोकि अपने प्रशंसकों के दिल में सदैव जीवित रहेंगे।  ~ अनुराग शर्मा

डॉक्टर की फ़ीस बहुत मंहगी होती है साहब जी ! हमारी बीमारी तो पंसारी के पुडिये वाली दवाईयों से ही ठीक हो जाती है।
(डा. अमर कुमार की कहानी "अपनों ने लूटा" से एक अंश)





अपने को डिस्कवर करने की मशक्कत में हूँ, बड़ा दुरूह है अभी कुछ बताना। एक उनींदे शहर के चिकित्सक को आकाश का जितना टुकड़ा दिखता है, उसीके कुछ शेड तलब ही मौज़ूद होने का सबब है। साहित्य मेरा व्यसन है और संवेदनायें मेरी पूँजी!
~ डॉ. अमर कुमार


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#Fourth Story, Apnon Ne Loota: Dr. Amar Kumar/Hindi Audio Book/2013/4. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 28 जनवरी 2013

प्रीतम के संगीत की रेस रेडिओ प्लेबैक इंडिया पर

प्लेबैक वाणी -31 -संगीत समीक्षा - रेस - 2  



रेस का पहला संस्करण २००८ में प्रदर्शित हुआ था, जिसे दर्शकों ने हाथों हाथ लिया. करीब ४ साल बाद अब्बास मस्तान लाये हैं इसका नया संस्करण जिसमें एक बार फिर संगीत है प्रीतम दादा का. रेस का संगीत भी फिल्म की रफ़्तार के मुताबिक तेज धुन पर थिरकाने वाला था, जहाँ शीर्षक गीत के अलावा ख्वाब देखे और जरा जरा जैसे मादक गीत भी खासे लोकप्रिय साबित हुए थे. ऐसे में रेस २ से भी यही उम्मीद रखी जायेगी कि इसका संगीत भी क़दमों को थिरकने पर मजबूर करने वाला होगा.
एल्बम की शुरुआत ही काफी धमाकेदार है जहाँ गीत का शीर्षक ही पार्टी ऑन माई माईन्ड हो वहाँ रिदम का तूफानी होना लाजमी है. गीत धीमे धीमे जोश में चढ़ता है.शेफाली अल्विरास की मादक आवाज़ में आगाज़ अच्छा होता है जिसे के के की जोशीली आवाज़ का साथ मिलता है जल्दी ही. ताज़ा चलन के अनुरूप यो यो हनी सिंह का रैप भी है तडके के लिए. डिस्को नाईट्स और पार्टियों के लिए एक परफेक्ट गीत है ये.
आतिफ असलम और सुनिधि चौहान की आवाज़ में अगला गीत बे इन्तेहाँ एक रूमानी गीत है. मयूर पुरी ने कैच शब्द के आस पास सारा ताना बाना बुना है पर शब्द अपेक्षित असर नहीं कर पाते. हालाँकि गायकों ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में गीत को सँभालने की भरपूर कोशिश की है. प्रीतम कुछ नया करते हुए प्रतीत नहीं होते.
लत लग गयी एक बार फिर नाचने को मजबूर करने वाला गीत है. रिदम काफी तेज है और यहाँ शब्द संगीत का तालमेल भी बढ़िया मुझे तो तेरी लत लग गयी, जमाना कहे लत ये गलत लग गयी..... बेनी दयाल की आवाज़ में काफी संभावना है और शामली खोलगडे की आवाज़ का नशा दिन बा दिन बढ़ता सा महसूस हो रहा है. इन दो युवा आवाजों में ये गीत एल्बम का सबसे बहतरीन गीत साबित होता है.
शीर्षक गीत वही है जो पहले था, यानी अल्लाह दुहाई है मगर कुछ गायकों की टीम में नयापन है और इसके ढांचे में प्रीतम ने कुछ बदलाव कर इसे और भी कातिलाना बना दिया है. आतिफ की आवाज़ इस असर को और बढ़ा देती है, साथ में विशाल ददलानी और अनुष्का भी पूरे फॉर्म में सुनाई दिए हैं.      
कुल मिलाकर रेस २ का संगीत अपनी अपेक्षाओं पर तो खरा उतरता है मगर कुछ नया लेकर नहीं आता. रेडियो प्लेबैक डे रहा है इसे ३.३ की रेटिंग.                   

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रविवार, 27 जनवरी 2013

दिन के चौथे प्रहर के कुछ आकर्षक राग

स्वरगोष्ठी – 106 में आज

राग और प्रहर – 4

गोधूली बेला के श्रम-परिहार करते राग


‘स्वरगोष्ठी’ के 106ठें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इन दिनों आपके प्रिय स्तम्भ पर लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। पिछले अंक में हमने दिन के तीसरे प्रहर के रागों की चर्चा की थी। आज बारी है, चौथे प्रहर के रागों की। इस प्रहर में सूर्य अस्ताचलगामी होता है। इस प्रहर के उत्तरार्द्ध काल को गोधूली बेला भी कहा जाता है। चूँकि इस समय गायों का झुण्ड चारागाहों से वापस लौटता है और उनके चलने से धूल का एक गुबार उठता है, इसीलिए इसे गोधूली बेला कहा जाता है। इस प्रहर के रागों में ऐसी स्वर-संगतियाँ होती हैं, जिनसे दिन भर के श्रम से तन और मन को शान्ति मिलती है। आज के अंक में हम इस प्रहर के हेमन्त, पटदीप, मारवा और गौड़ सारंग रागों की चर्चा करेंगे। 


दिन का चौथा प्रहर, अपराह्न तीन बजे से लेकर सूर्यास्त होने के बीच की अवधि को माना जाता है। यह वह समय होता है, जब जन-जीवन अपने दैनिक शारीरिक और मानसिक क्रियाओं से थका-हारा होता है तथा उसे थोड़ी विश्रान्ति की तलाश होती है। ऐसे में दिन के चौथे प्रहर के राग उसे राहत देते हैं। चौथे प्रहर में प्रयोग किये जाने वाले रागों में राग ‘गौड़ सारंग’ एक ऐसा राग है जिसे तीसरे प्रहर में भी गाया-बजाया जाता है। सारंग अंग से संचालित होने वाले इस राग को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह और अवरोह दोनों में वक्र गति से स्वर लगाए जाते हैं। राग में दोनों मध्यम का और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। आलाप में पंचम, ऋषभ, षडज और निषाद, ऋषभ, षडज का आवर्तन किया जाता है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत अथवा निषाद होता है।

आज हम आपको राग ‘गौड़ सारंग’ पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 में फिल्म 'हमदर्द' के लिए एक गीत 'रागमाला' में तैयार किया था। ‘रगमाला’ संगीत का वह प्रकार होता है, जब किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। अनिल विश्वास ने गीत के चार अन्तरों को चार अलग-अलग रागों में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों का चलन यह था कि ऐसे गीतों को गाने के लिए फिल्म जगत के बाहर के विशेषज्ञों को बुलाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने इस युगलगीत में पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे का और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर का चयन किया। फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत के बोल हैं- ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए...’। गीत की स्थायी की पंक्ति से लेकर अन्तरे के समापन तक राग 'गौड़ सारंग' के स्वरों में पिरोया गया है। गीत के शेष तीन अन्तरे अलग-अलग रागों में निबद्ध हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण ने संगति की थी। आज हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म के इस 'रागमाला' गीत का पहला अन्तरा सुनते हैं।


राग ‘गौड़ सारंग’ : फिल्म ‘हमदर्द’ : ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर



दिन के चौथे प्रहर का एक बेहद प्रचलित राग ‘पटदीप’ है। इसे राग ‘पटदीपिका’ भी कहते हैं। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला राग पटदीप औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं होता। गान्धार कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। आज के अंक में हम आपको राग पटदीप में निबद्ध श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक खयाल रचना सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ। राग पटदीप के इस खयाल के बोल हैं- ‘रंग रँगीला बनरा मोरा हमरी बात न माने...’ और यह द्रुत एकताल में निबद्ध है। तबला संगति पण्डित विश्वनाथ शिरोड़कर ने की है।


राग ‘पटदीप’ : ‘रंग रँगीला बनरा मोरा...’ : उस्ताद राशिद खाँ




चौथे प्रहर के रागों में ‘हेमन्त’ भी एक बेहद मधुर राग है। इसे राग ‘हेम’ भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने इस राग का सृजन किया था। परन्तु फिल्म संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी के मतानुसार तानसेन इस राग के सर्जक थे और उन्होने इस राग की एक प्राचीन ध्रुवपद बन्दिश- ‘सुध बिसर गई आज अपने गुनन की...’ की रचना की थी। श्री त्रिपाठी ने इस ध्रुवपद रचना को 1962 की अपनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी इस्तेमाल किया था। ‘हेमन्त’ औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार धैवत स्वर का प्रयोग नहीं होता। इसमें ऋषभ, गान्धार धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी पंचम होता है। यह ऋतु प्रधान राग भी है। हेमन्त ऋतु में यह किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है, किन्तु अन्य परिवेश में इसे सूर्यास्त से पहले गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग में उप-शास्त्रीय और सुगम संगीत की रचनाएँ खूब निखरती है। आज हम आपको राग ‘हेमन्त’ की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘याद पिया की आए...’ सुनवाते हैं। इसे सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने बड़े भावपूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।

राग ‘हेमन्त’ : ठुमरी- ‘याद पिया की आए...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ



लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ की आज की कड़ी में हम चौथे प्रहर के रागों की चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर में में गाये-बजाये जाने वाले रागों में ‘मारवा’ एक अत्यन्त भावपूर्ण राग है। यह मारवा थाट का आश्रय राग है, जिसकी जाति षाड़व-षाड़व है। इसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। कोमल ऋषभ और तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। पूर्वांग प्रधान इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग मारवा में प्रयोग किये जाने वाले स्वर राग पूरिया और सोहनी में भी होते हैं। परन्तु राग पूरिया का चलन सप्तक के पूर्वांग में और सोहनी का चलन सप्तक के उत्तरांग में होता है, जबकि मारवा का चलन सप्तक के मध्य अंग में होता है। इसके अलावा मारवा में ऋषभ और धैवत स्वर बलवान होता है, जबकि पूरिया में निषाद और गान्धार स्वर बली होते हैं। राग मारवा के स्वरों में गोधूली बेला के परिवेश को सार्थक बनाने की अद्भुत क्षमता होती है। अब हम आपको राग मारवा की एक मधुर रचना सितार पर सुनवाते हैं। वादक है, विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ। तबला संगति पण्डित अनिंदों चटर्जी ने की है। आप मधुर सितार-वादन का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग ‘मारवा’ : मध्य लय तीनताल का तराना : उस्ताद विलायत खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 106ठें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। 



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 - इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 104थे अंक में हमने आपको 1966 में बनी फिल्म ‘मेरा साया’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भीमपलासी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार मदनमोहन। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और हमारे एक नए पाठक मिनिसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। बैंगलुरु के पंकज मुकेश और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने एक-एक प्रश्न का ही सही जवाब दिया है। इन्हें एक-एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनो लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। आगामी अंक में हम आपके साथ रात्रि के पहले प्रहर अर्थात सूर्यास्त के बाद से लेकर रात्रि के नौ बजे के मध्य प्रस्तुत किये जाने वाले रागों पर चर्चा करेंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 26 जनवरी 2013

'सिने पहेली' में आज गणतंत्र दिवस विशेष

26 जनवरी, 2013
सिने-पहेली - 56  में आज 

सुलझाइये देशभक्ति गीतों की पहेलियाँ

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, जनवरी महीने का आख़िरी सप्ताह हम सभी भारतीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है। 23 जनवरी को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जनमदिवस, 26 जनवरी को प्रजातंत्र दिवस, और 30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का स्मृति दिवस जो शहीद दिवस के रूप में पालित होता है। रेडियो प्लेबैक इंडिया पर भी इसलिए यह सप्ताह देशभक्ति के रंग से सराबोर है। और आज की 'सिने पहेली' में भी हमने चढ़ाया है देशभक्ति का रंग। कितनी जानकारी रखते हैं आप फ़िल्मी देशभक्ति गीतों की, इसी की आज परीक्षा है आपकी। देखते हैं आप सुलझा पाते हैं या नहीं इन देशभक्ति गीतों की पहेलियों को!



आज की पहेली : वतन के तराने



ज 26 जनवरी 2013 है, आज समूचा राष्ट्र मना रहा है अपना 64-वाँ गणतंत्र दिवस है। गर्व और उल्लास भरे आपके इस दिन को और भी ख़ास बनाने के लिए हम लेकर आए हैं कुछ ऐसी पहेलियाँ जिनमें छुपी हुई हैं फ़िल्मी देशभक्ति गीत। नीचे दिए गए सवालों को ध्यान से पढ़िये, चित्रों पर ग़ौर कीजिए और पहचानिए इन गीतों को।

1. नीचे दिया हुआ चित्र इस गीत के फ़िल्म के पोस्टर का एक हिस्सा है। इस फ़िल्म में एक ऐसा देशभक्ति गीत है जिसमें पुरुष स्वर एक ऐसे गायक का है जिनके पिता एक महान पार्श्वगायक रहे हैं। इस गीत में जो महिला स्वर है उन्होंने टी-सीरीज़ म्युज़िक कंपनी के साथ अनुबंधित रह कर एक से एक लाजवाब गीत हमें दिए हैं 80 और 90 के दशकों में। क्या आप बता सकते हैं कि हम किस देशभक्ति गीत की तरफ़ इशारा कर रहे हैं और फ़िल्म का नाम क्या है? (1+1=2 अंक)




2. इन दो दृश्यों को देख कर बताइए कि यह कौन सा देशभक्ति गीत है और इस गीत में अभिनेत्री कौन हैं? (1+1=2 अंक)




3. नीचे दो दृश्य दिखाये गए हैं और दोनों में दिखाए गए चरित्र क्रैच की मदद से खड़े हैं। क्या आप इन दो गीतों को पहचान सकते हैं? (2+2=4 अंक)





4. नीचे एक बहुत ही मशहूर देशभक्ति गीत के दो दृश्य दिखाए गए हैं। बताइए इस गीत के गीतकार का नाम। (2 अंक)






जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 56" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 31 जनवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल

1. आशा भोसले के गाये इस गीत में "फ़िल्मी गीत" है तो उन्हीं के गाये एक अन्य गीत में "फ़िल्म का गाना" है। किन दो गीतों की तरफ़ हमारा इशारा है?

सही जवाब: फ़िल्म 'आन मिलो सजना' के गीत "पलट मेरी जान" के एक अंतरे में पंक्ति है "सोचा था ये मैंने मुझसे नैन वो लड़ायेगा, सीटी वो बजाके कोई फ़िल्मी गीत गायेगा", तथा 'लव स्टोरी' फ़िल्म के गीत "ये लड़का ज़रा सा दीवा लगता है" के एक अंतरे में पंक्ति है "किसी नई फ़िल्म का गाना लगता है"।

2. रफ़ी साहब के गाये किस गीत में "फ़िल्मों के सितारे" शब्द आते हैं? इस गीत में राज कपूर भी नज़र आते हैं।

सही जवाब: "जॉन जानी जनार्दन तररम पम पम पम पम"

3. आप ने कई जगहों पर नोटिस लगा हुआ देखा होगा कि यह आम रस्ता नहीं है। बताइये कि आनन्द बक्शी साहब ने किस गीत में इस चीज़ का इस्तमाल किया है?

सही जवाब: "देखो मैंने देखा है ये एक सपना" (लव स्टोरी) गीत में पंक्ति है "रस्ता नहीं यह आम लिखा है"।

4. कल (18 जनवरी) को जिस महान कलाकार की पुण्यतिथि थी, उनकी किसी फ़िल्म में गाई हुई एक ठुमरी को आगे चलकर एक अन्य फ़िल्म में भी शामिल की गई जिसे दो ग़ज़ल गायकों ने गाया। इन दोनों फ़िल्मों के नाम बताइये?

सही जवाब: 'स्ट्रीट सिंगर' व 'आविष्कार'

पिछली पहेली का परिणाम

लगता है इस बार 'सिने पहेली' में पूछे गए सवाल थोड़े से मुश्किल थे, जिस वजह से इस बार केवल 5 प्रतियोगियों ने ही भाग लिया। सबसे पहला जवाब भेजा लखनऊ के श्री चन्द्रकान्त दीक्षित ने, पर आप सभी सवालों के जवाब नहीं दे पाए, और न ही किसी अन्य प्रतियोगी ने 100% सही जवाब भेजे हैं। इसलिए इस सप्ताह कोई भी प्रतियोगी 'सरताज प्रतियोगी' नहीं बन पाए हैं। आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के अब तक के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।





नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?
1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार। 

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : ‘बॉम्बे टॉकीज़’, ‘क़िस्मत’ और अनिल विश्वास


भारतीय सिनेमा के सौ साल –33 
स्मृतियों का झरोखा  : गणतन्त्र दिवस पर विशेष

‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों का झरोखा’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज से प्रत्येक माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख किया करेंगे। आज के अंक में हम ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘क़िस्मत’ की निर्माण-प्रक्रिया और उसकी सफलता के बारे में कुछ विस्मृत यादों को ताजा कर रहे हैं।


बॉम्बे टॉकीज़’ की दूसरी फ़िल्म ‘क़िस्मत’ तो एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। अशोक कुमार और मुमताज़ शान्ति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस के पहले के सारे रेकॉर्ड्स तोड़ दिए। पूरे देश में कई जगहों पर जुबिलियाँ मनाने के अलावा कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार 196 हफ़्ते (तीन साल) तक नियमित रूप से चली। इस रेकॉर्ड को आगे चलकर रमेश सिप्पी की फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म थी क्योंकि इसमें बचपन में दो भाइयों के बिछड़ जाने और बाद में मिल जाने वाले फ़ॉरमूले को आज़माया गया था। फ़िल्म की सफलता ने इस विषय को काफ़ी लोकप्रिय बनाया और फ़िल्मकारों ने इस फ़ॉरमूले को बार-बार आज़माया।

‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सबसे कामयाब फ़िल्म थी। पार्श्वगायन की तकनीक अब विकसित हो चली थी और अनिल बिस्वास को अशोक कुमार के गायन में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए इस फ़िल्म में अरूण कुमार ने उनका शत-प्रतिशत पार्श्वगायन किया (इससे पहले अरूण कुमार एक-आध गीत ही गाया करते थे, जबकि बाक़ी गीत अशोक कुमार ख़ुद गाते थे)। मुमताज़ शान्ति की आवाज़ बनीं अमीरबाई कर्नाटकी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है...”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि में घी का काम किया। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए। एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती। इस देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। दो दिन बाद हम सब अपना राष्ट्रीय पर्व, गणतंत्र दिवस मनाएँगे। इस उपलक्ष्य में आइए सुनते है, यही चर्चित गीत। 

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘आज हिमालय की चोटी से...’ : अमीरबाई कर्नाटकी और साथी



अमीरबाई का गाया फ़िल्म का एक अन्य हिट गीत था “ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दीवाली है मेरे घर में अन्धेरा”। उन्हीं का गाया “अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया, भगवान किनारे पे लगा दे मेरी नैया...” भी फ़िल्म की एक लोकप्रिय रचना थी। केवल इन तीन गीतों से ही ‘क़िस्मत’ के गीत-संगीत की चर्चा समाप्त नहीं हो जाती। एक और गीत जिसने चारों तरफ़ लोकप्रियता के परचम लहरा दिए थे, वह थी कालजयी लोरी “धीरे-धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा...”। इस गीत के दो वर्ज़न थे – पहला अमीरबाई का गाया एकल गीत जबकि दूसरे में मुख्य आवाज़ अरूण कुमार की थी और अमीरबाई गीत ने आख़िर में अपनी आवाज़ मिलाई थी। कहते हैं कि इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर अरूण कुमार के बदले अशोक कुमार की ही आवाज़ थी और अनिल बिस्वास ने मज़ाक में कहा था कि शायद यही एक ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया है। जो भी है, हक़ीक़त यही है कि यह लोरी फ़िल्म-संगीत के इतिहास की एक सदाबहार लोरी है जिसकी चर्चा लोग आज भी करते हैं।

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘धीरे धीरे आ रे बादल...’ : अरुण कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी



‘क़िस्मत’ का शीर्षक गीत भी अमीरबाई और अरूण कुमार का गाया हुआ था, जिसके बोल थे “हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाय, ये जो एक दिन हँसाए, एक दिन रुलाए”। अरूण कुमार ने एकल आवाज़ में “तेरे दुख के दिन फिरेंगे, ले दुआ मेरी लिए जा...” गीत गाया था। इस फ़िल्म का एक और बेहद सुंदर और लोकप्रिय गीत रहा “पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...” जिसे पारुल घोष ने गाया था। यह गीत पारुल घोष का गाया सबसे लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। इस गीत का असर कैसा रहा होगा, इसका अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं कि लता मंगेशकर ने अपनी ‘श्रद्धांजलि’ एल्बम में पारुल घोष को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके इसी गीत को गाया था और पारुल घोष को याद करते हुए लता जी ने कहा था, “पारुल घोष, जानेमाने संगीतकार अनिल बिस्वास जी की बहन, और प्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की पत्नी थीं। फ़िल्म गायिका होने के बावजूद वो घर संसार सम्भालने वाली गृहणी भी थीं। उनके जाने के बाद महसूस हुआ कि वक़्त की गर्दिश ने हमसे कैस-कैसे फ़नकार छीन लिए।” जब मैंने पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से इस गीत के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया, “इस गीत के साथ तो न जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। जब मैं बहुत छोटी थी, तब सब से पहला पहला गीत जो मैंने सीखा था, वह यही गीत था। और जब भी कोई मुझे गीत गाने को कहता, मैं यही गीत गाती रहती। और आज तक यह मेरा पसंदीदा गीत रहा है”

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...’ : पारुल घोष



हिमांशु राय की मृत्यु के बाद से ही ‘बॉम्बे टॉकीज़’ विवादों और परेशानियों से घिर गया था। सरस्वती देवी, जिन्हें हिमांशु राय की वजह से वहाँ जगह मिली थी, के लिए भी वहाँ काम करना मुश्किल हो गया। उपर से रामचन्द्र पाल, पन्नालाल घोष और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकार वहाँ शामिल हो चुके थे। ऐसे में सरस्वती ने वहाँ से इस्तीफ़ा देना ही बेहतर समझा। उनकी प्रतिष्ठा और उनका अनुभव इतना था कि ‘मिनर्वा मूवीटोन’ के सोहराब मोदी ने उन्हें अपनी कम्पनी में काम करने के लिए आमन्त्रित किया। इस तरह से ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की कुल 20 फ़िल्मों में संगीत देने के बाद सरस्वती देवी इस कम्पनी से अलग हो गईं और आने वाले वर्षों में ‘मिनर्वा मूवीटोन’ की कुछ 6 फ़िल्मों में संगीत दिया।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों का झरोखा’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।  

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

बुधवार, 23 जनवरी 2013

राग छायानट - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग छायानट 
एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ


स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र
स्वर एवं संयोजन - संज्ञा टंडन 

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

बोलती कहानियाँ: पंडित सुदर्शन की लघुकथा परिवर्तन

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको प्रसिद्ध कहानियाँ सुनवाते रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने हरिशंकर परसाई की कहानी "ठिठुरता हुआ गणतंत्र" का पॉडकास्ट अर्चना चावजी की आवाज़ में सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं पंडित सुदर्शन की लघुकथा "परिवर्तन", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। लघु कहानी "परिवर्तन" का गद्य (टेक्स्ट) हिन्दी समय पर पढ़ा जा सकता है।

कहानी का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 29 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


हिन्दी साहित्य में "हार की जीत" जैसी प्रसिद्धि बहुत कम कहानियों को मिली है। जब मैंने जम्मू में पांचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में पहली बार "हार का जीत" पढी थी, तब से ही इसके लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता थी। दुःख की बात है कि "हार की जीत" जैसी कालजयी रचना के लेखक के बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को है। गुलज़ार और अमृता प्रीतम पर आपको अंतरजाल पर बहुत कुछ मिल जाएगा मगर यदि आप पंडित सुदर्शन की जन्मतिथि, जन्मस्थान या कर्मभूमि के बारे में ढूँढने निकलें तो निराशा ही होगी। पंडित सुदर्शन के नाम से प्रसिद्ध साहित्यकार का वास्तविक नाम पंडित बदरीनाथ भट्ट था। उनका जन्म 1896 में स्यालकोट पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह पंडित सुदर्शन भी हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे हैं। उनकी गणना प्रेमचंद संस्थान के लेखकों में विश्वम्भरनाथ कौशिक, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि के साथ की जाती है। उन्हें गद्य और पद्य दोनों ही में महारत थी। मुख्य धारा के साहित्य-सृजन के अतिरिक्त उन्होंने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे हैं. सोहराब मोदी की सिकंदर (१९४१) सहित अनेक फिल्मों की सफलता का श्री उनके पटकथा लेखन को जाता है। सन १९३५ में उन्होंने "कुंवारी या विधवा" फिल्म का निर्देशन भी किया। इस फिल्म के देशभक्ति-भाव से ओत-प्रोत गीत "भारत की दीन दशा का तुम्हें भारतवालों, कुछ ध्यान नहीं ..." ने पराधीन भारत के फिल्म-दर्शकों के मन में देशप्रेम का एक ज्वार सा उत्पन्न किया। उनकी रचनाओं में तीर्थ-यात्रा, पत्थरों का सौदागर, पृथ्वी-वल्लभ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। फिल्म धूप-छाँव (१९३५) के प्रसिद्ध गीत तेरी गठरी में लागा चोर, बाबा मन की आँखें खोल आदि उन्ही के लिखे हुए हैं। इसी फ़िल्म में उनका लिखा और पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति का गाया गीत “मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न पाऊँ...” सही अर्थ में भारतीय सिनेमा का पहला प्लेबैक गीत था। वे १९५० में बने फिल्म लेखक संघ के प्रथम उपाध्यक्ष थे। ~ अनुराग शर्मा



उसके सिर के, दाढ़ी के और मूँछों के बाल सफेद हो चुके थे और आँखों में यौवन की चमक के स्‍थान पर बुढ़ापे की उदासीनता थी।
(पंडित सुदर्शन की कहानी "परिवर्तन" से एक अंश)



रेडियो प्लेबैक इंडिया पर पंडित सुदर्शन की अन्य कहानियाँ
* पंडित सुदर्शन की कालजयी रचना हार की जीत
* पंडित सुदर्शन की "तीर्थयात्रा
* साईकिल की सवारी - पंडित सुदर्शन
* पंडित सुदर्शन की "अठन्नी का चोर"
* तेरी गठरी में लागा चोर - पंडित सुदर्शन


शिशिर कृष्ण शर्मा जी के ब्लॉग बीते हुए दिन पर पढ़िये -
* कलम के सिकंदर: पण्डित सुदर्शन


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#Third Story, Parivartan: Pt. Sudarshan/Hindi Audio Book/2013/3. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 21 जनवरी 2013

सुधीर मिश्रा निर्देशित इनकार के अच्छे संगीत का इकरार

प्लेबैक वाणी -30 -संगीत समीक्षा - इनकार  



सुधीर मिश्रा गंभीर फिल्म निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, उनकी ताज़ा पेशकश भी एक अलग विषय पर केंद्रित है. जहाँ तक संगीत का ताल्लुक है स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा उनके साथ बहुत सी फिल्मों में संगत बिठा चुके हैं. स्वानंद २०१२ के हमारे सर्वश्रेष्ठ गीतकार रहे हैं एक गैर फ़िल्मी एल्बम सत्यमेव जयते के गीत ओ री चिरैया गीत के लिए. जहाँ तक फ़िल्मी गीतों का सवाल है वहाँ भी स्वानंद बर्फी के शीर्षक गीत को लिखकर श्रोताओं का दिल जीतने में कामियाब रहे थे. आईये देखें वर्ष २०१३ में अपने पसंदीदा संगीतकार शांतनु के साथ उनकी नई कोशिश क्या रंग लेकर आई है.
पहले गीत दरमियाँ को हम किसी खास श्रेणी में नहीं रख सकते, बल्कि ये जोनर है स्वानंद जेनर, जिसमें आप बावरा मन और खोये खोये चाँद की तलाश में जैसे गीत सुने चुके हैं. गीतकारी का ये अंदाज़ नीरज सरीखा है, शब्द एक बार फिर बेहद दिलचस्प हैं जो पूरे गीत में श्रोताओं को बांधे रखते हैं. पूरी तरह से स्वानंद का ये गीत एल्बम को एक शानदार शुरुआत देता है.
अगले गीत में फिर स्वानंद की आवाज़ है मगर इस बार उन्हें साथ मिला है खुद शांतनु का. मौला तू मालिक है शब्द और संगीत के लिहाज से एक सूफियाना कव्वाली जैसा है. एक बार फिर धीमे धीमे असर करता ये गीत अच्छे संगीत के कद्रदानों को अवश्य पसंद आना चाहिए.
अग्नि बैंड के, के. मोहन अपनी आवाज़ से एक खास पहचान बना चुके हैं. स्वानंद के शब्द एक बार फिर कारगर हैं. लेकिन यहाँ शांतनु ने भी अपनी मौजूदगी सशक्त रूप में दर्शाई है. पूरी तरह से रौक अंदाज़ का ये गीत बार बार सुने जाने लायक है. शहरी जीवन की दौड भाग और सपनों को पाने कि अंधी दौड में शामिल हम सभी को ऐसे गीत बेहद करीब से छू जाते हैं.
सूरज जगन की गायकी में अब हमारे संगीतकारों को एक अच्छा हार्ड रोंक गायक नसीब हो गया है. पर अभी भारतीय श्रोता हार्ड रौक जैसे जोनर के लिए कितना तैयार हैं ये कहना ज़रा मुश्किल है. सूरज के गाये पिछले गीतों को मिली कम शोहरत इस बात को लेकर संशय खड़ा करते हैं. कुछ भी हो सकता है गीत मीडिया के बढते क़दमों और सब कुछ चलता है जैसे आधुनिक सोच को दर्शाता है अपने शब्दों के माध्यम से. हालाँकि इस गीत को अपेक्षित श्रोता मिल पायेंगें, ये कहना मुश्किल है.
इनकार थीम में उभरती हुई प्रतिभाशाली गायिका मोनाली ठाकुर की आवाज़ भी है. एक अच्छा पीस जिसे शांत बैठकर आराम से सुना जा सकता है, वोइलिन के स्वरों से टकराती मोनाली की उत्तेजना भरी आवाज़ बेहद सुखद लगती है. कुल मिलाकर इनकार एक अच्छा सरप्राईस है श्रोताओं के लिए जिसे स्वानंद और शांतनु ने मिलकर यादगार बनाया है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है एल्बम को ३.८ की रेटिंग.                   



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रविवार, 20 जनवरी 2013

दिन के तीसरे प्रहर के कुछ मोहक राग



 

स्वरगोष्ठी-105 में आज
राग और प्रहर – 3

कृष्ण की बाँसुरी और राग वृन्दावनी सारंग 



‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों आपके इस प्रिय स्तम्भ में लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। गत सप्ताह हमने आपसे दिन के दूसरे प्रहर के कुछ रागों के बारे में चर्चा की थी। आज दिन के तीसरे प्रहर गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की बारी है। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न लगभग तीन बजे तक की अवधि के बीच का माना जाता है। इस अवधि में सूर्य की सर्वाधिक ऊर्जा हमे मिलती है और इसी अवधि में मानव का तन-मन अतिरिक्त ऊर्जा संचय भी करता है। आज के अंक में हम आपके लिए तीसरे प्रहर के रागों में से वृन्दावनी सारंग, शुद्ध सारंग, मधुवन्ती और भीमपलासी रागों की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।


सारंग अंग के रागों में वृन्दावनी सारंग और शुद्ध सारंग राग तीसरे प्रहर के प्रमुख राग माने जाते हैं। यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय बाँसुरी पर वृन्दावनी सारंग और मेघ राग की अवतारणा किया करते थे। सारंग का अर्थ होता है मयूर और कृष्ण द्वारा दिन के तीसरे प्रहर वृन्दावन के कुंजों में अपने सखाओं के संग इस राग की अवतारणा की परिकल्पना के कारण ही वृन्दावनी सारंग नाम प्रचलन में आया होगा। वर्तमान में राग वृन्दावनी सारंग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-औड़व जाति के इस राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद, अर्थात दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। सामान्य परिवेश में इस राग का गायन-वादन दिन के तीसरे प्रहर में ही किया जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की चरम अवस्था और वर्षा ऋतु का आहट देने वाले कजरारे मेघों के एकत्रीकरण के परिवेश का सार्थक चित्रण करने में भी राग वृन्दावनी सारंग पूर्ण समर्थ होता है। अब हम आपको राग वृन्दावनी सारंग में निबद्ध एक मध्य-द्रुत तीनताल की रचना बाँसुरी पर सुनवाते हैं। वादक हैं आश्विन श्रीनिवासन्।

राग वृन्दावनी सारंग : बाँसुरी - मध्य-द्रुत तीनताल की रचना : आश्विन श्रीनिवासन् 


दिन के तीसरे प्रहर अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न तक की अवधि का एक और राग है, शुद्ध सारंग। आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों, अर्थात औड़व-षाडव जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित है। साथ ही आरोह में तीव्र मध्यम स्वर तथा अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। इस राग को कुछ संगीतकार कल्याण थाट से तो कुछ बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। आपको राग शुद्ध सारंग का एक मनमोहक उदाहरण सुनवाने के लिए एक बार फिर हमने बाँसुरी वाद्य का ही चयन किया है। विश्वविख्यात बाँसुरी-वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के प्रिय रागों में राग शुद्ध सारंग भी एक राग है। उन्हीं का बजाया राग शुद्ध सारंग का आकर्षक आलाप अब हम आपको सुनवाते हैं।

राग शुद्ध सारंग : बाँसुरी – आलाप : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


दिन के तीसरे प्रहर में ही गाया-बजाया जाने वाला एक और मधुर राग है, मधुवन्ती। इस राग के बारे में यह तथ्य प्रचलित है कि मैहर घराने के सुप्रसिद्ध सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने कर्नाटक पद्यति के 29वें मेलकर्ता राग धर्मावती के आरोह से ऋषभ और धैवत को हटा कर इस राग को स्वरूप दिया। स्वयं उस्ताद अली अकबर खाँ, पण्डित रविशंकर और इनके शिष्यों ने इस राग को प्रचारित-प्रसारित किया। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। आरोह में कोमल गान्धार और तीव्र मध्यम तथा अवरोह में इन स्वरों के साथ शुद्ध धैवत और ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। अब हम आपको राग मधुवन्ती की एक मध्य लय की रचना सरोद पर ही सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद अली अकबर खाँ।

राग मधुवन्ती : सरोद – मध्यलय की गत : उस्ताद अली अकबर खाँ


तीसरे प्रहर में अधिकाधिक प्रयोग किया जाने वाला एक राग भीमपलासी है। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला भीमपलासी, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। इसमें गान्धार व निषाद कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है, किन्तु अवरोह में सभी सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर तार सप्तक का षडज होता है। कुछ विद्वान वादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी करते हैं। आज के इस अंक में अब हम आपको राग भीमपलासी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। 1966 में सुनील दत्त और साधना अभिनीत एक फिल्म ‘मेरा साया’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक मदनमोहन ने राग भीमपलासी के सुरों में गीत- ‘नैनों में बदरा छाए...’ संगीतबद्ध किया था। गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ के शब्दों को लता मंगेशकर के स्वरों का साथ मिला था। राग भीमपलासी पर आधारित इस फिल्मी गीत का आप रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : फिल्म – मेरा साया : ‘नैनों में बदरा छाए...’ : लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 105वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में हमने आपको 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ से राग गूजरी अथवा गूर्जरी तोड़ी पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गूजरी या गूर्जरी तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हृदयनाथ और गायिका लता मंगेशकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। इन्हें पूरे दो अंक मिलते हैं। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के आधे भाग का सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं .5 अंक। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने पहले प्रश्न का अधूरा उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं 1.5 अंक। जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग को तो सही पहचाना किन्तु गायक-गायिका को नहीं पहचान सके, अतः इन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का 

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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