Saturday, August 27, 2016

"एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है...", क्यों इन्दीवर ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 90
 

'एक तू ना मिला ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 90-वीं कड़ी में आज जानिए 1966 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ के मशहूर गीत "एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल इन्दीवर के और संगीत कल्याणजी-आनन्दजी का। 


बात उन दिनों की है जब इन्दीवर जी बम्बई नहीं आए थे। थोड़ी-थोड़ी शोहरत मिल रही थी कवि सम्मेलनों के कारण। मध्य प्रदेश में होने वाले कवि सम्मेलनों में उन्हें ख़ास तौर से बुलाया जाता था। आमदनी भी हो जाती थी, घर चल जाता था। फिर एक ऐसा दौर आया जब इनकी बहन और बहनोई ने इन्दीवर जी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ दबाव डाल कर इनका विवाह झांसी की रहने वाली एक लड़की से करा दिया जिसका नाम था पार्वति। बिल्कुल शादी नहीं करना चाहते थे इन्दीवर जी। इसी वजह से अनमने से रहने लगे पत्नी के साथ। और शादी के कुछ समय बाद ही पत्नी से पीछा छुड़ाने की मनशा लिए तकरीबन बीस साल की उम्र में बम्बई भाग गए। बम्बई में दो साल तक संघर्षों के साथ भाग्य आज़माने की कोशिशें की। 1946 में फ़िल्म ’डबल फ़ेस’ में इन्दीवर जी के लिखे गीत पहली बार रेकॉर्ड हुए। किन्तु फ़िल्म चली नहीं। परिणाम यह हुआ कि इन्दीवर को जल्दी ही वापस अपने गाँव बरुवा लौट जाना पड़ा। अब भाग्य का खेल देखिए कि जिस पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए वो घर छोड़ कर भागे थे, अब उसी पत्नी से धीरे धीरे उनका लगाव और मोह होने लगा। और इसके चलते उन्होंने मन बना लिया कि वो उसे छोड़ कर कभी वापस नहीं जाएँगे। 

लेकिन उनकी पत्नी पार्वति को पता था कि उनका करीयर यहाँ इस गाँव में नहीं है। उनके हुनर की कद्र तो बम्बई में है। इसलिए धर्मपत्नी पार्वति देवी ने उन्हें वापस बम्बई जाने के लिए प्रेरित करना शुरु कर दिया। बहुत हौसला बढ़ाया। समझाया। बार बार कहा चले जाओ। और अन्त में उन्हें बम्बई लौट जाने के लिए राज़ी भी कर लिया। चले आए बम्बई। धीरे धीरे छोटी फ़िल्मों में गीत लिखने का काम भी मिलता गया। यह सिलसिला लगभग पाँच साल तक चलता रहा। अब इन्दीवर जी ने अपनी धर्मपत्नी पार्वति से गुज़ारिश की कि वो बम्बई आ जाए और साथ रह कर घर-परिवार को आगे बढ़ाए। परन्तु पार्वति देवी ने हमेशा के लिए बम्बई में रहने से इनकार कर दिया। पत्नी के इस इनकार का इन्दीवर जी को बहुत दुख हुआ, झटका लगा। वो पत्नी के ना करने से इतने नाराज़ हो गए कि उन्हें छोड़ दिया। छोड़ कर बम्बई चले आए। संघर्ष रंग लायी और 1951 में लिखे उनके गीत ने धूम मचा दी। फ़िल्म थी ’मलहार’ और गीत के बोल थे "बड़े अरमानों से रखा है बलम तेरी क़सम, प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम"। इन्दीवर जी बुलन्दियों पर पहुँच गए, मगर उनकी पत्नी से उनकी नाराज़गी ख़त्म नहीं हुई। और नतीजा यह हुआ कि वापस लौट कर कभी अपनी पत्नी के पास नहीं गए। 


इन्दीवार जी की नाराज़गी उनकी लिखी एक कविता में फूट पड़ी जब उन्होंने लिखा "जिसके लिए मैंने सब कुछ छोड़ा, वो ही  छोड़ के चल 
दी दिल मेरा तोड़ के चल दी"। जहाँ एक तरफ़ उनकी नाराज़गी रही, वहीं दूसरी तरफ़ शायद उनके मन में एक अपराधबोध भी ज़रूर रहा होगा पत्नी के प्रति अपने कर्तव्यों को ना कर पाने का। तभी उन्होंने कई गीत ऐसे लिखे जो फ़िल्मों की नायिकाओं की ज़ुबान के ज़रिए दुनिया तक पहुँचे। और इन तमाम गीतों में एक वियोगी पत्नी का दर्द छुपा हुआ रहा। एक पत्नी जिसके पति ने उसे बिना किसी ठोस कारण के छोड़ दिया हो, उसके दिल पर क्या बीतती है, उसके मन में कैसे भाव उठते हैं, उन्हें सकार करने की कोशिशें इन्दीवर साहब ने समय समय पर की। 1966 की फ़िल्म ’हिमालय की गोद में’ के गीत में उन्होंने लिखा "एक तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है, मेरा दिल ना खिला सारी बगिया खिले भी तो क्या है"। "तक़दीर की मैं कोई भूल हूँ, डाली से बिछड़ा हुआ फूल हूँ, साथ तेरा नहीं संग दुनिया चले भी तो क्या है", इस गीत का एक एक लफ़्ज़ जैसे उनकी पत्नी की तरफ़ ही इशारा करते हैं। संयोग से इसी गीत का एक सुखद संस्करण (happy version) भी लिखा गया था जिसके बोल थे "एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली, खिला जो मेरा दिल तो सारी बगिया खिली"। लेकिन उपहास देखिए कि "एक तू ना मिला" गीत ही ज़्यादा लोकप्रिय हुआ और लोगों के दिलों को ज़्यादा छुआ! 1968 में फ़िल्म ’सरस्वतीचन्द्र’ में इन्दीवर जी ने एक और ऐसा गीत लिखा "छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए, प्यार से भी ज़रूरी कई काम है, प्यार सबकुछ नहीं ज़िन्दगी के लिए"। और उनके ज़िन्दगी के इस घटना से सबसे ज़्यादा मिलता-जुलता गीत रहा 1970 की फ़िल्म ’सफ़र’ का - "हम थे जिनके सहारे वो हुए ना हमारे, डूबी जब दिल की नैया सामने थे किनारे"। ख़ैर, जो भी हुआ बुरा हुआ। ना इन्दीवर जी का परिवार आगे बढ़ पाया, और वो लड़की भी सारी ज़िन्दगी अकेली रही। बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई!!!




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




2 comments:

Rohit said...

बढ़िया जानकारी है। इतना गुस्सा किस काम का, ऐसी जिद्द किस काम की। एंटी शोहरत और पैसा कमाया, पर बिना किसी कारण दोनों ने ज़िन्दगी गवां दी।

अजय कुमार झा said...

एकदम रोमांचित करने वाली पोस्ट । गीत और उससे भी अधिक इंदीवर जी के बारे में जानना सुखद रहा

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