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Thursday, December 22, 2011

जीने के बहाने लाखों हैं, जीना तुझको आया ही नहीं....कभी सोचिये इस तरह भी



'ख़ून भरी माँग' १९८८ की राकेश रोशन की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी जो एक ऑस्ट्रेलियन मिनि सीरीज़ 'रिटर्ण टू ईडन' (१९८३) से प्रेरीत थी। यह कहानी है एक विधवा की जिसकी हत्या उसी का प्रेमी करना चाहता था, पर वो मौत के मुंह से निकल आती है और अपने प्रेमी से बदला लेती है।

Wednesday, December 21, 2011

आओ झूमें गायें, मिलके धूम मचायें....क्योंकि दोस्तों जश्न है ये ज़िदगी



किसी स्कूली छात्र को अगर "गाँव" शीर्षक पर निबन्ध लिखने को कहा जाये तो वह जिन जिन बातों का ज़िक्र करेगा, जिस तरह से गाँव का चित्रण करेगा, वो सब कुछ इस गीत में दिखाई देता है, और जैसे एक आदर्श गाँव का चित्र उभरकर हमारे सामने आता है। फ़िल्म 'पराया धन' शुरु होती है इसी गीत से और गीत में ही फ़िल्म की नामावली को शामिल किया गया है।

Sunday, December 18, 2011

इस दुनिया में जीना हो तो...क्या करें सुने इस गीत में



फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि एक नाइट क्लब में साथ-साथ नृत्य कर सात युवाओं की एक टीम (जिसमे पाँच पुरुष और दो महिलाएँ थीं) नें उस डान्स कम्पीटिशन को जीता, और इनाम के रूप में उन्हें एक प्राइवेट विमान से 'प्राइज़ हॉलिडे' में भेजे जाने का ऐलान हुआ। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।।

Wednesday, December 14, 2011

ये चमन हमारा अपना है....राज कपूर की जयंती पर सुनें शैलेन्द्र -दत्ताराम रचित ये गीत


इस कथानक पर फिल्म बनवाने के पीछे नेहरू जी के दो उद्देश्य थे। मात्र एक दशक पहले स्वतंत्र देश के सरकार की न्याय व्यवस्था पर विश्वास जगाना और नेहरू जी का बच्चों के प्रति अनुराग को अभव्यक्ति देना। फिल्म के अन्तिम दृश्यों में नेहरू जी ने स्वयं काम करने की सहमति भी राज कपूर को दी थी। पूरी फिल्म बन जाने के बाद जब नेहरू जी की बारी आई तो मोरार जी देसाई ने उन्हें फिल्म में काम करने से रोका। नेहरू जी की राजनैतिक छवि के कारण अन्य लोगों ने भी उन्हें मना किया।

Monday, December 12, 2011

ते की मैं झूठ बोलेया...पूछा राज कपूर ने समाज से, सलिल चौधरी की धुन में



पूरी फिल्म में नायक कुछ नहीं बोलता। केवल अन्त में वह कहता है- ‘मैं थका-हारा-प्यासा पानी पीने यहाँ चला आया, और सब लोग मुझे चोर समझ कर मेरे पीछे भागे, जैसे मैं कोई पागल कुत्ता हूँ। मैंने यहाँ हर तरह के लोग और चेहरे देखे। मुझ गँवार को तुमसे यही शिक्षा दी कि चोरी किये बिना कोई बड़ा आदमी नहीं बन सकता... क्या सचमुच चोरी किये बिना कोई बड़ा आदमी नहीं बन सकता?’

Sunday, December 11, 2011

हम प्यार करेंगे....कहा राज कपूर के लिए साथ आये हेमंत कुमार और मदन मोहन साहब ने


यह एकमात्र गीत है, जिसमें हेमन्त कुमार ने राज कपूर के लिए स्वर दिया और ‘धुन’ राज कपूर द्वारा अभिनीत एकमात्र वह फिल्म है जिसका संगीत मदनमोहन ने दिया। इस फिल्म के बाद फिल्म संगीत के इन दोनों दिग्गजों ने राज कपूर के साथ कभी कार्य नहीं किया।

Tuesday, December 6, 2011

बहारों ने जिसे छेड़ा है....वही तराना ज्ञानदत्त का रचा साजे दिल बना राज कपूर का


१९४९ में प्रदर्शित फिल्म ‘सुनहरे दिन’ का निर्माण जगत पिक्चर्स ने किया था, जिसके निर्देशक सतीश निगम थे। फिल्म में राज कपूर की भूमिका एक रेडियो गायक की थी। अपने श्रोताओं के बीच यह गायक चरित्र बेहद लोकप्रिय है। इस फिल्म का संगीत वर्तमान में लगभग विस्मृत संगीतकार ज्ञानदत्त ने दिया था।

Sunday, December 4, 2011

जिन्दा हूँ इस तरह...राज कपूर के पहले संगीत निर्देशक राम गांगुली ने रचा था ये दर्द भरा नग्मा


राज कपूर के फिल्म-निर्माण की लालसा का आरम्भ फिल्म ‘आग’ से हुआ था, जिसके संगीतकार राम गांगुली थे। दरअसल यह पहली फिल्म राज कपूर के भावी फिल्मी जीवन का एक घोषणा-पत्र था। ठीक उसी प्रकार, जैसे लोकतन्त्र में चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी अपने दल का घोषणा-पत्र जनता के सामने प्रस्तुत करता है। ‘आग’ में जो मुद्दे लिये गए थे, बाद की फिल्मों में उन्हीं मुद्दों का विस्तार था, और ‘आग’ की चरम परिणति ‘मेरा नाम जोकर’ में हम देखते हैं।

Thursday, December 1, 2011

एक राधा एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा...दादु की दिव्य चेतना में कायम रहे उनकी संगीत साधना

टी.पी. साहब ने ज़िक्र किया कि दादु, राज साहब को गाना सुनाओ। यह गीत मैंने 'जीवन' फ़िल्म के लिए लिखा था, 'राजश्री' वालों के लिए। दो ऐसे गीत हैं जो दूसरी फ़िल्म में आ गए, उसमें से एक है 'अखियों के झरोखों से' का टाइटल सॉंग, सिप्पी साहब के लिए लिखा था जो 'घर' फ़िल्म बना रहे थे, लेकिन वो कुछ ऐसी बात हो गई कि उनके डिरेक्टर को पसन्द नहीं आया, उनको गाना ठंडा लगा। तो मैंने राज बाबू को सुना दिया तो उन्होंने यह टाइटल रख लिया। फिर सिप्पी साहब ने वही गाना माँगा मुझसे, मैंने कहा कि अब तो मैंने गाना दे दिया किसी को। बाद में ज़रा वो नाख़ुश भी हो गए थे। तो यह गाना 'जीवन' फ़िल्म के लिए, प्रशान्त नन्दा जी डिरेक्ट करने वाले थे, उसके लिए "एक राधा एक मीरा" लिखा था मैंने। तो राज साहब वहाँ बैठे थे। तो यह गाना जब सुनाया तो राज साहब ने दिव्या से पूछा कि यह गीत किसी को दिया तो नहीं? मैंने कहा कि नहीं, दिया तो नहीं! राज साहब तीन दिन थे और तीनो दिन वो मुझसे यह गाना सुनते रहे। और टी.पी. भाईसाहब से सवा रुपय लिया और मुझे देकर कहा कि आज से यह गाना मेरा हो गया, मुझे दे दो।

Monday, November 28, 2011

एक दिन तुम बहुत बड़े बनोगे...और दिल से बहुत बड़े बने दादु हमारे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 797/2011/237

'मेरे सुर में सुर मिला ले' शृंखला की सातवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। रवीन्द्र जैन के लिखे और स्वरबद्ध किए गीतों की इस शृंखला में आइए आज आपको बतायें कि दादु को बम्बई में पहला मौका किस तरह से मिला। "झुनझुनवाला जी नें मुझे कहा कि तुम अभी थोड़ा धैर्य रखो, यहाँ बैठ के काम करो, अपने घर में जगह दी, और काम करता रहा, उनको धुनें बना बना के सुनाता था, उन्होंने एक फ़िल्म प्लैन की 'लोरी', जिसके लिए हम बम्बई गानें रेकॉर्ड करने आए थे, जिसका मुकेश जी नें दो गानें गाये। मुकेश जी का एक गाना मैं आपको सुनाता हूँ, जो कुछ मैं कलकत्ते से यहाँ लेके आया था - "दुख तेरा हो कि दुख मेरा हो, दुख की परिभाषा एक है, आँसू तेरे हों कि आँसू मेरे हों, आँसू की भाषा एक है"।"

Tuesday, November 22, 2011

तू जो मेरे सुर में सुर मिला दे...दादु के इस मनुहार को भला कौन इनकार कर पाये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 793/2011/233

"तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िन्दगी हो जाये सफल"। यह बात किसी और के लिए सटीक हो न हो, रवीन्द्र जैन के लिए १००% सही है क्योंकि उनके सुरों में जिन जिन नवोदित गायक गायिकाओं नें सुर मिलाया, उन्हें प्रसिद्धि मिली, उन्हें यश प्राप्त हुआ, उनका करीयर चल पड़ा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार सुजॉय चटर्जी का और इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'मेरे सुर में सुर मिला ले' जिसमें आप सुन रहे हैं गीतकार-संगीतकार रवीन्द्र जैन की फ़िल्मी रचनाएँ और जान रहे हैं उनके जीवन की दास्तान उनकी ही ज़ुबानी विविध भारती की शृंखला 'उजाले उनकी यादों के' के सौजन्य से। कल की कड़ी में आपने जाना कि किस तरह से जन्म से ही उनकी आँखों की रोशनी जाती रही और इस कमी को ध्यान में रखते हुए उनके पिताजी नें उन्हें गीत-संगीत की तरफ़ प्रोत्साहित किया। अब आगे की कहानी दादु की ज़ुबानी - "तो यहाँ अलीगढ़ में नाटकों में मास्टर जी. एल. जैन संगीत निर्देशन किया करते थे, आर्य-जैन समाज के, और उन्होंने सबसे पहले जो ग़ज़ल मुझे सिखाई थी, उसका ख़याल मुझे आ रही है, (गाते हुए) "लबों पे तबस्सुम निगाहों में बिजली, क़यामत कहीं से चली आ रही है..."। जी. एल. जैन, यानि घमण्डी लाल जी, घमण्ड कुछ नहीं था, सीधे सादे व्यक्तित्व के धनि थे। उसके बाद पंडित जनार्दन शर्मा, जिन्होंने स्वर का ज्ञान कराया। बड़ी मेहनत कराई उन्होंने, उनका अभ्यास कराने का एक ढंग था, वो ऐसे नहीं कहते थे कि इतनी बार इसको गाना है तुमको, एक 'मैच-बॉक्स' ले लिया, माचिस की तीलियाँ निकाल के रख ली, उन्होंने कहा कि इसमें से आप एक एक तीली निकाल के रखते जाइए और १०-१० बार उन सरगमों को गाइए, अब किसको गिनना है कि उसमें कितनी तीलियाँ हैं और उतनी बार गाना है, क़ैद नहीं थी समय की। ऐसे ही एक कटोरी ले ली चने की, उसमें से एक एक चना निकालिए और गाइए उसको, सरगम गाते रहिए। इस तरह पूरा दिन निकल जाता था, कब दिन निकल गया पता भी नहीं चला। उस समय मेरी उम्र थी पाँच साल। मुझे एक छोटा सा हारमोनियम दिया था खिलौने के जैसा, क्योंकि बड़ा हारमोनियम तो हैण्डल नहीं कर सकता था, हाथ ही नहीं जाता था वहाँ तक, तो छोटा हारमोनियम दिया गया था और फिर पंडित जनार्दन शर्मा नें रागों से परिचित कराया, स्वर-ज्ञान कराया, और एक छोटा सा कोर्स है प्रयाग संगीत समिति का, फ़ॉरमल एडुकेशन जिसे हम कहते हैं, अलीगढ़ के ही पंडित नथुराम शर्मा, उनके साथ बैठ के फिर उनके शिक्षण में संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल की, फिर गुरुदेव नें कहा कि तुम्हारी अलीगढ़ की जो सीखना है वह हो चुका है, अब देशाटन करो और इस बीच में बड़े भैया के साथ, डी.के. जैन जी के साथ, इनका बड़ा योगदान है मेरे करीयर में, मेरे साहित्यिक प्रकाश में, ख़ास तौर से उन्होंने बड़ा योगदान दिया, तो उनके साथ नागपुर आया और इत्तेफ़ाक़ की बात है कि नागपुर से बम्बई की दूरी एक रात की थी। और रांची फिर गया, रांची से कलकत्ते की दूरी एक रात की थी, तो मेरे कज़िन थे जो मुझे कलकत्ते ले गए और कलकत्ते से ही जो मेरा फ़िल्मी करीयर और गैर-फ़िल्मी रेकॉरडिंग्स शुरु हुई।"

'मेरे सुर में सुर मिला ले' में आज हमने जिस गीत को चुना है, वह गीत है रवीन्द्र जैन के करीयर का एक बेहद उल्लेखनीय पड़ाव 'चितचोर' का। इस फ़िल्म में केवल चार ही गीत थे, पर चारों ही एक से बढ़ कर एक। येसुदास के गाये दो एकल गीत "गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा" और "आज से पहले आज से ज़्यादा" तथा येसुदास और हेमलता के गाये दो युगल गीत "जब दीप जले आना" और "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले", इनमें से कौन किससे बेहतर है कहना आसान नहीं। हमनें इस अन्तिम गीत को आज की कड़ी के लिए चुना है। 'चितचोर' बासु चटर्जी निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें अमोल पालेकर और ज़रीना वहाब मुख्य कलाकार थे। 'सौदागर' और 'गीत गाता चल' ही की तरह 'चितचोर' भी राजश्री प्रोडक्शन्स की ही फ़िल्म थी। 'चितचोर' को बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी मिली और उस वर्ष कई पुरस्कारों के लिए मनोनित हुई। इस फ़िल्म से अमोल पालेकर नें अपनी डॆब्यु सिल्वर जुबिली हैट्रिक पूरी की - 'रजनीगंधा' (१९७४), 'छोटी सी बात' (१९७५) और 'चितचोर' (१९७६)। "गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा" गीत के लिए येसुदास को राष्ट्रीय पुरस्कार और आज के प्रस्तुत गीत के लिए हेमलता को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। हेमलता इस गीत के बारे में बताते हैं - "इस गीत की रेकॉर्डिंग् के दिन मैं स्टुडियो लेट पहुँची, किस कारण से लेट हुई थी, यह तो अब याद नहीं, बस लेट हो गई थी। वहाँ येसुदास जी आ चुके थे। गाने की रेकॉर्डिंग् के बाद दादु नें मुझसे कहा कि अगर तुम मेरे गुरु की बेटी नहीं होती तो वापस कर देता। यह सुन कर मैं इतना रोयी उस दिन। मुझे उन पर बहुत अभिमान हो गया, कि वो मुझे सिर्फ़ इसलिए गवाते हैं क्योंकि मैं उनके गुरु की बेटी हूँ? बर्मन दादा, कल्याणजी भाई, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, ये सब भी तो मुझसे गवाते हैं, तो फिर उन्होंने ऐसा क्यों कह दिया? मुझे बहुत बुरा लगा और मैं दिन भर बैठ के रोयी। मैं दादु से जाकर यह कहा कि देर से आने के लिए अगर आप मुझे बाहर निकाल देते तो मुझे एक सबक मिलता, बुरा नहीं लगता पर आप ने ऐसा क्यों कहा कि अगर गुरु की बेटी न होती तो बाहर कर देता। तो उन्होंने मुझसे बड़े प्यार से कहा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जब तुम्हारे लिए सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स वेट करेंगे, तुम नहीं आओगी तो रेकॉर्डिंग् ही नहीं होगी।" 'चितचोर' फ़िल्म की कई रीमेक भी बनी है। ॠतीक रोशन, करीना कपूर, अभिषेक बच्चन अभिनीत 'मैं प्रेम की दीवानी हूँ' के अलावा १९९० में मलयालम में 'मिन्दाप्पुचयक्कू कल्याणम्', तेलुगू में 'अम्मयी मनासू' और बंगला में 'शेदिन चैत्र मास' जैसी फ़िल्में इसी कहानी पर आधारित थीं। तो आइए रवीन्द्र जैन के सुरों में हम भी सुर मिलाते हैं और सुनते हैं यह अवार्ड-विनिंग् गीत जो आधारित है राग पीलू पर।



पहचानें अगला गीत - आवाज़ है महेंद्र कपूर की, गीत मूल रूप से एक प्रेरणादायक कविता से प्रेरित है

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, November 21, 2011

श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम....दादु का ये गीत कितना सकून भरा है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 792/2011/232

गीतकार-संगीतकार-गायक रवीन्द्र जैन पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'मेरे सुर में सुर मिला ले' की दूसरी कड़ी में आप सभी का फिर एक बार हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, जैसा कि कल हमने कहा था कि रवीन्द्र जैन की दास्तान शुरु से हम आपको बताएंगे, तो आज की कड़ी में पढ़िए उनके जीवन के शुरुआती दिनों का हाल दादु के ही शब्दों में (सौजन्य: उजाले उनकी यादों के, विविध भारती)। जब दादु से यह पूछा गया कि वो अपने बचपन के दिनों के बारे में बताएँ, तो उनका जवाब था - "बचपन तो अभी गया नहीं है, क्योंकि जहाँ तक ज्ञान का सम्बंध है, आदमी हमेशा बच्चा ही रहता है, यह मैं मानता हूँ। उम्र में भले ही हमने बचपन खो दिया हो, लेकिन ज्ञान में अभी बच्चे हैं। तो अलीगढ़ में थे मेरे माता-पिता, अलीगढ़ से ही जन्म मुझको मिला, अलीगढ़ में ही हो गया था शुरु ये गीत और संगीत का सिलसिला। डॉ. मोहनलाल, जो मेरे पिताश्री के कन्टेम्पोररी थे, मेरे पिताजी का नाम पंडित इन्द्रमणि ज्ञान प्रसाद जी, तो मोहनलाल जी नें जन्म के दिन ही आँखों का छोटा सा एक ऑपरेशन किया, उन्होंने आँखें खोली, क्योंकि बन्द थी आँखें, आँखें बन्द होने का वरदान मुझे जन्म से मिला है। क्योंकि यह मैं मानता हूँ कि आँखें इन्सान को भटका देते हैं क्योंकि आँखें जो हैं न, इन्सान का ध्यान यहाँ-वहाँ लगा देता है, तो कन्सेन्ट्रेशन के लिए वैसे भी हम आँखें बन्द कर लेते हैं। तो डॉ. मोहनलाल नें ऑपरेट किया आँखों को, अलीगढ़ के बड़े नामी डॉक्टर थे, और उन्होंने कहा कि इस बच्चे की आँखों में रोशनी धीरे-धीरे आ सकती है और आयेगी लेकिन पढ़ना मुनासिब नहीं रहेगा उतना क्योंकि उससे जितना देख पाएगा उसका नुकसान होगा। तो ऐसे में मेरे पिताजी, उनकी दूरदर्शिता को मैं सराहता हूँ कि देखिए उन्होंने क्या मेरे लिए निर्णय लिया, कि संगीत ही मेरे जीवन का लक्ष्य होगा और संगीत में ही मेरी पहचान बनेगी।"

दोस्तों, रवीन्द्र जैन जी की सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपनी आँखों की रोशनी के न होने की वजह से जीवन से हार नहीं मान लिया, बल्कि अपनी इस विकलांगता पर विजय प्राप्त कर न केवल अपनी ज़िन्दगी को संवारा, बल्कि दूसरे नेत्रहीन लोगों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनें। और अब आते हैं आज के गीत पर। धार्मिक और पौराणिक फ़िल्मों के संगीतकारों की बात करें तो ४०, ५० और ६० के दशकों में जो नाम सुनाई देते थे, वो थे शंकरराव व्यास, चित्रगुप्त, एस. एन. त्रिपाठी, अविनाश व्यास प्रमुख। और ७०-८० के दशकों में अगर इस जौनर की बात करें तो शायद रवीन्द्र जैन का नाम सर्वोपरी रहेगा। दादु के संगीत से सजी जो धार्मिक फ़िल्में आईं, वो हैं 'सोलह शुक्रवार', 'हर हर गंगे', 'गंगा सागर', 'गोपाल कृष्ण', 'राधा और सीता', 'दुर्गा माँ', 'जय देवी सर्वभूतेषु', 'शनिव्रत महिमा', 'जय शकुम्भरी माँ' आदि। और कई फ़िल्मे ऐसी भी रहीं जो धार्मिक या पौराणिक विषयों की तो नहीं थीं, पर उनमें भी रवीन्द्र जैन नें भक्ति रस के कई सुमधुर गीत रचे। उदाहरण स्वरूप फ़िल्म 'लड़के बाप से बढ़के' में हेमलता की आवाज़ में "रक्षा करो भवानी माता" काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। लेकिन इस तरह की ग़ैर-भक्ति रस की फ़िल्मों में भक्ति रस पर आधारित जो गीत सर्वाधिक सफल हुआ, वह था १९७५ की फ़िल्म 'गीत गाता चल' का "श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, लोग करे मीरा को यूंही बदनाम"। जसपाल सिंह और आरति मुखर्जी की गाई यह भक्ति रचना इतनी कामयाब हुई कि हर धार्मिक पर्व पर मन्दिरों में यह गीत गूंजती हुई सुनाई देती है। गीत के बोल भी दादु नें ऐसे लिखे हैं कि सुन कर ही जैसे मन पवित्र हो जाता है। कभी कभी तो आश्चर्य होता है कि क्या इसे दादु नें ही लिखा है या फिर कोई पारम्परिक रचना है। दरअसल यह दादु के पौराणिक विषयों के अगाध ज्ञान का नतीजा है। आइए आनद ली जाये इस कालजयी भक्ति रचना की फ़िल्म 'गीत गाता चल' से।



पहचानें अगला गीत - इन युगल स्वरों में दो गीत हैं फिल्म में एक के मुखड़े में शब्द है "शाम", गायक गायिका का नाम बताएं

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 16, 2011

घर के उजियारे सो जा रे....याद है "डैडी" की ये लोरी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 789/2011/229

'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' - पुरुष गायकों की गाई फ़िल्मी लोरियों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की नवी कड़ी में आप सभी का मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ फिर एक बार स्वागत करता हूँ। आज की कड़ी के लिए हमनें जिस गीत को चुना है वह है १९८९ की फ़िल्म 'डैडी' का। फ़िल्म की कहानी पिता-पुत्री के रिश्ते की कहानी है। यह कहानी है पूजा की जिसे जवान होने पर पता चलता है कि उसका पिता ज़िन्दा है, जो एक शराबी है। पूजा किस तरह से उनकी ज़िन्दगी को बदलती है, कैसे शराब से उसे मुक्त करवाती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी। बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है इस फ़िल्म की। पूजा को उसके नाना-नानी पाल-पोस कर बड़ा करते हैं और उसे अपनी मम्मी-डैडी के बारे में कुछ भी मालूम नहीं। उसके नाना, कान्ताप्रसाद के अनुसार उसके डैडी की मृत्यु हो चुकी है। पर जब पूजा बड़ी होती है तब उसे टेलीफ़ोन कॉल्स आने लगते हैं जो केवल 'आइ लव यू' कह कर कॉल काट देता है। कान्ताप्रसाद को जब आनन्द नामक कॉलर का पता चलता है तो उसे पिटवा देते हैं और पूजा से न मिलने की धमकी देते हैं। पर एक दिन जब पूजा का एक बदमाश इज़्ज़त लूटने की कोशिश करता है तो आनन्द उसकी जान बचाता है और पूजा को पता चल जाता है यह बदसूरत और शराबी आनन्द ही उसका पिता है। पूजा और आनन्द की ज़िन्दगी किस तरह से मोड़ लेती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी।

महेश भट्ट की इस फ़िल्म के माध्यम से पूजा भट्ट नें फ़िल्म के मैदान में कदम रखा था। डैडी की भूमिका में थे अनुपम खेर। बड़ी ख़ूबसूरत फ़िल्म है 'डैडी' और इस फ़िल्म के लिए अनुपम खेर को उस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के 'फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। सूरज सनीम को सर्वश्रेष्ठ संवाद का 'फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड' से नवाज़ा गया था। और दोस्तों, सूरज सनीम नें ही इस फ़िल्म के तमाम गानें लिखे थे जिन्हें ख़ूब सराहना मिली। ख़ास तौर से तलत अज़ीज़ के गाये दो गीत - "आइना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे, मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगे" और "घर के उजियारे सो जा रे, डैडी तेरा जागे तू सो जा रे"। और यही दूसरा गीत, जो कि एक लोरी है, आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। 'डैडी' के संगीतकार थे राजेश रोशन। राजेश रोशन की अन्य फ़िल्मों के संगीत से बिल्कुल भिन्न है 'डैडी' का संगीत। एक कलात्मक फ़िल्म में जिस तरह का संगीत होना चाहिए, राजेश जी नें बिल्कुल वैसा संगीत इस फ़िल्म के लिए तैयार किया था। और तलत अज़ीज़ की आवाज़ भी अनुपम खेर पर सटीक बैठी है। शायद जगजीत सिंह की आवाज़ भी सही रहती। अच्छा दोस्तों, जगजीत सिंह से याद आया कि तलत अज़ीज़ का पहला ऐल्बम, जो १९७९ में जारी हुआ था, उसका शीर्षक था 'Jagjit Singh presents Talat Aziz'। इस ऐल्बम तलत के लिए एक स्टेपिंग् स्टोन था, जिसे ख़ूब मकबूलियत हासिल हुई। मूलत: एक ग़ज़ल गायक, तलत अज़ीज़ नें कुछ गिनी-चुनी फ़िल्मों में भी पार्श्वगायन किया है जिनमें शामिल हैं 'उमरावजान', 'बाज़ार', 'औरत औरत औरत', 'धुन' और 'डैडी'। तो आइए सुना जाए तलत अज़ीज़ की मुलायम आवाज़ में इस लोरी को।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
आज की पहली बिल्कुल सीधे सीधे पूछ रहे हैं। कुमार सानू और अनुराधा पौडवाल की गाई हुई एकमात्र फ़िल्मी लोरी है यह, बताइए कौन सी है?

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, November 9, 2011

तुझे सूरज कहूँ या चन्दा...शायद आपके पिता ने भी कभी आपके लिए ये गाया होगा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 784/2011/224

मस्कार! दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हम प्रस्तुत कर रहे हैं लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी'। इस शृंखला में आपनें बलराज साहनी पर फ़िल्माया तलत साहब का गाया फ़िल्म 'जवाब' का गीत सुना था। आज एक बार फिर बलराज साहब पर फ़िल्माई एक लोरी हम आपके लिए ले आये हैं, और इस बार आवाज़ है मन्ना डे की। एक समय ऐसा था जब किसी वयस्क चरित्र पर जब भी कोई गीत फ़िल्माया जाना होता तो संगीतकार और निर्माता मन्ना दा की खोज करते। इस बात का मन्ना दा नें एक साक्षात्कार में हँसते हुए ज़िक्र भी किया था कि मुझे बुड्ढों के लिए प्लेबैक करने को मिलते हैं। मन्ना दा की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि नायक से ज़्यादा उनकी आवाज़ वयस्क चरित्रों पर फ़िट बैठती थी। लेकिन इससे उन्हें नुकसान कुछ नहीं हुआ, बल्कि कई अच्छे अच्छे अलग हट के गीत गाने को मिले। आज उनकी गाई जिस लोरी को हम सुनने जा रहे हैं, वह भी एक ऐसा ही अनमोल नग़मा है फ़िल्म-संगीत के धरोहर का। १९६९ की फ़िल्म 'एक फूल दो माली' का यह गीत है "तुझे सूरज कहूँ या चन्दा, तुझे दीप कहूँ या तारा, मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा"। प्रेम धवन के बोल और रवि का संगीत। इस गीत के बोल हैं तो बड़े साधारण, पर शायद हर माँ-बाप के दिल की आवाज़ है। हर माँ-बाप की यह उम्मीद होती है कि उसका बच्चा बड़ा हो कर बहुत नाम कमाये, उनका नाम रोशन करे। और यही बात इस गीत का मूल भाव है।

पिता-पुत्र के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती 'एक फूल दो माली' देवेन्द्र गोयल की फ़िल्म थी, जिसमें बलराज साहनी, संजय ख़ान और साधना मुख्य भूमिकाओं में थे। बलराज साहनी को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकन मिला था। फ़िल्म की भूमिका कुछ इस तरह की थी कि सोमना (साधना), एक ग़रीब लड़की, अपनी विधवा माँ लीला के साथ भारत-नेपाल बॉर्डर की किसी पहाड़ी में रहती हैं और सेब के बाग़ में काम करती है जिसका मालिक है कैलाश नाथ कौशल (बलराज साहनी)। कौशल पर्वतारोहण का एक स्कूल भी चलाता है जिसमें अमर कुमार (संजय ख़ान) एक विद्यार्थी है। सोमना और अमर मिलते हैं, प्यार होता है, और दोनों शादी करने ही वाले होते हैं कि एक तूफ़ान में अमर और सह-पर्वतारोहियों के मौत की ख़बर आती है। पर उस वक़्त सोमना गर्भवती हो चुकी होती हैं। उसे और उसके बच्चे को बचाने के लिए कौशल उससे शादी कर लेते हैं और बच्चे को अपना नाम देते हैं। ख़ुद पिता न बन पाने की वजह से उनका सोमना के बच्चे के साथ कुछ इस तरह का लगाव हो जाता है कि कोई कह ही नहीं सकता कि वो उस बच्चे का पिता नहीं है। पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। पाँच वर्ष बाद जब सोमना और कौशल अपने बेटे का छठा जनमदिन मना रहे होते हैं, उस पार्टी में अमर आ खड़ा होता है। आगे कहानी का क्या अंजाम होता है, यह तो आप ख़ुद ही देख लीजिएगा फ़िल्म की डी.वी.डी मँगवा कर, फ़िलहाल इस बेहद ख़ूबसूरत लोरी का आनन्द लीजिए मन्ना दा के स्वर में।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
शैलेन्द्र, शंकर-जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी के कम्बिनेशन की यह लोरी है, पर इसे शम्मी कपूर पर फ़िल्माई नहीं गई है। तो बताइए किस लोरी की हम बात कर रहे हैं? अतिरिक्त हिण्ट - इस लोरी के तीन संस्करण हैं - रफ़ी सोलो, लता सोलो, रफ़ी-लता डुएट।

पिछले अंक में
बहुत अच्छे उज्जवल

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, November 8, 2011

चन्दन का पलना रेशम की डोरी....लोरी की मिठास और हेमंत दा की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 783/2011/223

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! इन दिनों इस स्तंभ में आप आनन्द ले रहे हैं पुरुष गायकों द्वारा गाई फ़िल्मी लोरियों से सजी इस लघु शृंखला 'चंदन का पलना, रेशम की डोरी' का। आज के अंक की लोरी भी यही है जिससे इस शृंखला का नाम रखा गया है। हेमन्त कुमार की गाई हुई १९५४ की फ़िल्म 'शबाब' की लोरी "चंदन का पलना, रेशम की डोरी, झुलना झुलाऊँ निन्दिया को तोरी"। शक़ील बदायूनी के बोल, नौशाद का संगीत। लोरी फ़िल्माई गई है भारत भूषण पर। वैसे इस लोरी के दो संस्करण हैं, पहला हेमन्त दा की एकल आवाज़ में और दूसरे में लता जी भी उनके साथ हैं। एकल संस्करण में महल का दृश्य है जिसमें गायक बने भारत भूषण इस लोरी को गाते हैं और पर्दे के उस पार कक्ष में नूतन बिस्तर में बैठी हैं। राजा और दासियाँ/ सहेलियाँ छुप-छुप कर यह दृश्य देख रहे हैं। मैंने फ़िल्म तो नहीं देखी पर इस गीत के विडियो को देख कर ऐसा लगता है जैसे नूतन को नींद न आने की बिमारी है और उन्हें सुलाने के लिए राजमहल में गायक को बुलाया गया है लोरी गाने के लिए। नूतन के सो जाते ही सहेलियाँ ख़ुशी से हंस पड़ती हैं।

दोस्तों, कल ही हम बात कर रहे थे कि जब भी फ़िल्मों में किसी पुरुष पर लोरी फ़िल्माने की बात आई, संगीतकार नें ऐसे गायक को चुना जिनकी आवाज़ मखमली हो, कोमल हो। हेमन्त कुमार भी एक ऐसे ही गायक रहे जिनकी आवाज़ गम्भीर होते हुए भी बेहद कोमल और मधुर है। नौशाद साहब नें हेमन्त कुमार को इस लोरी के लिए चुना और उस समय हेमन्त कुमार नवोदुत गायक थे बम्बई में। उन्होंने इसे इतनी ख़ूबसूरती के साथ गाया कि यह एक कालजयी लोरी बन गई है। इस लोरी के बारे में हेमन्त दा नें 'विविध भारती' के सम्भवत: 'जयमाला' कार्यक्रम में कहा था - "जब मैं १९५१ में बम्बई आया, नौशाद साहब उस वक़्त आइडील म्युज़िक डिरेक्टर थे। ऐसा सिन्सियरिटी, साधना देखा नहीं। रिदम के साथ-साथ मेलडी उन्होंने ही शुरु की थी, इसमें कोई शक़ नहीं। उन्होंने मुझे बुलाया और अपनी फ़िल्म 'शबाब' का एक गीत "ओ चंदन का पलना" गाने का ऑफ़र दिया। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि नौशाद साहब नें मुझे गाने के लिए बुलाया है। राग पीलू पर आधारित यह गाना डुएट भी था और सोलो भी।" जी हाँ, डुएट वर्ज़न में लता जी हेमन्त दा के साथ हैं। लेकिन आज हम हेमन्त दा की एकल आवाज़ में इस लोरी का आनन्द लेने जा रहे हैं। तो प्रस्तुत है "चंदन का पलना, रेशम की डोरी..."।



पहचानें अगला गीत, इस सूत्र के माध्यम से -
संजय ख़ान और साधना अभिनीत एक फ़िल्म की यह लोरी है, पर लोरी इन दोनों में से किसी पर भी फ़िल्माई नहीं गई है। गायक वो हैं जिन्हें अफ़सोस रहा है कि केवल बूढ़े चरित्रों के लिए ही उनकी आवाज़ ज़्यादा ली गई। किस लोरी की हम बात कर रहे हैं?

पिछले अंक में
वाह अमित जी

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Thursday, November 3, 2011

कहाँ तुम चले गए ...बस यही दोहराते रह गए जगजीत के दीवाने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 780/2011/220

गजीत सिंह को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'जहाँ तुम चले गए' की अंतिम कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, जगजीत सिंह का पंजाबी भाषा और पंजाबी काव्य को लोकप्रिय बनाने और दूर दूर तक फैलाने में भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। शिव कुमार बटालवी की कविताओं को जनसाधारण तक पहुँचाने में उनका ऐल्बम 'बिरहा दा सुल्तान' उल्लेखनीय है। "माय नी माय मैं इक शिकरा यार बनाइया", "रोग बन के रह गिया है पियार तेरे शहर दा", "यारियां राब करके मैनुं पाएं बिरहन दे पीड़े वे", "एह मेरा गीत किसी नी गाना" इसी ऐल्बम के कुछ लोकप्रिय गीत हैं। १० मई २००७ को संसद के युग्म अधिवेषन में ऐतिहासिक केन्द्रीय हॉल में जगजीत सिंह नें बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल "लगता नहीं है दिल मेरा" गा कर भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (१८५७) के १५० वर्ष पूर्ति पर आयोजित कार्यक्रम को चार चाँद लगाया। राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह, उप-राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत, लोक-सभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वहाँ मौजूद थीं। सन् २००३ में जगजीत सिंह को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

२००७ के आसपास जगजीत सिंह की सेहत बिगड़ने लगी थी। ब्लड सर्कुलेशन की समस्या के चलते उन्हें २००७ के अक्टूबर में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इससे पहले १९९८ के जनवरी में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया था। अभी हाल में ब्रेन हैमरेज से आक्रान्त जगजीत को अस्पताल ले जाया गया, पर वो वापस घर न लौट सके। उनका दिया अंतिम कॉनसर्ट था १६ सितंबर २०११ को नेहरू साइन्स सेन्टर मुंबई में, १७ सितंबर को सिरि फ़ोर्ट ऑडिटोरियम नई दिल्ली में और २० सितंबर को देहरादून के इण्डियन पब्लिक स्कूल में। और फिर ख़ामोश हो गई यह आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए। जैसे उन्हीं का गाया गीत साकार हो उठा - "चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गए"। आइए जगजीत सिंह को समर्पित इस शृंखला का समापन भी हम इसी गीत से करें। उत्तम सिंह के संगीत में यह है गीतकार आनन्द बक्शी की रचना १९९८ की फ़िल्म 'दुश्मन' के लिए। यूं तो यह पुराने फ़िल्म का गीत नहीं है, और इसलिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल होने के काबिल भी नहीं, पर इसके बोल कुछ ऐसे हैं कि जगजीत जी के जाने की परिस्थिति में बहुत ही ज़्यादा सार्थक बन पड़ा है। आइए इस गीत को सुनें और इस शृंखला को यहीं सम्पन्न करें। पूरे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से स्वर्गीय जगजीत सिंह को भावभीनी श्रद्धांजली और उनकी पत्नी चित्रा जी के लिए समवेदना और सहानुभूति। अनुमति दीजिए, नमस्कार!



चलिए आज कुछ बातें जगजीत की ही की जाये, हमें बताएं उनके गाये अपने सबसे पसंदीदा ५ गीत...

पिछले अंक में
अनाम बंधू अपना नाम तो बताएं, मेरे ख़याल से तो वो दिल्ली में ही हैं कृपया इन नंबर पर संपर्क करें ९८७३७३४०४६
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Monday, October 31, 2011

इश्क़ से गहरा कोई न दरिया....सुदर्शन फाकिर और जगजीत का मेल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 777/2011/217

'जहाँ तुम चले गए' - इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है जगजीत सिंह को श्रद्धांजली स्वरूप यह लघु शृंखला। कल हमारी बात आकर रुकी थी जगजीत जी के नामकरण पर। आइए आज उनके संगीत की कुछ बातें बताई जाएं। बचपन से ही जगजीत का संगीत से नाता रहा है। श्रीगंगानगर में उन्होंने पण्डित शगनलाल शर्मा से दो साल संगीत सीखा, और उसके बाद छह साल शास्त्रीय संगीत के तीन विधा - ख़याल, ठुमरी और ध्रुपद की शिक्षा ग्रहण की। इसमें उनके गुरु थे उस्ताद जमाल ख़ाँ जो सैनिआ घराने से ताल्लुख़ रखते थे। ख़ाँ साहब महदी हसन के दूर के रिश्तेदार भी थे। पंजाब यूनिवर्सिटी और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के वाइस चान्सलर स्व: प्रोफ़ सूरज भान नें जगजीत सिंह को संगीत की तरफ़ प्रोत्साहित किया। १९६१ में जगजीत बम्बई आए एक संगीतकार और गायक के रूप में क़िस्मत आज़माने। उस समय एक से एक बड़े संगीतकार और गायक फ़िल्म इंडस्ट्री पर राज कर रहे थे। ऐसे में किसी भी नए गायक को अपनी जगह बनाना आसान काम नहीं था। जगजीत सिंह को भी इन्तज़ार करना पड़ा। वो एक पेयिंग् गेस्ट बन कर रहा करते थे और शुरुआती दिनों में उन्हें विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाने को मिला करते। उन्हें पहली बार निर्माता सुरेश अमीन नें अपनी गुजराती फ़िल्म 'धरती न छोडूं' में बतौर पार्श्वगायक गाने का मौका दिया। ग़ज़लों की दुनिया में उनका किस तरह से पदार्पण हुआ यह हम कल के अंक में आपको बतायेंगे, फ़िलहाल बात करते हैं आज प्रसारित होने वाले गीत की।

आज प्रस्तुत है १९८४ की फ़िल्म 'रावण' से विनोद सहगल का गाया "इश्क़ से गहरा कोई न दरिया"। वैसे तो इस गीत को लिखा है सुदर्शन फ़ाकिर नें, पर गीत की प्रेरणास्रोत है ग़ालिब का मशहूर शेर "ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है"। गीत शुरु होने से पहले भी अभिनेता विकास आनन्द (जिन पर यह गीत फ़िल्माया गया है) इसी शेर को कहते हैं। बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत है - "इश्क़ से गहरा कोई न दरिया, डूब गया जो उसका पता क्या, लैला जाने, मजनूं जाने, हीर यह जाने, रांझा जाने, तू क्या जाने दीवाने ये बातें तू क्या जाने"। जॉनी बक्शी निर्मित व निर्देशित 'रावण' के मुख्य कलाकार थे स्मिता पाटिल, विक्रम, गुलशन अरोड़ा और ओम पुरी। संगीत के लिए जगजीत सिंह और चित्रा सिंह को लिया गया था। इस फ़िल्म के अन्य गीतों में शामिल हैं भूपेन्द्र के गाये "मसीहा" और "ज़िन्दगी मेरी है", चित्रा सिंह की गाई "चुनरिया" और जगजीत सिंह का गाया "अजनबी"। गायक विनोद सहगल के बारे में यह कहना चाहेंगे कि एक अच्छी आवाज़ के होते हुए भी वो पहली श्रेणी के ग़ज़ल गायकों में शामिल नहीं हो सके, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। टेलीफ़िल्म 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में उन्होंने दो ग़ज़लें गाईं पर जगजीत सिंह की ग़ज़लों को ही ज़्यादा सुना गया। विनोद सहगल नें जिन फ़िल्मों में गीत गाये हैं, उनमें शामिल हैं 'सरदार करतारा' (१९८०), 'बेज़ुबान' (१९८२), 'लौंग दा लश्कारा' (१९८६), 'राही' (१९८७), 'जग वाला मेला' (१९८८), 'बिल्लू बादशाह' (१९८९), 'यारां नाल बहारां' (१९९१), 'इन्साफ़ का ख़ून' (१९९१), 'शहीद उधम सिंह' (२०००) और 'बदला' (२००३)। इस फ़िल्मोग्राफ़ी से यह पता चलता है कि जगजीत सिंह को जब भी फ़िल्म में संगीत देने का मौका मिला उन्होंने विनोद सहगल को गाने का मौका दिया। तो आइए आज सलाम करें जगजीत सिंह और विनोद सहगल की जोड़ी को।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
जगजीत चित्रा की युगल आवाज़ में ये एक पारंपरिक ठुमरी है

पिछले अंक में
वाह क्षिति जी बहुत दिनों बाद आमद हुई...वेल्कम

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Sunday, October 30, 2011

ये जो घर आँगन है...जगजीत व्यावसायिक सिनेमा के दांव पेचों में कुछ मधुरता तलाश लेते थे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 776/2011/216

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस नए सप्ताह में आप सभी का एक बार फिर से मैं, सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ स्वागत करता हूँ। इन दिनों इस स्तंभ में जारी है ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह पर केन्द्रित लघु शृंखला 'जहाँ तुम चले गए'। इस शृंखला में हमारी कोशिश यही है कि जगजीत जी की आवाज़ के साथ साथ ज़्यादातर उन फ़िल्मों के गीत शामिल किए जाएँ जिनका संगीत भी उन्होंने ही तैयार किया है। पाँच गीत आपनें सुनें जो लिए गए थे 'अर्थ', 'कानून की आवाज़', 'राही', 'प्रेम गीत' और 'आज' फ़िल्मों से। आज के अंक के लिए हमने जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'बिल्लू बादशाह' का। यह १९८९ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण सुरेश सिंहा नें किया था और निर्देशक थे शिशिर मिश्र। शीर्षक चरित्र में थे गोविंदा, और साथ में थे शत्रुघ्न सिंहा, अनीता राज, नीलम और कादर ख़ान। जगजीत सिंह फ़िल्म के संगीतकार थे और गीत लिखे निदा फ़ाज़ली और मनोज दर्पण नें। इस फ़िल्म में गोविंदा का ही गाया "जवाँ जवाँ" गीत ख़ूब मशहूर हुआ था जो हसन जहांगीर के ग़ैर फ़िल्मी गीत "हवा हवा" की धुन पर ही बना था। पर जो गीत हम आज सुनने जा रहे हैं उसे गाया है दिलराज कौर नें और फ़िल्म में यह गीत फ़िल्माया गया है उस बालकलाकार पर जिन्होंने फ़िल्म में गोविंदा के बचपन की भूमिका निभाई थी। दृश्य में माँ बनी रोहिणी हत्तंगड़ी भी नज़र आती हैं। इसी गीत को सैड वर्ज़न के रूप में जगजीत सिंह नें ख़ुद गाया था और क्या गाया था! इसे उन्होंने अपनी ऐल्बम 'जज़्बा' में भी शामिल किया था।

दोस्तों, क्योंकि आज हम एक ऐसा गीत सुन रहे हैं जिसमें बातें हैं घर-आंगन की, माँ की, छोटे-छोटे भाई-बहनों की, इसलिए आज आपको जगजीत जी के शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताया जाये! जगजीत सिंह का जन्म राजस्थान के श्रीगंगानगर में अमर सिंह धीमान और बचन कौर के घर हुआ। धर्म से सिख और मूलत: पंजाब के रहने वाले अमर सिंह धीमान एक सरकारी कर्मचारी थे। चार बहनों और तीन भाइयों वाले परिवार में जगजीत को घर में जीत कह कर बुलाते थे। जगजीत को पढ़ाई के लिए श्रीगंगानगर के खालसा हाइ स्कूल में भेजा गया और मैट्रिक के बाद वहीं पर 'गवर्णमेण्ट कॉलेज' में साइन्स स्ट्रीम में पढ़ाई की। उसके बाद उन्होंने आर्ट्स में बी.ए. किया जलंधर के डी.ए.वी. कॉलेज से। और उसके बाद हरियाणा के कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से इतिहास में एम.ए. किया। इस तरह से जगजीत सिंह नें अपनी पढ़ाई पूरी की। आपको पता है जगजीत का नाम शुरु शुरु में जगमोहन सिंह रखा गया था। फिर एक दिन वो अपनी बहन से मिलने चुरू ज़िले के सहवा में गए थे जहाँ नामधारी सम्प्रदाय के एक संत नें उनके गाये श्लोकों को सुन कर उनके बहनोई रतन सिंह को यह सुझाव दिया कि इस लड़के का नाम जगजीत कर दिया जाए क्योंकि इसमें क्षमता है अपनी सुनहरी आवाज़ से पूरे जग को जीतने की। बस फिर क्या था, जगमोहन सिंह बन गए जगजीत सिंह, और उन्होंने वाक़ई इस नाम का नाम रखा और उस संत की भविष्यवाणी सच हुई। दोस्तों, जगजीत जी से जुड़ी कुछ और बातें कल की कड़ी में, फिलहाल सुनते हैं दिलराज कौर की आवाज़ में "ये जो घर आंगन है, ऐसा और कहाँ है, फूलों जैसे भाई-बहन हैं, देवी जैसी माँ है"।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
विनोद सहगल की आवाज़ में ये गीत है जिसकी शुरुआत "इश्क" शब्द से होता है

पिछले अंक में
अमित जी ये क्या कम है कि आपने गीत पहचान तो लिया

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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Thursday, October 27, 2011

रिश्ता ये कैसा है....जिस रिश्ते से बंधे हैं जगजीत और उनके चाहने वाले

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 775/2011/215

मस्कार! 'जहाँ तुम चले गए', इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है गायक और संगीतकार जगजीत सिंह को श्रद्धांजली स्वरूप यह लघु शृंखला में जिसमें हम उनके गाये और स्वरबद्ध गीत सुन रहे हैं। अब तक हमने इस शृंखला में चार गीत सुनें जगजीत जी द्वारा स्वरबद्ध किए हुए, जिनमें से दो उन्हीं के गाये हुए थे, तथा एक एक गीत लता जी और आशा जी की आवाज़ में थे। आज जो गीत हम लेकर आये हैं, उसे भी जगजीत जी नें ही कम्पोज़ किया है, पर गाया है उनकी पत्नी और गायिका चित्रा सिंह नें। यह गीत है फ़िल्म 'आज' का "रिश्ता ये कैसा है, नाता ये कैसा है"। यह १९९० की फ़िल्म थी महेश भट्ट द्वारा निर्देशित। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज किरण, कुमार गौरव, अनामिका पाल, स्मिता पाटिल और मार्क ज़ुबेर। फ़िल्म के तमाम गीत जगजीत और चित्रा सिंह नें गाये। फ़िल्म का शीर्षक गीत जगजीत जी का गाया हुआ था। फ़िल्म 'राही' के उसी गीत की तरह यह भी एक आशावादी दार्शनिक गीत था "फिर आज मुझे रुमको बस इतना बताना है, हँसना ही जीवन है, हँसते ही जाना है"। आज का प्रस्तुत गीत भी बड़ा ख़ूबसूरत गीत है, बोलों के लिहाज़ से भी और संगीत के लिहाज़ से भी। इस गीत को लिखा है मदन पाल नें। मदन पाल का नाम फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा चर्चित नहीं हुआ पर इस गीत के बोलों पर ग़ौर करें तो अनुमान लगाया जा सकता है कि वो किस स्तर के गीतकार थे...

"रिश्ता ये कैसा है, नाता ये कैसा है।
पहचान जिससे नहीं थी कभी
अपना बना है वही अजनबी,
रिश्ता ये कैसा है, नाता ये कैसा है।
तुम्हे देखते ही रहूँ मैं हमेशा
मेरे सामने यूं ही बैठे रहो तुम,
करूँ दिल की बातें मैं ख़ामोशियों से,
और अपने लबों से न कुछ भी कहो तुम,
ये रिश्ता है कैसा, ये नाता है कैसा।
तेरे तन की ख़ुशबू भी लगती है अपनी
ये कैसी लगन है ये कैसा मिलन है
तेरे दिल की धड़कन भी लगती है अपनी
तुम्हे पाके महसूस होता है ऐसे
के जैसे कभी हम जुदा ही नहीं थे
ये माना के जिस्मों के घर तो नए हैं
मगन है पुराने ये बंधन दिलों के।"


दोस्तों, पिछली चार कड़ियों में हमनें कई कलाकारों के शोक संदेश पेश किए, आइए आज भी कुछ और शोक संदेश पढ़ें। गायिका उषा उथुप कहती हैं - "I can’t believe it. It was because of him that ordinary men could enjoy good Ghazal. We worked together in a jingle when I was just staring my career. "He is the person who introduced the 12-string guitar and the bass guitar in ghazal singing, in a way no one could. I spoke to him recently. What a human being. It is a great loss." समकालीन ग़ज़ल गायक पंकज उधास नें जगजीत सिंह को वर्सेटाइल सिंगर कहते हुए बताया कि "I am devastated after hearing the tragic news." दोस्तों, आज दीपावली है, आप सभी को शुभकामनाएँ देते हुए जगजीत सिंह के संगीत का दिया जलाते हैं और सुनते हैं चित्रा जी की मनमोहक आवाज़ में यह ख़ूबसूरत गीत।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
आवाज़ है दिलराज कौर की, और मुखड़े में शब्द है "देवी"

पिछले अंक में

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, October 25, 2011

ज़िन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो....आशा के स्वर जगजीत के सुरों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 773/2011/213

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह को, जिनका पिछले १० अक्टूबर को देहावसान हो गया। 'जहाँ तुम चले गए' शृंखला की कल की कड़ी में हमने लता जी का शोक-संदेश आप तक पहुंचाया था, आइए आज कुछ और शोक-संदेश पढ़ें। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नें कहा कि जगजीत सिंह अपने गोल्डन वायस के लिए हमेशा याद किए जायेंगे। उनके शब्दों में - "by making ghazals accessible to everyone, he gave joy and pleasure to millions of music lovers in India and abroad....he was blessed with a golden voice. The ghazal maestro’s music legacy will continue to “enchant and entertain” the people." गीतकार जावेद अख़्तर बताते हैं, "जगजीत सिंह की मृत्यु नें हिन्दी फ़िल्म और म्युज़िक इंडस्ट्री को कभी न पूरी होने वाले क्षति पहुँचाई है। मैंने उनको पहली बार स्कूल में रहते हुए सुना था जब मैं IIT Kanpur के एक कार्यक्रम में गया था, वह था 'Music Night by Jagjit Singh and Chitra'।" शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल नें कहा - "He was an icon. There is nothing I can say to console his wife (Chitra). All I can say is that he will never be forgotten. I pray to God to give her the strength to recover from the loss."

आज की कड़ी के लिए हमने जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'राही' का। फ़िल्म में संगीत जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का था। 'राही' १९८७ की फ़िल्म थी जिसमें संजीव कुमार, शत्रुघ्न सिंहा और स्मिता पाटिल नें मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। लखन सिंहा निमित व रमण कुमार निर्देशित इस फ़िल्म में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह के गाये गीत तो थे ही, साथ ही आशा भोसले, सुरेश वाडकर, महेन्द्र कपूर, मीनू पुरुषोत्तम और भुपेन्द्र के गाये गीत भी शामिल थे। फ़िल्म ज़्यादा नहीं चली, इसके गानें भी अनसुने ही रह गए, पर एक गीत जो रेडियो पर काफ़ी गूंजा, वह था जगजीत जी की एकल आवाज़ में ज़िन्दगी से भरपूर "ज़िन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो, फ़ासले कम करो, दिल मिलाते रहो"। आज जब जगजीत जी हमारे बीच नहीं है, इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि वो यहीं कहीं आसपास हैं। यह गीत ही इतना आशावादी है, ज़िन्दगी से लवरेज़ है कि इस गीत को सुनते हुए यह कल्पना करना मुश्किल हो जाता है कि इसे गाने वाला शारीरिक रूप से हमारे साथ नहीं है। आइए इस गीत को सुनें और उनके कहेनुसार मुस्कुरायें और उनके मुस्कुराते हुए चेहरे को याद करें। गीतकार हैं नक्श ल्यालपुरी।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
आशा की आवाज़ में है ये गीत जगजीत द्वारा संगीतबद्ध

पिछले अंक में
एक बार फिर अमित जी एकदम सही हैं आप
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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