Skip to main content

सुधीर मिश्रा निर्देशित इनकार के अच्छे संगीत का इकरार

प्लेबैक वाणी -30 -संगीत समीक्षा - इनकार  



सुधीर मिश्रा गंभीर फिल्म निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, उनकी ताज़ा पेशकश भी एक अलग विषय पर केंद्रित है. जहाँ तक संगीत का ताल्लुक है स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा उनके साथ बहुत सी फिल्मों में संगत बिठा चुके हैं. स्वानंद २०१२ के हमारे सर्वश्रेष्ठ गीतकार रहे हैं एक गैर फ़िल्मी एल्बम सत्यमेव जयते के गीत ओ री चिरैया गीत के लिए. जहाँ तक फ़िल्मी गीतों का सवाल है वहाँ भी स्वानंद बर्फी के शीर्षक गीत को लिखकर श्रोताओं का दिल जीतने में कामियाब रहे थे. आईये देखें वर्ष २०१३ में अपने पसंदीदा संगीतकार शांतनु के साथ उनकी नई कोशिश क्या रंग लेकर आई है.
पहले गीत दरमियाँ को हम किसी खास श्रेणी में नहीं रख सकते, बल्कि ये जोनर है स्वानंद जेनर, जिसमें आप बावरा मन और खोये खोये चाँद की तलाश में जैसे गीत सुने चुके हैं. गीतकारी का ये अंदाज़ नीरज सरीखा है, शब्द एक बार फिर बेहद दिलचस्प हैं जो पूरे गीत में श्रोताओं को बांधे रखते हैं. पूरी तरह से स्वानंद का ये गीत एल्बम को एक शानदार शुरुआत देता है.
अगले गीत में फिर स्वानंद की आवाज़ है मगर इस बार उन्हें साथ मिला है खुद शांतनु का. मौला तू मालिक है शब्द और संगीत के लिहाज से एक सूफियाना कव्वाली जैसा है. एक बार फिर धीमे धीमे असर करता ये गीत अच्छे संगीत के कद्रदानों को अवश्य पसंद आना चाहिए.
अग्नि बैंड के, के. मोहन अपनी आवाज़ से एक खास पहचान बना चुके हैं. स्वानंद के शब्द एक बार फिर कारगर हैं. लेकिन यहाँ शांतनु ने भी अपनी मौजूदगी सशक्त रूप में दर्शाई है. पूरी तरह से रौक अंदाज़ का ये गीत बार बार सुने जाने लायक है. शहरी जीवन की दौड भाग और सपनों को पाने कि अंधी दौड में शामिल हम सभी को ऐसे गीत बेहद करीब से छू जाते हैं.
सूरज जगन की गायकी में अब हमारे संगीतकारों को एक अच्छा हार्ड रोंक गायक नसीब हो गया है. पर अभी भारतीय श्रोता हार्ड रौक जैसे जोनर के लिए कितना तैयार हैं ये कहना ज़रा मुश्किल है. सूरज के गाये पिछले गीतों को मिली कम शोहरत इस बात को लेकर संशय खड़ा करते हैं. कुछ भी हो सकता है गीत मीडिया के बढते क़दमों और सब कुछ चलता है जैसे आधुनिक सोच को दर्शाता है अपने शब्दों के माध्यम से. हालाँकि इस गीत को अपेक्षित श्रोता मिल पायेंगें, ये कहना मुश्किल है.
इनकार थीम में उभरती हुई प्रतिभाशाली गायिका मोनाली ठाकुर की आवाज़ भी है. एक अच्छा पीस जिसे शांत बैठकर आराम से सुना जा सकता है, वोइलिन के स्वरों से टकराती मोनाली की उत्तेजना भरी आवाज़ बेहद सुखद लगती है. कुल मिलाकर इनकार एक अच्छा सरप्राईस है श्रोताओं के लिए जिसे स्वानंद और शांतनु ने मिलकर यादगार बनाया है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है एल्बम को ३.८ की रेटिंग.                   



यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:



Comments

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...

मोहनवीणा और विश्वमोहन भट्ट : SWARGOSHTHI – 247 : MOHAN VEENA & VISHWAMOHAN BHATT

स्वरगोष्ठी – 247 में आज संगीत के शिखर पर – 8 : पण्डित विश्वमोहन भट्ट मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की आठवीं कड़ी में हम पश्चिम के लोकप्रिय तंत्रवाद्य हवाइयन गिटार या स्लाइड गिटार के परिवर्तित भारतीय रूप ‘मोहनवीणा’ के अन्वेषक और विश्वविख्यात वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही इस वाद्य के मूल उद्गम पर भी चर्चा करेंगे। आज हम आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा मोहनवीणा पर...